UPSC कोचिंगों में कंटेंट डेवलपर के रूप में कैरियर की समीक्षा

कंटेंट डेवलपर या कंटेंट राइटर कोचिंग क्षेत्र में स्थायित्व ग्रहण करने की और बढ़ता हुआ एक क्षेत्र हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसमें कंटेंट डेवलप करना होता हैं। कोचिंग क्षेत्र में कई प्रकार के कंटेंट डेवलप किये जाते हैं, जैसे कि- स्टडी मटेरियल, करेंट अफेयर्स, डेली न्यूज़, मंथली मैगज़ीन, टेस्ट सीरीज, मॉडल आंसर इत्यादि। ये सब कंटेंट कोचिंग में पढने वाले छात्रों को उपलब्ध कराया जाता हैं।  कंटेंट एक प्राइमरी प्रोडक्ट की तरह भी कार्य करता हैं। इसी कंटेंट के आधार पर टीचर अध्यापन कार्य करवाता हैं, टेस्ट सीरीज करवाई जाती हैं और फिर मॉडल आंसर उपलब्ध कराये जाते हैं। इसी कंटेंट को एक्सप्लेनेशन विडियो बनाने के लिए भी प्रयुक्त किया जाता हैं। इस प्रकार कंटेंट कोचिंग इंडस्ट्री में एक प्राइमरी प्रोडक्ट की भूमिका निभाता हैं और कंटेंट बनाने वाले बेक एंड प्लेयर्स की भूमिका में होते हैं। कंटेंट डेवलपर की भूमिका टीचर के विपरीत होती हैं, वह छात्रों से सीधा जुड़ने के कारण फ्रंट एंड प्लेयर होता हैं। आजकल कोचिंग क्षेत्र अपनी गहरी जड़े जमा चूका हैं, कोटा, जयपुर, पटना, दिल्ली जैसे शहरों की अर्थव्यवस्था में कोचिंग क्षेत्र बड़ी भूमिका निभा रहा हैं। ऐसे में फ्रंट एवं बेक एंड दोनों की समान आवश्यकता महसूस की जा रही है। दोनों ही प्रोफाइल स्थायित्व ग्रहण कर रही हैं।

विभिन्न प्रश्नों के माध्यम से इस आलेख में मैं अपने अनुभव को साझा कर रहा हूँ।

आपने इसे ज्वाइन करने का निर्णय क्यों लिया?

मैं 2015 में अपनी ग्रेजुएशन पूर्ण होने के बाद से लगातार यूपीएससी द्वारा आयोजित होने वाली सिविल सेवा की परीक्षा दे रहा था। तैयारी के माध्यम से मैंने अपनी एकेडमिक स्किल्स में काफी वृद्धि की थी। मैंने तीन बार मुख्य परीक्षा में कटऑफ के बहुत नजदीक अंक प्राप्त किए थे। 2016 में मेरा इंटरव्यू कॉल 12 मार्क्स (718/730) से रह गया था। 2018 में मैं UPSC सिविल सेवा के प्रीलिम्स में ही फ़ैल हो गया था परन्तु RAS का प्रीलिम्स पास हो गया था। ऐसे में 2019 में आयोजित RAS की मुख्य परीक्षा देने के बाद मैं पूरी तरीके से फ्री था, तब मैंने सोचा था कि अपने एकेडमिक नॉलेज का उपयोग करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त पारिवारिक वित्तीय दबावों के कारण भी रोजगार प्राप्त करना आवश्यक था। चूँकि कोचिंग वाले वेतन भी अच्छा प्रदान कर रहे थे, जो कि सरकारी जॉब के समान ही था। इसलिए मुझे यह बेहतर विकल्प लगा।

आपकी जोइनिंग किस प्रकार हुई?    

ज्वाइन करने का निर्णय लेने के बाद, मुझे एक दोस्त ने बताया कि एक नई कोचिंग यूथ डेस्टिनेशन के नाम से शुरू हुई हैं, उसने एक दिन विज्ञापन जारी किया था। इसके बाद मैं कोचिंग के ऑफिस गया और HR को अपना रिज्यूमे दिया, तीन दिन बाद उन्होंने मुझे टेस्ट के लिए बुलाया और कुछ सैंपल लिख कर लाने को कहा। अगले दिन सैंपल सबमिट करने के बाद कंटेंट हेड ने मेरी मुलाकात उच्चाधिकारी से करवाई, जिन्होंने इंटरव्यू लिया। इसके बाद मुझे अगले दिन से आने की बोल दिया, पर कहा कि अभी आप अपने आपको स्थायी नहीं माने, हम आपको सात दिन के ट्रायल पर रख रहे हैं। पर वे मेरे काम से पहले दिन ही खुश हो गये थे, तो उन्होंने अगले दिन कुछ दस्तावेज और बैंक डिटेल्स उपलब्ध करवाने को कह दिया था। इस प्रकार मेरी फर्स्ट जॉब की शुरुआत हुई। कहते हैं कि हमे अपने को पहली जॉब देने वालो को कभी नहीं भूलना चाहिए, इसलिए मैं भी HR मैडम पूजा शर्मा जी, कंटेंट हेड अतुल मिश्रा जी का बहुत-बहुत आभार व्यक्त करना चाहता हूं।

यूथ डेस्टिनेशन में मेरा वेतन सोलह हजार रूपये था, इसलिए द हिन्दू में प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर मैंने विज़न में भी आवेदन कर दिया था। जहाँ पर लिखित परीक्षा एवं इंटरव्यू के बाद मेरा चयन हो गया था और मेरा वेतन भी वर्तमान से दोगुना (बत्तीस हजार रूपये) था। यूथ डेस्टिनेशन में 35 दिन जॉब करने के बाद, मैंने 27 अगस्त 2019 को विज़न में अपना कैरियर शुरू किया था।

विज़न में कार्य संस्कृति किस प्रकार की थी?

विज़न आईएएस कोचिंग फॉर्मल सेक्टर में कार्य करता हैं, जिसमे हरेक एम्प्लोयी को सभी विधिसम्मत सुविधा प्रदान की जाती हैं। ज्वाइन करते समय कॉन्ट्रैक्ट एक्ट के नियमानुसार ऑफर लैटर जारी किया जाता हैं, जिसमे वेतन, कार्यावधि एवं अन्य चीजों का वर्णन होता हैं। सप्ताह में 6 दिन प्रात: दस बजे से सांय छ: बजे तक कार्यदिवस होता था। सभी नेशनल होलीडे पर अवकाश होता था। बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम था। टेस्ट सीरीज और करंट अफेयर्स के लिए अलग-अलग टीम थी। मैं करेंट अफेयर्स वाली टीम में था।

टीम लीडर द्वारा रोजाना कार्य आवंटन किया जाता था। इसकी सूचना ईमेल के माध्यम से प्रदान की जाती थी। ऑफिस जाने के बाद इसे पूर्ण करना होता था। 1500 शब्दों का काम रोजाना के हिसाब से आवंटित किया जाता था। अगर किसी के टॉपिक पहले कम्पलीट हो जाते तो उसे उन्हें फिर से देखने को कहा जाता था ताकि किसी प्रकार की कोई त्रुटि न रहे। इस प्रकार वर्क लोड ज्यादा नहीं था। कभीकभार ही काम 1800 शब्दों तक पहुंचता था। कार्य कितना ज्यादा है या कितना कम है, यह मैटर नही करता, टीम और टीम लीडर का व्यवहार बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं। टीम लीडर का व्यवहार बहुत ही सपोर्टिव था, वे आगे पढाई के लिए भी प्रोत्साहित करते थे। मेरे टीम लीडर ने प्रारंभ के 3 महीने इंडस्ट्री स्टैण्डर्ड को सिखाने में बहुत ही ज्यादा मदद की। इसलिए मुझे वर्क कल्चर भी बहुत ही ज्यादा अच्छा लगा।

एक कंटेंट डेवलपर में किस प्रकार की स्किल्स होनी चाहिए?

एक कंटेंट डेवलपर में एकेडमिक और टेक्निकल स्किल्स होनी चाहिए। एकेडमिक स्किल्स में सब्जेक्ट का नॉलेज होना चाहिए ताकि प्रासंगिक चीजो को जोड़ा एवं आवश्यकतानुसार हटाया जा सके। उसी प्रकार टेक्निकल स्किल्स में MS-Word, Google Doc, गूगल इनपुट टूल और गूगल सर्च के बारे में जानकारी होनी चाहिए।

कंटेंट डेवलपर की भूमिका एवं उत्तरदायित्व क्या होती हैं?

एक कंटेंट डेवलपर टीम लीडर द्वारा आवंटित कार्य के संपादन के लिए उत्तरदायी होता हैं। कोचिंग क्षेत्र में किए जाने वाले प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:

  • स्टडी मटेरियल तैयार करना और समय-समय पर अपडेट करना।
  • डेली न्यूज़, MCQ एवं अन्य अभ्यास पत्रक तैयार करना।
  • टेस्ट सीरीज तैयार करना और उनके मॉडल उत्तर तैयार करना। आदि

कंटेंट डेवलपर के कैरियर का भावी संभावना क्या हैं?

