Tracing MODI-fied India

जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे तब यह प्रोपेगेंडा चलाया गया था कि उनके पास गुजरात में प्रशासन चलाने का लम्बा  अनुभव केंद्र में भी काम आएगा। लेकिन अब स्पष्ट हो गया है कि ज्यादा अनुभव वाला आदमी भी सही नहीं रहता क्योकि उसके अंदर सिस्टम को नजरअंदाज करने की क्षमता आ जाती है। सरकार ने इस समय देश के सभी उच्च शीर्ष संस्थानों की हालत खराब कर रखी है। सभी संस्थाओ पर केंद्र सरकार का भारी दबाव है। मोदी सरकार उन्हें अपने निर्देशो के अनुसार चलाना चाह रही है।

इस आलेख में हम दो भागो में आगे बढ़ते है। पहले भाग में हम उच्च अफसरों के साथ सरकार कैसा व्यवहार कर रही है, के बारे में होगा। वही दूसरे भाग में संस्थानों की हालत कैसे ख़राब कर रखी है, के बारे में विचार करेंगे। 

दादागिरी करने वाले लोगो की एक लोकप्रिय कहावत है कि या तो आप हमारे साथ है या फिर हमारे खिलाफ, बीच में रहकर सत्यनिष्टा दिखाने की कोई गुंजाईश नहीं है। यहां पर भी इसी रणनीति का अनुसरण किया जा रहा है। जो अफसर सरकार के एजेंडे को बिना प्रश्न किए जैसे-तैसे आगे बढ़ा रहे है, वे सर्वाइव कर रहे है। बाकी लोगो को प्रताड़ित या उपेक्षित किया जा रहा है।   
  1. इस सरकार को शुरू में देश के बेहतरीन लोगो का साथ मिला था, जो अपने अपने फील्ड में ख्यातिप्राप्त थे। लेकिन इस सरकार के एजेंडे को भांपकर सभी लोग भाग खड़े हुए। आर्थिक क्षेत्र में सबसे ज्यादा ब्रेन ड्रेन मोदी के काल मे हुआ। रघुराम राजन चले गए, अरविंद सुब्रह्मण्यम, अरविंद पनगड़िया चले गए। अर्थशास्त्रियों में केवल विवेक देवराय इनके साथ है।
  2. अच्छे अच्छे अफसरों को इन्होंने लांछन लगाकर बर्खास्त कर दिया। जब भी किसी अफसर को हटाया गया। भाजपा के आईटी सेल ने उन्हें बदनाम करके रख दिया। विदेश सचिव निरुपमा और रघुराम राजन के उदाहरण सामने है।
  3. कई अफसरों को मोदी जी ने व्यक्तिगत प्रतिशोध का निशाना बनाया , जिसमे संजीव भट्ट शामिल है जिसने गुजरात दंगो पर मोदी को आरोपी ठहराने वाले अवधारणाएँ सामने रखी थी।
  4. जिन लोगो ने आने पर निकालने की कोशिश की, उनको कोपभाजन सहना पड़ा। इनमे पुराने रेलमंत्री गोडा और हरड़ मंत्री स्मृति ईरानी का नाम शामिल है। 
  5. अफसरों की बलि भी अपने संकीर्ण हितों को पूरा करने के लिए दी गई। देवयानी खोबरागड़े को अमेरिका से रिश्ते सुधारने के लिए उपेक्षित किया गया। अब बैंकिंग लॉबी के दबाव में उर्जित पटेल भी बलि का बकरा बन सकते है।
  6. उनकी जगह पर जो लोग लाये गए। उनके कद छोटे रखे गए ताकि उन्हें अपने व्यक्तित्व का मातहत बनाया जा सके। राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचन भी इसी रणनीति का हिस्सा है। उर्जित पटेल ने नोटबन्दी के समय समर्पण कर दिया था। ओपी रावत ने राजस्थान के चुनावों की घोषणा में देरी की ताकि मोदी की सभा पूरी हो सके।
  7. कई पदाधिकारी यो ने मोदी को फायदे वाले काम किए। उन्हें दूसरे उच्च पद देकर सम्मानित किया। जिनमे 2G scam की अवधारणा बुनने वाले विनोद रॉय को बैंक बोर्ड ब्यूरो का चेयरमैन बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाकर भेजना भी इसी तरह की दुर्गंध के संकेत देता है।
  8. केंद्र में गुजरात कैडर और आरएसएस की विचारधारा के व्यक्तियों का जमावड़ा कर दिया गया। उन्हें श्रेष्ठ पद दिए गए। हसमुख अधिया उनमे प्रमुख नाम है।
  9. कुछ अफसरों के प्रति मोदी का विशेष स्नेह रहा। इनमे पहला नाम तो अजित डोवाल का है। जिसका कद एक मंत्री से भी ऊपर है। राजीव महर्षि भी वित्त सचिव, गृह सचिव रहे। उन्हें सेवा विस्तार मिला और उसके बाद कैग जैसे महत्वपूर्ण पद पर बिठा दिया गया।
मतलब मोदी सरकार में पद पाने के लिए मोदी भक्त होना प्राथमिक और अनिवार्य योग्यता है। इस योग्यता को धारण करने के बाद आप साहेब की असीम कृपा का लाभ प्राप्त करोगे।


