रणथंभौर में बाघ-मानव संघर्ष : कारण एवं समाधान

एक तरफ हम इस बात के लिए गर्व कर रहे हैं कि रणथम्भौर बाघ आरक्षित क्षेत्र में सैलानियों की संख्या बढती जा रही हैं। पर्यटन क्षेत्र में दिनोदिन निवेश बढ़ता जा रहा हैं। नवीन सृजित आर्थिक गतिविधियों द्वारा कई स्थानीय लोगों का रोजगार प्राप्त हो रहा हैं। स्थानीय हस्तशिल्प के कलाकरों को आजीविका प्रपात हो रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ हमे इस बात के लिए भी चिंतित होना चाहिए कि बाघ आरक्षित क्षेत्र के कारण क्षेत्र में पर्यावरणीय कानूनों के कारण औद्योगिक विकास की संभावनाओं में कमी आई हैं। आरक्षित क्षेत्र के आसपास के गांवों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार अनुमतियों के जाल में उलझ गया हैं। एक बड़ी सामाजिक लागत इसके साथ निहित हैं। लेकिन इन सबसे बढ़कर समस्या यह हैं कि वन क्षेत्र के भीतर विभिन्न  कारकों के कारण बाघों की बाह्य क्षेत्रों में आमद बढ़ी हैं, जिसने न केवल मवेशियों बल्कि पिछले दस सालों में लगभग 14 लोगों की जान ली हैं। इस आलेख में हम उन्ही पहलुओं तक पहुँचने की कोशिश करेंगे, जो मानव-बाघ संघर्ष एवं बाघों के अधिवास की कमी के लिए उत्तरदायी हैं। 

1. स्थिति क्या है?

रणथम्भौर में बाघों के आपसी संघर्ष की सुर्खियाँ अक्सर समाचारों में देखने को मिल जाती हैं। बाघों के लिए क्षेत्र कम पड़ने के कारण युवा बाघ टेरिटरी नही बना पा रहे हैं। कुछ बाघ सीमावर्ती क्षेत्रों में रहते हैं, जहाँ से वे निकलकर पालतू पशुओं व मनुष्यों का शिकार करते हैं। वही मानव भी नियम विरुद्ध जंगल में पहुँच रहा हैं, जिससे बाघ और मानव का आमना-सामना होने लगा हैं। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) के अनुसार यहाँ पर अधिकतम 40 बाघ हो सकते हैं, लेकिन यहाँ पर इस समय 70 बाघ हैं। ऐसे में दबाव की मात्रा को हम समझ सकते हैं।

2. उत्तरदायी कारण

2.1. अति आबादी (Over-Population)

संरक्षण प्रयासों की बदौलत रणथम्भौर ही नहीं संपूर्ण भारत में बाघों की संख्या में भारी वृद्धि हुई हैं। भारत ने 2022 तक बाघों की संख्या को दोगुना करने के लक्ष्य को वर्ष 2018 में ही प्राप्त कर लिया था। हर चार साल में होने वाली टाइगर सेन्सस-2018 के अनुसार, वर्तमान में भारत में 2967 बाघ हैं। देश के सभी बाघ संरक्षित क्षेत्र अति आबादी के दबाव से गुजर रहे है। इस समय रणथम्भौर टाइगर रिज़र्व में भी 70 से 80 के मध्य बाघ हैं। समस्या की जड़ यह है कि प्रे-बेस के आधार पर यहाँ 40 से ज्यादा बाघ नहीं होने चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति इस सीमा के पूर्ण विपरीत हैं।

बाघों के मध्य होने वाले क्षेत्रीय संघर्ष (Territorial Conflict) में युवा बाघ वृद्धों को खदेड़ देते हैं, जो मानव आबादी वाले क्षेत्रों की ओर चले जाते हैं। इससे मानव-बाघ संघर्ष से जुडी समस्या उत्पन्न होती हैं।

2.2. अपर्याप्त अधिवास

बाघों की आबादी की तुलना में अनुकूल अधिवासों की कमी ही समस्या का कारण हैं। रणथम्भौर टाइगर रिज़र्व में बाघों की सांद्रता कुछ ही क्षेत्रों में हैं, जो सवाई माधोपुर या खंडार तहसील के क्षेत्र हैं। टाइगर रिज़र्व में ही आने वाले कैलादेवी अभयारण में कम बाघ पाए जाते है।

अधिवासों की कमी के लिए एक और कारण उत्तरदायी माना जाता हैं और वो यह हैं कि बाघ आरक्षित क्षेत्र में कुछ गाँव स्थित हैं, जिनके विस्थापन की प्रक्रिया बहुत ही मंद गति से चल रही हैं तथा इस दिशा में कोई महत्वपूर्ण विकासक्रम नही हुआ है।

2.3. पर्यटन का दबाव

वन क्षेत्र में पर्यटन के अधिक दबाव के कारण भी बाघ वन क्षेत्र से बाहर चले जाते हैं। इको टूरिज्म के नाम पर जिप्सियां पर्यटकों को भर-भर के उनके अधिवास स्थलों पर ले जाती रहती हैं, इससे उनके आराम एवं स्वछंद जीवन में दखल पड़ता हैं। वन क्षेत्र से बाहर जाने के लिए उनको यह वजह भी प्रेरित करती हैं।

2.4. बाहरी आकर्षक कारक

वन क्षेत्र में शिकार के लिए तो वैसे कई प्रकार के वन्य जीव पाए जाते हैं, परन्तु बाघ आरक्षित क्षेत्र की सीमाओं के समीप रहने वाले लोगो के मवेशी बाघों को बाहर आने के लिए आकर्षित करते रहे हैं। बाहर  इनको शिकार आसानी से मिल जाता हैं, साथ ही कई बगीचों में छिपने का आश्रय भी। जब फसले बड़ी हो जाती हैं तो बाघों का मूवमेंट आरक्षित क्षेत्र से बाहर 10-20 किलोमीटर की परिधि में देखने को मिलता हैं। जिससे किसानों में इसका व्यापक भय देखने को मिलता हैं क्योंकि हमले के कई मामले सामने आ चुके हैं। 

3. किए गये प्रयास और उनकी सीमाएं

3.1. प्रोजेक्ट टाइगर

प्रोजेक्ट टाइगर की घोषणा के साथ ही इन क्षेत्रों के संरक्षण मानदंडों में उतरोतर वृद्धि हुई हैं। क्रिटिकल टाइगर हैबिटैट एरिया में अवांछित लोगो की गतिविधियों को पाबन्द किया गया हैं। इससे वनों में बाघ के आराम में दखलंदाजी और खतरे कम हुए हैं।

3.2. बाघ आरक्षित क्षेत्रों से गांवों का विस्थापन

टाइगर रिज़र्व की सीमा में आने वाले बीस गांवों को विस्थापन के लिए चिन्हित किया गया हैं। विस्थापन की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही हैं। पांच गांवों को विस्थापित किया भी जा चूका हैं , बाकि लोगो से समझाइश की जा रही हैं।

3.3. टाइगर रिज़र्व के दुसरे क्षेत्रों में अनुकूलता में वृद्धि करना

टाइगर रिज़र्व में ही शामिल कैलादेवी में अनुकूलता में वृद्धि की जा रही हैं। इसके लिए संबंधित क्षेत्रों में संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं।

3.4. पर्यटन के दबाव में कमी करना

वनों में पर्यटन का दबाव भी बाघों के वनों से पलायन के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। इसके लिए उन पर दबाव कम पड़े इसलिए फुल डे सफारी पर रोक लगाईं गई हैं। इसके अतिरिक्त मानसून सीजन में भी पर्यटन पर पाबंदी लगी होती हैं।

3.5. अन्य स्थानों पर शिफ्ट करने पर विचार 

बाघों को अन्य क्षेत्र में भेजना भी एक समाधान हो सकता हैं। इस पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। यहाँ से बाघों को मुकन्दरा या रामगढ विषधारी में भेजने की बात हो रही हैं। जिस पर प्राथमिकता से आगे बढ़ने की जरुरत हैं।