खुद कोचिंग का जीवनकाल बहुत छोटा होता है। इसलिए कोचिंग के बंद होने पर कंटेंट डेवलपर का कैरियर भी जोखिम में आ जाता है। इसलिए लॉन्ग टर्म के लिए इसकी सलाह नहीं दी जा सकती। हालांकि कंटेंट डेवलपर आगे फैकल्टी के रूप में पढाना शुरू कर सकता हैं, तब कैरियर को स्थायी बनाने के लिए अधिक विकल्प प्राप्त हो जाते हैं।

किसी अभ्यर्थी को कब ज्वाइन करना चाहिए?

जब कोई अभ्यर्थी कम मार्क्स से रह जाता है और फिर से कोशिस करना चाहता हैं। अगर उसे वित्तीय दबाव महसूस हो रहा है, तब वह ज्वाइन कर सकता हैं। ऐसी स्थिति में ज्वाइन करने से वह पढाई से जुड़ा रहेगा और वित्तीय सहायता भी प्राप्त होगी। जो अभ्यर्थी कम मार्क्स से रहते हैं, और अगले अटेम्पट में भी काफी टाइम होता हैं, तब रूम पर खाली रहने के बजाय ज्वाइन कर लेना चाहिए। इससे न केवल वित्तीय आवश्यकता पूर्ण होती है, बल्कि जॉब का अनुभव भी हो जाता है।

हालाँकि मैं फ्रेशर को ज्वाइन नहीं करने की सलाह दूंगा, क्योंकि उन्हें अभी अपने अटेम्पट देने चाहिए। एक बार पैसे के लालच में फंस गये तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा। जॉब करते वक्त इतना टाइम भी नहीं मिलता की ज्यादा पढाई कर सके।

निष्कर्ष 

कंटेंट डेवलपर पार्ट टाइम जॉब के लिए एक बेहतरीन विकल्प हैं। कुछ अच्छे संस्थानों में यह बेहतरीन करियर विकल्प प्रदान करता हैं। अभ्यर्थियों की डिमांड इस क्षेत्र में जॉब पाने के लिए बढ़ रही हैं, इसका फायदा फ्रीलांसर मोड़ में काम करवाने वाले उठा रहे हैं। इसलिए गैर-संगठित क्षेत्र के ऐसे अभिकर्ताओं को कानून के दायरे में लाने की आवश्यकता हैं। साथ हो कंटेंट डेवलपर को भी संगठित होकर इंडस्ट्री से बात करनी चाहिए। 

UPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2019 निबंध प्रश्न पत्र

सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2019, निबंध प्रश्न-पत्र का इस आलेख में सटीक दृष्टिकोण बताया जा रहा हैं। किसी निबंध के मॉडल उत्तर में किन-किन पक्षों को शामिल किया जाना चाहिए तथा सम्बन्धित विषय पर क्या संतुलित दृष्टिकोण होना चाहिए, इन सबको आप इस आलेख में देख सकते हैं। इसी तरह की हमारी पहल को गत वर्ष भी काफी सराहा गया था।
खंड I
  1. विवेक सत्य को खोज निकालता है।  (Wisdom finds truth)
  2. मूल्य वे नही जो मानवता है, बल्कि वे है जैसा मानवता को होना चाहिए।  (Values are not what humanity is, but what humanity ought to be)
  3. व्यक्ति के लिए जो सर्वश्रेष्ट है, वह आवशयक नही की समाज के लिए भी हो। (Best for an individual is not necessarily best for the society)
  4. स्वीकारोक्ति का साहस एवं सुधार करने की निष्ठा सफलता के दो मंत्र है। (Courage to accept and dedication to improve are two keys to success)
खंड II
  1. दक्षिण एशियाई समाज सत्ता के आस-पास नही, बल्कि अपनी अनेक संस्कृतियों और विभिन्न पहचानो के ताने बाने से बने है। (South Asian Societies are woven not around the state, but around their plural cultures and plural identities)
  2. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा की उपेक्षा भारत के पिछड़ेपन का कारण हैं। (Neglect of primary healthcare and education in India are reasons for its backwardness)
  3. पक्षपातपूर्ण मीडिया भारत के लोकतंत्र के समक्ष एक वास्तविक खतरा है। (Biased media is a real threat to Indian Democracy)
  4. कृत्रिम बुद्धि का उत्थान:भविष्य में बेरोजगारी का खतरा अथवा पुनर्कौशल और उच्च-कौशल के माध्यम से बेहतर रोजगार के सृजन का अवसर। (Rise of Artificial Intelligence: the threat of jobless future or better job opportunities through reskilling and upskilling)


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खंड I के निबंधों से संबंधित सही दृष्टिकोण

1.1.विवेक सत्य को खोज निकालता है।
(Wisdom finds truth)

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1.2.मूल्य वे नही जो मानवता है, बल्कि वे है जैसा मानवता को होना चाहिए।
(Values are not what humanity is, but what humanity ought to be)
एक मापदंड के रूप में मूल्यों ने किसी समाज, देश या संगठन के लक्ष्यों और उद्देश्यो की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समाज के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक मूल्यों को हमेशा सराहा गया है।मानव समाज के हितों की प्राप्ति के लिए भी मूल्यों का निर्धारण किया गया है। जिन्हें मानवीय मूल्य कहा जा सकता है। सभी लोगो को इन मूल्यों को अंगीकृत करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। एक तरह से मानव समाज के ऐसा होने की उम्मीद की जाती है।
  • लेकिन मूल्यों का यह मापदंड मानवीय उद्देश्यो में पूर्णतः सफल नही रहा है क्योंकि : कई मूल्य हिंसक, द्वेषतापूर्ण, पक्षपातीय और समयातीत है। भौतिकतावादी दौड़ के कारण मूल्यों का क्षरण हो रहा है। मूल्यों की प्राप्ति हमेशा से आदर्श रही है और माना जाता रहा है कि लोगो की सामाजिक आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं है कि वे आदर्शो को व्यवहार में अपना सके।मानवीय हितों पर आधारित मूल्यों ने प्रकृति की अनदेखी की है।
  • इसलिए मूल्यों ने तो मानवता को समुचित राह दिखाई। लेकिन मानवता ने  मूल्यों को हमेशा कमतर आंका। इसका परिणाम यह रहा कि अनैतिकता को समाज मे मान्यता मिलने लगी। उदारहण के लिए भ्रष्टाचार करने वालो को लोगो द्वारा गलत नही मानना। अगरिमामय और शोषणकारी गतिविधियों को नियति मान लिया गया और विरोध करने वालो को   बगावती या विद्रोही माना गया। एक तरह से मूल्यों का नवीनीकरण जटिल हो गया।
  • ऐसे में जरूरी है कि मूल्यों की शाश्वतता को बनाये रखा जाए, उसे मानवीय हितों के अनुकूल सुविधा अनुसार परिभाषित नही किया जाए। उसके पालन को समाज और सरकारो द्वारा बढ़ावा दिया जाए। अगरिमापूर्ण चीजो को समाप्त किया जाए और सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाए।
निष्कर्ष :
मूल्य सार्वभौमिक होते है, वे सुविधा के अनुसार प्रभावित नही होते। मूल्यों को संकीर्ण आधार पर निर्धारित नही किया जाना चाहिए। इसलिए यहां भी मानवता को मूल्यों से बढ़कर नही मानना चाहिए, बल्कि मानवता भले ही मूल्यों को निर्धारित करती हो परन्तु वह भी मूल्यों के अधीन ही है।


1.3.व्यक्ति के लिए जो सर्वश्रेष्ट है, वह आवशयक नही की समाज के लिए भी हो।
(Best for an individual is not necessarily best for the society)

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1.4.  स्वीकारोक्ति का साहस एवं सुधार करने की निष्ठा सफलता के दो मंत्र है।  
(Courage to accept and dedication to improve are two keys to success)
जीवन में हर मुकाम पर खुद को बनाये रखने और आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ता हैं। संघर्ष के परिणाम कई बार अनपेक्षित भी प्राप्त होते हैं। ऐसे में कई लोग परिणाम को स्वीकार करके अपनी राह बदल लेते हैं और कमतर परिणामो से संतुष्ट हो जाते हैं। कुछ लोग परिस्थितियों या व्यवस्था को दोष देने लग जाते हैं। लेकिन सफलता के प्रति जुनूनी लोग अपनी गलतियों को स्वीकार करने में हिचकिचाते नही हैं। वे उनमे सुधार करके फिर से कोशिश करते हैं। इस तरह वे प्रयास करते हुए सफलता को प्राप्त कर जाते हैं।
  • स्वीकारोक्ति की आवश्यकता : 
  • स्वीकार नही करने के नुकसान :
  • गलतियों से सबक और सुधार के बाद सफल होने वालो के उदाहरण 
  • सफलता के लिए क्यों जरुरी हैं  
  • उदहारण :
  • वर्तमान सन्दर्भ : 
निष्कर्ष :




UPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2018 निबंध प्रश्न पत्र

सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2018, निबंध प्रश्न-पत्र का इस आलेख में सटीक दृष्टिकोण बताया जा रहा हैं। किसी निबंध के मॉडल उत्तर में किन-किन पक्षों को शामिल किया जाना चाहिए तथा सम्बन्धित विषय पर क्या संतुलित दृष्टिकोण होना चाहिए, इन सबको आप इस आलेख में देख सकते हैं। इसी तरह की हमारी पहल को गत वर्ष भी काफी सराहा गया था।
खंड I
  1. जलवायु परिवर्तन के प्रति सुनम्य भारत हेतु वैकल्पिक तकनीकियां (Alternative Technologies for a Climate Change resilient india)
  2. एक अच्छा जीवन प्रेम से प्रेरित तथा ज्ञान से संचालित होता है (A good life is one inspired by love and guided by knowledge)
  3. कही पर भी गरीबी हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है (Poverty anywhere is a threat to prosperity everywhere)
  4. भारत के सीमा विवादों का प्रबंधन - एक जटिल कार्य (Management of Indian border disputes - a complex task)
      खंड II
      1. रूढ़िगत नैतिकता आधुनिक जीवन का मार्गदर्शक नहीं हो सकती है। (Customary morality can not be a guide to modern life)
      2. अतीत मानवीय चेतना तथा मूल्यों का एक स्थायी आयाम है। (The past is a permanent dimension of human consciousness and values)
      3. जो समाज अपने सिधान्तो के ऊपर अपने विशेषाधिकारों को महत्व देता है, वह दोनों से हाथ धो बैठता है। (A people that values its privileges above its principles, loses both is defeated by both of them.)
      4. यथार्थ आदर्श के अनुरूप नहीं होता है , बल्कि उसकी पुष्टि करता है। (Reality Does not conform to the ideal, but confirms it.)

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          खंड I के निबंधों से संबंधित सही दृष्टिकोण

          1.1.जलवायु परिवर्तन के प्रति सुनम्य भारत हेतु वैकल्पिक तकनीकियां।
          (Alternative Technologies for a Climate Change resilient india)

          जलवायु परिवर्तन के नुकसान देशों को भारी जान माल की क्षति कर रहे है। वैश्विक स्तर पर सभी देशो द्वारा इन नुकसानों का न्यूनीकरण करने पर ध्यान दिया जा रहा है। यह मुद्दा कई अंतर्राष्ट्रीय मंचो के एजेंडा का हिस्सा रहा है। सेंडाइ फ्रेमवर्क हो या फिर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन से संबंधित क्षेत्रीय आयोजन हो। सभी में इस पर लक्ष्यबद्ध तैयारी को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। भारत ने भी इन प्लेटफार्म की सदस्यता ली है और इनके लक्ष्यों का अंगीकरण भी किया है ताकि जलवायु परिवर्तन संबंधित जोखिमो को निम्नीकृत किया जा सके। 
          • इन तकनीकियों को अपनाने की क्यों जरुरत है -  Explain india's Vulnerability
          • इस सिलसिले में परम्परागत तरीको को अनुकूलित किए जाने की आवश्यकता है वही उनके जलवायु निम्नीकरण स्वभाव को न्यूनीकृत भी किया जाना चाहिए। इसके लिए निम्न तकनीकि उपयोगी हो सकती है -  Explain INDC and other technologies
          • लेकिन ये तकनीकियां मानस पटल पर ही रहेगी अगर हम इन्हे जमीं पर उतारने में काबिल नहीं हो सके तो , इसके लिए हमे इनके लिए तकनिकी और वित्त संबंधित जरुरतो की पूर्ति पर ध्यान देना होगा। अब इनके समाधान के लिए हम प्रयासरत तो है ही लेकिन सीमाओं को देखते हुए अधिक व्यवहार्य समाधानों पर विचार करने की जरुरत है। - Affordable and accessible solution
          • वैकल्पिक तकनीकियों के निम्न फायदे हो सकते है - ये निवेश का जरिया बनेगी, लोगो के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे और हरित अर्थव्यवस्था का आधार निर्मित होगा। अन्य फायदे तकनीकी के नवाचार से जुड़े हो सकते है।  
          • वैकल्पिक तकनीकियों के निम्न नुकसान हो सकते है- महँगी होगी , परम्परागत ज्ञान की उपेक्षा होगी या फिर उसके लाभ से वे वंचित रह सकते है। 
          निष्कर्ष : में कहा जा सकता है कि अत भारत को इन तकनीकियों को अपनाने पर ध्यान तो देना ही चाहिए , लेकिन इससे जुड़े सकारत्मक और नकारत्मक मुद्दों पर भी ध्यान दे लेना चाहिए। 

          1.2.एक अच्छा जीवन प्रेम से प्रेरित तथा ज्ञान से संचालित होता है।
          (A good life is one inspired by love and guided by knowledge)

          एक अच्छे जीवन की प्रकृति पर हमेशा विमर्श चलता रहता है। कुछ लोग इसका आंकलन पहले धन के आधार पर करते थे लेकिन हम देखते है कि धन रिश्तो में प्रेम का आभाव बना देता है और जीवन नीरस  या यांत्रिक अधिक प्रतीत होता है, वही गरीब आदमी पारिवारिक प्रेम की बदौलत ख़ुशी से अपना जीवन गुजारता है। लेकिन गरीब आदमी शिक्षा जैसे संसाधनों तक सीमित पहुंच के कारण अपने जीवन की गुणवत्ता को निम्नतर ही रखता है। प्रेम खाने को थोड़ी देता है। इसके लिए तो पैसा चाहिए जो कि ज्ञानार्जन के माध्यम से किए गए कुछ आर्थिक कार्यो पर निर्भर करता है। इसलिए हम देख सकते है की अच्छा जीवन अधिक प्रेम से भी प्रेरित नहीं होता, न ही अधिक ज्ञान से संचालित होता है। इसके लिए सभी गतिविधियों का समायोजन चाहिए। एक दूसरे को समय देना आना चाहिए। धनार्जन भी जरुरी है।  
          • जीवनशैली में प्रेम का महत्व : संतुलित प्रेम और प्रेम की अधिकता बिगड़ देती है और बच्चे कॅरिअर खराब कर लेते है , उसके बाद केवल प्रेम ही अच्छे जीवन का आधार नहीं है। 
          • ज्ञान से संचालित : ज्ञान से जीवन शैली की गुणवत्ता बढ़ती है। वः सही मायने में अच्छे जीवन की तरफ जाता है , लेकिन ज्ञान तर्क पर आधारित होता है जो जीवन को नीरस बना देता है। 
          • संतुलन : अच्छे जीवन के लिए ज्ञान और प्रेम दोनों में संतुलन होना चाहिए। 
          • अच्छे जीवन की लोकप्रिय धारणा और उस पर ये दोनों मानदंड : मानव विकास सूचकांक के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आय। ऐसे में धनार्जन पर ध्यान देना भी जरुरी है। जिसकी बदौलत सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है। 
          निष्कर्ष : अच्छे जीवन का पैमाना विविधता लिए हुए है जो अलग अलग चीजों पर निर्भर करता है. ये दोनों इसका बड़ा हिस्सा है। जिन की उपलब्धता पर हमे ध्यान देना चाहिए।  
          फैक्ट : Happiness index, HDI, Social justice based life

          1.3.कही पर भी गरीबी हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है।
          (Poverty anywhere is a threat to prosperity everywhere)

          आधुनिक सभ्य समाज में असमानता पर प्रश्न काफी दिनों से खड़ा किया जाता रहा है। जिसमे बहुआयामी गरीबी को जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी खत्म करने की बात कहि जाती है। सङ्ग में भी इस चीज के लक्ष्य निर्धारित किए गए है। जिसके लिए सभी देशो की सरकार प्रयासरत है। उसके अलावा कई निजी संस्थाए भी कार्यरत है। इस तरह के बहुआयामी प्रयासों वाले गरीबी के प्रश्न को अलगाव का विषय नहीं मानने की अवधारणा है। यह कही न कही दूसरे क्षेत्रो को भी प्रभावित करती है। 
          • गरीबी कैसे दूसरे क्षेत्रो को प्रभावित करती है - लोकतत्र कमजोर होता है, सही नीतिया नहीं बनती, जिससे शोषण या तो बढ़ता है या फिर सम्बोधित नहीं होता। अर्थव्यवस्था को भी शिथिल करती है , मांग का अभाव, उत्पादन और आगे रोजगारो को प्रेरित नहीं करता है।  सांस्कृतिक तोर पर भी विषमता उत्पन्न होती है जो देश के मूल्यों का विभाजन कर देती है , जिसकी वजह से समान रूप से लोगो का सम्बोधन रुक जाता है। समाज में भी व्यक्तिवाद जल्दी से घर कर जाता है।  संकीर्णतम विचारधाराओ को उर्वर भूमि मिल जाती है। 
          • लेकिन समृद्धि भी गरीबो के लिए मुश्किलें खड़ी करती है। जो आज के हालत में देख सकते है। धनि लोग उनके हको पर कब्जा कर रहे है और अपने नैतिक मूल्यों को ढीला कर रहे है। उन्हें विस्तापित करती है। 
          • उदाहरण जैसे नक्सलियों की गरीबी पुरे देश की सुरक्षा के लिए खतरा है, जिसके बदौलत निवेशकों की आनाकानी इस असुरक्षा को बढाती है।  
          • उठाये जाने वाले कदम- ताकि कोई क्षेत्र गरीब छूटे ही नहीं और अगर रह भी जाए तो उसे कैसे ऊपर लाये। 
          निष्कर्ष : हमारी संस्कृति लोगो को साथ में लेकर चलने की है। कोई पीछे छूट गया तो उसे साथ में लाना चाहिए। आरक्षण इसका उदारहण है। इसके अलावा आमिर लोगो को अपना न्य वर्ग बनाने की बजाय वर्गहीन समाज को बढ़ावा देना चाहिए।