संस्थाओ की विकलांग स्थिति
इस समय सारी संस्थाए विकलांग व्यक्ति के समान कर दी गई है। किसी संस्था के पास बजट नही है, तो किसी के पास स्टाफ नही है।

नियुक्तियों को अटकाना :
जब किसी संस्था में स्टाफ ही नही होगा तो वे कैसे काम करेगी। ये सब ऐसे संस्थान है जो सरकार को जवाबदेह बनाते है। 
  1. भ्रष्टाचार की जांच के लिए लोकपाल नियुक्त करने का कानून बने लगभग चार साल हो गए है। लेकिन अभी भी उसकी नियुक्ति नही हुई है। दरअसल लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को भी रखा गया है, अब PM के खिलाफ वह टिप्पणी करेगा तो मोदी की छवि का विश्लेषण करने का जनता को मौका मिलेगा। मोदी ने इसका अवसर ही जनता को नही दिया। बात को कानून में संशोधन पर फंसा दिया (explain in comment)
  2. जिन संस्थाओ में अध्यक्ष के अलावा कुछ सदस्य होते है। उनमें आधे सदस्यों की नियुक्ति ही नही की जाती। कुछ सदस्य उसमे विपरीत विचारधारा के नियुक्त कर दे रहे है ताकि वे आपस मे ही उलझे रहे। RBI में अभी ऐसे सदस्य घुसा दिए गए है।
  3. न्यायालयो में नियुक्तियो के आग्रह को ठुकराना भी इनका काम रहा है। CJI टीएस ठाकुर ने इनके सामने जजो की नियुक्ति को नही अटकाने का आग्रह करते हुए आंसू छलकाए थे, जिसका इन पर कोई असर नही हुआ। अल्फोंस की नियुक्ति को दोबारा भेजने पर स्वीकृति दी थी क्योंकि उसने उत्तराखंड में इनके विपरीत निर्णय दिया था।
  4. अयोग्य व्यक्तियों को नियुक्त किया जा रहा है। FTII पुणे में गजेंद्र चौहान को नियुक्त कर दिया। लम्बे विरोध के बाद अनुपम खेर को नियुक्त किया गया, जिसने भी इस्तीफा दे दिया।

कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप :
कई संस्थानों की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप किया। फ़िल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड को सेंसर बोर्ड बना दिया। पहलाज निहलानी ने इस मामले में बड़ी कुख्याती पाई। रिज़र्व बैंक में हस्तक्षेप किया जा रहा है। रघुराम राजन के स्वतंत्र व्यक्तित्व और विचारों के कारण ये उससे डरते रहे। लेकिन उर्जित पटेल को अंधेरे में रखकर नोटबन्दी कर दी। अब तो उसने भी ज्यादा हस्तक्षेप करने पर इस्तीफे की धमकी दी है।

संस्थाओ में टकराव :
सीबीआई और आईबी जैसी संस्थाओ में टकराव की स्थिति पैदा करने में मोदी जी को पुरानी महारत हासिल है। अभी सीबीआई डायरेक्टरो के बीच मामले में इसे देखा जा सकता है। कामकाज में भी दबाव बनाकर असंवेधानिक कार्य किए जा रहे है या फिर कानूनी लूपहोल का फायदा उठाया जा रहा है।

