सहकारी समितियों के माध्यम से अमरूद विपणन की समस्या का समाधान

सवाई माधोपुर का अमरुद अपनी मिठास के कारण बहुत अधिक लोकप्रिय हैं। यहां पर अमरूदों की बंपर पैदावार होती है। स्वादिष्ट व उत्तम क्वालिटी से भरपूर यहां का अमरूद देश की नामी-गिरामी मंडियों तक जाता है। यहाँ की मिट्टी और जलवायु के कारण अमरुद के बागान सवाई माधोपुर जिले में काफी सफल रहे हैं। करमोदा गाँव में अमरूदों की सफलता के बाद, एक दशक के भीतर ही इसके बगीचे लगभग पुरे सवाई माधोपुर जिले में विस्तृत हो गये।  सवाई माधोपुर में अब अमरूद की खेती व्यापक स्तर पर होने लगी है। लेकिन जैसे ही अमरुदों की बागवानी के अंतर्गत क्षेत्र में वृद्धि हुई, इनकी बिक्री की समस्या भी उत्पन्न हो गई। एक समय था जब अमरुद के लिए भाव और बाजार बहुत ज्यादा था, लेकिन धीरे-धीरे व्यापार खत्म होता चला गया। इस समय पर स्थिति उस निर्णायक मोड पर आ गई हैं, जहां किसान ये सोच रहा है कि इनके पेड़ों को लगे रहने दे या फिर खोद करके फेंक दे। सरकार भी इस दिशा में कई प्रयास कर रही हैं। ऐसी स्थिति में एक उपाय सहकारी समितियों के माध्यम से नजर आता है। जिस प्रकार क्रय-विक्रय सहकारी समितियां न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि खाद्यान्नों की खरीद करती हैं, उसी प्रकार से अमरुद के लिए भी खरीद की जा सकती हैं। इसके बारे में हम विस्तार से चर्चा करते है-

उपयुक्तता

अमरुद के लिए शुष्क जलवायु उपयुक्त होती हैं। ये सभी दशाएं सवाई माधोपुर में उपलब्ध हैं। इसलिए इसके बागान यहां पर तेजी से लोकप्रिय हुए। यहां की अनुकूल जलवायु, सिचाई हेतु यहां का बरसाती पानी एवं यहां की मिट्टी में बसे लौह तत्व की अधिकता व काली जलोढ़ मिट्टी की पर्याप्तता होने के कारण (अच्छी बारिश होने पर) लगभग सभी फसलों में प्रति हैक्टेयर उत्पादन बहुत अधिक है। मिट्टी काली जलोढ़ होने के कारण अधिक समय तक भूमि में नमी बनाए रखने में यह कारगर है। प्रायः देखा गया है कि पेड़ो की ग्रोथ के साथ फलों का आकार भी काफी बड़ा होता है। और सबसे अहम बात यहां मिट्टी में लवणीयता नही होने के कारण अमरूदों का स्वाद बिल्कुल मीठा है।

सवाई माधोपुर में अमरूद की खेती के प्रारंभिक चरण में उत्तर प्रदेश की नर्सरी से अमरूद के पौधे खरीदे गए।अब तो सवाई माधोपुर में ही बहुत सारी नर्सरी बन चुकी हैं। यहां बर्फ खान गोला, लखनऊ 49, इलाहाबादी, सफेदा किस्म के अमरूद के पौधे तैयार किए जाते हैं। वर्तमान में सवाई माधोपुर में 100 से अधिक नर्सरी हैं। इनमें विनियर ग्राफ्टिंग से अमरूद के पौधे तैयार किए जा रहे हैं।किसान अपनी आवश्यकता के अनुरूप पौधे यही से प्राप्त कर लेते हैं।