          1.4.  भारत के सीमा विवादों का प्रबंधन - एक जटिल कार्य ।
          (Management of Indian border disputes - a complex task)

          भारत एक बड़ी सीमा रखा का धनी है जो भौगोलिक रूप से समुद्र, रेगिस्तान, पहाड़ ,बर्फ, नदी-नाले, कीचड़ आदि के द्वारा बनती है। इसके अलावा यह सीमा कई देशों के साथ साझा होती है ,जिसमें से अधिकतर के साथ संबंध सही नही रहे है। ऐसे में यह चुनौती और बढ़ जाती है। इस सीमा के प्रबंधन के लिए बहुत सारी सुरक्षा एजेंसी भी कार्यरत है। जिसके कारण इसमें कोर्डिनेशन भी मुद्दा बना रहता है।  अंतरराष्ट्रीय सीमा घुसपैठ, तस्करी, चरमपंथियों के आवागमन  संबंधित मुद्दों से जूझ रही है। वही सैन्य प्रबंधन के लोगो को खराब दशा में कार्य करना पड़ता है। दूसरे देशो के सैन्य दलों के साथ कई बार मुठभेड़ की घटनाए भी होती है। 
          • सीमा विवादों की प्रकृति और उसकी वजह से क्या मुद्दे खड़े होते है। 
          • सीमा विवादों के समाधान क्या हो सकते है - क्षमता निर्माण, अवसंरचना निर्माण। राजनयिक प्रयास 
          • समाधानों की सीमाए क्या है - क्यों ये प्रभावी नहीं हो पा रहे है। 
          • सीमा विवादों का सुलझना अर्थव्यवस्था के हितो में जरुरी है। इसके लिए आगे की राह कैसी होनी चाहिए - न केवल सीमा विवादों का सुलझना चाहिए , बल्कि क्षेत्रीय एकीकरण के लिए कार्यकरना चाहिए। जिसका लाभ सभी को होगा। भारत की अफगानिस्तान तक पहुंच बढ़ेगी।  रक्षा बजट में कमी आएगी। मानव विकास में इजाफा होगा। 
          निष्कर्ष : हम दोस्त बदल सकते है लेकिन पडोसी नहीं।  इसलिए हमे इन संबंधो को सुधारने की बुनियाद सीमा विवादों के समाधान पर ध्यान देना चाहिए। जिससे हम देश के किसी भी हिस्से में होने वाली अनिश्चितताओं को रोक सके। क्षेत्र को आधुनिक मूल्यों की शक्ल दे सके, कब तक औपनिवेशिक विरासत से जूझते रहेंगे। 



          खंड II के निबंधों से संबंधित सही दृष्टिकोण

          2.1.रूढ़िगत नैतिकता आधुनिक जीवन का मार्गदर्शक नहीं हो सकती है।
          (Customary morality can not be a guide to modern life)

          भारतीय समाज विकास के आसमान स्तरो पर रहा है। जिसमे कुछ लोग आधुनिक मूल्यों को जल्दी ही प्राप्त कर लिए और कुछ लोग अभी भी परम्परागत मूल्यों के चिपके हुए है। इसके कारण समाज की गतिशीलता में विसंगति देखी जाती है। आधुनिक मूल्य वालो को प्राचीन वाले बिगड़े हुए मानते है, वही प्राचीन वालो को आधुनिक मूल्य वाले लोग पिछड़े हुए मानते है। अब हमे इसी पर विचार करना है कि वर्तमान आधुनिक जीवन में कोनसे मूल्य सही है और कोनसे गलत।  

          किसी भी समाज, संस्था या देश का संचालन कुछ नियमो के माध्यम से होता है। ये नियम उस समाज के उद्देशो की पूर्ति से जुड़े होते है। हमारा व्यवहार अगर उन नियमो के अनुरूप है जो संगठन के लक्ष्यों की पूर्ति में सहायक है तो हमे नैतिक समझा जाएगा। वही हमारा व्यवहार अगर उन नियमो के अनुरूप नहीं है या संगठन के लक्ष्यों में बाधा बनता है तो हमे अनैतिक समझा जायेगा। जैसे जैसे समय बदलता है, यह नैतिकता बदलती जाती है। स्थान के अनुसार भी यह बदलती है। 
          • आधुनिक समाज की प्रगति में रुकावट बने परंरागत मूल्य :  हमारा समाज आगे बढ़ गया। लेकिन कुछ मूल्य इस समाज को आधुनिक दौड़ में शामिल नहीं करा सके, जिनमे महिलाओ की शिक्षा से संबंधित प्रमुख है।
          • आधुनिक समाज के आधुनिक मूल्यों द्वारा उत्पन्न की गई विसंगति :जैसे महिलाओ को उपभोग की वस्तु मानना। अश्लीलता का प्रचलन 
          • आधुनिक जीवन में पश्चिमी मूल्यों की आवश्यकता : सयंम आधिरत जीवन और जलवायु परिवर्तन 
          निष्कर्ष : अत: हम कह सकते है की परम्परागत मूल्यों के संवर्धन की जरुरत है की उनको नकारने की। भारतीय मूल्यों की जड़े काफी गहरी है इसलिए उन्हें बेकार बताना सही नहीं है। भारतीय मूल्य परिष्कृत होकर समाज को बेहतर दिशा देते है। 

          2.2.अतीत मानवीय चेतना तथा मूल्यों का एक स्थायी आयाम है।
          (The past is a permanent dimension of human consciousness and values)

          मानवीय मूल्य और चेतना हमेशा गतिशील होती है। मानव जिस समाज में रहता है उसके अनुकूल अपने को ढालने के लिए अपने मूल्य विकसित करता है। इन सबके लिए उसे उस क्षेत्र की समझ बहुत सहायता करती है। ऐसे में उस समाज के पास इतिहास का समृध्द अनुभव उसके मूल्यों को बहुत धनवान बना सकता है। उसमे गलती होने के अवसर खत्म हो जाते है। इस प्रकार इतिहास एक आयाम की तरह कार्य करता है। 

          लेकिन इतिहास को हमेशा याद रखना उसके लिए अनिवार्य हो जाता है, वरना पुराणी चीजे फिर से दोहराई जा सकती है। इसलिए इतिहास एक स्थायी आयाम प्रतीत होता है। लेकिन मानव की चेतना भी विकसित होती रहती है। इसलिए वह इतिहास की उपेक्षा करके नवीन रास्ते अपना लेता है। जब वह सफल हो जाता है तो इतिहास के स्थायी आयाम की बात कंडित हो जाती है। 

          निष्कर्ष :  इसलिए मानव चेतना और मूल्यों में इतिहास एक आयाम तो होता है लेकिन स्थायी जैसी कोई चीजे नहीं होती है। क्योकि मानव चेतना स्वतंत्र होती है।

          2.3.जो समाज अपने सिधान्तो के ऊपर अपने विशेषाधिकारों को महत्व देता है, वह दोनों से हाथ धो बैठता है।
          (A people that values its privileges above its principles, loses both is defeated by both of them)

          किसी समुदाय या जगह पर बाउट सारे समाजो का अधिवास होता है। उनमे से कोई समाज वर्चस्वकारी  भूमिका में होता है तो कोई अधीनस्थ की भूमिका मे। ऊपर वाला समाज अपने वर्चस्व की बदौलत कुछ विशेषाधिकारों का उपभोग करता है। इसके लिए वह कुछ सिधान्तो के द्वारा अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करता है। लेकिन समाज गतिशील होता है उसमे स्थापित वर्ग को चुनौती मिलती है और दूसरा वर्ग स्थापित होता है। यह चक्र चलता रहता है। 

          लेकिन बात संतुलन की है किसके सिद्धांत अच्छे थे। इसे हम उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे -
          • ब्राह्मणो ने चतुर्वर्ण के सिद्धांत के आधार पर विशेषाधिकारों का प्रयोग किया, जिसमे व्यक्तिगत हितो केंद्र में रखकर चतुर्वर्ण का सिद्धांत बनाया गया था। आगे विशेषाधिकार भी नहीं रहे और न ही सिद्धांत रहा। अगर सिद्धांत में कुछ पवित्रता होती तो विशेषाधिकारों को चुनौती नहीं मिलती। 
          • अंग्रेजो ने भी सभ्य बनाने के लिए नस्लवाद के सिद्धांत के आधार पर विशेषाधिकारों का उपभोग किया, उनको भी लोगो ने भगा दिया। 
          • यही हाल यूरोप के सामंतो का हुआ था। 
          • लोकतान्त्रिक नेताओ ने लोकतांत्रिक सिद्धांतो के माध्यम से विशेषाधिकार प्राप्त किए। जिन्हे कोई चुनौती नहीं दे पा रहा है क्योकि इनमे सिद्धांतो की प्रमुखता है। यहां पर भी विप कल्चर के बढ़ने पर उसे चुनौती दी जाती है। 
          निष्कर्ष :  इसलिए यहां पर मुद्दा यह है की विशेषाधिकारों का अगर उपभोग करना है तो उनके लिए सिद्धांत नैतिक होने चाहिए, उनमे किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हो ,कोई भी प्रतिभा के आधार पर वहां तक पहुंच सके। लोकतंत्र की महत्ता यह से भी सही सिद्ध हो जाती है।

           2.4.यथार्थ आदर्श के अनुरूप नहीं होता है , बल्कि उसकी पुष्टि करता है।
          (Reality Does not conform to the ideal, but confirms it.)