कानूनी दुर्बलता के प्रयास :
कई संस्थानों की शक्ति तो बाकायदा कानून लाकर कम कर दी गई। इस मामले में रिज़र्व बैंक सरकार को सर्वाधिक खटका जिससे बहुत सारी शक्तिया वापस ली गई। सुचना आयोग का भी यही हाल है। 

आगे क्या :
कुल मिलाकर बात यह है कि अफसरों और संस्थाओ को दबाव में रखकर काम करवाया जा रहा है। ये सब काम सिर्फ पूंजीपतियों के फायदे के लिए किया जा रहा है। जबकि संस्थान वंचित वर्ग के हितों की रक्षा के लिए खड़े होते है। ऐसे में गरीबो के हितों की कीमत पर बिजनेसमैन को खड़ा करने में मोदी सरकार तन मन धन से लगी हुई है।
जनमत को भी इसकी निंदा करनी चाहिए। अफसरों को अपनी सत्यनिष्ठा पर अडिग रहना चाहिए। तब जाकर हो सकता है हम संस्थानों को उन उद्देश्यो पर कार्यरत देख सके, जिनके लिए उन्हें स्थापित किया गया था।

Conclusion :
जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी तो india is indira, indira is india का नारा दिया गया। मतलब जो इंदिरा ने कर दिया वही सही है, कही से विरोधी स्वर निकलने की गुंजाईश ही नहीं थी। अब मोदी जी भी उसी रवैये पर चल रहे है जो मानते है कि अब india MODIfied हो चुका है, जिसमे मोदी जी ने जो कह दिया वो ही सही होगा। हालांकि हम सब जानते है कि अहंकार किसी को भी नही पचता। हमारे अंदर दूसरे संस्थानों और व्यक्तियों की उपस्थिति को लेकर सम्मान होना चाहिए।

बनारस में वर्ष 2014 के आम चुनाव के संस्मरण

वर्ष 2018 के आम चुनावो की आहट शुरू हो गई है। इसी सिलसिले में में मुझे वर्ष 2014 के आम चुनाव में बनारस का मुकाबला याद आ जाता है। दो लोकप्रिय उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल और नरेंद्र मोदी के बनारस से चुनाव लड़ने के कारण, वह पूरे भारत की लाइम लाइट में आ गया था। देश की राजनीती की दिशा भी वहां से जुडी हुई थी। तो उस मुकाबले को कवर करने के लिए देश -विदेश के पत्रकार बनारस में इकठ्ठे हुए थे।

उस दौरान मैं IIT(BHU) से अपनी इंजीनियरिंग का तीसरा साल समाप्त कर रहा था। जब यह लग गया कि इंजीनियरिंग में अपना कुछ होना नहीं है तो मैंने सिविल सेवाओं की तयारी शुरू कर दी थी। इस वजह से देश के जमीनी मुद्दों पर एक समझ विकसित हो गई थी, जिसकी बदौलत यह तय करने में आसानी होने लगी कि कोनसा नेता झूठ बोल रहा है और कोनसा सही बात कर रहा है। इसलिए मैंने अपने साथियों के साथ इस चुनाव में आम आदमी पार्टी का समर्थन किया। हालांकि कॉलेज में सभी दलों का समर्थन करने वाले छात्र मौजूद थे।

आम आदमी पार्टी की तरफ आकर्षण
उस दौरान लोकसभा चुनावों में पहली बार उतरे केजरीवाल सिविल सेवा को ही छोड़कर आये थे और IITian भी थे, वे बाते भी व्यवस्था में बदलाव की कर रहे थे। इन सभी चीजों की वजह से मेरा आकर्षण आम आदमी पार्टी की तरफ हो गया। साथ में पढ़ने वाले लगभग 20-25 लड़को की एक टीम बना ली थी। सबको आम आदमी पार्टी के पक्ष में कर लिया और विरोध करने वालो को स्वच्छ राजनीती का पाठ पढ़ने लग गए। केजरीवाल जब बनारस आये तो कई लड़को ने वोलियन्टर बनकर उसका सहयोग भी किया। केजरीवाल के साथ आये स्टार प्रचारकों से भी सम्पर्क किया। आम आदमी पार्टी को वित्तीय सहायता के लिए ऑनलाइन डोनेशन भी दिया। उसी समय टाइम पत्रिका ने विश्व के प्रभावशाली लोगो के लिए वोटिंग करवाई थी, जिसमे केजरीवाल के पक्ष में मतदान के लिए छात्रों को प्रेरित किया। पार्टी के प्रचार के सिलसिले में आने वाले कई लोगों से मुलाकात की।

