नेहरू को छोड़कर मोदीजी द्वारा अनिच्छा से मनमोहन को अपनाना

मोदीजी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कई ऐसे निर्णय लिए और कई ऐसे कदम उठाए जो अपने आप मे ऐतिहासिक महत्व रखते है। इतने सारे ऐतिहासिक महत्व के विषयों को घटता देखकर ऐसा लगता है जैसे कि स्वतंत्रता के बाद का भारतीय इतिहास इस तरह जाना जाएगा- मोदी काल से पूर्व और मोदी काल के बाद। ऐसे में इतिहासकारो के लिए एक बात को तलाशने की जरूरत होगी और वो यह है कि क्या उनके प्रयासों के बाद निरन्तरता ही जारी रही अथवा परिवर्तन महसूस किया गया।

अगर मोदीजी के प्रशासनिक, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सुधारो में केंद्रीय थीम को पकड़ा जाए तो वह है- आर्थिक विकास। आर्थिक विकास के लिए इन्होंने नवउदारवादी मार्ग को अपनाया। जिस की शुरुआत भारत मे 1991 के निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण के माध्यम से हो चुकी थी। जिसमे सरकार को अपनी भूमिका को सेवा प्रदाता से विनिमय प्रदाता के तौर पर बदलने के बारे में कहा गया था। मोदीजी ने इसके तहत सरकार के हस्तक्षेप को कम करने के लिए 'न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन' की अवधारणा अपनाई। प्रक्रियात्मक और संरचनात्मक सुधारो के माध्यम से देश मे व्यापार और निवेश करने को आसान बनाने पर ध्यान दिया गया। इसके लिए जरूरी कानूनों में बदलाव किए गए, नए नियम बनाये गए, अवसंरचना का निर्माण किया गया और अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे बदलाव किए जो निवेशकों के अनुकूल हो। सरकार द्वारा राजस्व घाटे को न्यूनतम रखने के लिए लोक कल्याणकारी कार्यो में होने वाले व्ययों में कटौती की बात कही गई, FRBM एक्ट पारित किया गया। कुल मिलाकर विदेशी निवेश को आकर्षित करने के हर सम्भव प्रयास किए गए।

इतिहास के साथ तुलना :
इतिहास के झरोखे से देखा जाए तो नेहरू ने जो समाजवादी रुझान की व्यवस्था स्थापित की थी, उसे 1991 के आर्थिक संकट में ही अप्रासंगिक समझ लिया गया और उसी का नतीजा था 1991 कि आर्थिक सुधार। इन आर्थिक सुधारों के मॉडल को नवउदारवाद कहा जाता है जिसमे शामिल है-खुला व्यापार, खुली पूंजी, निजी क्षेत्रों पर निर्भरता, वैश्विक आर्थिक तालमेल आदि। नव उदारवादी मॉडल में कदम तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के प्रयासों से रखे जा चुके थे और काफी सुधार हो चुके थे। हालांकि समावेशी विकास को भी बराबर महत्व देकर चल रही पंचवर्षीय योजनाओं के कारण आर्थिक एजेंडे पर समाजवादी हैंगओवर छाया रहा।

जब नरेंद्र मोदीजी प्रधानमंत्री बने तो इन्होंने समाजवादी दृष्टिकोण को तिलांजलि दे दी और जनमत के दबाव में गिने-चुने लोकलुभावन कार्य उसकी जगह पर किए। उपलब्ध संसाधनों का तार्किक वितरण करने वाले और सभी के विकास को तय करने वाले योजना आयोग को समाप्त कर दिया गया। विनिवेश पर जोर दिया।  एक तरीके से अब निजी क्षेत्र के लिए नीतियां अब लगभग पूरी तरीके से उदारीकृत कर दी गई।

एक तरह से नेहरू की विरासत को खत्म कर दिया गया। लेकिन इस प्रयास में वे मनमोहन की विरासत को आगे बढ़ाने लग गए। वे नवउदारवाद के नए ध्वजवाहक बनकर सामने आए, जैसे कि मनमोहन के समर्पित शिष्य हो। हालांकि मनमोहन ने नवउदारवादी नीतियों की शुरूआत अवश्य की थी लेकिन फिर भी वे समाजवादी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नही हो पाए, उनके द्वारा शुरू किए गए मनरेगा, खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रम इसके सबूत है। लेकिन मोदीजी नवउदारवाद पर बिना हिचकिचाहट के आगे बढ़ गए।

मोदीजी का आर्थिक कार्यक्रम:
नवउदारवाद के माध्यम से  समावेशी विकास की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह कई लोगो द्वारा लगाया जा चुका है। क्योंकि भारत को तो संवृद्धि युक्त विकास की बजाय समावेशी विकास की आवश्यकता है। ऐसे में यह अध्ययन का विषय हो जाता है कि प्रधानमंत्री मोदीजी ने बाजारी शक्तियों के प्रति इतना समर्पण क्यों दिखाया?

जिस समय रोजगार विहीन संवृद्धि की सभी जगह आलोचना हो रही हो, उसी समय मे आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम उल्टा संवृद्धि पर ही जोर दे देते है। उनका मानना है कि ज्यादा संवृद्धि से ही रोजगार उत्पन्न होंगे। यह एकदम से गुमराह करने वाला दावा प्रतीत होता है। क्या कक्षा में एक-दो छात्रों के अंक बढ़ाने के प्रयासों से सारे छात्रों का परिणाम अच्छा आ सकता है। लेकिन वे इसका जवाब भी  बिज़नेस माइंडसेट से देते है कि एक-दो छात्रों के उच्च प्राप्तांक देखकर नए एडमिशन तो आ ही सकते है। जिस तरह वे छात्रों के बजाय स्कूल के फायदे की सोच रहे है उसी प्रकार सरकार भी लोगो की आर्थिक दशा के बजाय बजटीय आंकड़ो पर वाहवाही लूटने की सोच रही है। यही  नीति मोदी सरकार द्वारा भी अपनाई जा रही है। जो क्षेत्र आगे बढ़ रहा है उसे उतनी ही क्षमता से आगे बढ़ने दो, एक तरह से डार्विन का सिद्धांत यहां लागू कर दिया गया है। व्यवसायों को बढ़-चढ़कर प्रोत्साहित किया जा रहा है वही कृषि, असंगठित क्षेत्रो के लिए केवल औपचारिक निर्वातहीनता उत्पन्न की जा रही है। अगर लोगो की क्षमता निर्माण पर ध्यान भी दिया जा रहा है तो वो भी बाजार के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर। जैसे कि- लोगो के पास क्रय शक्ति हो इसलिए सार्वभौमिक बुनियादी आय की परिकल्पना।