          हक़ीक़त हम सब जानते है कि आदर्श से कोसो दूर होती है। लेकिन हकीकत की कोशिस हमेशा आदर्श के नजदीक जाने की होती है। मतलब हकीकत की आदर्श की तरफ झुकाव उसकी पुष्टि करता है। इसलिए हम किसी भी उद्देश्य को दिशा देने के लिए एक आदर्श लक्ष्य मन में स्थापित कर लेते है। 
          • लेकिन वर्तमान में आदर्श को मनोरंजन जगत की शक्तिया निर्धारित कर रही है, इस वजह से आदर्श विलासिता वाला होता जा रहा है, वह परम्परागत तरीको की वैकल्पिक विधियों की सरासर उपेक्षा कर रहा है। इसकी वजह से लोगो की निजी जिंदगी खराब होती जा रही है -लोगो में तनाव बढ़ रहा है, अवैध संबंध पनप रहे है, लोग भौतिक चीजों को बसने में लगे हुए है, इन सबका दबाव पर्यावरण पर पद रहा है। 
          • इसलिए आदर्शलोक को हक़ीक़त के पैमाने पर रख करके आंकना चाहिए। मार्क्स आदि भी यूटोपियन माने जाते है। जिन्होंने समाजवाद के नाम पर कई लड़ाई लडवाई, जबकि हक़ीक़त दुनिया पूंजीवाद में ही तलाशती है। आदर्शलोक का अव्यवहारिक होना मनोरंजन जगत में तो चल जाता है। लेकिन उसके आधार पर सिद्धांत जब निजी जिंदगी में दे दिए जाते है तब समस्या खड़ी होती है। 
          • यह सब खराब होमवर्क का नतीजा है। इसलिए मनोरंजन जगत को भी प्रैक्टिकल चीजे दिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। वही उलटे सीधे नियम बनाने वालो को भी आलोचनात्मक समीक्षा के आधार पर परखा जाना चाहिए।
          • लेकिन  यह हमेशा गलत ही नहीं होता। यह सपने दिखता है जिसके आधार पर हम कार्य करते है और अभी की खराब हालत से निकलकर बाहर आने के लिए प्रेरित होते है।  इसका मतलब है कि आदर्श को प्राप्त करने के लिए लोगो को प्लेटफार्म दिए जाने चाहिए।
          निष्कर्ष : आज का आदर्श कल की सामन्य चीज हो सकती है। यह इस पर निर्भर करता है की हम उसे पाने के लिए मेहनत कितनी कर रहे है। इसके लिए हमारे पास संसाधन है या नहीं।

          धन्यवाद 

          Indian Culture Today- The Myth or Reality

          वर्तमान में पूरी दुनिया वैश्वीकरण के प्रभावों का सामना कर रही है। वैश्वीकरण की बदौलत हो रहे विचारो और सूचनाओ के आदान-प्रदान का असर सांस्कृतिक क्षेत्र में भी महसूस हो रहा है। वैसे तो बदलावों की शुरुआत आधुनिक शिक्षा और तकनीकी विकास के द्वारा ही मिल गयी थी लेकिन वैश्वीकरण के कारण विचारों और सूचनाओ का आदान-प्रदान भारी मात्रा में हुआ। जिससे सांस्कृतिक क्षेत्र में परिवर्तन इतनी तेजी से हो रहे है कि कुछ लोग तो इन बदलावों की दिशा ही नही पकड़ पा रहे है और कुछ लोगो को लग रहा है कि भारतीय संस्कृति खत्म हो रही है और हम पाश्चात्य संस्कृति को अपनाते जा रहे है। लेकिन भारतीय संस्कृति के स्वरूप को समझा जाये तो हम अलग ही तस्वीर पाते है।

          भारत का सम्पर्क जब उपनिवेश काल मे पाश्चात्य विचारो से हुआ तो यहां भी लोगो मे स्वतंत्रता, समानता जैसे तत्वों के प्रति लोगो मे रुचि बढ़ी। वैश्वीकरण के दौर में अधिक भारतीय पश्चिमी विचारो के साथ ज्यादा नजदीकी से सम्पर्क में आये। इस समय भारतीयों की आत्मनिर्भरता बढ़ी तो पश्चिमी भौतिक संस्कृति के प्रति तेजी से आकर्षित हुए। इन लोगो ने खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन, बोलचाल में पश्चिमी तत्वों की मात्रा बढ़ती चली गईं। विदेशी टीवी चैनल और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने पश्चिमी चीजो और व्यवहारों को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। दिखावटीपन को बढ़ावा मिला, फैशन और महंगी चीजो को अपनाने लगे, खुलेआम स्नेह दर्शाने लगे, कामुक विचारो पर खुलेआम राय रखने लगे। लोगो के व्यवहारों में औपचारिकता हावी होने लग गयी। रिश्तों का निर्धारण नए तरीके से होने लगा है, शादी-विवाहों में घरवालो की बजाय लड़के-लड़कियों की इच्छा महत्वपूर्ण हो गयी है।

          हम देख रहे है कि वैश्वीकरण के कारण हो रहे तीव्र बदलाव परम्परागत संस्कृति को चुनोती देते हुए दिख रहे है। इनमे कुछ बदलाव सकारात्मक है जो कि स्वतंत्रता और समानता जैसी चीजों से जुड़े हुए है। जैसे कि लोग खुलकर अपनी मर्जी को दुसरो से बेपरवाह होकर अभिव्यक्त कर रहे है। परम्परागत नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है जिससे महिलाओं, दलित, आदिवासीओ की मुक्ति सुनिश्चित हो रही है। लोग खुलकर अपने को सोशल मीडिया पर व्यक्त कर रहे है। कुल मिलाकर बात यह है कि लोग गरिमामय तरीके से जीवन जीने की ओर प्रयासरत है।

          मौजूदा बदलावों के द्वारा ऐसे प्रभाव भी पड़ रहे है जो भारतीय संस्कृति के मूल्यों के विपरीत है जैसे कि लोग दिखावे के चक्कर मे खूब अपव्यव कर रहे है। भौतिक संसाधनों को प्राप्त करने के चक्कर मे लोग अनैतिक तरीके से कमाई करने लगे है, रिश्वत ले रहे है, धोखाधड़ी हो रही है। सम्पन्न जीवनशैली के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन किया जा रहा है। खुलेपन के नाम पर अश्लीलता को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप महिलाओ की सुरक्षा का मुद्दा उभरने लगा है। तकनीकियों के प्रयोग ने आदमी की जिंदगी को सुगम बनाया है इसलिए आदमी अकेला रहना पसंद करने लगा है और समाज से दूरी बनाने लगा है। रिश्तों में भी तनाव उभरने लगा है जिससे उनमे भावनात्मक लगाव कम हो गया है। पहले की कई बुराइयों का भी आधुनिकीकरण हो गया है, जैसे कि दहेज, इस कारणे जो प्रयास महिलाओ को शसक्त करने के लिए किए जा रहे है वे प्रभावहीन होते जा रहे है।

          कुछ प्रतिक्रियावादी लोगो का मानना है कि मौजूदा बदलाव भारतीय संस्कृति को दूषित कर रहे है। इसे वे पश्चिम के सांस्कृतिक आक्रमण के तौर पर देखते है जिसके कारण भारतीय संस्कृति लगातार अनुपस्थित होती जा रही है। इनका मानना है कि लोग आधुनिक चीजो को ग्रहण करने के चक्कर मे परम्परागत चीजो को पिछड़ी समझ कर भूलते जा रहे है। सम्पन्न लोगों की देखा देखी दूसरे लोग भी उनकी नकल करने में लगे हुए है जिससे एक सांस्कृतिक अराजकता  का माहौल बन गया है। ऐसा माहौल बन गया है जिसमे सांस्कृतिक बदलावों की दिशा  को पहचानना मुश्किल हो गया है। ऐसा लगने लगा है की पश्चिमी संस्कृति का ही एकमात्र विकल्प बचा है, भारतीय संस्कृति अब एक भ्रम मात्र रह गयी है