बाद में जब जब परिणाम आया तो केजरीवाल बुरी तरीके से हार गए और नरेंद मोदी की देश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी,  इस तरह हमारी इच्छाओ की हार हो गई। बाकी लड़को के सामने शर्मिंदा होना पड़ा। मैंने इसके बाद राजनीती में सक्रिय रूचि से मुँह मोड़ लिया और सिविल सेवाओं की जरूरतों के अनुकूल पार्टी लाइन से ऊपर उठकर निष्पक्षता को मन में बिठा लिया। बाकी के लड़को को अपनी शर्मिंदगी मिटाने का अवसर तब मिला जब केजरीवाल ने अगले साल वर्ष 2015 में दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीट जीत ली। लेकिन आगे केजरीवाल ने भी अपनी पार्टी को एक  कम्पनी की शक्ल दे दी और कई गणमान्य सदस्यों को उपेक्षित कर दिया, तो बाकी साथियो का भी आम आदमी पार्टी से मोह खत्म हो गया। आगे वे भाजपा विरोध को आगे जारी रखने के लिए कांग्रेस की तरफ आकर्षित हो गए और खुद को अभी भी वहां पर राजनितिक रूप से सक्रिय बनाये हुए है। 

लेकिन अब पांच साल बाद मेरा मन उस घटनाक्रम और राजनीती का विश्लेषण करने का कर रहा है। कुछ बुनियादी प्रश्न है जिन पर विचार करते है -
>क्या मोदी उस समय अजेय थे?
>क्या केजरीवाल भी एक विकल्प था।

सभी के मन में यही सवाल था कि क्या अरविंद केजरीवाल बनारस में भी दिल्वली की कहानी दोहराएंगे, जहां  दिल्ली में खुद शीला दीक्षित के सामने खड़े होकर उसे शिकस्त दी थी। चाहे कुछ भी हो लेकिन केजरीवाल ने किसी भी प्रकार के चमत्कार की उम्मीद अंतिम समय तक रखी और अंत तक संघर्ष किया। 

संभावनाए और समीकरण :
  1. सब को पता था कि पिछले दो-तीन सालों में जो घोटाले कांग्रेस ने किए है, उसकी वजह से वह सत्ता में कभी नही आ पाएगी। ऐसे में भाजपा के गठबंधन दलों को भावी सरकार के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आधारित अन्ना आंदोलन को सहारा बनाकर केजरीवाल द्वारा गठित पार्टी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी। दिल्ली में लोकलुभावन वादों के सहारे अपनी जगह बनाने वाले केजरीवाल ने खुद शीला दीक्षित को शिकस्त दे डाली, इसके बाद वे केंद में सरकार के ख्याली पुलाव बनाने लगे। और इसी के तहत उन्होंने नरेंद मोदी के खिलाफ बनारस से लड़ने का मन बना लिया था। वही पार्टी के दूसरे दिग्गज नेता कुमार विश्वास को राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से खड़ा कर दिया था ।                               
  2. मोदी को प्रधानमंत्री नही देखने वालों का मानना था कि केजरीवाल ने अगर कैसे भी करके मोदी को बनारस में हरा दिया तो बनारस से हारे हुए मोदी को न तो भाजपा और नही सहयोगी कभी प्रधानमंत्री बनाएंगे। इसलिए सभी केजरीवाल का मूक समर्थन कर रहे थे। लेकिन केजरीवाल की मंशा किसी के समझ में नही आ रही थी। क्योंकि उसने राहुल गांधी के खिलाफ भी बड़ा उम्मीदवार खड़ा कर दिया था। सपा, बसपा से भी उसकी कोई खास बन नही पा रही थी। दूसरे दलों में से केवल नीतीश कुमार की पार्टी ने समर्थन दिया, शरद कुमार प्रचार के लिए भी आये थे ।
  3. यह बात सच मे भी थी। राजनाथ सिंह उस समय भाजपा के अध्यक्ष थे, वे कही न कही ऐसे मौकों का इंतजार भी कर रहे थे। मोदी की टीम को भी पता चल तो उसके समर्थकों ने यह कहना भी शुरू कर दिया था कि अगर मोदी को PM बनाना है तो राजनाथ को हराना है। लखनऊ से खुद के खिलाफ हवा देखकर राजनाथ को कहना पड़ा कि भाई मुझे हराओ मत, जिताओ में आगे रुकावट नही बनूंगा। तब जाकर उसके पक्ष में माहौल बनाया गया।
प्रचार अभियान :
जब बनारस में प्रचार शुरू हुआ तो भाजपा ने केजरीवाल को रायता फैलाने वाले के तौर पर देखा और उसके प्रति बिल्कुल भी सहनशीलता नही दर्शाई गई। वैसे तो मोदी विकास के गुजरात मॉडल पर चुनाव लड़ रहे थे। लेकिन यह विकास की बजाय चुनाव जीतने का मॉडल ज्यादा था। जिसमे विरोधी उम्मीदवार को डराया-धमकाया जाता है। 