अब हमारे पास सभी प्रश्नों का उत्तर देने के लिए पर्याप्त सूचना उपलब्ध हो गई है।
  1. पहला प्रश्न तो शीर्षक से ही उत्पन्न होता है। नेहरू  को दरकिनार कर दिया वही मनमोहन सिंह को अपना लिया गया, जिसे की ऊपर दिखा चुके है। लेकिन भारतीय राजनीति में जनमत की परवाह के कारण लोककल्याण के कार्यो से पृथक होने में अक्षमता की वजह से नवउदारवादी नीतियां पूरी तरीके से कभी भी लागू नही की जा सकती। इस आधार पर इतिहास के विद्यार्थी यह कह सकते है कि मोदीजी न तो नेहरू को दरकिनार कर पाए और न ही मनमोहन को अपना पाए। लेकिन अब हम कह सकते है कि सच्चाई दोनो दावों के बीच मे ही है।
  2. शीर्षक से ही दूसरी बात है मनमोहन सिंह के विचारों को न चाहते हुए भी अपनाने की मजबूरी होना। हम समझ सकते है कि कांग्रेस मुक्त भारत की बात कहने वाले व्यक्ति के लिए कांग्रेस के ही नेता की नीतियों को अपनाना कितना मुश्किल रहा होगा, यही कारण है कि वे गैर-अनुमानित फैसले (नोटबन्दी) लेकर यह दर्शाने की कोशिश करते है कि उनका आर्थिक कार्यक्रम पहले से अलग है।
  3. मोदी काल की अवधारणा की बात हमे अतिश्योक्ति लग सकती है। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए इसे मानना कोई बड़ी बात नही है, उनका बस चले तो वे 26 मई 2014 से मोदी संवत शुरू करवा दे। खुद मोदीजी की भी मनोवृत्ति इसी तरह काम करती है, वे पहले की सरकारों द्वारा किए गए कामो को मान्यता ही नही देते है, वे सभी कार्यक्रमों को फिर से नई शुरुआत देकर नए युग की शुरुआत दिखाना चाहते है।
  4. एक प्रश्न यह उठा था कि मोदीजी नवउदारवादी नीतियों के चक्कर मे समावेशी विकास की उपेक्षा तो नही कर रहे है?  तो इसमें कोई शक नही है कि उनकी नीतियों से ऑक्सफेम की चिंताओं की पुष्टि होती है, वे आर्थिक विषमता को निर्मित करती है। सीधे शब्दों में ही देख लेते है न कि चुनिंदा व्यवसायीयो को बढ़ावा देने से बाकी लोगो को फायदा कैसे होगा। ऑटोमेशन और नवउदारवाद से उत्पन्न रोजगार कटौती का समाधान करने में मोदीजी बुरी तरीके से विफल रहे है। देश के संसाधनों का आवंटन करने वाले योजना आयोग को समाप्त करके मोदीजी ने समावेशी विकास के पैर पर कुल्हाड़ी मारी है।
आर्थिक नीतियों में संकीर्णता के कारण :
हमने देखा कि मोदीजी के आर्थिक सुधारों का झुकाव बड़े व्यवसायीयो के प्रति ज्यादा है बजाय किसानों, ग्रामीणों या असंगठित क्षेत्रों के। इसके निम्न कारण हो सकते है -
  1. व्यवसायिक क्षेत्रो के प्रति झुकाव मौजूदा समय की वैश्विक सच्चाई है, यह कोई भारत मे किसी सरकार की कोई विशेष नीति नही है। फ़र्क़ इतना है कि मोदीजी व्यक्तिगत रूप से इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने में रुचि ले रहे है।
  2. झुकाव का दूसरा कारण राजनीतिक है। कई कॉरपोरेट घरानों ने प्रधानमंत्री बनने में सहायता की थी। अब वे उनके अनुकूल नीतियां बनाकर उनका आभार व्यक्त करना चाहते है।
  3. निम्न तबके को वे विपक्षी दलों के वोट बैंक के रूप में देखते है। इसलिए हो सकता है कि उनकी आर्थिक उन्नति को बाधित कर राजनीतिक महत्वकांशाओ को निर्मूल करना चाह रहे हो।
हालांकि ये सब अटकलें है। आर्थिक कार्यक्रमो में संसदीय चर्चाओ का भी प्रभाव रहता है, जो निश्चित तौर पर किसी भी वर्ग के प्रति पक्षपात नही करती। फिर भी कार्यपालिका के हाथ मे एजेंडे को दिशा देने की पर्याप्त शक्तियां रह जाती है।