          लेकिन इन आशंकाओ का मूल्यांकन करने पर पाते है कि भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्व तो अभी भी मजबूत स्थिति में है। भारतीय संस्कृति का अभी भी पृथक वजूद है, पहचान है जो विदेशो में भी लोकप्रिय हो रहा है। इसका एक उदाहरण यह है कि योग दिवस घोषित करने के भारत के सयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव को 177 देशो का समर्थन मिला था। बॉलीवुड भारत का विदेशो में प्रतिनिधित्व कर रहा है। बाहरी दिखाई देने वाली चीजें जरूर पश्चिम के रंग में रंगी है लेकिन आंतरिक चीजे पर तो विदेशो में भी भारत का ही रंग जम रहा है।

          ऐसा कोई पहली बार नही हो रहा है जब भारतीय संस्कृति बाहरी चीजो के सम्पर्क में आई हो। इससे पहले इस्लामिक संस्कृति का जब भारत मे आगमन हुआ तो वह भारतीय संस्कृति को पचा नही सकी, जबकि उसने इराक और ईरान की संस्कृतियों को पचा लिया था। भारतीय संस्कृति के साथ मिलकर एक समन्वित संस्कृति विकसित की जो आज भी बहुलता में सामंजस्य का उदाहरण प्रस्तुत करती है। उस समय भी कई लोगो को लगा था कि ये किसी न किसी मे विलय हो जाएगी लेकिन ऐसा नही हुआ। उसी प्रकार पश्चिम के साथ भी भारतीय संस्कृति के सम्पर्क से नई परिष्कृत संस्कृति सामने आएगी । रही बात मौजूदा सांस्कृतिक परिदृश्य की खामियों की , तो उन्हें गम्भीर प्रयास किया जाए तो दूर किया जा सकता है।

          निष्कर्ष : 
          अतः हम कह सकते है कि भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्व न केवल स्थापित है बल्कि परिष्कृत भी हो रहे है। यह किसी मिथक तक सीमित नही है, इसकी पहचान वास्तविक तौर पर की जा सकती है।

          Nothing Good or Bad, Thinking Makes it

          mastram meena blog
          जब भी अच्छे और बुरे की पहचान की बात होती है तो हमारे जेहन में द्रोणाचार्य की परीक्षा याद आती है। एक बार द्रोणाचार्य, युधिष्ठिर को नगर में सबसे बुरा आदमी तलाशने के लिये भेजते है और दुर्योधन को सज्जन आदमी की तलाश में भेजते है। कुछ समय की तलाश के पश्चात दोनो खाली हाथ लौटते है। युधिष्ठिर बुरे आदमी को इसलिए नही तलाश पाते क्योंकि उन्हें सभी आदमी सज्जन ही नजर आते है। दूसरी ओर दुर्योधन को सभी आदमी बुरे नजर आते है इसलिये वह कोई सज्जन आदमी नही तलाश पाता। अंत मे द्रोणाचार्य कहते है कि हमे दुनिया वैसी ही नजर आती है जैसे कि हमारे विचार होते है। कोई भी चीज सही है या बुरी, यह हमारे विचारों से ही निर्धारित होता है।

          अच्छाई या बुराई का निर्धारण किसी मानक के आधार पर होता है। ये मानक अक्सर किसी परिवार, समाज, राज्य या संस्था के हितों से जुड़ी होती है। जो व्यवहार और क्रियाकलाप किसी संस्था के हितों की पूर्ति में सहायक होते है वे उसके अनुसार अच्छे होते है तथा जो व्यवहार और क्रियाकलाप हितों की पूर्ति में बाधक होते है वे बुरे होते है। उदारहण के लिए- ईमानदारी किसी लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होती है तो वह अच्छाई मानी जायेगी लेकिन ईमानदारी की वजह से लक्ष्य प्राप्ति में बाधा पहुचती है तो वह बुराई कही जाएगी। हम यहाँ देख रहे है कि ईमानदारी का मूल्यांकन ही दो आधारों पर किया जा रहा है और उन आधारों पर वह अच्छाई और बुराई कही जा रहीं है। इसके विपरीत बेईमानी भी अच्छी या बुरी हो सकती है, यह निर्धारित होता है कि उसका प्रयोग किस प्रकार के व्यवहार में किया गया है। बेईमानी के प्रयोग से किसी आदमी को राहत पहुचती है तो वह अच्छाई हो जाती है।

          अच्छाई और बुराई को निर्धारित करने वाले मानक परिस्थितियों, समय, स्थान और लोगों के अनुसार बदलते रहते है। कुछ व्यवहार ऐसे होते है जिनके प्रति नैतिक विचार भिन्न-भिन्न स्थान और लोगो के भिन्न-भिन्न होते है। उदाहरण के लिए कश्मीर में चरमपंथियों को हम आतंकवादी कहकर बुराई करते है वही उन्हें समर्थन देने वाले मुजाहिदीन कहके उन्हें सही बताते है। यही हाल आज़ादी से पहले क्रांतिकारीयो का था, भारतीय उन्हें स्वतन्त्रता सेनानी मानते थे वही अंग्रेज उन्हें उग्रवादी के तौर पर देखते थे। यहाँ हम स्पष्ट देख सकते है कि अच्छाई और बुराई का निर्धारण सम्बन्धित वर्ग के हितों के आधार पर हो रहा है।

          अच्छाई और बुराई का निर्धारण परिस्थितियों के अनुसार भी होता है। हमारा व्यवहार किन परिस्थितियों में किया जा रहा है। जैसे कि कोई आदमी पेट भरने के लिए चोरी करता है तो उसे अच्छाई तो नही कहेंगे लेकिन बुराई भी नही कह सकते। लेकिन अगर कोई आदमी अय्यासी के लिए चोरी या धोखाधड़ी करता है तो उसे क्षमायोग्य नही मान सकते। कहने का तात्पर्य है कि किसी व्यवहार को हम सीधे तौर पर निर्धारित नही कर सकते कि वह सही है या गलत, इसके लिए हमे उनकी परस्थितियों का आंकलन करना होगा।

          कोई भी व्यवहार साश्वत रूप से अच्छा या बुरा नही रहता। समय के साथ मानको में बदलाव आता है और पुराने व्यवहारों की नैतिकता फिर से परिभाषित होती है। उदाहरण के लिए सीता की अग्निपरीक्षा को उस काल मे मर्यादा की रक्षा  के लिए उचित माना गया लेकिन आज के नारीवादी इस तरह की मर्यादा को उचित नही ठहराते है।

          इस प्रकार अच्छाई और बुराई एक सिक्के के दो पहलू है जो परिस्थितियों, स्थान, समय और लोगो के अनुसार निर्धारित होता है कि कोनसा उनके पक्ष में है। हरेक को अपना व्यवहार अच्छा नजर आता है और दूसरों का बुरा।इसलिए अपने व्यवहार को न्यायोचित ठहराने के लिए हिंसा का सहारा लेने से भी नही कतराते है ।यही कारण था कि महाभारत में दोनों पक्षो को अपना दावा नैतिक नजर आ रहा था। यह सब उनके विचारों से संचालित था। अतः हम कह सकते है कि नैतिकता व्यवहार की बजाय विचारो की परीक्षा अधिक है। अगर अच्छे विचार होंगे तो गलत कार्यो की गुंजाइश कम होगी और होगी तो भी उसके पीछे कोई न कोई प्रयोजन अवश्य होगा।

          विचारो का निर्धारण बचपन से ही शुरू हो जाता है जो हम परिवार, समाज, विद्यालय में सीखते है।इसी जगह पर ये संस्थाए अपने हितों के अनुकूल विचार भर देती है जिनमे आगे संसोधन की गुंजाइश बहुत ही कम रह जाती है। उदाहरण के लिए कश्मीर में जिहादी, बच्चों को ही आज़ादी के बारे में गलत शिक्षा देकर उनमे अलगाववाद भर रहे है। अब बच्चों को क्या पता कि इन विचारों का दूसरा पक्ष भी है। इस तरह एकतरफा विचारो का संवर्धन होता रहता है।

          निष्कर्ष :
          अगर हमे अच्छाई और बुराई का निर्धारण प्रभावी तरीके से करना है तो दोनों तरफा विचारो को अवश्य जानना होगा, तब ही हम सही मायने में उचित निर्णय ले सकेंगे। इसके लिए जरूरी है कि आलोचनात्मक विश्लेषण की गुंजाइश हो और विरोधी विचारो के प्रति सहिष्णुता का भाव हो।

          Fulfillment of 'New Woman' in India is a Myth

          नए युग की महिला की अवधारणा आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता पर आधारित है। ये परम्परागत रूप से चली आ रही त्याग और बलिदान की भूमिका को स्वीकार नही करती है तथा कानूनी और यौन समानता में विश्वास करती है। इनका मानना है कि विवाह करने के कारण ऐसी समानता नही रह पाती इसलिए एकल रहने में भी यकीन करती है। 'ओल्ड वुमन' की तुलना में ये कामुकता के बारे में अधिक खुले विचार रखती है, अच्छी तरह से शिक्षित है, नॉकरी भी करती है, एथलेटिक्स और अन्य शारीरिक गतिविधियों में भी जोरदार है, परम्परागत वस्त्रो की जगह आरामदायक कपड़ो (कभी-कभी पुरुष पोशाक) पसंद करती है। इस तरह 'न्यू वुमन' एक बैचलर गर्ल से ज्यादा है जो परंपरागत नियंत्रण का प्रतिरोध करती है और दुनिया मे पूर्ण भूमिका निभाना चाहती है।