बनारस में जगह-जगह पोस्टर लगाए गये कि देखो दिल्ली का भगोड़ा आया हैं। जो दिल्ली में टिक नही सका वो बनारस में क्या टिकेगा। इस आरोप पर केजरीवाल सफाई देते रहे लेकिन उन्हें सुनने के लिए जनता मौजूद नही थी।

केजरीवाल का स्वागत अंडे फेंककर किया गया। इसके मंत्रियों को पीटा गया जिनमे सोमनाथ भारती शामिल थे। इस का समर्थन कर रहे रोडीज के रघु राम को बीएचयू में पीटा गया। इसका मतलब था कि भाजपा वास्तविक तौर पर केजरीवाल से डरी हुई थी।

मजबूत और कमजोर पक्ष :
लेकिन माहौल भाजपा के पक्ष में ही था। जिसके कई कारण तलाशे जा सकते है। पिछली बार भी भाजपा का ही सांसद मुरली मनोहर जोशी थे, जिन्हें मोदी के लिए सीट खाली करके कानपुर भेजा गया था। दूसरी तरफ बनारस हिंदू धर्म का गढ़ मानी जा सकती है। मोदी को स्थानीय जनता ने एक तारणहार के तौर पर देखा।  'हर हर मोदी, घर घर मोदी' नारा कोई कल्पना मात्र नही था। केजरीवाल के पास जनता के दिल मे बसने का ऐसा कोई कारण नही था।

वही भाजपा के पास समर्पित स्थानीय कार्यकर्ताओ का संगठन था। जिन्होंने पार्टी के प्रचार के साथ ही केजरीवाल का विरोध बढ़ चढ़कर किया। जबकि केजरीवाल के पास दिल्ली और एनसीआर से ले जाये गए बन्दे थे, जिन्हें स्थानीय परिस्थितियों की समझ नही थी। फिर राष्ट्रीय नेता का दम्भ भरते केजरीवाल के अहंकार को सन्तुष्ट करने के लिए यह भीड़ उनके साथ ही जाती थी। चाहे अमेठी हो, नागपुर हो, गुजरात हो या फिर दिल्ली एनसीआर हो। सीधी सी बात है इस वजह से कही पर भी फोकस नही हो पाया। फिर भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी आप के टूरिस्ट कार्यकर्ता के पैर नही टिकने दिए। उन्हें न तो आराम से रहने दिया और न ही अपनी बात रखने दी। उनकी सभाओ में मंच के पास जाकर विरोधी नारे लगाए।

खुद केजरीवाल को भी इस खराब स्थिति का आंकलन हो गया था। भले ही उन्होंने माना नही हो, लेकिन उनके ढीले पड़े Attitude से इसका अंदाजा लगाया जा सकता था।