उत्पादन

  • देश का 60 प्रतिशत अमरूद केवल राजस्थान में हो रहा है। इस 60 प्रतिशत का 75 से 80 फीसदी हिस्सा सवाई माधोपुर जिले का है। अनुमानित रूप से देश का 50 प्रतिशत अमरूद अकेला सवाई माधोपुर जिला पैदा कर रहा है। विश्व में सबसे अधिक अमरूद भारत में होता है।
  • सवाई माधोपुर के अमरुद इतने अधिक पसंद किए जाते हैं कि वर्ष 2016-17 के सर्वे के अनुसार जहां सवाई माधोपुर में जहां पर्यटन से सालाना ₹800 करोड़  की आय हुई थी, वहीं अमरूदों के कारोबार ने  1200 करोड़ का आंकड़ा पार किया था।
  • उद्यान विभाग की माने तो गत वर्ष इस बार 90 हजार मीट्रिक टन के लगभग अमरुद का उत्पादन हुआ था और यह आंकड़ा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। इसके डेढ़ से दो लाख मीट्रिक टन के उत्पादन होने की आशा की जा रही है जो कि आने वाले समय में और बढ़ने की उम्मीद है।
  • बारह अरब तक व्यवसाय की उम्मीद: एक पक्के बीघा में 150 से 200 अमरूदों के पेड़ लगाए जा सकते हैं। जिले में फल दे रहे अमरूदों के पौधों की तादाद तकरीबन 40 लाख है। एक पौधा औसतन 100 से 125 किलोग्राम अमरूद की उपज देता है यानी जिले में 40 करोड़ किलोग्राम अमरूद का उत्पादन हो रहा है। यहां के अमरूद की औसतन फुटकर कीमत 25 रुपए किलोग्राम आंकी गई है। इस हिसाब से जिले में अमरूद का रिटेल कारोबार 12 अरब रुपए के आसपास पहुंच चुका है।

अमरुद की खेती से तुलनात्मक लाभ 

अमरूद की खेती सवाई माधोपुर जिले का वातावरण अनुकुल होने से फायदे का सौदा साबित हो रही है। अमरुद की खेती से उस खेत में बोई जाती रही अन्य फसलों की तुलना में लाभ रहता हैं। यह किसान की आय दोगुना करने में सहायक है।

उद्यान विभाग के अनुसार परंपरागत खेती की तुलना में अमरुद बागवानी से चार गुना तक लाभ होने से किसान इसे अपना रहे हैं। हाल के कुछ सालों में जिले के किसानों ने सरसों, गेहूं जैसी फसलों को को छोड़कर अमरूद की बागवानी की ओर रुख किया है।

शुरू में किसानों ने काफी मुनाफा कमाया

नवंबर व दिसंबर माह में यहां होने वाली अमरूदों की बंपर पैदावार किसानों को रोजगार ही नहीं आर्थिक सुदृढ़ीकरण में भी योगदान करती है। अमरूदों की खेती ने यहां के किसानों की जिंदगी ही बदल दी है। सवाईमाधोपर जिला मुख्यालय और आसपास के गांवों के किसानों की माली हालत सुधारने में अमरूद की खेती कारगर सिद्ध हुई है। इससे किसानों के सपने सच हुए हैं।

मांग अधिक होने के कारण अच्छे दाम प्राप्त होते हैं। किसानों का अमरूद की फसल पर कहना है कि फिलहाल अमरूद का उत्पादन काफी बेहतर चल रहा है जिसके चलते किसानों को अमरूदों के काफी अच्छे दाम मिल रहे है। अमरूदों के बगीचों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही हैं जिससे व्यापार के लगातार बढ़ने की उम्मीद है।

इससे प्रेरित होकर इनके बागानों की संख्या में चरघातांकी वृद्धि हुई। अमरूद के प्रति किसानों की बढ़ती रुचि को देखते हुए इसके पौधे की नर्सरियों की संख्या काफी बढ़ गई है। ऐसे में अब जिले में ही अमरूदों की नर्सरियां तैयार होने लगी हैं।

खेती में शारीरिक जोखिम

खेतीं के कामकाजों में गम्भीर शारीरिक जोखिम निहित रहती है। ये जोखिम कृषि कार्यों के दौरान लापरवाही बरतने, कृषि यंत्रों के संचालन में कौशल के अभाव या कई प्रकार की दुर्घटनाओं के कारण होती है। जिनके कारण लोग शारीरिक अंगो को या तो विकृत कर लेते हैं या जान से ही हाथ धो बैठते है। इसके अलावा मेहनत भी अकुशल तरीके से करने के कारण सेहत पर भी कुप्रभाव पड़ता है। ऐसा लगता है कि लोग इसे मजबूरी ज्यादा और एक पेशा कम समझते है।