आगे की राह

बाघों के संरक्षण के लिए विस्थापन कार्यों के लिए प्रमुखता से कार्य किए जाने की आवश्यकता हैं। इसके लिए विस्थापन के साथ-साथ पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास को भी प्राथमिकता मिलने पर ही बाकी लोग भी तैयार हो पाएंगे। विस्थापित होने वाले लोगो की आजीविका को ध्यान में रखकर योजना बनानी होगी। फुल डे सफारी को सीमित करने की आवश्यकता हैं। साथ ही पर्यटन कारोबार में लगे हितधारकों को भी प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। दूसरी जगह पर शिफ्ट करने की योजनाओं को यथाशीघ्र अमल में लाने की आवश्यकता हैं।

साथ ही मानवीय क्षति को कम करने के लिए भी कई उपाय करने की आवश्यकता हैं, जैसे कि :

  1. बाघों के हमले में घायल और मरने वाले लोगो के लिए एक निश्चित मुआवजा नीति होनी चाहिए। इसे अधिकारियो के विवेक और सौदेबाजी क्षमता के भरोसे मामला-दर-मामला निर्धारित नही करना चाहिए। घायलों के उपचार के लिए व्यवस्था होनी चाहिए। किसी भी हमले की स्थिति में एक जिम्मेदार अधिकारी को पीड़ित के पास जाकर अग्रिम कार्यवाही का आश्वासन देना चाहिए।
  2. बाघ की वन क्षेत्र के बाहर और भीतर सघन निगरानी की जानी चाहिए। वन क्षेत्र से बाहर निकलते ही संबंधित क्षेत्र के निवासियों को वास्तविक समय सूचना प्रदान करनी चाहिए ताकि वे सुरक्षित स्थानों पर पहुँच सके। साथ ही वन विभाग के कर्मियों को वापस वन में भेजने पर कार्य करना चाहिए।
  3. राष्ट्रीय उद्यान के जिन क्षेत्रो से बाघ की निकासी होती हैं, उन क्षेत्रो में चारदीवारी की मरम्मत की जाए। साथ ही चारदीवारी के निर्माण में खराब गुणवत्ता के सामानों का प्रयोग करने वाले ठेकेदारों पर कार्यवाही की जाए।
  4. हिंसक हुए बाघ को एनक्लोजर में रखा जाना चाहिए या फिर उसके लिए अधिक क्षेत्र की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसी घटनाओ को पुनः अंजाम देने वाले बाघों पर ठोस उपाय किए जाने चाहिए।  
  5. फसलो के दिनों में बाघ को छुपने में आसानी रहती हैं, इसलिए इस दौरान निगरानी में सख्ती बरतनी चाहिए। साथ ही बड़े-बड़े बगीचों के पौधो में भी उसके छुपे होने की संभावना हो सकती हैं। इसलिए किसानो और वन विभाग के बीच उसके मूवमेंट को लेकर सूचनाओ के आदान-प्रदान की संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए। चेतावनी प्रणाली की तरह सुचनाए वितरित करनी चाहिए।
  6. बाघ के मूवमेंट को लेकर ग्रामीणों द्वारा दी गई सूचनाओ को वन विभाग द्वारा नकार दिया जाता हैं, ऐसे में वन कर्मियों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता हैं।
  7. वन क्षेत्र में से पर्यटन के दबाव को कम करने की आवश्यकता हैं ताकि बाघ अपने मूल क्षेत्र में हस्तक्षेप मुक्त महसूस कर सके। एक समय सीमा का पालन किया जाना चाहिए। बाघ को परेशान करने वाले जिप्सी चालको और पर्यटकों पर कार्यवाही करने की आवश्यकता हैं।
  8. पर्यटन क्षेत्र और विचरण क्षेत्र को लग करने की आवश्यकता हैं। इसके लिए टाइगर सफारी पार्क की स्थापना  की योजना को यथासीघ्र जमीनी आधार दिया जा सके।
  9. बाघ आधारित नीतियों के निर्माण में स्थानीय लोगो को भी शामिल किए जाने की जरुरत हैं। इसमें केवल व्यवसायिक समूहों से जुड़े बाघ-प्रेमियों का ही दबदबा नही होना चाहिए ।
  10. इत्यादि।

निष्कर्ष

अंत में हम यही कहेंगे कि जंगल में विचरण करता बाघ निश्चित तौर पर एक वरदान की तरह है। परन्तु जैसे ही यह जंगल से बाहर निकलता है तो लोगो की दिनचर्या का बाधित करने के साथ-साथ दहशत उत्पन्न करने की वजह से यह अभिशाप बन जाता है। ऐसे में हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यह जंगल में ही बना रहे। इसके लिए सुझाए गये उपायों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।

सहकारी समितियों के माध्यम से अमरूद विपणन की समस्या का समाधान

सवाई माधोपुर का अमरुद अपनी मिठास के कारण बहुत अधिक लोकप्रिय हैं। यहां पर अमरूदों की बंपर पैदावार होती है। स्वादिष्ट व उत्तम क्वालिटी से भरपूर यहां का अमरूद देश की नामी-गिरामी मंडियों तक जाता है। यहाँ की मिट्टी और जलवायु के कारण अमरुद के बागान सवाई माधोपुर जिले में काफी सफल रहे हैं। करमोदा गाँव में अमरूदों की सफलता के बाद, एक दशक के भीतर ही इसके बगीचे लगभग पुरे सवाई माधोपुर जिले में विस्तृत हो गये।  सवाई माधोपुर में अब अमरूद की खेती व्यापक स्तर पर होने लगी है। लेकिन जैसे ही अमरुदों की बागवानी के अंतर्गत क्षेत्र में वृद्धि हुई, इनकी बिक्री की समस्या भी उत्पन्न हो गई। एक समय था जब अमरुद के लिए भाव और बाजार बहुत ज्यादा था, लेकिन धीरे-धीरे व्यापार खत्म होता चला गया। इस समय पर स्थिति उस निर्णायक मोड पर आ गई हैं, जहां किसान ये सोच रहा है कि इनके पेड़ों को लगे रहने दे या फिर खोद करके फेंक दे। सरकार भी इस दिशा में कई प्रयास कर रही हैं। ऐसी स्थिति में एक उपाय सहकारी समितियों के माध्यम से नजर आता है। जिस प्रकार क्रय-विक्रय सहकारी समितियां न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि खाद्यान्नों की खरीद करती हैं, उसी प्रकार से अमरुद के लिए भी खरीद की जा सकती हैं। इसके बारे में हम विस्तार से चर्चा करते है-

उपयुक्तता

अमरुद के लिए शुष्क जलवायु उपयुक्त होती हैं। ये सभी दशाएं सवाई माधोपुर में उपलब्ध हैं। इसलिए इसके बागान यहां पर तेजी से लोकप्रिय हुए। यहां की अनुकूल जलवायु, सिचाई हेतु यहां का बरसाती पानी एवं यहां की मिट्टी में बसे लौह तत्व की अधिकता व काली जलोढ़ मिट्टी की पर्याप्तता होने के कारण (अच्छी बारिश होने पर) लगभग सभी फसलों में प्रति हैक्टेयर उत्पादन बहुत अधिक है। मिट्टी काली जलोढ़ होने के कारण अधिक समय तक भूमि में नमी बनाए रखने में यह कारगर है। प्रायः देखा गया है कि पेड़ो की ग्रोथ के साथ फलों का आकार भी काफी बड़ा होता है। और सबसे अहम बात यहां मिट्टी में लवणीयता नही होने के कारण अमरूदों का स्वाद बिल्कुल मीठा है।