          अगर 'न्यू वुमन' की अवधारणा का भारतीय परिदृश्य में मूल्यांकन करे तो हम पाते है कि भारत मे संविधान में ही उन्हें समानता के अवसर प्रदान कर दिए। आगे समय-समय पर विभिन्न कानूनों के माध्यम से उनके खिलाफ भेदभाव, हिंसा और उत्पीड़न को रोकने के उपाय किये गए। न केवल सार्वजनिक स्थानों को महिलाओं के अनुकूल बनाने के लिए प्रयास किये गए बल्कि घरेलू स्तर पर भी महिलाओ के लिए गरिमामय जीवन जीने को सुनिश्चित किया गया। सामाजिक स्तर पर भी महिलाओं को आगे लाने के लिए प्रेरित किया गया।

          सरकारी द्वारा प्रदान किये गए अवसरों से महिलाओं को लाभ मिला और उन्होंने शिक्षा प्राप्त करके विभिन्न कार्यक्षेत्रों में अग्रणी भूमिका प्राप्त की। कई प्रवेश परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं में लड़कियों ने शीर्ष स्थान ग्रहण करके पुरुषो को पीछे छोड़ दिया है, उन्होंने अपनी काबिलियत से दिखा दिया है कि वे पुरुषों से कम नही है, सेनाओ तक मे भागीदारी इसका सबूत है। सार्वजनिक जीवन मे योगदान करने में महिला आगे आती जा रही है, वही अपनी आत्मनिर्भर प्रकृति के कारण पारिवारिक फैसलो में भी भूमिका निभाने लगी है। महिलाओं का कैरियर शिक्षा आधारित ही नही है, वे खेलो, फिल्मो, राजनीति आदि में भी बेहतर प्रदर्शन कर रही है। नए अवसरों का प्रयोग करके वे आत्मनिर्भर हुई है जिससे अपने पुरूष सम्बन्धियो पर निर्भरता कम हुई है, इस कारण वे हर मामले में उनके प्रति जवाबदेह नही रह गयी है जिनमे सेक्सुअल च्वॉइस भी शामिल है। यही वजह है कि लिव-इन-रिलेशनशिप और देरी से शादियों का प्रचलन बढ़ा है।

          लेकिन 'न्यू वुमन' की अवधारणा का भारत मे क्रियान्वयन आसान नही है। जब भारत महिला सशक्तिकरण और लैंगिक न्याय के मामलों में ही संघर्ष कर रहा हो ऐसे में अधिकारों की लड़ाई को एक कदम और आगे बढ़ा देना निश्चित तौर पर अधिक चुनोती धारण करता है। जो कि इस प्रकार है----

          1. पहली चुनोती तो यह है कि महिला सशक्तिकरण के फायदे शहरी औरतों को ही मिल रहे है या फिर गांवो में आर्थिक सक्षम घरो की महिलाये ही आगे बढ़ रही है। अन्य महिलाओं को बुनियादी सुविधाएं ही नही मिल पाती है जिनमे शिक्षा और चिकित्सा शामिल है। इस तरह अवसरों के अभाव में गांवो के लिए 'नई महिला' की अवधारणा मिथक भर ही है।

          2. भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक प्रकृति है जिसमे नारी को बचपन मे पिता के, यौवन में पति के और बुढ़ापे में पुत्रो के आश्रय में देखा गया। इस व्यवस्था को भावनात्मक तौर पर इतना मजबूत बनाया गया कि खुद औरतो ने भी इससे बाहर निकलने की इच्छाशक्ति नही दर्शायी। इससे समानता की जगह अधीनस्थता का तत्व आ जाने से स्वतन्त्रता का हनन हुआ। ऐसे में नारी की भूमिका बच्चे, रसोई, साज-सज्जा और परम्पराओ के पालन तक ही सिमट कर रह गयी। इस तरह औरत की भूमिका को घर तक सीमित कर दिया गया।
          वर्तमान में नए अवसरों की पहुच में आने से पितृसत्तात्मकता का शिकंजा कमजोर हुआ तो 'न्यू वुमन' का आधा अधूरा स्वरुप सामने आया। क्योंकि ऐसे परिवारों में कई असुरक्षाये मौजूद थी जैसे कि- लड़की को ज्यादा पढा दिया तो ज्यादा दहेज देना पड़ेगा, लड़की को ज्यादा पढ़ाया तो हाथ से निकल जायेगी, लड़की को पढ़ा भी लिया तो ठीक है लेकिन नॉकरी नही करने देंगे आदि। इस प्रकार पित्रसत्ता के कारण 'न्यू वुमन' के स्वप्न का पूरा होना अधूरा बना हुआ है।

          3.  'न्यू वुमन' के किरदार की छवि का समाज मे नकारात्मक होना भी इसके समर्थन में कटौती करता है। ये महिलाएं कमाई से जुडी हुई है जो परिवार की आय में योगदान करती है, एवज में पारिवारिक फैसलो में भागीदारी चाहती है। यह बात पुरुषों की प्रधानता वाले परिवारों को रास नही आती है। वे मानते है कि कमाई करने के बावजूद भी महिला को अपनी परम्परागत भूमिका को नही भूलना चाहिए। इस तरह के रवैये से पति -पत्नी के बीच तनाव बढ़ रहे है जिसका परिणाम हिंसा, तलाक, दहेज उत्पीड़न, परिवारों का टूटना, एकल माता और पिताओ का बढ़ना आदि के रूप में सामने आ रहा है। इस प्रकार 'न्यू वुमन' का यह अवतार नए प्रकार के शोषण और भेदभावो का शिकार हो गया है। मतलब हको की लड़ाई एक कदम आगे बढ़ने के बजाय एक कदम पीछे खिसक गयी है।

          4. 'न्यू वुमन' के किरदार द्वारा जिस प्रकार की स्वतंत्रता की बात की जाती है उसे भी समाज मे स्वीकृति नही है। ये महिलाएं कामुकता और देह पर अधिक खुले विचार रखती है, जबकि भारतीय परंपरा तो लाज, कौमार्य औऱ पतिव्रता नारी के आदर्श पर टिकी हुई है। ऐसे मूल्यों के साथ महिलाओं को ज्यादा उन्मुक्त होने की अनुमति कैसे दी जा सकती है, इसी वजह से लिपस्टिक अंडर माई बुर्का जैसी फिल्मों पर आपत्ति की गई। दीपिका पादुकोण की माई च्वाइस और अमिताभ बच्चन अभिनीत पिंक में महिलाओं के खुद के शरीर पर अधिकार का समर्थन किया गया। वे शरीर का कुछ भी दिखाए, किसी के साथ सम्बन्ध बनाये या ना बनाये, यह उनका निजी मामला है। लेकिन माना जाता है कि सामाजिक व्यवस्था में ऐसी गतिविधिया अश्लीलता को जन्म देती है, इसलिए उन पर नैतिकता थोपी जाती है। इस नैतिकता के द्वारा भी न्यू वुमन की फंतासियों की पूर्ण होने से रोका गया है। और जिन महिलाओं ने नैतिकता की परवाह किये बगैर इन स्वतंत्रताओ को पूरा करना चाहा उन्हें समाज मे सम्मान खोना पड़ा।

          इस प्रकार हम देखते है कि न्यू वुमन की अवधारणा का कुछ पक्ष तो भारतीय परिद्रश्य में समर्थित है और कुछ पक्षो को अनैतिक तौर पर देखा जाता है, जिनको की पूर्ण करने लक्ष्य नही माना जाता और जो पक्ष स्वीकृत भी है उनको प्राप्त करने के लिए सभी महिलाओं को अवसर प्राप्त नही हो पा रहे है। इन्हें हम उदाहरण से समझ सकते है जैसे कि समानता के तत्व को स्वीकार करते हुए पारंपरिक भूमिकाओं में होने वाले भेदभावों को रोका गया है, हिंसाओं को प्रतिबंधित किया है, आत्मनिर्भर होने के लिए कार्यक्षेत्र को अनुकूल बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ स्वतंत्रता के अधिकार को पर्याप्त मात्रा में स्वीकार नही किया गया है, इसके प्रति आशंका है कि इससे पारिवारिक और सामाजिक संस्थाओं की नींव उखड़ जाएगी। इनके अलावा स्वीकृति प्राप्त क्षेत्रो में भी सभी महिलाओं को समान अवसर प्रदान करने की चुनोती है, गांवो में लड़कियों की गुणात्मक शिक्षा और रोजगारो तक पहुँच सुनिश्चित करना जरूरी है।