आगे क्या होगा :
मैंने पहले बताया था कि नवउदारवादी नीति से खुद को पृथक दिखाने के लिए मोदीजी गैर-अनुमानित फैसले (नोटबन्दी) लेते है। जबकि सरकारी नीतियों में इतनी पारदर्शिता होनी चाहिए कि लोग उनका अनुमान लगा सके। लेकिन यह उनका काम करने का बाबूभाई स्टाइल है। इसके बावजूद भी कम से कम आगामी नीतियों के ऊपरी फ्रेमवर्क को ट्रेस तो किया ही जा सकता है।
  1. निजी क्षेत्र काफी संगठित और महत्वकांक्षी हो चुका है। वह अब चुनावो के एजेंडो को निर्धारित करता है। कई राष्ट्रीय दल कॉरपोरेट सेक्टर से भारी चंदा प्राप्त करते है। ऐसे में निजी क्षेत्र किसी प्रकार की लगाम को बर्दाश्त नही करेगा। इसलिए अब भूल जाओ की जो प्राकृतिक संसाधन या राष्ट्रीय सम्पतिया निजी क्षेत्र के पास चली गई है वे वापस राष्ट्रीयकृत की जाएगी। अब तो इसी चीज की निगरानी की जाए कि निजी क्षेत्र को अंधाधुंध संसाधनों का आवंटन नही हो, वरना समावेशी विकास  और ज्यादा मुश्किल होगा क्योंकि लोगो के लिए तो संसाधन उनकी संख्या की मात्रा में उपलब्ध ही नही रह पाएंगे। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा घरेलू छोटी कम्पनियों को पचाने की संभावना काफी तीव्र है। आगामी समय मे नीति निर्माताओं के सामने यह बड़ी चुनौती होगी।
  2. आर्थिक समीक्षा 2016 में कहा गया कि लोककल्याण के कार्यो में अत्याधिक भागीदारी से सरकार ने बोझ बढ़ा लिया है, अब निजी क्षेत्र को सेवा प्रदाता के तौर पर स्वीकार करके एग्जिट नीति पर विचार किया जाना चाहिए। लेकिन लोगो की क्षमता निर्माण को बाजार के भरोसे छोड़ने पर सरकार को भी शंका हुई है और उसने समयबद्ध एग्जिट नीति को अब अपनाया है। मतलब सरकार कार्यक्रमो से हाथ एकदम नही बल्कि एक निर्धारित अवधि के बाद खींचेगी। इसी सिलसिले में FRBM एक्ट के लक्ष्यों के अनुसरण को बंद करने का विचार बनाया गया है।
  3. सरकारे यह मानने लगी है कि देश के जनसांख्यकी लाभांश को भुनाने के लिए आर्थिक इकोसिस्टम का निर्माण किया जाए। इसलिए आगामी दिनों में आर्थिक गतिविधियों के लिए गवर्नेन्स सम्बंधित सुधार गति पकड़ेंगे।
निष्कर्ष :
जैसा की हम देख चुके है कि मोदीजी की नीतियों में भी निरंतरता ही मौजूद है, अगर परिवर्तन कही आया है तो वह है नीतियों को लागू करने में। विकास प्रक्रम में नीतिगत अपंगता और क्रियान्वयन अपंगता को मोदीजी ने सीधे सम्बोधित किया है। इससे पहले मनमोहन सिंह के कार्यक्रमो शायद यह दुविधा थी कि नव उदारवाद का दामन स्थाई रूप से थामा जाए या फिर आर्थिक स्थिति नियंत्रण में आते ही इससे पल्ला छुड़ा लिया जाए। मोदीजी ने इस दुविधा को खत्म कर दिया, वे मानने लगे कि भारत को उभरती अर्थव्यवस्था  वैश्विक नेतृत्व तभी दिलवाएगी जब नव उदारवाद पर पूरी तरीके से आगे बढ़ेंगे। तभी तो वे पश्चिम और खाड़ी देशों के प्रति अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहो का त्याग करके निवेश सम्बंधो को मजबूत करने में लगे है।

जैसा कि The Economist नामक पत्रिका ने भी मोदीजी को नव-प्रवर्तक के बजाय महान प्रशासक माना है। मुझे भी लगता है कि इतिहास भी मोदीजी को इसी रूप में जगह देगा। वे शेरशाह सूरी ज्यादा नजर आएंगे बजाय खिलजी या अकबर।

रोजगारो का प्रायोजित अभाव


हम सब मानते है कि वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से प्रगति कर रही है लेकिन यह प्रगति रोजगार के प्रश्न का उचित समाधान नही कर पा रही है। जब भी कोई भर्ती की सूचना आती है तो उसके लिए पहुचने वाले लाखों आवेदन और फिर आसमान छूती कटऑफ को देखकर लगता है कि रोजगार कितने कम रह गए है और उन्हें पाने की अभिलाषा रखने वालो की संख्या कितनी ज्यादा हो गई है। ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि भर्तियां एक तो नियमित रूप से नही आती दूसरी बात यह है कि उनकी संख्या मांग को देखते हुए बहुत ही कम होती है। इन सबको देखकर ऐसा लगता है कि रोजगारो का संकट उत्पन्न हो गया है।


ऐसे में कहा जा रहा है कि वर्तमान स्थिति में भी रोजगारो की कोई कमी नही है, मौजूदा अभाव एक तरीके से कृत्रिम तौर पर निर्मित किया गया है। सरकारी विभागों में कर्मचारियों के लाखों पद खाली पड़े हुए है, मानव संसाधन के अभाव से हर विभाग को जूझना पड़ रहा है। लेकिन समस्या यह है कि सत्ताधारी वर्ग उन्हें भरने के लिए अनिच्छुक है। मौजूदा अभाव एक तरीके से प्रयोजित है जिसे विभिन्न वर्गों द्वारा प्रायोजित किया जा रहा है।

रोजगारो के अभाव को प्रायोजित करने वाले कारक

1. अंतराष्ट्रीय संस्थान
अंतरराष्ट्रीय संस्थान विभिन्न देशों की नीतियों को प्रभावित कर रहे है। इन संस्थानों में विकसित देशों का बोलबाला है और ये विकासशील देशों में अपने निवेशों को सुरक्षित करने के लिए कई तरह के इंडैक्स जारी करते है और उनमें रैंकिंग सुधारने के नाम पर लोगो का भला करने वाली नीतियों को खत्म करने की वकालत करते है।
ये मानते है कि जो देश नोकरियो में वेतन-भत्तों में ज्यादा व्यव करेगा तो उसका राजस्व घाटा भी  ज्यादा होगा। ऐसे देश से अपने निवेशों की सुरक्षित वापसी मुश्किल होगी, इसीलिए ये सरकारो को प्रभावित करते रहते है।

2. सार्वजनिक क्षेत्र
हर एक सरकारी विभाग मानव संसाधनों के अभाव से ग्रसित है, इस कारण वहां के हर कार्य अटके पड़े हुए है। वे ऊपरी स्तर पर कर्मचारियों की आवश्यकता को भी जाहिर करते है, लेकिन होने वाली नियुक्तियां उनकी मांग से इतनी कम होती है कि नवनियुक्तो के आने से भी विभागीय कामकाज में कोई बदलाव नही आता है। उम्मीद के तौर पर तकनीकी उन्नयन का आश्वासन है कि कम लोग ही तकनीकी की बदौलत सभी कामकाजों को संभाल सकेंगे।