सवाई माधोपुर में अमरूद की खेती के प्रारंभिक चरण में उत्तर प्रदेश की नर्सरी से अमरूद के पौधे खरीदे गए।अब तो सवाई माधोपुर में ही बहुत सारी नर्सरी बन चुकी हैं। यहां बर्फ खान गोला, लखनऊ 49, इलाहाबादी, सफेदा किस्म के अमरूद के पौधे तैयार किए जाते हैं। वर्तमान में सवाई माधोपुर में 100 से अधिक नर्सरी हैं। इनमें विनियर ग्राफ्टिंग से अमरूद के पौधे तैयार किए जा रहे हैं।किसान अपनी आवश्यकता के अनुरूप पौधे यही से प्राप्त कर लेते हैं।

उत्पादन

  • देश का 60 प्रतिशत अमरूद केवल राजस्थान में हो रहा है। इस 60 प्रतिशत का 75 से 80 फीसदी हिस्सा सवाई माधोपुर जिले का है। अनुमानित रूप से देश का 50 प्रतिशत अमरूद अकेला सवाई माधोपुर जिला पैदा कर रहा है। विश्व में सबसे अधिक अमरूद भारत में होता है।
  • सवाई माधोपुर के अमरुद इतने अधिक पसंद किए जाते हैं कि वर्ष 2016-17 के सर्वे के अनुसार जहां सवाई माधोपुर में जहां पर्यटन से सालाना ₹800 करोड़  की आय हुई थी, वहीं अमरूदों के कारोबार ने  1200 करोड़ का आंकड़ा पार किया था।
  • उद्यान विभाग की माने तो गत वर्ष इस बार 90 हजार मीट्रिक टन के लगभग अमरुद का उत्पादन हुआ था और यह आंकड़ा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। इसके डेढ़ से दो लाख मीट्रिक टन के उत्पादन होने की आशा की जा रही है जो कि आने वाले समय में और बढ़ने की उम्मीद है।
  • बारह अरब तक व्यवसाय की उम्मीद: एक पक्के बीघा में 150 से 200 अमरूदों के पेड़ लगाए जा सकते हैं। जिले में फल दे रहे अमरूदों के पौधों की तादाद तकरीबन 40 लाख है। एक पौधा औसतन 100 से 125 किलोग्राम अमरूद की उपज देता है यानी जिले में 40 करोड़ किलोग्राम अमरूद का उत्पादन हो रहा है। यहां के अमरूद की औसतन फुटकर कीमत 25 रुपए किलोग्राम आंकी गई है। इस हिसाब से जिले में अमरूद का रिटेल कारोबार 12 अरब रुपए के आसपास पहुंच चुका है।

अमरुद की खेती से तुलनात्मक लाभ 

अमरूद की खेती सवाई माधोपुर जिले का वातावरण अनुकुल होने से फायदे का सौदा साबित हो रही है। अमरुद की खेती से उस खेत में बोई जाती रही अन्य फसलों की तुलना में लाभ रहता हैं। यह किसान की आय दोगुना करने में सहायक है।

उद्यान विभाग के अनुसार परंपरागत खेती की तुलना में अमरुद बागवानी से चार गुना तक लाभ होने से किसान इसे अपना रहे हैं। हाल के कुछ सालों में जिले के किसानों ने सरसों, गेहूं जैसी फसलों को को छोड़कर अमरूद की बागवानी की ओर रुख किया है।

शुरू में किसानों ने काफी मुनाफा कमाया

नवंबर व दिसंबर माह में यहां होने वाली अमरूदों की बंपर पैदावार किसानों को रोजगार ही नहीं आर्थिक सुदृढ़ीकरण में भी योगदान करती है। अमरूदों की खेती ने यहां के किसानों की जिंदगी ही बदल दी है। सवाईमाधोपर जिला मुख्यालय और आसपास के गांवों के किसानों की माली हालत सुधारने में अमरूद की खेती कारगर सिद्ध हुई है। इससे किसानों के सपने सच हुए हैं।

मांग अधिक होने के कारण अच्छे दाम प्राप्त होते हैं। किसानों का अमरूद की फसल पर कहना है कि फिलहाल अमरूद का उत्पादन काफी बेहतर चल रहा है जिसके चलते किसानों को अमरूदों के काफी अच्छे दाम मिल रहे है। अमरूदों के बगीचों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही हैं जिससे व्यापार के लगातार बढ़ने की उम्मीद है।

इससे प्रेरित होकर इनके बागानों की संख्या में चरघातांकी वृद्धि हुई। अमरूद के प्रति किसानों की बढ़ती रुचि को देखते हुए इसके पौधे की नर्सरियों की संख्या काफी बढ़ गई है। ऐसे में अब जिले में ही अमरूदों की नर्सरियां तैयार होने लगी हैं।

ईआरसीपी परियोजना : राजनीतिक श्रेय के भंवर में पूर्वी राजस्थान का पानी

 “भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ,

आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दआ।”


कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां धरातल पर पानी की आवश्यकताओं और पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना के राष्ट्रीय दर्जे को लेकर चल रहे आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति पर सटीक बैठती है। एक तरफ तो पेयजल एवं सिंचाई के लिए बेसब्री से आस लगाये बैठे हुए लोग है, दूसरी तरफ एक दुसरे पर दोषारोपण करते हुए राजनीतिक दल है। कांग्रेस का कहना है कि इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देकर प्रधानमन्त्री को अपना वादा पूरा करना चाहिए। वही केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री का मानना है कि दर्जे की मांग करने से पहले कम से कम परियोजना की डीपीआर तो सही से बनाकर भेजे। वही लोगों के मन में बिठा दिया गया हैं कि यह परियोजना उनकी जल संकट की समस्या का समाधान कर देगी। बहुत सारे लोगों को तो यह पता भी नही है कि यह नहर किस भाग से होकर गुजरेगी, उनके क्षेत्रों से गुजरेगी भी या नहीं, लेकिन वे इस विषय पर राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में भाग लेकर अपनी उर्जा को व्यर्थ करने में कोई कमी नही छोड़ रहे है। इस आलेख में ऐसे ही कई आयामों को शामिल किया गया हैं।

सबसे पहले पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना के बारे में जान लेते है, इसके बाद राष्ट्रीय दर्जे को लेकर चल रही राजनीति के विभिन्न पहलुओं पर विचार करेंगे।


1.1. पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP) के बारे में

पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरपीसी ) का मुख्य उद्देश्य राजस्थान के जल प्रबंधन को नए सिरे से विकसित करना है। यह इंट्रा-बेसिन जल स्थानांतरण (Intra - Basin Water Transfer) स्कीम है, जिसके तहत दक्षिणी राजस्थान की नदियों (कुन्नू, पार्वती, कालीसिंध) के मानसून काल में अधिशेष पानी को दक्षिण-पूर्व की नदियों (बनास, मोरेल, बाणगंगा, गंभीर, पार्वती) में स्थानांतरित करना प्रस्तावित है। यह पूर्वी राजस्थान के 13 जिलों (झालवाड़, बांरा, कोटा, बूंदी, टोंक, अजमेर, जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर, भरतपुर, अलवर) की पेयजल एवं सिंचाई आवश्यकताओं को पूर्ण करेगी।


यह परियोजना तीन चरणों में पूर्ण होगी। इस परियोजना के अंतर्गत 6 बैराज (हनोतिया, रामगढ़, महलपुर, नवनेरा, मेज और राठौड़ बैराज) एवं डूंगरी नामक बांध का निर्माण प्रस्तावित है। गुरुत्वाकर्षण नहरें, गुरुत्वाकर्षण सुरंगें, पंपिंग/ डिलीवरी के माध्यम से लगभग 1268 किलोमीटर लंबी जल संवाहक प्रणाली निर्मित की जाएगी, जो सभी मौजूद एवं प्रस्तावित संरचनाओं को आपस में जोड़ेगी।