केजरीवाल की राजनीति अवसरवाद से भरी हुई थी। जिसे दूसरे दल कतई नही समझ पा रहे थे। वही मीडिया के ऊपर भी केजरीवाल ने लांछन लगा दिया। इसके बाद वे एस्टबलिशमेंट के निशाने पर आ गए।

चुनावी मुद्दे :
भाजपा का एजेंडा पुरे देश के समान मोदी था। जिसके सामने उत्साहित कार्यकर्ता किसी भी विरोधी  मुद्दे को नहीं टिकने दे रहे थे। वही केजरीवाल के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं था। वे कह रहे थे कि प्रधानमंत्री का उम्मीदवार होने का मतलब यह नहीं कि इससे आपके क्षेत्र को तगड़े विकास की गारंटी मिल गई है। इस बात को ज्यादा तवज्जो भी नहीं मिल पाई।

वही केजरीवाल को रक्षात्मक भूमिका में ला दिया। जगह-जगह भाजपा ने ४९ दिन के बाद दिल्ली से सरकार छोड़कर भागने का ताना मारने वाले पोस्टर लगा दिए। केजरीवाल इसका कोई ठोस जवाब नहीं दे पाए। दो बड़े उम्मीदवारों की खींचतान में अन्य उम्मीदवारों के मुद्दे दबकर रह गए।

दूसरे दलों की भूमिका :
दूसरे दल इस लड़ाई में भागीदारी का दस्तूर पूरा कर रहे थे। कांग्रेस ने पहले तो कद्दावर नेता की तलाश की थी जिसमे सचिन तेंदुलकर और रेखा के नामो की चर्चा हुई थी। लेकिन आगे फिर स्थानीय व्यक्ति को ही टिकट दे दिया। सपा और बसपा ने भी अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। जिनको ठीक ठाक संख्या में वोट प्राप्त हुए थे।

वोट बैंक का विश्लेषण  :
उत्तरप्रदेश की राजनीति पर गौर करे तो हम पाते है कि दलित वर्ग बसपा और कांग्रेस दोनो का वोटबैंक है, वही मुस्लिम समुदाय सपा और कांग्रेस दोनो का वोटबैंक है। रही बात पिछड़े वर्ग की तो ये सपा के हिस्से में रहे है, वही उच्च जाति के सवर्ण वर्ग भाजपा के वोटबैंक रहे है।
दलित वर्ग = बसपा और कांग्रेस 
मुस्लिम =  सपा और कांग्रेस 
पिछड़े वर्ग = सपा 
सवर्ण वर्ग = भाजपा
अब भाजपा को ऐसा लग रहा था कि केजरीवाल शहरी सवर्ण वर्ग के वोट बांट कर नुकसान पहुचाएगा। वही केजरीवाल दलित और मुस्लिम समुदाय को भी आकर्षित करने की रणनीति पर चल रहे थे। इसलिए वहां के मुस्लिम धर्मगुरुओं से मुलाकात की। लेकिन यह बंटा हुआ मोदी विरोध अपने उद्देश्य में विफल रहा था।

परिणाम :
जब अंतिम परिणाम आये तो मतगणना के दिन केजरीवाल बनारस आये थे, इसका मतलब था कि अपने अनुमान के अनुसार वे जितने की उम्मीद रखते थे। लेकिन दोपहर तक प्रतिकूल परिणाम पाकर निकल लिए। अब बनारस आने की बारी मोदी की थी। उन्हें पूरे देश मे भी भारी बहुमत मिला था। उनका सपना पूरा हो गया था, उन्होंने गंगा घाट पर जाकर आरती की।