गांवो में लोग खेतीबाड़ी के कामो में दिन-रात कठीन परिश्रम करते है और फिर उसके अनुरूप   पोषण नही प्राप्त करते है। इस तरह की जीवन शैली के लंबे समय तक चलने से उनके शारीरिक ढांचे में बदलाव आ जाता है। जो लोग मजदूरी करते है वे भारी भरकम सामान उठाने के कारण कमर से झुक जाते है। इस वजह से वे युवावस्था के उत्तरार्द्ध से ही वृध्दों के समान लगने लग जाते है। अकुशल तरीके से की जाने वाली मेहनत उनके शरीर को निचोड़ लेती है। इससे उनकी रोग प्रतिरोधकता पर भी असर पड़ता है जिसके कारण वे बुढ़ापे के दिन बीमारियों के साथ व्यतीत करते है।

कृषि कार्यो के दौरान भी कई ऐसी घटनाएं होती है जो गम्भीर शारीरिक नुकसान पहुचाती है। जो कि इस प्रकार है-
  1. धूल और धुंए सम्बंधित कई कामकाज ऐसे होते है जो सांस व त्वचा की बीमारियों को जन्म देते है जैसे कि थ्रेशिंग कार्य। त्वचा सम्बंधित बीमारी अक़्सर बच्चों में ज्यादा देखने को मिलती है, इनमे फोड़े, खाज-खुजली, एलर्जी आदि शामिल है।
  2. गांवो में बरसात के पानी के निकास की सही व्यवस्था नही होती है, ऐसे में गंदे जल से बार-बार निकलने के कारण पैरो में खारवा नामक समस्या लोगो को होती है। पांवो के फटने की समस्या भी अधिकतर महिलाएं और पुरुषों में देखी जाती है। कई लोगो के तो हाथ की धारियां ही मिट गई है, जिसके कारण उन्हें बॉयोमेट्रिक प्रमाणीकरण में दिक्कत होती है ।
  3. कई जानलेवा चीजे भी खेतीं के कार्य मे निहित होती है। कई बार लोग फसल कटाई या चारा काटते समय अपने अंगो को क्षतिग्रस्त करवा बैठते है। मशीनों से कइयों की अंगुली कट जाती है तो कइयों के हाथ या पैर, कई बार तो थ्रेशिंग मशीनों से लोगो तक के मरने तक कि खबर सुनने में आती है।
  4. रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग के सही तरीको से अज्ञानता के कारण भी समस्या उत्पन होती है। लोग उन्हें सीधे हाथ मे ले लेते है और फिर हाथ सही से साफ नही करते है। उन्हें छिड़कते समय भी मुह को ढककर नही रखते है। जिसके कारण साँस लेने में समस्या होती है और कई प्रकार की त्वचा सम्बंधित एलर्जी उत्पन हो जाती है।
  5. फसली कामकाज के दौरान जहरीले कीड़ो का भी खतरा रहता है। सांप, बिच्छू जैसे जीव खेतो में घूमते रहते है। घास में ये दिखते तो है नही और जब गलती से हाथ-पैर लग जाता है तो ये काट लेते है। इनके उपचार के लिए भी स्थानीय स्तर पर कोई चिकित्सकीय व्यवस्था नही होती है। लोग झाड़फूंक के भरोसे रह जाते है।
  6. विधुत लाइनो की क्षतिग्रस्तता भी किसानों के लिए जानलेवा बन रही है। खंभो और तारो का सरकार द्वारा समय पर रखरखाव नही किया जाता है, जिससे वे कभी भी टूटकर खेतो में गिर जाते है। ऐसे में अंधेरे-उजाले खेतो में जाने वाले किसानों को करंट लग जाता है। उच्च वोल्टेज के उतरने पर भी विधुत उपकरणों की वजह से करंट आ जाता है।
  7. लोगो को शारीरिक नुकसान पहुंचाने में आपसी झगड़ो का भी योगदान रहता है। वे खेतो की मेड़बंदी, मेड़ो पर स्थित पोधो के स्वामित्व को लेकर, पशुओं के दुसरो के खेतों में जाने को लेकर आपस मे लड़ पड़ते है। इन बातों पर वे लाठी या धारदार हथियारों का प्रयोग करते है जिससे सामने वाले के या तो हाथपैर तोड़ दिये जाते है या काट दिये जाते है, कई बार तो जान भी चली जाती है।
उपाय
कृषि कार्य के दौरान होने वाली शारीरिक जोखिमों को कम करने के लिए वैसे तो सबसे बड़ा उपाय सावधानी बरतना है फिर भी निम्न उपाय किए जाने चाहिए--
  1. साँस व त्वचा सम्बंधित समस्याओं का कारण धूल और धुंए में कार्य है। इसलिए किसानों को ऐसी पध्दतियों से अवगत कराने की जरूरत है जो स्वच्छ तरीके से करे जा सकते हो। गंदे जल की निकसीं की व्यवस्था की जाए ताकि उसमे बार-बार घूमने की जरूरत नही पड़े।
  2. कृषि उपकरणों को चलाने का प्रशिक्षण दिया जाए , बिना जानकारी के अभाव में मशीनों से अपने हाथपैर कटवा लेते है। मशीनों की डिज़ाइन भी इस तरीके से की जाए कि वे लापरवाही और असावधानी की दशा में नुकसान दायक साबित नही हो।
  3. रासायनिक पदार्थो को प्रयोग करने के सही तरीको के बारे में किसानों को अवगत कराया जाए। हाथ मे दस्ताने लगाने और मुंह ढकने की सलाह दी जाए।
  4. जहरीले कीड़ो के काटते ही आदमी और उसके आसपास के लोग अपना आपा खो देते है। जल्दबाजी में वे कोई उचित कदम नही उठा पाते है। पहले तो उन्हें प्राथमिक चिकित्सा के बारे में अवगत कराया जाए और फिर स्थानीय चिकित्सालय में पहुचाया जाए। जहर-रोधी दवाएं गांवो के स्तर तक भी उपलब्ध होनी चाहिए।
  5. करंट लगने की दशा में भी प्राथमिक उपचार से लोगो को अवगत कराया जाए। इसके अलावा तारो की समय-समय पर देखरेख की जानी चाहिए। तारो की लाइनो को खेतों के बीच से होकर कम से कम निकाला जाए।
  6. लोगो को आपसी झगड़ो के समाधान में भी कम आक्रामक रहने की सलाह दी जाए। छोटी-मोटी लड़ाइयों में शरीर को नुकसान पहुंचाने को कभी भी सही नही कहा जा सकता।