इतनी भयावह स्थिति होने के बाद भी सरकार भर्ती के प्रति अनिच्छुक बनी हुई है क्योंकि वो कर्मचारियों के वेतन-भत्तों का बोझ नही बढ़ाना चाहती है। सरकार को बस राजस्व घाटे का स्कोर कम दिखाकर वाहवाही लूटनी है। अपने कामकाज को निजी क्षेत्र में स्थानांतरित करना तो प्राथमिक बना ही हुआ है , साथ मे तकनीकी की बदौलत जीतने कर्मचारियों को कम किया जा सके, उतना करने की कोशिश जारी है। मौजूदा मानव संसाधन का ही कैसे अधिकतम उपयोग किया जाए, सरकार इस मिजाज में रहती है। अब बोलो इस तरह के रवैये से रोजगार सरकारी विभागों में कैसे निकलेंगे, उल्टा आने वाले समय मे कम और होंगे। अधिकतम कार्यो को संविदा और अस्थायी नियुक्तियो से किया जाएगा।

3. निजी क्षेत्र
निजी क्षेत्र का एकमात्र मकसद मुनाफे पर रहता है। मुनाफे के लिए जरूरी है कि लागत को कम से कम किया जाए। लागत में कटौती जब सम्भव है जब कम लोग ही अधिक कामो को संभाल सके। इसलिए निजी क्षेत्र क्रत्रिम बुध्दिमता पर आधारित स्वचालन का प्रयोग बढ़ाने का पक्षधर है, जिसके कारण नोकरियो में भारी मात्रा में कमी होगी। इसके साथ ही काम करने वालो के सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी दायित्वों को कम करने के लिए श्रम कानूनों को ढीला करवाने के लिए सरकार को भरोसे में लिया जा रहा है, इससे भी लोगो मे अपने रोजगार के प्रति असुरक्षा बढ़ेगी।

कॉरपोरेट सेक्टर ने तो अपने रोजगार के दायित्वों से बचने के लिए बीच मे यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि हम तो रोजगार देने  को इच्छुक है लेकिन भारतीय युवाओं के पास ही रोजगार देने लायक क्षमता नही है। यहां मन मे एक सवाल उठता है कि अगर भारतीयों के पास क्षमता नही है तो फिर उन्ही भारतीयों को नियुक्त करने के लिए H1B वीजा की लड़ाई आप लड़ रहे है? सीधी सी बात है रोजगार की योग्यता का अभाव एक बहाना है। ऐसे कई बहाने इनके द्वारा बनाये जा रहे है। अगर ये कुछ प्रयास भी कर रहे है तो वो सिर्फ औपचारिकता भर है, जैसे कि अप्रेंटशिप के कोर्स करवा दिए, कौशल विकास के शिविर लगा दिए।

दोष देते समय निजी क्षेत्र के हालातों को भी समझ लेना चाहिए। दरअसल वर्तमान बड़ी कम्पनी ओर बड़ी होती जा रही है वे छोटी कम्पनियों को अधिग्रहण, कीमत युध्द, नीतिगत संरक्षण के माध्यम से बाहर कर दे रही है। इससे छोटी इकाइयों के अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो गया है। इस वजह से कम्पनिया अपने भविष्य को कम कार्मिको की बदौलत दिशा देना चाहती है। जैसे कि आईटी सेक्टर में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कम्पनियों ने इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो जैसी कम्पनियों के लाभांश को चुनोती दी है। वालमार्ट ने हाल ही में फ्लिपकार्ट को खरीद लिया है, अलीबाबा भी बड़ी भागीदारी निभा रही है। इसका मतलब है कि संसाधन सम्पन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियों देशी इकाईयो को प्रभावित कर रही है, इसका असर रोजगारो पर भी पड़ रहा है। बड़ी कम्पनियों के पास कामकाज के संचालन के लिए बेहतर तकनीकी और प्रबंधन होता है जिससे कम लोगो का नियोजन सम्भव हो पाता है।

4. नीति-निर्माताओं की भूमिका
रोजगारो के अभाव को प्रायोजित करने में नीति-निर्माताओं की भी बड़ी भूमिका होती है-

  • नीति-निर्माता रोजगार सृजन के लिए कोई मजबूत इच्छाशक्ति नही रखते है। अगर आर्थिक समीक्षा की माने तो वे रोजगार के नाम पर लोगो को केवल जूते-कपड़े बनाने का प्रशिक्षण देना चाहते है। सरकार अनोपचारिक क्षेत्र को ही कागजो के जाल में फंसाकर रोजगार का अहसास दिलाना चाहती है। पकोड़े बनाने को रोजगार कहना कोई जुमला नही था बल्कि वो सरकारी प्रयासों का एक उदाहरण था।
  • नीति-निर्माता राजनीतिक दलों से आते है जोकि अपने वित्तपोषण के लिए कॉरपोरेट सेक्टर पर निर्भर रहते है। अतः उन्हें नाखुश करने के चक्कर मे भी सरकार कोई ठोस व्यवस्था नही कर पा रही है।
  • आरक्षण विरोधी लोग भी सरकारी भर्तीयो के अभाव को प्रायोजित कर रहे है। इनका मकसद है कि भर्तियों को अटकाया जाए और बाद में अधिक नोकरियो को निजी क्षेत्र में बदला जाए। अधिकतम सरकारी काम को संविदा पर करवाया जाए। इसी सिलसिले में बेकलॉग चल रहे लाखो पदों को हाल ही में खत्म कर दिया गया।
इस प्रकार हम देख रहे है कि बाहरी तत्व, सरकार, निजी क्षेत्र और विभिन्न हितों से परिचालित नीति-निर्माता रोजगारो के इस प्रयोजित अभाव के लिए जिम्मेदार है।