कुन्नु नदी, कुल नदी, पार्वती नदी एवं कालीसिंध नदी पर डायवर्जन संरचनाओं का निर्माण करके ग्रेविटी नहरों के माध्यम से पानी को चंबल क्रॉस कराते हुए आगे भेजा जाएगा। नहरों के माध्यम से जलाशयों को भरा जाएगा तथा विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अगले जलाशय तक पानी को भेजा जाएगा। उदाहरण के लिए- ईसरदा बांध के पानी को जयपुर की पेयजल आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए उपयोग में लिया जाएगा। 


1.2. परियोजना का महत्व

इस प्रकार इस परियोजना के माध्यम से पूर्वी राजस्थान के जलाशयों को आपस में जोड़ा जाना संभव होगा। इससे मानसून अवधि में अधिशेष जल को दुसरे बेसिन में भेज कर बाढ़ की संभावनाओं को समाप्त किया जा सकेगा और वर्षा के जल का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा। इस प्रकार बाढ़ एवं सूखे की समस्या का समाधान होगा। पूर्वी क्षेत्र में जल की उपलब्धता बढ़ने से सतही एवं भूजल की उपलब्धता में वृद्धि होगी। 


बता दें कि इस परियोजना से 4.31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई का पानी मिलेगा। वहीं दिल्ली-मुबंई इंडस्ट्रियल कोरिडोर प्रोजेक्ट के तौर राजस्थान में औद्योगिक विकास के नए रास्ते खुल सकते हैं।


इससे लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन आएगा। इसके परिणामस्वरूप राज्य में निवेश और राजस्व में वृद्धि होगी।


1.3. अनुमानित लागत

इस परियोजना की अनुमानित लागत 37500 करोड़ रूपये है। इस पर 5200 करोड़ रूपये के कार्य पूर्व में स्वीकृत हो चुके हैं। राजस्थान सरकार ने 2022-23 के बजट में 9,600 करोड़ रुपये की लागत से नवनेरा-बीसलपुर-ईसरदा लिंक, महलपुर बैराज और रामगढ़ बैराज के निर्माण की घोषणा की है, जो कि वर्ष 2022-23 में शुरू करके वर्ष 2027 तक पूर्ण किए जाएंगे। सरकार ने यह घोषणा तब की है, जब केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देने के बजाय परियोजना को रोकने का निर्देश दिया था।


विलंब के कारण परियोजना की लागत बढती जा रही है, जो परियोजना 40 हजार करोड़ रूपये में पूरी होने वाली थी, अब उसकी लागत 70 हजार करोड़ रूपये तक आने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है। इस परियोजना को पूर्ण होने में काफी समय लग जाएगा, यदि यह राष्ट्रीय परियोजना घोषित नहीं हो पाती हैं।

खंड I

2.1. राष्ट्रीय परियोजना के दर्जे की मांग 

राजस्थान सरकार द्वारा इस परियोजना को समय पर पूर्ण करने के लिए राष्ट्रीय परियोजना के दर्जे की मांग की जा रही हैं। राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने से केंद्र सरकार के वित्तपोषण अंश में वृद्धि होगी। फंडिंग पैटर्न वर्तमान के 60:40 से बढ़कर 90:10 हो जाएगा। गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा अब तक 16 परियोजनाओं को यह दर्जा दिया गया है, जिसमे से एक भी राजस्थान की नहीं हैं।


2.2. राष्ट्रीय परियोजना के दर्जे को लेकर राजनीति

इस परियोजना को वर्ष 2016-2017 में भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार ने बनाया था।

वर्ष 2017-18 के बजट में राजस्थान की तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार ने इस परियोजना की घोषणा की थी। राजे ने अपने आखिरी बजट भाषण में कहा था कि राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने के लिए प्रस्ताव भेजा है।


अब, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी लगातार ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना दर्जा दिलाने की मांग कर रहे हैं। इनका तर्क है कि इसकी अनुमानित लागत लगभग 40,000 करोड़ रुपये है, जिसे राज्य सरकार अकेले वहन नहीं कर सकती है। इसलिए, केंद्र सरकार को राज्य के कल्याण के हित में सहायता प्रदान करनी चाहिए। 


अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को हराकर लोकसभा सदस्य बने गजेन्द्र सिंह शेखावत के जल संसाधन मंत्री बनते ही इस परियोजना को लेकर शेखावत बनाम गहलोत अडावट शुरू हो गई। मंत्री महोदय के राजस्थान से संबंध रखने के कारण इस परियोजना को राष्ट्रीय दर्जा मिलने की उम्मीद जगी थी, परन्तु मंत्री जी ने 3 आपत्तियां गिनवा दी-

  1. पहला मामला है नदियों के पानी के उपयोग की डिपेंडेबिलिटी। राष्ट्रीय परियोजना के लिए इसका प्रतिशत 75 होना चाहिए, जबकि ईआरसीपी के मामले में यह 50 फीसदी है। 

  2. दूसरा मामला मध्य प्रदेश से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) का है। एमपी से आने वाली नदियों के पानी के उपयोग के लिए एनओसी अभी तक नहीं मिल सकी है। एमपी को यह भी लग रहा है कि राजस्थान उनके हिस्से का पानी ले लेगा। 

  3. तीसरा मामला अंतर-राज्य विवाद पर केंद्र के दखल का है। ऐसे अंतर-राज्य विवादों को केंद्र साथ बैठकर हल कराता है। लेकिन ईआरसीपी मामले में कई बैठकों के बाद भी पेच 50 फीसदी डिपेंडेबिलिटी के चलते डीपीआर पर अटका हुआ है।


इसी सिलसिले में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के सचिव ने राजस्थान के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर निर्देश दिया कि जब तक मध्य प्रदेश की समस्या का समाधान नहीं हो जाता, तब तक ईआरसीपी पर सभी तरह के काम बंद कर दिए जाएं। 


इसके जवाब में मुख्यमंत्री श्री गहलोत ने पूछा कि पानी राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र को हस्तक्षेप ही नहीं करना चाहिए। साथ ही, राज्य द्वारा अपनी सीमाओं के भीतर अपने हिस्से के पानी को स्वयं की लागत पर प्रयुक्त किया जा रहा है, ऐसे में केंद्र सरकार, राज्य सरकार को काम रोकने के लिए कैसे कह सकती है। उन्होंने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत पर ईआरसीपी के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करने का भी आरोप लगाया। साथ ही कहा कि राज्य अब इसे अपने संसाधनों से ही पूर्ण करने की कोशिश करेगा।


2.3. तीनो आपत्तियों का विश्लेषण

2.3.1.  डिपेंडेबिलिटी 

प्रथम आपत्ति डिपेंडेबिलिटी को लेकर है। वर्तमान में राजस्थान सरकार ने 50 प्रतिशत निर्भरता पर DPR बना राखी हैं क्योंकि इसमें राजस्थान के कैचमेंट यील्ड एवं मध्य प्रदेश की 10% यील्ड पर 3510 MCM पानी उपलब्ध हैं, जबकि ERCP के लिए 3510 MCM पानी की ही आवश्यकता है। इसलिए पेयजल एवं सिंचाई की आवश्यकता आराम से पूर्ण हो जाएगी।

पानी की उपलब्धता (MCM में)

50% निर्भरता पर 

75% निर्भरता पर 

राजस्थान के कैचमेंट यील्ड एवं मध्य प्रदेश की सरप्लस यील्ड पर 

7878

3393

राजस्थान के कैचमेंट यील्ड एवं मध्य प्रदेश की 10% यील्ड पर 

3921

1744

ERCP के लिए आवश्यक पानी

3510

1744


लेकिन केंद्र सरकार 75 प्रतिशत निर्भरता पर DPR बनाने की कह रही हैं, जिस पर केवल 1744 MCM पानी ही उपलब्ध है। इससे पेयजल हेतु मांग 1723.5 MCM को पूर्ण करने के पश्चात केवल 21 MCM जल ही शेष रहेगा। ऐसे में सिचाई एवं उद्योगों की आवश्यकता के लिए पानी की मांग की पूर्ति नहीं हो सकेगी, जिससे जल संकट की समस्या हल होने की बजाय बनी रहेगी।