निष्कर्ष
इस प्रकार खेतीं के कार्य को कम जोखिमयुक्त बनाया जा सकता है। ग्रामीणों को कौशल प्रशिक्षण और तकनीकी साहचर्यता से परिचित कराकर इन समस्याओं के समाधान ढूंढना चाहिए।
कोई भी ऐसी आजीविका सही नही मानी जा सकती जिसमे शारीरिक नुकसान शामिल हो। कृषि को भी एक आरामदायक पेशा बनाया जाना चाहिए जिसे तकनीकी उपकरणों और पध्दतियों के माध्यम से सुनिश्चित किया जाए।

किसानों से ऋण बोझ को कम करना

कर्ज और किसानी के बीच नजदीकी सम्बन्ध होता है। शुरू में किसान फसल और अन्य जरूरी कार्यो के लिए कर्ज लेता है और जब फसल तैयार होती है तो उसे चुका देता है। लेकिन वर्तमान में मानसून की विफलता, महंगाई, सामाजिक आयोजनों के खर्चों, शिक्षा और चिकित्सा सम्बंधित वित्तीय जरूरतों, भौतिक सुविधाओं को जुटाने की मंशा आदि कारणों की वजह से कर्ज का बोझ बढ़ गया है और उसे समय पर चुकाना भारी हो गया है। बढ़ते हुए कर्ज और उन्हें चुकाने में असमर्थता ने किसानों के भविष्य को अंधकारमय बना दिया है।

इससे भयभीत होकर किसानों के आत्महत्या तक की घटनाएं हुई है। जिनके कारण किसानों की दरिद्रता को सरकार ने भी जेहन में लिया है और समस्या समाधान में रूचि ली है।

किसानों के ऊपर से कर्ज के बोझ को कम करने के लिए निम्न आयामो पर विचार किया जा सकता है---