समस्या की भयावहता
सबसे बड़ी बात यह है कि यह समस्या नजर आती है। जहाँ देखो काम मांगने वालों, परीक्षा देने वालो, साक्षात्कार देने वालो की भारी भीड़ नजर आती है। इतनी संख्या में छात्र कॉलेजो से बाहर आ रहे है कि नोकरियो की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान मशरूम की तरह फलफूल रहे है, उनकी फीस और कमरों के किराए गरीब छात्रों की जेब काट रहे है। पानी, खाना, अखबार, सामान जैसी कई दूसरी सहायक सुविधा देने वाले लोग छात्रों की मजबूरी का शोषण करने में लगे हुए है। इसके बाद भी आसमान छूती कटऑफ की तरफ सरकार की एक दृष्टि भी नही जाती। लेकिन विडम्बना है कि इनसे आम आदमी जूझ रहा है, नीति निर्माता नही। वे तो खुद और खुद की पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करने में लगे हुए है। और लोगो को आरक्षण, जाति, भाषा और धर्म के नाम पर बांटकर खुश नजर आते है। इसके साथ ही अनियमितताओं से ग्रसित चयन आयोग है जो छात्रों के धैर्य की कठिन परीक्षा ले रहे है। इन सब को भगवान से डरना चाहिए कि एक तरफ तो मानव संसाधनों का अभाव झेल रहे कार्यालय है वही दूसरी तरफ कानून से बंधे और आंसू बहाते अभ्यर्थी है।

अब चलते है समाधान की तरफ
जैसा कि हम जानते है कि भारत अभी जनसांख्यकी लाभांश के दौर से गुजर रहा है, जिसमे 70% लोग 35 साल से कम उम्र के है। मतलब रोजगारो की तलाश करने वाले है या बेहतरीन विकल्पों की तलाश में लगे हुए लोग है।


  1. यह वह समय है जब भारत मे रोजगार के सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनो में काफी अवसर है। लेकिन जनसांख्यकी लाभांश ही वह कारण है जिसकी वजह से गला काट प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। जब हम इस लाभांश को पार कर जाएंगे तब यह हालात नही रहेंगे। यह वह समय है जब लोग स्नातक पूरी करके निकल रहे है, और सरकारी नॉकरी सभी की प्राथमिकता होती है। सरकार को चाहिए कि रिक्तियों को बढ़ाये और आगे चलकर भले ही नियुक्तियों को जनसंख्या के आधार पर विनियमित कर दे।
  2. ऐसा समय है जब इन रिक्तियों को भरने की जरूरत है, लेकिन सरकार को लगता है कि इसके कारण राजस्व घाटा बढेगा। लेकिन वैतनिक लोग बिज़नेस वर्ग से ज्यादा कर अदा करंगे ओर खर्चा करेंगे तो 30% से 40% तक धन तो वापस सरकार या अर्थव्यवस्था में ही चला जायेगा। यह एक तरह से विन-विन सिचुएशन होगी।
  3. एक भर्ती आंदोलन शुरू किया जाए जिसमे सभी विभागों में सभी रिक्तियों की पहचान की जाए और उन्हें भरा जाए। एक पदोन्नति नीति के माध्यम से मेहनती और ईमानदार लोगो को कुछ निश्चित समय के बाद अनिवार्य पदोन्नति दी जाए। एक छंटनी अभियान चलाकर कामचोर कार्मिको को बाहर किया जाए।
  4. सरकार युवाओ को क्यों उद्वमी बनाने पे तुली हुई है। यहा दबावपूर्ण उड्डमशीलता कैसे करेगी, आप लोगो को कह रहे हो कि रोजगार पाने वाले नही देने वाले बनो। लेकिन एक गरीब आदमी का बच्चा स्नातक होते ही स्थायित्व की तलाश में नॉकरी पकड़ेगा या फिर अस्थायी केरियरयुक्त बिज़नेस करेगा। सीधी सी बात है बिज़नेस वाला कार्यक्रम उच्च वर्गो को सम्बोधित करता है, जिनको की दैनिक दिनचर्या के लिए रोजगार की तलाश नही करनी पड़ती, बल्कि अतिरिक्त धन को निवेश करने की तलाश होती है। अतः बिज़नेस वाले पक्ष को सरकार रोजगार समाधान के तौर पर पेश करने से बचे।
  5. कई विभागों में यह कहकर भी नियुक्ति नही निकाली जा रही कि उनका तकनीकी उन्नयन किया जाएगा जैसे कि रेलवे। अगर रोजगारो में कटौती की कीमत पर यह सब करना होता तो यह पिछली सरकारों के लिए भी आसान था। लेकिन सामाजिक सुरक्षा और न्याय की भावना को उद्धम से पृथक करके देखने का प्रयास उन लोगो ने नही किया।


निष्कर्ष
राजस्व घाटे के स्कोर को कम करके हम कुछ भी बड़ा नही कर रहे है। निजी क्षेत्र को सहूलियत देकर हम अमीर-गरीब की खाई को दिनोदिन ओर बड़ा रहे है। कक्षा में एक छात्र मेरिट में आ जाये और बाकी के छात्र असफल हो जाये तो क्या ऐसी कक्षा के परिणाम को बेहतर कहा जायेगा? नही। समावेशी विकास का सफर रोजगारो के माध्यम से ही तय होगा, इसलिए सरकार, नीति-निर्माताओं को लोकतांत्रिक दायित्वों का प्रति सोच लेना चाहिए और इस अभाव को जल्दी से जल्दी खत्म करना चाहिए। जब रोजगार नही दे सकते तो ग्रोथ रेट के स्कोर ओर व्यापार में आसानी की रैंकिंग कोई ऐसे मुकाम नही है, जिन पर सीना चौड़ा किया जाए।

नव उदारवाद काल में गाँव

नव-उदारवाद के दौर में गाँवो ने सरकार को एक प्रकार की उलझन में शुरू से ही डाले रखा, एक तरफ तो सरकार तेजी से विकास के सपने संजोये मार्केट के साथ चलना चाहती थी वही दूसरी तरफ कल्याकारी राज्य के टैग को बचाना चाहती हैं। जहां मार्केट के साथ आगे बढ़ने से कई समस्याओ के समाधान की संभावना थी, वही गाँवो को इसके  तैयार करने की भी जरुरत थी। गाँवो को नव-उदारवादी मैराथन में दौड़ाने के लिए विशेष सुविधा दिए जाने की जरुरत भी थी। भारत में स्वतंत्रता के बाद इस चीज को समझते हुए बाजार को नियंत्रित कार्यक्षेत्र ही प्रदान किया गया था।