विवरण

मांग (MCM में)

पेयजल हेतु मांग

1723.5

उद्योगों के लिए आरक्षित

286.4

सिंचाई के लिए आरक्षित

1500.4


ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा 75 प्रतिशत डिपेंडेबिलिटी का मानदंड राज्य के हित में नहीं हैं। फिर भी नियमों के अनुसार भले ही 75 प्रतिशत निर्भरता पर DPR का होना जरुरी हो, परन्तु जल विवाद प्राधिकरण के निर्णय और केंद्र सरकार का एक सर्कुलर इसमे रियायत देते हैं। कावेरी एवं कृष्णा प्राधिकरण 75 प्रतिशत से कम के कई प्रोजेक्ट्स को सही ठहरा चूका है। वर्ष 1983 में जारी केंद्र सरकार के एक सर्कुलर में कहा गया है कि 50 प्रतिशत निर्भरता पर प्रोजेक्ट्स बनाये जा सकते है, जहां पानी की कमी है। इस प्रकार केंद्र सरकार चाहे तो मौजूदा 50 प्रतिशत निर्भरता पर आधारित डीपीआर के आधार पर भी राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दे सकती हैं।


2.3.2.  मध्य प्रदेश से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC)

राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के मध्य चंबल के पानी का बंटवारा वर्ष 2005 में जयपुर में आयोजित इंटर-स्टेट वाटर कंट्रोल बोर्ड की बैठक में हुआ था। इसमें तय हुआ था कि दोनों राज्य अपने जलग्रहण क्षेत्र के पानी के साथ-साथ दूसरे राज्य के जलग्रहण क्षेत्र से 10% पानी का उपयोग कर सकते है। 


मध्य प्रदेश ने पार्वती नदी की सहायक नदी नेवज नदी पर मोहनपुरा बांध और कालीसिंध नदी पर कुंडलिया बांध का निर्माण किया है, जिससे वहां पर लगभग 2.65 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र का विकास हुआ है। इनके निर्माण पर राजस्थान ने आपत्ति दर्ज नहीं की, न ही जल आयोग ने प्रदेश की NOC मांगी। जलशक्ति मंत्रालय ने भी सवाल नहीं उठाये थे। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2017 में बांधों के निर्माण के बाद अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त किया गया था।


राजस्थान सरकार ने कहा है कि ईआरसीपी पर मध्य प्रदेश की आपत्ति की आवश्यकता निराधार है, क्योंकि उसने वर्ष 2005 में आयोजित अंतर्राज्यीय बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार अपनी परियोजनाओं को मंजूरी दी थी। साथ ही, राजस्थान सरकार ने केंद्रीय जल आयोग के वर्ष 2010 के दिशानिर्देशों के अनुसार ही विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की है।


2.3.3.  केंद्र की भूमिका 

तीसरी आपत्ति केंद्र की भूमिका के बारे में हैं। ऐसे अंतर-राज्य विवादों को केंद्र साथ बैठकर हल कराता है। लेकिन ईआरसीपी मामले में कई बैठकों के बाद भी पेच 50 फीसदी डिपेंडेबिलिटी के चलते डीपीआर पर अटका हुआ है। यहाँ पर केंद्र सरकार की भूमिका असहयोगपूर्ण नजर आ रही है। केंद्र सरकार, राजस्थान के प्रति न केवल भेदभावपूर्ण रवैया अपना रही है बल्कि ईआरसीपी के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करने का कार्य कर रही है।


खंड II


3.1. ईआरसीपी राजनीतिक मुद्दे के रूप में

ईआरसीपी ऐसा मुद्दा बन गया है, जो श्रेय लेने की लड़ाई में फस गया है। भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार ने इसकी परिकल्पना की थी और प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अपने वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावी भाषण में इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देने का वादा किया था। इस परियोजना की आवश्यकता इतनी अपरिहार्य है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद अशोक गहलोत ने भी इसे दर्जा देने की मांग को केंद्र के समक्ष बार-बार दोहराया है। लेकिन अशोक गहलोत की मांग पर जल संसाधन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कभी भी सकारात्मक प्रतिक्रिया नही दी। वे चाहते तो अपने राज्य के हित पूर्ण करने का प्रतिनिधि धर्म निभा सकते थे। गहलोत ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने का इरादा जाहिर किया है। जब केंद्र सरकार ने रोक लगाने का आदेश किया तो गहलोत ने इसकी संवैधानिकता पर सवाल उठा कर सिद्ध कर दिया कि भाजपा इस परियोजना के पक्ष में नहीं है और पूर्वी राजस्थान के जल संकट की समस्या के समाधान हेतु अनिच्छुक है। अब भाजपा के लिए यह गले की फांस बनता जा रहा हैं, क्योंकि उहोने दर्जा देने के प्रति उदासीनता दर्शाई हैं। ऐसे में इसे दर्जा मिलने और नहीं मिलने दोनों ही स्थिति में कांग्रेस को फायदा होने की संभावना बन रही हैं।


निष्कर्ष 

पूर्वी राजस्थान में पेयजल एवं सिंचाई की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ईआरसीपी का क्रियान्वयन बहुत जरुरी है। इसके समय पर क्रियान्वयन हेतु जरुरी है कि इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा यथाशीघ्र प्रदान किया जाए। मानसून काल में व्यर्थ बहकर जाने वाले पानी को इसमें स्थानांतरित करके बाढ़ एवं सूखे की समस्या का समाधान प्रभावी तरीके से किया जा सकता हैं।



संदर्भ

Eastern Rajasthan Canal Project takes political twist after Centre’s directive to stop work

https://www.thehindu.com/news/national/other-states/eastern-rajasthan-canal-project-takes-political-twist-after-centres-directive-to-stop-work/article65600112.ece


विरोधाभासी हितों की जकड़न में रणथंभौर

Ranthambore tiger, territorial conflict among tigers
बाघों के प्राकृतिक परिवेश में विचरण करते देखने की चाह लेकर आने वाले वाले देशी-विदेशी पर्यटकों ने रणथंभौर को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट जगह दी हैं। रणथंभौर को बाघ आरक्षित क्षेत्र घोषित करके उनके संरक्षण को विधायी रूप से सुनिश्चित किया गया हैं। पर्यटन से जुडी गतिविधियाँ यहाँ पर तेजी से फलफूल रही हैं। लेकिन इन्ही के समानांतर रणथंभौर में इस समय कई प्रकार के द्वन्द मौजूद है। जो स्थानीय लोगो को दैनिक रूप से प्रतिकूल रूप से प्रभावित  कर रहे है। इस आलेख में  हम उन द्वंदों की पहचान कर रहे हैं, हालाँकि स्थानीय लोगो को इन द्वंदों के बारे में जागरूक करना भी समान रूप से चुनौतीपूर्ण है। इन द्वंदों का संतुलित विश्लेषण करने के लिए आवश्यक हैं कि द्वंद में मौजूद कमजोर पक्ष अपने उपेक्षित होते हितो की पहचान करे। ऐसी स्थिति में ही संबंधित प्राधिकारियों को उनके हितो के लिए उपाय करने हेतु तैयार किया जा सकता हैं। रणथंभौर में विरोधाभासी हितो की इस पहेली में कई हितधारक हैं, जिनमे सरकार, पर्यटन उद्योग, पर्यावरणवादीयों के साथ-साथ स्थानीय समुदाय प्रमुख हैं। इनमे सबसे कमजोर हितधारक स्थानीय समुदाय हैं, जिनके हितो की पहचान, जागरूकता और संरक्षण की आवश्यकता हैं। इस आलेख में स्थानीय समुदाय को विशिष्ट रूप से ध्यान में रखते हुए द्वंदों की पड़ताल की गई हैं। 