  1. सबसे पहले तो किसानों को असंस्थागत ऋण के स्त्रोतों से हटाकर संस्थागत स्त्रोतों (बैंको) से जोड़ने की जरूरत है। अब तक किसान सर्वाधिक शोषित असंस्थागत साहूकारों के द्वारा हुए है, जिनकी किसानों के संसाधनों पर पकड़ होती है जिसे वे स्वपरिभाषित चूक (defaultry) के माध्यम से हड़प लेते है और फिर किसान भूमिरहित हो जाते है। साहूकारी का यह स्वरूप 80 व 90 के दशक की बॉलीवुड फिल्मों में भली भांति दिखाया जाता है।
  2. दूसरी बात यह है कि कर्ज को लक्षित करके उसके अपव्यव रूपी रिसाव को खत्म किया जाए। उदारहण के लिए कई बार ऐसा होता है कि लोग भैस खरीदने या मशीनरी लाने के लिए कर्ज उठाते है और उसे दावतों में खर्च कर देते है। अब यहां यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि  कर्ज के धन का लक्षित प्रयोग हो, भले ही सभी प्रकार के खर्चो को भी यथोचित कर्ज श्रेणी में तब्दील करना पड़े। इसका फायदा यह होगा कि उत्पादक और अनुत्पादक दोनो श्रेणियों में पृथक रूप से कर्ज का उद्देश्य भुनाया जा सकेगा। कर्ज का उद्देश्य पूरा होने पर ही उसकी वापसी सुनिश्चित होगी।
  3. कर्ज के बोझ को रोकने के लिए किसानों को अपव्यव पर भी लगाम लगानी होगी। इसके लिए सामाजिक स्तर पर पहल करनी होगी। अपनी क्षमता से परे जाकर खर्च करने पर बहिस्कार जैसे मापदंड काम में लिए जाए, दहेज, दावते, महंगी शादियों जैसे प्रतिष्ठात्मक व्यव आदि पर रोक लगे।
  4. कर्ज के बोझ से बाहर आने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू है- किसानों की क्षमता का निर्माण ताकि उन्हें कर्ज की जरूरत न्यूनतम पड़े। इसके लिए किसानों को अतिरिक्त आय से जोड़ने की जरूरत है जिनमे पशुपालन, बागवानी, प्रसंस्करण आदि शामिल है।
  5.  इसके अलावा गांवो या गांवो के समूह पर उद्योग या सेवा क्षेत्रों को स्थापित करने के लिए नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है, जैसे कि -पर्यटन, होटल, विनिर्माण आदि। इनसे रोजगार का सृजन होगा और लोग कृषि से इतर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकेंगे। जब आय में इजाफा होगा तो कर्ज लेने और चुकाने की क्षमता भी बढ़ जाएगी।

किये गए प्रयास
इस दिशा में सरकार ने कई प्रयास किए है। सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से फसल-ऋण चक्र में ब्याज के बोझ को न्यूनतम करने का प्रयास किया है। किसानों की क्षमता को विकसित करने के लिए कई योजनाएं शुरू की है।
लेकिन मुख्य मुद्दा यह है की इन योजनाओं की प्रभावशीलता उचित प्रकार की नही रही है। बैंको से मिलने वाला कर्ज थोड़ा होता है और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया कम शिक्षित किसानों के लिए कष्टसाध्य होती है। उसी प्रकार किसानों की विभिन्न जरूरतों को भी ऋण श्रेणियां कवर नही करती है। सामाजिक कार्यो में भी दिखावे के बढ़ते प्रचलन के कारण धन का अविवेकपूर्ण अपव्यव जारी है। इन सबके चलते किसानों को ऋण के बोझ से बचाना मुश्किल होगा।

निष्कर्ष
अगर हमे किसानी को फायदेमंद निर्वाह का माध्यम बनाये रखना है तो हमे किसानों की जरूरतों को लक्षित करना होगा। धन के दक्ष प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देना होगा।

फसल ऋण चक्र में नई चुनौतियां

किसानों और कर्ज का गहरा नाता है। कहते है कि किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज के साथ बढ़ा होता है और मरते वक्त अपने पुत्रों पर कर्ज का बोझ विरासत में छोड़ जाता है। अगर हम  किसानों की जिंदगी का आंकलन करे तो यह बात उन पर सटीक बैठती है।