1991 के बाद भारत में आर्थिक सुधारो के साथ बाजार को आज़ादी देने के वो प्रयास होने लगे जिनकी विश्व जनमत की तरफ से भी मांग हो रही थी। इस पहल  को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा था जिनमे आईएमएफ, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और कई अन्य मंचो के द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा था। ये संस्थान वित्तीय और तकनिकी सहायताओ के बदले देशो की संप्रभुता से आगे बढ़कर कानूनी और संरचनात्मक सुधारो के लिए मजबूर कर रहे हैं। ऐसे सरकारी विनियमो को तोडा और मरोड़ा जा रहा हैं जो मुनाफे को नुकसान पहुंचाए। सार्वजनिक संसाधनों की अवधारणा अब ख़त्म हो चुकी हैं और सरकार उन पर से अपना नियंत्रण हटाकर उन्हें निजी क्षेत्रो में भेज रही हैं। सामाजिक सेवाओ में  भी अब मुनाफा नजर आने लगा हैं और सरकार वहां से अपनी भूमिका को सीमित करके उनमे निजी क्षेत्रो को प्रवेश दे रही हैं। ये सब चल रहा हैं व्यापार करने में सुविधा के लिए अपनी स्थिति सुधारने के नाम पर।


सामाजिक सेवाओ में सरकार जो सुविधा उपलब्ध करा रही थी वे अपनी अकुशलता के कारण तो पहले ही कारगर नहीं थी। अब सरकार उनसे पलायनवादी रुख अपना कर लोगो को मुनाफा आधारित निकायों के भरोसे छोड़ने की नीति अपना रही हैं। जहां पहले शिक्षा और स्वास्थय जैसी चीजे पहले सरकार उपलब्ध करा देती थी अब ये ही सुविधा निजी क्षेत्र के अधीन मिल रही हैं। यह बात सही भी बैठती हैं की इस से  सेवा प्रदायगी में गुणवत्ता और दक्षता आयी है। लेकिन इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि इन सुविधाओ तक पहुँच क्या सभी लोगो की हैं। खासकर यह समस्या ग्रामीणों को ज्यादा उठानी पड़ रही हैं क्योंकि उनमे से ही अधिकांश निम्न आय के कारण इन तक पहुँच नहीं रखते हैं। जब ये  सुविधा सरकार उपलब्ध  कराती हैं तो उन से  गरीब और वंचित लोगो  के लाभान्वित होने की उम्मीद ज्यादा रहती हैं। अब नव-उदारवादी नीति का अनुसरण   करके सरकार इन क्षेत्रो से वापस होती हैं तो शोषण करने वाली शक्तिया ही विकल्प के रूप में रह जायेगी।


सार्वजनिक संसाधनों की अवधारणा से जो नाता तोडा जा रहा हैं उसका सर्वाधिक असर गाँवो को ही उठाना पड़  रहा हैं क्योंकि वे अभी भी उन से लाभान्वित हो रहे हैं या फिर उनसे जुड़े हुए हैं। जो प्राकृतिक संसाधन पहले समुदाय के नियंत्रण में थे वे अब या तो निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहित किये जा चुके हैं या  फिर उनसे लोगो को वंचित किया जा चूका हैं।

नव उदारवाद से गाँवो के मुलभुत हितो पर चोट पहुंची हैं इसके साथ ही गाँवो में रहने वालो के हित भी बुरी तरीके से प्रभावित हो रहे हैं। समावेशी विकास की मुहीम भी इससे  बुरी तरीके से प्रभावित हो रही हैं इसी चीज ने पापुलिज्म जैसी चीजो को जन्म दिया।   

शब्दावलियों के जाल में फंसाकर बजट का पूंजीपति उन्मुखीकरण

mastram meena blogबजट की घोषणा के आते ही लोग इस चर्चा में लग जाते हैं की क्या क्या नए काम होंगे और कोनसी चीज सस्ती होगी तथा कोनसी चीज महंगी होगी इसके अलावा किस क्षेत्र को क्या मिला और ज्यादा से ज्यादा हम सोचते हैं की क्यों मिला , मीडिया में भी इन्ही चीजो पर जोर के कारण लोक-लुभावन मुद्दो पर बहस के अलावा बजट की कभी भी भावना को परखा नही जाता हैं। क्यों की बजट में जो शब्दावलियाँ प्रयुक्त की जाती हैं वे आम आदमी की समझ से दूर होती हैं और मीडिया भी उन्हें उसी रूप में पेश कर देता हैं।


बजट का रुख 
हा अब अगर लोकलुभावन चीजो को हम नही  देखे तो फिर हमे कोनसी चीजे देखनी चाहिए, ये सवाल आता हैं। क्यों परेशानी होती हैं मुख्य भावना को समझने में
बजट में जो शब्द प्रयुक्त होते हैं उनमे अंतर केवल अर्थशास्त्र का विद्यार्थी ही कर सकता हैं। जैसे की राजस्व घाटा, पूंजी घाटा, सकल घाटा और  प्राथमिक घाटा , लोगो को इतने घाटो में उलझाने के बाद वे सोचते हैं की हाँ सरकार घाटे में चल रही हैं इसलिए सरकार से ज्यादा अपेक्षा करना ठीक नही हैं ,उसी प्रकार प्राप्तियों के सम्बन्ध में हैं। मीडिया को चाहिए की इनके आंकड़े हरेक अवयवो सहित प्रकाशित किये जाए।
अब यहां से शुरू होता हैं एक खेल, जिसमे लोगो को केवल गुमराह किया जाता हैं। जिसे हम इस तरीके से समझ सकते हैं।
1. सबसे पहले तो आंकड़े दे कर बताया जाता हैं की हमारी अर्थव्यवस्था की हालत यह हैं , जिसमे घरेलु और वैश्विक दोनों कारको को शामिल किया जाता हैं।  फिर क्षेत्रवार तुलना द्वारा बताया जाता हैं की कोनसा क्षेत्र अधिक उत्पादक हैं और उसके लिए सुविधाओ में इजाफा करने के लिए किये जाने वाले प्रावधानों को आम स्वीकृति दिलाई जाती हैं दूसरी तरफ कृषि का योगदान जीडीपी  में कम साबित करके सब्सिडियों की याद दिलाई जाती हैं।