एक ऐसी स्थिति याद आ रही हैं जिसमें लोगो के मन में असंतोष तो हैं कि जो भी हो रहा हैं, वो उनके हितो के अनुकूल नही हैं। लेकिन उन्हें पता नही हैं कि उनके हित क्या हैं और क्या वे किसी प्रकार का कोई नैतिक या न्यायिक आधार रखते भी हैं या नही। कोई न तो उनके हितो की वकालात करता और न ही कोई उनके प्रति सहानुभूति दर्शाता हैं, इससे ऐसा भी लगता हैं कि हो सकता हैं वो ही गलत हो। इस प्रकार यह अज्ञानतापूर्ण अपराधबोध ही उन्हें सुभेद्य स्थिति में ले जाने के लिए उत्तरदायी हैं। यह एक तरीके से औपनिवेशिक स्थिति के समकक्ष हैं, उसकी आहट हैं।     

जिस तरह दादाभाई नौरोजी ने औपनिवेशिक व्यवस्था के आर्थिक प्रभावों की पहचान की और उनके खिलाफ आवाज उठाई। भले ही उसका अंग्रेजों पर तत्काल कोई असर नही हुआ हो,परन्तु वे द्वंद को उजागर करने में कामयाब हुए थे। इसलिए हमे भी दादाभाई नैरोजी के समान अपनी बात को कहने से नहीं चूकना चाहिए, इस भरोसे में नहीं रहे कि कोई सुनने वाला तो है ही नहीं, हम बोलकर क्या करेंगे। हो सकता है लोग एक शुरुआत का इंतजार कर रहे हो।

मौजूदा द्वन्द निम्न प्रकार के है -
1.  वन्य जीव -मानव संघर्ष
2.  बाघ-बाघ संघर्ष
3.  स्थानीय लोग -वन प्रशासन टकराव
4 . लोग आपसी टकराव
5.  व्यावसायिक समूहो के संघर्ष

चलो अब हम इन संघर्षो का विस्तृत खाका खींचने की कोशिश करते है -

1. TIGER- TIGER CONFLICT

रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान लम्बे समय से बाघों का प्राकृतिक आवास रहा है। प्रोजेक्ट टाइगर के द्वारा मिले संरक्षण के माध्यम से न केवल अपना अस्तित्व बनाये रखा है, बल्कि बाघों के जनसंख्या आधिक्य से जुडी समस्याए उत्पन्न भी हुई है। जंगल में बाघों के इलाको में टकराव के कारण आपसी संघर्ष हुए है। जंगल पर इनकी बढ़ती हुई संख्या के दबाव से इन्होने वन क्षेत्र के बाहर भी मूवमेंट शो किया है।

2. TIGER- LOCAL PEOPLE CONFLICT

आबादी क्षेत्रो में बाघों के प्रवेश ने लोगो में आक्रोश को उतपन्न किया है। इन बाघों ने आबादी क्षेत्रो में जाकर मवेशियों और यहां तक की मानव तक का शिकार किया है। इनके खौप के कारण लोग रात में फसलों की सिंचाई और रखवाली तक को नहीं जाते है। जिसके कारण उनकी फसल को रात्रि में आवारा पशुओ का जोखिम रहता है। रात्रि में विधुत का फीडर होने की वजह से उसे खली छोड़ना पड़ता है। इस वजह से आक्रोश के लपेटे में विद्युत विभाग भी आ जाता है।
बाघों की वजह से जंगल में लोगो की गतिविधियों को पहले ही प्रतिबंधित किया जा चूका है। इसकी वजह से वे दैनिक उपयोग के वनोत्पाद को प्राप्त नहीं कर सकते है। उनके पशुओ को चराने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। गाँवो में चरागाहों पर अतिक्रमण की स्थिति उत्पन्न होने से अब किसानो के लिए पशुओ को रखना मुश्किल हो गया है। इस प्रकार इसने आजीविका को भी बुरी तरिके से प्रभावित किया है।

3.  GOVT- PEOPLE CONFLICT

एक तरफ लोगो का प्रवेश हतोत्सहित कर दिया गया है , वही दूसरी तरफ पर्यटन गतिविधियों का संचालन लोगो के मन में संशय उत्पन्न करता है कि उन्हें उनके संसाधनों से वंचित किया जा रहा है। क्योकि कई गाँवो को इसके सीमा क्षेत्र से विस्थापित कर दिया गया है, जिनका पुनर्वास ने न केवल विस्थापित लोगो बल्कि अन्य लोगो के मन में भी आक्रोश उत्पन्न किया। क्योकि उन्हें नई  जगहों पर बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा।  अब जो गांव बफर एरिया में स्थित है उन पर भी कई तरह के अंकुश थोपे जाते है। जिसके कारण उनमे भी गुस्सा है। इन अंकुशों पर प्रतिक्रिया का उदाहरण उलियाना गांव में सामने आ चूका है। पडोसी गांव के लोगो ने दिवार को समय समय पर तोड़कर बताया है कि वे सरकार के वनो से पृथक करने के फैसले से खुश नहीं है।

4 PEOPLE-PEOPLE CONFLICT

 सरकारी अंकुशों के बावजूद अपनी गतिविधियों को जारी रखने के लिए लोगो ने अवैध तरीको को अख्तियार किया है। जिसकी वजह से स्वयं लोगो को ही परेशानी का सामना करना पड़ा है। जैसे कि - पहाड़ो से पत्थर लाने पर रोक के कारण अवैध खनन करने वाली सरपट दौड़ती ट्रेक्टर-ट्रॉलियों ने कई लोगो को कुचला है ,जिससे खुद ग्राम वाले ही इनका विरोध कर रहे है। दूसरा उदाहरण यह है कि वनो व चरागाहों तक पहुंच के आभाव में पशुपालको के जानवर खेतो में पहुंच जाते है, जिससे ग्रामीणों के बीच आपसी तनाव उत्पन्न हो जाता है। इस  प्रकार से चीजे आपसी तनाव को बढ़ावा दे रही है।

5. CONFLICT FROM BUSINESS

वही लोगो को एक तरफ तो घरो के लिए पत्थरो आदि की जरूरत पड़ती है, वही दूसरी तरफ सरकार इस पर प्रतिबंध लगाकर इस मसले को उलझा देती है। वही कुछ व्यवसायियों को वनो में गतिविधियों का संचालन की अनुमति देती है। जिससे यह साबित होता है कि नियम कायदे केवल गरीबो के लिए है। पैसे वाले के लिए कोई नियम कानून नहीं है।

6. CONFLICT BY ENVIRONMENT

रणथम्भौर के पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर इस क्षेत्र में कोई बड़ी औधोगिक इकाई यहाँ पर लग नहीं पाई है। इसकी वजह से क्षेत्र में काफी ज्यादा बेरोजगारी पाई जाती है। पर्यटन की वजह से भी पर्याप्त रोजगार उत्पन्न नहीं हुए है।

7. OTHER ISSUES

इसके अलावा रणथम्भौर एक ऐतिहासिक स्थल रहा है ,जिसका महत्व वर्तमान में गौण हो गया है। उसके ऐतिहासिक महत्व के आधार पर इसकी प्रासंगिकता पर विचार करना चाहिए , न की सवाई माधोपुर की स्थापना की छाया में उसे दबाना चाहिए।

खंड II
कभी भी ऐसा नहीं होना चाहिए कि भौगोलिक विशेषताएं स्थानीय लोगो को फायदा नहीं पहुचाये, उल्टा उन्हें परेशानी में डाले और फायदे बाहर के लोगो को मिले। लोगो में अपने स्थान को लेकर स्वाभिमान की भावना उत्पन्न करने के प्रयास किए जाने चाहिए। रणथम्भोर से जुड़े इसी प्रकार के मुद्दों को हम इस रिपोर्ट में कवर करने की कोशिश करेंगे, ताकि हम उन से जुड़े समाधानों की तलाश कर सके। लोगो में यह भाव रहना चाहिए कि प्राकृतिक संस्धानों पर उनके परम्परागत अधिकार कायम है। रणथम्भौर में लोगो की समस्याओं के समाधान की असीम क्षमता है, जिसे प्रयुक्त  करने की आवश्यकता है। रणथम्भौर लोगो के जीवन में सकारत्मक भूमिका निभाएगा। इस भावना के साथ हम इस मुद्दे पर आगे बढ़ते है।