कर्ज की शुरुआत फसल बोने से होती है और फसल को बेचकर चुकाने पर खत्म होती है। शुरू में खाद-बीज के लिए कर्ज लेते है, फिर सिंचाई कार्यो के लिए, अंत मे फसल से उत्पादन प्राप्ति को बेचकर उन्हें चुकाया जाता है। इसे फसल-ऋण चक्र कहा जाता है जिसमे ऋण लेकर फसल की जाती है और फसल बेचकर ऋण चुकाया जाता है। यह चक्र हर साल दोहराया जाता है। अगर उत्पादन कम हो तो कर्ज को अगली फसल के भरोसे छोड़ दिया जाता है। बीच मे होने वाले सामाजिक आयोजनों और अन्य आवश्यक खर्चो के लिए भी कर्ज से ही वित्तीयन किया जाता है।
अगर कर्ज और फसल की प्राप्ति का यह चक्र चलता रहता तो ग्रामीण जीवन पूर्ववत चलता रहता, लेकिन नवीन आर्थिक-सामाजिक बदलावों ने इस चक्र को चुनोती दे डाली जिसके कारण कर्ज को चुकाने में एक मौसम की फसल से प्राप्त आय अप्रर्याप्त रहने लग गई और कर्ज को यह बोझ अगली फसल को अतिरिक्त रूप से प्राप्त हुआ।

फसल-ऋण चक्र को चुनोती देने वाले कारको को हम निम्न प्रकार से समझ सकते है----


  1. फसल-ऋण चक्र को पहली चुनोती तो भौगोलिक कारको पर आधारित है। जैसा कि भारत मे कृषि मानसून पर निर्भर करती है और मॉनसूनी जलवायु में अनिश्चितता होती है, जिसके कारण उत्पादन में भी अनिश्चितता आ जाती है। जिस भी वर्ष सूखा , ओलावृष्टि, बाढ़ जैसी घटनाएं होती है उसी वर्ष कर्ज चुकाई का संकट आ जाता है।
  2. महंगाई ने भी फसल-ऋण चक्र को चुनोती दी। दैनिक आवश्यकता की चीजो के भाव अत्याधिक हो गए और फसलों के दामो में ज्यादा अंतर नही आ पाया। साथ ही फसली इनपुटो के भी भाव बढ़ने से लागत कई गुना बढ़ गई, इन सबके चलते उत्पादन में उतना सामर्थ्य नही रहा कि वह कर्ज के बोझ को उठा सके।
  3. शादी-विवाह, दहेज, कई प्रकार की दावते जैसे सामाजिक आयोजनों में भी किसानो की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा चला जाता है। कई बार तो इनमे किया जाने वाला खर्चा कर्ज लेकर किया जाता है। इन सामाजिक आयोजनो में महंगाई और आधुनिक रूप देने का जो सिलसिला चला है उसने भी अतिरिक्त भार डाल दिया है।
  4. किसानों के अपरम्परागत क्षेत्रों में उतरने से भी कर्ज का बोझ बढ़ा है। जैसे कि अब बच्चों की महंगी पढ़ाई-लिखाई का बोझ पड़ा है, भौतिक सुविधाओं को भी जुटाने लगे है। पहले की जीवनशैली में ये खर्चे शामिल नही थे। अब इन व्यवो ने आय के लिए अन्य स्रोतों को अपनाने पर जोर देकर कर्ज के चक्र को चुनोती दी है।

प्रभाव

यह फसल-ऋण चक्र असंस्थागत स्त्रोतों अर्थात साहूकारो पर आधारित था जहां महंगी ब्याज दर होती थी। चुकाने में कोई भी चूक होने पर भूमि या किसी अन्य संसाधन से हाथ धोना पड़ता था।
इसका असर यह हुआ कि खासकर सीमांत किसानों में उत्पादन से ज्यादा चिंता कर्ज को कम करने को लेकर होने लगी। क्योंकि उन्हें भूमिहीन होने की डर लगने लगा। मराठवाड़ा, विदर्भ जैसे सूखे क्षेत्रो से बड़ी मात्रा में किसानों के द्वारा आत्महत्या करने की घटनाएं सामने आने लगी।