 2. यह पहले ही बताया जा चूका हैं की कृषि एक रोजगार परक क्षेत्र नही हो सकता और फिर विनिर्माण क्षेत्र का गुणगान किया जाता हैं की इसी में वो क्षमता हैं जो देश से बेरोजगारी को  मिटा सकता हैं और यही देश के निर्यात को बढ़ा सकता हैं।

3. विनिर्माण की महिमा बताने के बाद इसके लिए जरुरी चीजो की पूर्ति का इंतजाम किया जाता हैं। इसके बहाने देश के कानूनो, संवेधानिक प्रावधानों को तोड़ा और मरोड़ा जाता हैं। तथा देश के हित के साथ भी समझोते किये जाते हैं।
सेज़ जैसे प्रावधान करके एक भ्रष्ट सिस्टम को तैयार करके सरकारी खजाने के हितो से खेला जाता हैं। इसमें प्रावधान कर दिया गया हैं की उन्हें करो से छूट दी जायेगी , जो सरकारी राजस्व को सीधा नुकसान हैं। इसके बाद इन इलाको में बिज़नेस इकाई लगाने के लिए फिर रिश्वत गेम खेल जाता हैं। इस प्रकार काफी बड़ी राशि को माफ़ कर दिया जाता हैं , और इसका खामियाजा दूसरे क्षेत्रो को भुगतना पड़ता हैं जिसे उनको होने वाले आवंटन से जान सकते हैं।

4. विनिर्माण या निर्माण क्षेत्र को जमीन उपलब्ध कराने के लिए भूमि अधिग्रहण कानूनो में संसोधन किया जाता हैं। और जो किसानो के लिए पहले सेफ़गार्ड थे जो उन्हें जमीन के छीनने से बचाते थे उनको लचीला बनाकर अंधाधुंध अधिग्रहण किया जा रहा हैं। इससे एक तो किसानो की जमीन छीनी जा रही हैं दूसरी और उनके भविष्य से भी खिलवाड़ की जा रही हैं।
कई जगहों पर तो सरकारी जमीन को ही बंजर, दलदली और अनुपजाऊ साबित करके आवंटित कर दिया जाता हैं।

5. अवसंरचना के नाम पर हम तुलना करने से पहले बता देते हैं की सरकार उन्ह अवसरचनाओ पर करोडो खर्च कर रही हैं जिन्हे एक खासा वर्ग ही इस्तेमाल करता हैं। जैसे की- हवाई अड्डो का निर्माण, ये ऐसा क्षेत्र जिसे हम कह सकते हैं की ये आम आदमी के हितो से परे हैं और कुछ ही लोगो की जरुरत हैं ,ऐसे में सरकार के बजाय निजी क्षेत्रो को इनमे आमंत्रित करना चाहिए।
इस प्रकार उन परिसम्पतियों के निर्माण पर बहुत अधिक खर्च किया जाता हैं जिन्हे कोई ख़ास वर्ग ही इस्तेमाल करता हैं।

6. सामजिक क्षेत्रो पर आते हैं तो हम देखते हैं की उनको अखिल भारतीय स्तर पर मिला आवंटन इतना कम होता हैं की उससे केवल इस चीज का अध्यन ही किया जाता होगा जिसके लिए इसका आवंटन हुआ हो।

7. गाँवो और जो निम्न वर्ग के लिए जो प्रावधान किये जाते हैं वो इतने जटिल बना दिए जाते हैं की उनका आसानी से कोई भी फायदा नही उठा सकता हैं। और फिर ऐसी व्यवस्था में फसा दिया जाता हैं जिसमे राजनितिक वर्ग के ही बिचोलिये जुड़े हो।

8. अब बात करते हैं हम कर्जो की तो  इनमे गाँवो को प्राथमिक क्षेत्र में डालकर अधिकतम उपलब्धता की बात की जाती हैं परन्तु उनकी प्रक्रिया इतनी जटिल हैं की किसी  गांव से दो-चार लोग ज्यादा से ज्यादा लाभान्वित होते होंगे। जबकि बहुत बड़े बड़े कर्ज कॉर्पोरेट सेक्टर को आसानी से उपलब्ध करा दिए जाते।
अगर हम बात करे नपा की तो वो सर्वाधिक कॉर्पोरेट सेक्टर की ही होती हैं पर हमारे नीति निर्माता जान बूझकर उसमे कृषि को भी शामिल करले लेते हैं जिनकी मात्रा बहुत छोटी होती हैं।

पूंजीपति कारी  एसेट निर्माण

  

समाज के विभिन्न वर्गों पर मुद्रास्फीति का असमान वितरण


मुद्रास्फीति आज हर क्षेत्र में अपने पांव पसार चुकी हैं। ऐसी अब कोई भी चीज नही बची होगी जो अपनी कीमतों में पिछले आठ-दस पुरानी कीमत संरचना से समानता दर्शाती हो। सब चीजो की कीमतों में भारी अंतर आ गया हैं। महंगाई की मार खाद्य सामग्रियों से लेकर भारी मशीनरी तक में सब जगह देखी जा सकती हैं। और कम-ज्यादा सभी वर्गों को प्रभावित करती हैं। महंगाई एक अलग से बनकर मुद्दा बन गया हैं जिस पर राजनीती की जा सकती हैं और जनता भी उनको प्रतिक्रिया दे कर इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं।