अब बात करते है समाधानों की। तो इसके लिए सभी हितधारकों की  चिंताओं का समाधान जरुरी है। जिसे पृथक-पृथक रूप से सम्बोधित किया जा सकता है -
  1. ग्रामीण फोरम
     
    वन क्षेत्र के पडोसी गांव  के लोगो की एक फोरम बनाई जानी चाहिए , जिसे स्थानीय वन चौकी से जोड़ा जाए। जिसमे वन विभाग ग्रामीणों की अपेक्षाओं का ध्यान रखे। वही ग्रामीण वन कानूनों के प्रवर्तन में सहयोग करे। इससे दोनों पक्षों के बीच सुचना अंतराल उत्पन्न नहीं होगा और किसी प्रकार के अविश्वास  उत्पन्न नहीं होगी। वही मांगो और अपेक्षाओं पर तात्कालिक कार्रवाही सम्भव होगी। 
  2. वन्य जीवो का दूसरे जगहों पर स्थानांतरण किया जाए।  वन क्षेत्रो में दूसरे जीवो की संख्या बधाई जाए। पर्यटन  के द्वारा वन क्षेत्र को इतना अशांत नहीं बनाया जाए कि बाघ जंगल से निकलकर आबादी भूमि में पहुंच जाए। 
इस प्रकार हम रणथम्भौर से जुडी प्रतिकुलताओ को  अवसरों में बदल सकते है।

खंड III
रणथम्भौर में पर्यटन से जुड़े अवसरों को संवर्धित करने की आवश्यकता है। यहां  शूटिंग की भी अपार संभावनाए है।

निष्कर्ष :
Those who forget geography can never defeat it  वाली बात यहां पर सही साबित हो जाती है। इसलिए हमे भूगोल को काबू में करने की जरुरत है।

रणथंभौर में बाघ: आशीर्वाद या अभिशाप

बाघ और मनुष्यों के बीच बढ़ते संघर्षो को स्वीकार करने में भारी असंतुलन मौजूद है। बाघ के समान, मनुष्य की प्रतिकूलताओं पर नीति निर्माताओ, पर्यावरणविद् और स्थानीय वन प्रशासन का उचित ध्यान नहीं जाता है। बाघ संरक्षित क्षेत्र की घोषणा के बाद, स्थानीय लोगों ने जो खोया है, उसकी चर्चा कभी नहीं की जाती है। तुरंत ही वनों पर उनकी निर्भरता समाप्त हो गई, आजीविका प्रभावित हुई और अब बाहरी क्षेत्र में भी बाघों के हमले बढ़ रहे हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि स्थानीय लोगों की आवाज गायब है। सभी की नजरे बाघ पर है कि कैसे यह विभिन्न हितधारकों को अधिकतम लाभ प्रदान कर सकता हैं। अन्य सभी प्रकार की आवाजें हाशिए पर हैं।

बाघों के कारण सवाई माधोपुर को वैश्विक पटल पर टाइगर सिटी के रूप में पहचान मिली है। प्राकृतिक आवास में बाघों को विचरण करते देखने के लिए आकर्षित होकर आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान किया है। इस हिसाब से बाघों की यहां पर उपस्थिति को  क्षेत्रवासियों के लिए एक प्राकृतिक आशीर्वाद की तरह माना गया है।

लेकिन वे पहलु अब यहां पर महत्व हासिल करते जा रहे है, जो दर्शाते है कि बाघों की यह उपस्थिति क्षेत्र के लोगो के लिए आशीर्वाद से कही बढ़कर अभिशाप है। क्योकि स्थानीय लोगो के लिए इनसे फायदे का ऐसा कोई शक्तिशाली विचार नहीं है, जिसके आधार पर ये गर्व कर सके। वन क्षेत्र के बाहर आबादी वाले क्षेत्रो में बाघों की आवाजाही ने स्थानीय लोगों को अपने घरों और खेतों में भय के माहौल में काम करने के लिए मजबूर कर दिया है। जिसने न केवल गाय, बकरी और भेड़ जैसे पशुओ का शिकार किया हैं, बल्कि मानव पर भी जानलेवा हमले किए हैं। पिछले आठ साल में पन्द्रह से अधिक लोगो का शिकार इस क्षेत्र में किया है। जो चौकाने वाला आंकड़ा है। हाल ही में एक दस साल के लड़के पर हमला किया गया हैं।

यहाँ पर हम, एक ऐसी तस्वीर देख रहे हैं जिसमे एक तरफ पर्यटन व्यवसाय में सलग्न लोग, वन अधिकारी और राजनेताओ के हित तथा बाघ के हितो की पैरवी करने वाले पर्यावरणविद् हैं। इन सबकी नजरो में बाघ महत्वपूर्ण हैं। लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष स्थानीय लोगो के हितो का हैं, जो आलोचना की हद तक उपेक्षित हैं। हम इस आलेख में इन्ही दो पक्षों के बीच के असंतुलन पर विमर्श करेंगे।

आशीर्वाद के रूप में बाघ
बाघों को प्राकृतिक आवास में विचरण करते देखना रणथंभोर में एक वास्तविक अनुभव है। इस विशेषता ने यहां कई मशहूर हस्तियों को आकर्षित किया है, उदाहरण के लिए सयुंक्त राज्य अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, भारत और विदेशी सरकार के कई पूर्व और सेवारत गणमान्य व्यक्ति, राजनेता, खिलाड़ी, अभिनेता और कई प्रकृति से प्यार करने वाले लोग। बाघ आधारित पर्यटन के कारण सवाई माधोपुर में होटल और हस्तशिल्प जैसी आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि हुई हैं। 

पर्यटकों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। इसलिए कई निवेशक यहां रुचि ले रहे हैं। ओबेरॉय जैसे व्यावसायिक घरानों ने यहाँ पर निवेश किया हुआ हैं। कई अफसरों, राजनेताओ और व्यवसायियों के लिए यह निवेश का एक आकर्षक गन्तव्य बन गया हैं। यही वजह हैं कि सवाई माधोपुर के शहरी क्षेत्र से दूर गाँवो तक होटलों का निर्माण कार्य चल रहा हैं, पर्यटकों, चालको और मार्गदर्शको के लिए सुविधा केंद्र बन रहे हैं। इस प्रकार आतिथ्य क्षेत्र की विभिन्न प्रोफाइल में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं, उदाहरण के लिए होटल, शिल्प, गाइड और ड्राइवर। 