इसका असर मानव संसाधनो के विकास पर भी पड़ा है। सीधी सी बात है ये अपने बच्चों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा नही उपलब्ध करवा सकते जिस कारण वे खेती के अलावा रोजगार का कोई विकल्प भी नही प्राप्त कर सकते। अगर ऐसा होता तो वे गरीबी के जाल से आसानी से बाहर आ जाते। न ही इनके बच्चे अपने अन्य किसी हूनर की आजमाइश कर पाते है। इस प्रकार गरीबी का चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।

निष्कर्ष

अब सरकार ने संस्थागत स्त्रोतों (बैंको) को बढ़ावा देकर इस चक्र के दुष्प्रभावो को कम करने की कोशिश की है। लेकिन अभी भी इस समस्या के समाधान के लिए बुनियादी कारणों को लक्षित करने की आवश्यकता है।

सीमांत किसानों का दर्द

सीमांत किसानों की संख्या भारत मे सर्वाधिक हो गयी है, जैसे जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी तो जमीने भी बढ़ती चली गयी। जोतो की संख्या इतनी बढ़ गयी कि उनका आकार आजीविका के स्तर तक सिमट कर रह गया। लोगो की परेशानी तब और बढ़ गयी जब ये जोते बिखरी हुई है। ऐसे में इनके लिए न तो मशीनरी की व्यवस्था कर सकते और न ही सिंचाई हेतु कोई बड़ा निवेश कर सकते हैं। इससे उत्पादन में वृद्धि के अवसर भी चले जाते है। इन किसानों को उत्पादन के तौर पर निवेश और लागत को हटाने के बाद केवल खाने के लिए अनाज ही शेष बचता है। अतिरिक्त उपज होने की सम्भावना नगण्य होती है। ऐसे में कृषि से इतर गतिविधियों के संचालन के लिए ऋण की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है।

वर्तमान में कृषि की लागत बढ़ती जा रही है। अब खेती में प्रयुक्त होने वाले खाद बीजो का भाव काफी बढ़ गया है, ट्रैक्टरों से जुताई महंगी हो गयी है, बैल आधारित जुताई को कब का छोड़ा जा चुका है, सिंचाई के लिए भी पानी की उपलब्धता काफी महंगी है, इसके अतिरिक्त अन्य कार्यो में भी काफी महंगा निवेश होता है। इन सबके लिए किसानों को ऋण-फसल चक्र से जुड़ना पड़ता है। वर्तमान में महँगाई, सामाजिक और पारिवारिक खर्चो के बोझ तथा मानसून ने ऋण-फसल चक्र को चुनोती देकर सीमांत किसानों को और अधिक परेशानी में डाल दिया है।

सीमांत किसानों की पहचान वैसे तो किसानों के रूप में है लेकिन इन्हें भूमि युक्त मजदूरों के समान माना जा सकता है। क्योंकि इनके जीवन मे आजीविका को लेकर असुरक्षा काफी ज्यादा होती है। ये अपनी छोटी से भूमि में कामकाजों को जल्दी से निपटा लेते है उसके बाद तो बड़े किसानों के यहाँ मजदूरी करने को लेकर तैयार रहते है। अपनी भूमि से खाद्यान्न प्राप्ति के अलावा आय न हो तो यह एक विकट संकट की स्थिति बन जाती है।

सीमांतपने के दर्द से मुक्त होने के लिए अलग रोजगार अपनाने की आवश्यकता है, इसके अलावा अपने बच्चों के कॅरिअर पर भी ध्यान देने की जरूरत हैं। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि सीमांत किसानों के लिए वैकल्पिक साधन भी बड़े निवेश की आवश्यकता रखते है और अंततः कठिन विकल्प प्रतीत होते है। ऐसे किसानों को ये आकर्षित नही कर पाते है।
इनकी बेहतरी के लिए आवश्यक है कि इनको मिलने वाले सरकारी फायदों को लक्षित किया जाए, कर्जो को असंस्थागत स्त्रोतों से हटाया जाए, सामाजिक आयोजनों के खर्चो को हतोत्साहित किया जाए।ऐसा करके ही ग्रामीण समाज को अधिक समावेशी स्वरूप दिया जा सकता है।