 महंगाई का तुलनात्मक असर
महंगाई का असर हम गरीब और अमीर वर्ग पर अलग-अलग देखते हैं। एक वर्ग को दैनिक जीवन की सभी उपयोगी वस्तुओ पर इसका असर देखने को मिलता हैं ,जब की दूसरे वर्ग के लिए यह असर  उसकी क्रय शक्ति के दायरे में आने के कारण अप्रभावी रहता हैं।
अमीर वर्ग की क्रय शक्ति का दायरा अधिक होने के कारण उसे केवल भौतिक चीजो में ही महंगाई का सामना करना पड़ता हैं , और इनकी खरीददारी कभी कभार ही की जाती हैं इस प्रकार यह वर्ग मुद्रास्फीति  से अनभिज्ञ ही रहता हैं। साथ ही इनकी भौतिक चीजो के मांग और आपूर्ति का संतुलन बना रहने के कारण इसमें भी कम ही मुद्रास्फीति रहती हैं।
अमीर और गरीब वर्ग के बीच में हम एक मध्यम वर्ग को लेकर चलते हैं जिसकी आय निम्न वर्ग से थोड़े ऊपर से शुरू होकर काफी आगे तक जाती हैं।  इस वर्ग की आय नियमित होती हैं इस प्रकार यह वर्ग अपने आप को निम्न वर्ग से अलग करता  हैं। यह वर्ग दैनिक जीवन में भी महंगाई का सामना करता  हैं जो इसकी क्रय शक्ति को प्रभावित करता हैं। क्रय शक्ति प्रभावित होने से भौतिक साधनो को बसाने में इस वर्ग को अधिक समय लगता हैं। इस प्रकार यह वर्ग भौतिक सुविधाओ के साथ दोनों ऊपर व नीचे के वर्ग के बीच दोलायमान स्थिति दर्शाता हैं।
अब सबसे निम्न वर्ग के पास आते हैं इसमें में उन सभी परिवारो को शामिल करता हूँ जिनकी आय नियमित नही हैं तथा उद्योग व सेवा क्षेत्र से संबंधित नही हो। जैसे की कृषि या उससे संबंधित कार्यो में कार्यरत लोगो की आय नियमित नही होती हैं। असंघटित क्षेत्र में कार्य करने वाले लोग भी इसी दायरे में आते हैं।

निम्न वर्ग की व्यथा 
इस वर्ग की आय अनियमित होने के साथ-साथ बहुत ही कम होती हैं। इनको दैनिक जरुरतो के लिए सबसे ज्यादा महंगाई को उठाना पड़ता हैं, इस कारण इनकी क्रय शक्ति ही विकसित नही हो पाती। इस वर्ग में भौतिक साधनो की कमी अत्यधिक रहती हैं। साथ ही विभिन्न प्रकार के पारिवारिक आयोजन इन्हे कर्ज के तले धकेल देते हैं।
ऊपर से देखने पर एकमात्र ये ही वर्ग हैं जिसे पारिवारिक सदस्यों की जरुरतो, जैसे की -शिक्षा ,स्वास्थ्य, वस्त्र,आवास आदि के लिए भी ऋणग्रस्तता झेलनी पड़ती हैं। इस वर्ग में शिक्षा का काफी अभाव हैं इसलिए अपनी आय को बढ़ने के लिए दूसरे जीविका निर्वाह के साधन भी चुन नही पाते हैं।
इस वर्ग की दूसरी पीढ़ी भी पैसे के अभाव में गुणवत्ताहीन जगहों से शिक्षा प्राप्त कर रही हैं जो उन्हें केवल पढ़े लिखे मजदुर से ज्यादा कुछ नही बनाएगी। इनमे से कुछ मेधावी छात्र ही छात्रवृति या फिर अन्य अनुदानों अथवा कर्जे लेकर अपनी पढाई आगे नियमित कर पाते हैं। कुछ छात्र तो बाहर जाकर पढाई करने में होने वाले खर्चे या महंगी फीसों से बचने के लिए पढाई या तो छोड़ देते हैं या फिर  गुणवत्ताहीन जगहों से जारी रखते हैं। इस प्रकार शिक्षा के द्वारा कौशल विकसित कर इस वर्ग की आय बढ़ाने का विकल्प भी अप्रभावी लगता हैं।

दूसरी बात यह हैं की इस वर्ग को महंगाई के प्रभाव को कम करने के लिए कोई सहायता भी नही मिलती हैं। जबकि मध्यम वर्ग  आदि को महंगाई भत्ते ,करो में कटौती आदि महंगाई रोधी विकल्प मिलते हैं। सरकार से पूछने पर वो सब्सिडियों की याद दिलाती हैं जिसे वो निम्न और गरीब वर्ग की सभी समस्याओ का सार्वभौमिक जवाब मानते हैं। तथा कुछ संकीर्ण सोच वाले बुद्धिजीवी तो यहां तक दावा कर देते हैं की सरकार द्वारा खर्च किया जाने वाला पैसा मध्यम वर्ग के करो का हैं इसे एक अनुत्पादक वर्ग पर कैसे खर्च किया जा सकता हैं।

महंगाई के प्रभाव से निपटने के लिए एक विकल्प बैंको से कर्ज का हैं। परन्तु पहली बात यह सरकार का केवल हाजिरजवाबी विकल्प हैं क्यूंकि निम्न वर्ग सर्वाधिक पीड़ित खाद्य मुद्रास्फीति से रहता हैं और कोई भी सब्जियां खरीदने के लिए न तो कर्ज लेता हैं और नही कोई देता हैं। अब बात आती हैं भौतिक सुविधाओ या फिर पारिवारिक आवश्यकताओं के लिए कर्ज प्राप्त करने की तो, इनकी प्रक्रिया भ्रष्टाचार या फिर कामचोरी की वजह से इतनी जटिल हैं की  एक अशिक्षित किसान बिना किसी बिचोलिये के आगे बढ़ ही नही सकता। इस प्रकार यह विकल्प जटिलताओं भरा हैं और इसमें भी कुछ लोग प्राथमिक क्षेत्र की कर्ज सीमा को कम करवाने के प्रयास में लगे हुए हैं, तथा NPA  आदि को इस से जोड़ रहे हैं भले ये सब को पता हैं की इस क्षेत्र का NPA बहुत ही कम हैं।

इस प्रकार हम देख चुके हैं की महंगाई से सबसे ज्यादा कम आय वाला व्यक्ति प्रभावित होता हैं।