गलत की शुरुआत यहाँ से होती है
रणथम्भोर में बाघों के हिंसक होने के लिए निम्न कारण देखे जा सकते हैं -
  1. वन में बाघों की संख्या का अधिक होना और इलाको का आपसी टकराव
  2. पर्यटन के दबाव
  3. नीतिगत खामियां
  4. मानवीय गतिविधियों की वन क्षेत्र में उपस्थिति 
अभिशाप के रूप में बाघ
आबादी भूमि में बाघों के प्रवेश की आवृत्ति में इजाफा हुआ है। जिसका कारण वन में बाघों की संख्या का अधिक होना और इलाको का आपसी टकराव है। जिन्हे तत्काल दूसरे क्षेत्रो में भेजने की जरूरत है। या फिर विस्तारित कॉरिडोर का निर्माण की जरूरत है।इसके साथ ही पर्यटन के दबाव को कम करने की भी जरुरत हैं। निम्न बिंदु स्पष्ट करेंगे कि टाइगर ने किस तरीके से लोगो के जीवन को नकारत्मक रूप से प्रभावित किया है -
  1. हिंसक हमले : बाघों ने आबादी भूमि में अक्सर अपनी आवाजाही बनाये रखी है। जिसका शिकार गाय, बकरी और भेड़ जैसे पशुओ के साथ-साथ मानव तक हुए है। पिछले सात साल में तेरह लोगो का शिकार इस क्षेत्र में किया है। जो चौकाने वाला आंकड़ा है।
  2. आजीविका संकट : बाघों के कारण लोगो की जंगल तक पहुंच को प्रतिबंधित कर दिया गया है। जिससे उनकी पशुपालन और वनोत्पाद संग्रहण पर निर्भर आजीविका रुक गई। क्योकि उनके विकल्पों के लिए सरकार द्वारा कोई व्यवस्था नहीं की गई। साथ ही बाघों के खौप के कारण लोग रात में फसलों की सिंचाई और रखवाली तक को नहीं जाते है। जिसके कारण उनकी फसल को रात्रि में आवारा पशुओ का जोखिम रहता है। 
  3. वन क्षेत्र में पहुंच से वंचित होना : वन क्षेत्र में पशुओ को चराने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। वही गाँवो में चरागाहों पर अतिक्रमण की स्थिति उत्पन्न होने से अब किसानो के लिए पशुओ को रखना मुश्किल हो गया है। इस प्रकार इसने आजीविका को भी बुरी तरीके से प्रभावित किया है।
  4. समीपवर्ती गांवो पर प्रतिबंध : गांव बफर एरिया में स्थित है उन पर भी कई तरह के अंकुश थोपे जाते है। जिसके कारण उनमे भी गुस्सा है। इन अंकुशों पर प्रतिक्रिया का उदाहरण उलियाना गांव में सामने आ चूका है। पडोसी गांव के लोगो ने दिवार को समय समय पर तोड़कर बताया है कि वे सरकार के वनो से पृथक करने के फैसले से खुश नहीं है।
  5. विस्थापन : कई गाँवो को इसके सीमा क्षेत्र से विस्थापित कर दिया गया है, जिनका पुनर्वास ने न केवल विस्थापित लोगो बल्कि अन्य लोगो के मन में भी आक्रोश उत्पन्न किया। क्योकि उन्हें नई  जगहों पर बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा। हाल ही में एक जगह पर विस्थापित किए गये लोग अपनी मूल जगह पर धार्मिक काम के सिलसिले में आये थे और उन्होंने वापस जाने से मना कर दिया था। 
  6. पक्षपातपूर्ण नीतियां : एक तरफ लोगो का प्रवेश हतोत्सहित कर दिया गया है, वही दूसरी तरफ पर्यटन गतिविधियों का संचालन लोगो के मन में संशय उत्पन्न करता है कि उन्हें उनके संसाधनों से वंचित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त कुछ व्यवसायियों को वनो में गतिविधियों के संचालन की अनुमति दी हुई है। जिससे यह साबित होता है कि नियम कायदे केवल गरीबो को रोकने और अमीरों की सुविधा के लिए है। पैसे वाले के लिए कोई नियम कानून नहीं है।
  7. उद्योगों की स्थापना में बाधक : रणथम्भौर के पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर इस क्षेत्र में कोई बड़ी औधोगिक इकाई यहाँ पर लग नहीं पाई है। इसकी वजह से क्षेत्र में काफी ज्यादा बेरोजगारी पाई जाती है। पर्यटन की वजह से भी पर्याप्त रोजगार उत्पन्न नहीं हुए है।
  8. इत्यादि। 
क्या किए जाने की जरुरत हैं 
हमे स्थानीय लोगो और पर्यटन व्यवसाय या वन संरक्षण से जुड़े लोगो के हितो को आपस में प्रतिद्वंदी के तौर पर नही देखना चाहिए। हमे इनके बीच में संतुलन स्थापित करना होगा। स्थानीय लोगो के हितो की उपेक्षा करने से वन प्रशासन और पर्यटन व्यवसायीयों के खिलाफ भावनाओ का उदय होगा, जिसके व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक निहितार्थ होंगे। उसी प्रकार पर्यटन क्षेत्र की उपेक्षा करने से एक उभरते क्षेत्र के सामर्थ्य से वंचित रह जायेंगे। उसी प्रकार बाघ के हितो को भी प्राथमिकता देने की आवश्यकता हैं। यहां पर निम्न उपाय किए जा सकते हैं -
  1. बाघों के हमले में घायल और मरने वाले लोगो के लिए एक निश्चित मुआवजा नीति होनी चाहिए। इसे अधिकारियो के विवेक और सौदेबाजी क्षमता के भरोसे मामला-दर-मामला निर्धारित नही करना चाहिए। घायलों के उपचार के लिए व्यवस्था होनी चाहिए। किसी भी हमले की स्थिति में एक जिम्मेदार अधिकारी को पीड़ित के पास जाकर अग्रिम कार्यवाही का आश्वासन देना चाहिए।
  2. बाघ की वन क्षेत्र के बाहर और भीतर सघन निगरानी की जानी चाहिए। वन क्षेत्र से बाहर निकलते ही संबंधित क्षेत्र के निवासियों को वास्तविक समय सूचना प्रदान करनी चाहिए ताकि वे सुरक्षित स्थानों पर पहुँच सके। साथ ही वन विभाग के कर्मियों को वापस वन में भेजने पर कार्य करना चाहिए।
  3. राष्ट्रीय उद्यान के जिन क्षेत्रो से बाघ की निकासी होती हैं, उन क्षेत्रो में चारदीवारी की मरम्मत की जाए। साथ ही चारदीवारी के निर्माण में खराब गुणवत्ता के सामानों का प्रयोग करने वाले ठेकेदारों पर कार्यवाही की जाए।
  4. हिंसक हुए बाघ को एनक्लोजर में रखा जाना चाहिए या फिर उसके लिए अधिक क्षेत्र की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसी घटनाओ को पुनः अंजाम देने वाले बाघों पर ठोस उपाय किए जाने चाहिए।  
  5. फसलो के दिनों में बाघ को छुपने में आसानी रहती हैं, इसलिए इस दौरान निगरानी में सख्ती बरतनी चाहिए। साथ ही बड़े-बड़े बगीचों के पौधो में भी उसके छुपे होने की संभावना हो सकती हैं। इसलिए किसानो और वन विभाग के बीच उसके मूवमेंट को लेकर सूचनाओ के आदान-प्रदान की संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए। चेतावनी प्रणाली की तरह सुचनाए वितरित करनी चाहिए।
  6. बाघ के मूवमेंट को लेकर ग्रामीणों द्वारा दी गई सूचनाओ को वन विभाग द्वारा नकार दिया जाता हैं, ऐसे में वन कर्मियों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता हैं।
  7. वन क्षेत्र में से पर्यटन के दबाव को कम करने की आवश्यकता हैं ताकि बाघ अपने मूल क्षेत्र में हस्तक्षेप मुक्त महसूस कर सके। एक समय सीमा का पालन किया जाना चाहिए। बाघ को परेशान करने वाले जिप्सी चालको और पर्यटकों पर कार्यवाही करने की आवश्यकता हैं।
  8. पर्यटन क्षेत्र और विचरण क्षेत्र को लग करने की आवश्यकता हैं। इसके लिए टाइगर सफारी पार्क की स्थापना  की योजना को यथासीघ्र जमीनी आधार दिया जा सके।
  9. बाघ आधारित नीतियों के निर्माण में स्थानीय लोगो को भी शामिल किए जाने की जरुरत हैं। इसमें केवल व्यवसायिक समूहों से जुड़े बाघ-प्रेमियों का ही दबदबा नही होना चाहिए ।
  10. इत्यादि। 

निष्कर्ष
अंत में हम यही कहेंगे कि जंगल में विचरण करता बाघ निश्चित तौर पर एक वरदान की तरह है। परन्तु जैसे ही यह जंगल से बाहर निकलता है तो लोगो की दिनचर्या का बाधित करने के साथ-साथ दहशत उत्पन्न करने की वजह से यह अभिशाप बन जाता है। ऐसे में हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यह जंगल में ही बना रहे। इसके लिए सुझाए गये उपायों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।