          अतः हम कह सकते है कि भारत मे 'न्यू वुमन' की पूर्णता भले ही कुछ कारणों से मिथक नजर आता हो लेकिन इसके कई आयामो को हम सामाजिक स्वीकृति को भी ध्यान में रखते हुए यकायक की बजाय क्रमिक रूप से प्राप्त कर रहे है। जिससे 'न्यू वुमन' का भारतीय संस्करण विकसित होगा जिसमें पाश्चात्य मॉडल के विपरीत सम्मान का तत्व भी होगा।

          Crisis faced in india-moral or economic

          21वी सदी की शुरुआत से ही कहा गया कि यह भारत की सदी होगी। भारत जैसे विकासशील देश इस दौरान अपने प्राकृतिक, आर्थिक और मानव संसाधनों की बदौलत वैश्विक मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका में पहुचेंगे। यह बात लगभग दो दशकों के बाद अब सच्चाई में प्रतीत होती दिख रही है। वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व मे सर्वाधिक तेजी से वृद्धि कर रही अर्थव्यवस्थाओ में शामिल है। क्रय क्षमता के आधार पर इसका आकार तीसरे नम्बर का हो गया है। न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था बल्कि भारतीय नागरिक भी वैश्विक मंचो पर छाए हुए हैं और राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रो में शीर्ष भूमिका अदा कर रहे है। इनके अलावा भारत अपने नैतिक मानको के आधार पर भी विश्व के पथ प्रदर्शक के रूप में उभरा है। जलवायु परिवर्तन जैसे संकटो के प्रति भारत ने संयम आधारित उपाय सुझाकर अपनी नैतिक समृद्धि का परिचय दिया है। वर्तमान में तारीफ बटोरती भारतीय अर्थव्यवस्था और सदियों से प्रशंसित नैतिक मूल्यों की उपस्थिति के बावजूद भारत की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था चुनोतियों से मुक्त नही है।

          भारत की मौजूदा स्थिति का मूल्यांकन करे तो पाते है कि भारत की आर्थिक प्रगति आलोचनाओ से मुक्त नही है। उसमें कई ऐसी विसंगति है जो गंभीर प्रश्न खड़े करती है, ये खामिया या तो आर्थिक संकट को दर्शा रही है या फिर बड़े संकट की तरफ बढ़ रही है। सबसे पहली बात तो यही है कि क्या तेजी से वृद्धि कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था सभी भारतीयों की प्रगति को दर्शा रही है। विभिन्न प्रकार के आकड़ो के आधार पर हम सिद्ध कर सकते है कि भारत की तथाकथित प्रगति कुछ चुनिंदा क्षेत्रों, इकाईयो और लोगों की ही प्रगति है।भारतीय जनसंख्या का एक चौथाई भाग तो सरकारी आकड़ो के अनुसार ही दैनिक तौर पर रोजी रोटी के लिए संघर्ष करता है। लोगो मे आर्थिक विषमता का स्तर काफी उच्च हो गया है।ऑक्सफेम की रिपोर्ट दर्शाती है कि 1% से भी कम लोगों ने देश के 90% से भी संसाधनों पर कब्जा कर रखा है। जनसांख्यकी लाभांश का दावा करने वाला देश रोजगार विहीन संवृद्धि (Growth) का आरोप झेल रहा है, और युवाओ की बड़ी संख्या संसाधन के बजाय बोझ में तब्दील होती जा रही है। एक प्रकार से देश समावेशी विकास का संकट देख रहा है। एक तरफ IMF और विश्व बैंक जैसी संस्थाओ की व्यवसाय के मामले में प्रसंशा बटोर रहा है वही दूसरी तरफ भुखमरी, बेरोजगारी, कुपोषण, सामाजिक कल्याण के मामलों में वैश्विक संस्थाओ की ही फटखार खा रहा है। अर्थव्यवस्था की इस दुविधा को हम नैतिक मानको में आ रही गिरावट के संदर्भ में समझ सकते है।

          भारतीय संस्कृति को नैतिक मूल्यों की दृष्टि से काफी समृद्ध माना गया है। यह सर्वे भवन्तु सुखिनः और वसुधैव कुटुम्बकम जैसे समावेशी विचारो में भरोसा करती है। यह सभी को अपने समाज , परिवार और देश के प्रति दायित्व समझाती है। इन नैतिक मानको पर टिके रहने वालों को सम्मान दिया गया और विचलित होने वालों का तिरस्कार किया गया। यही कारण था कि लोगो ने नैतिक मूल्यों से प्रेरित अपने मान सम्मान के लिए बलिदान और त्याग किये। अगर इन नैतिक मूल्यों का वर्तमान में मूल्यांकन करे तो पाते है कि ये कही पीछे छूट गए है, इनको अब पिछड़ी सोच से जोड़कर देखा जाता है। वर्तमान में घोटाले करने वालो को कोई लज्जा महसूस नही होती अपितु उन्हें अपनी चालाकी पर गर्व होता है। समाज भी उन्हें तिरस्कार की दृष्टि से नही देखता है। रिश्वत देकर काम निकलवाने को लोगों ने सुगमता की कीमत से जोड़ दिया है। जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही जनता के बजाय वित्त और विजय पोषकों के प्रति हो गयी है। इन उदाहरणो से अंदाज़ा लगाया  जा सकता है कि भारतीय नैतिक मूल्यों से दूर भाग रहे है और एक तरह से नैतिक संकट की स्थिति बन रही हैं।

          नैतिक मूल्यों में संकट का प्रभाव राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रो में गंभीर तौर पर देखा जा रहा है। नैतिक मूल्यों का संकट ही कई आर्थिक संकटो को जन्म दे रहा है। पूंजीवाद की तो अवधारणा ही भारतीय नैतिक मानको के पैमाने पर हमेशा से ही संदिग्ध रही है, यह सभी के समान विकास की बजाय कुछ ही लोगो के मुनाफा कमाने को जायज ठहराती है। इस वजह से संसाधनों के वितरण में विषमता उत्पन्न होती है। रिश्वत लेकर सरकारी कर्मचारियों द्वारा संसाधनों का त्रुटिपूर्ण आवंटन किया जा रहा है। अनैतिक मानदंडों के कारण वितरण की वजह से असली लाभार्थी तो वंचित ही बना हुआ है, इसी वजह से सरकार की कल्याणकारी योजनाए अप्रभावी बनी हुई है। हम जानते है कि नैतिकता को कानून और नियमो के आधार पर स्थापित किया जाता है।लेकिन कुछ लोगो के फायदों के लिए कायदे कानूनों को ही तोड़ा मरोड़ा जा रहा है। नव-उदारीकरण के चलते भारतीय नैतिक मानको को कड़ी चुनोती मिल रही हैं। अर्थव्यवस्था की प्रगति के नाम पर किसानों और श्रमिकों के सुरक्षा उपायों को ढीला किया जा रहा है। इस तरह नैतिक मूल्यों में आ रही गिरावट अर्थव्यवस्था को अमानवीय चेहरा प्रदान करके एक गंभीर समस्या उत्पन्न कर रही है।

          लेकिन सम्पूर्ण दोष नैतिक मूल्यों में गिरावट पर थोपना भी सही नही है। भारत को गरीबी, अकाल, भुखमरी, बेरोजगारी, ऋणग्रस्तता जैसी समस्या तो आज़ादी के बाद विरासत में प्राप्त हुई है, न कि भारतीयों के नैतिक पतन के कारण उत्पन्न हुई है। उल्टा भारतीयों ने तो लोकतांत्रिक नीति निर्माण के माध्यम से इन समस्याओं की भयानकता को कम किया है। विरासत में मिली आर्थिक परेशानियों को दूर करने में भारतीय संसाधन प्रर्याप्त नही पड़ रहे थे। भारतीय संसाधनों के बल पर विकास करने में समय लग रहा था। इस चीज ने लोगों को भौतिक संसाधन जुटाने हेतु शॉर्टकट रास्ते अपनाने को प्रेरित किया और परिणामस्वरूप नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ।

          इस प्रकार हम देख चुके है कि नैतिक संकट के कारण आर्थिक संकट को बल मिलता है वही आर्थिक संकट के कारण नैतिक संकट को बल मिलता है। इस प्रकार दोनो समस्याओ को पृथक -पृथक करके नही देख सकते, इनकी उपस्थिति को एक साथ ही देखा जाना चाहिए।

          अगर भारत के संदर्भ में मौजूदा स्थिति पर गौर करे तो हम देखते है कि भारत में अर्थव्यवस्था को मानवीय चेहरा देने पर हमेशा जोर दिए जाने के कारण संकट जैसी स्थिति को हम टालते रहे है। उसी प्रकार नैतिक मूल्यों से अभी भी अधिकांश लोग जुड़े हुए है, इस कारण नैतिक संकट जैसी स्थिति कहना भी सही नही है।अगर भारत मे कुछ गड़बड़ है तो उसे संकट की बजाय समस्या ही कहना चाहिये। भारतीयों ने इन समस्याओं के आगे आत्मसमर्पण नही किया, इसलिए भी समस्याओ को संकट कहना सही नही है। भारतीय निरंतर प्रयासों से इन समस्याओं को दूर करने में लगे हुए है।