कुछ अन्य रोचक घटनाए :
  1. भाजपा मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रैली करना चाहती थी। लेकिन निर्वाचन अधिकारी प्रांजल यादव ने साफ मना कर दिया। भाजपा ने विरोध करते हुए बीएचयू के गेट पर धरना भी दिया, लेकिन नाकाम रहा।
  2. मोदी की तरफ से प्रचार अभियान भाजपा के बजाय खुद मोदी की टीम के पास था। अमित शाह उस समय उत्तर प्रदेश के प्रचार प्रभारी थे।
  3. बाबा रामदेव ने मोदी का प्रचार किया था। वैसे तो ये व्यवसायी है । इन्होंने पूरे शहर में 100% मतदान होना चाहिए के बोर्ड लगाए। हालांकि किसके पक्ष में इसका उल्लेख नही करके चुनाव आयोग की नजरों से बच गए।
  4. आम आदमी पार्टी के भी कई कार्यकर्ताओ ने गली-गली में धूल छानी। अलका लांबा ने अकेले ही पूरे शहर में पैदल घुमफिरके पर्चे बांटे, बाद में उसे दिल्ली से टिकट मिला और वह विधायक बनी।
  5. मीडिया ने अघोषित रूप से केजरीवाल का बहिष्कार कर दिया। किसी भी अखबार में कोई खबर नही मिलती थी। यह सब ऊपर से मिले निर्देशो का नतीजा कहा जा सकता है। कॉर्पोरेट मीडिया क्या कर सकता है। इस चीज को यहां से समझ सकते है। 

निष्कर्ष :
यह एक ऐतिहासिक चुनाव था, जिसके गवाह बनने का मौका मिला। लेकिन उसके बाद से आप की राजनीति से मोहभंग हो गया। वह कुछ ज्यादा ही व्यक्तिवादी हो चली थी। पूरी पार्टी को केजरीवाल ने हाइजेक कर लिया और उसे एक कॉरपोरेट कम्पनी की तरह चलाने लगे। अंततः कह सकते है कि भोले मनो को ठगने के इस जाल में  केजरीवाल विफल रहे और मोदी इस कार्य मे जीत गये।

प्रशासक के तौर पर मोदीजी से क्या सीखे

वैसे तो एक प्रशासक राजनीतिक रूप से निष्पक्ष होता है और उसके पास अनुभव और ज्ञान ही इतना होता है कि वह पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सोच सकता है और वह इसी तरीके से कार्य करता भी है। उसके लिए सभी दल एक जैसे होते है और वह किसी भी दल या समूह के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ नही होता है। वही प्रधानमंत्री मोदीजी राजनीतिक कौशल में तो महारत रखते ही है  लेकिन प्रशासक के तौर पर अपने कामकाज को इस तरह से अंजाम दिया है कि वे भविष्य के अफसरों के लिए कुछ पदचिन्ह छोड़ जाते है।
उनके कार्य करने की शैली अनूठी है जिसे हम निम्न बिन्दुओ के माध्यम से समझ सकते है-



1. खुद की कमियों के बजाय खुद की क्षमताओं पर भरोसा

  • खुद की भाषा, संस्कृति पर गौरव की भावना होनी चाहिए, न कि शर्म और हो सके तो उन्हें दूसरे लोगो मे भी विस्तारित करना चाहिए। मोदीजी ने विदेशी मंचो पर भी हिंदी का धड़ल्ले से प्रयोग किया, भारतीय वेशभूषा को अपनाया, योग के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करवाया।
  • कभी भी नकारात्मक राजनीति को नही अपनाना चाहिए। जब 2014 के चुनाव हो रहे थे तो केजरीवाल ने यह फैलाया की देश तो बिकने वाला है, कुछ दिनों बाद आपको देश नही मिलेगा। ऐसा कहकर निराशा फैलाने की कोशिश की। मोदीजी ने उसी समय कहा कि देश विकास कर रहा है और बहुत जल्दी अच्छे दिन आने वाले है। लोगों को आशा पसन्द आयी।

2. सही समय का इंतजार करो, धैर्य रखो तब तक।

  • अगर आप कुछ बड़ा करना चाहते हो तो बीच मे हो-हल्ला मत करो, सही समय का इंतजार करो। वरना ईर्ष्या, द्वेष वाले लोग तुम्हे हतोत्साहित करेंगे और तुम उनसे निपटने में ही अपनी ऊर्जा गवां दोगे। यह भी हो सकता है फिर लोग आप जो करना चाहते  है वहाँ से पहले ही रोक दे।
  • टी.एन. शेषन ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त बनने पर सुधारो को सख्ती से लागू किया था। उससे पहले तो सभी नेता उसे सीधा-साधा अफसर ही मानते थे। और नेताओं को पता लग जाता कि यह इतना कड़क अफसर निकलेगा तो वे उसे कभी चुनाव आयुक्त नही बनाते।

3. अपनी खुद की प्राथमिकताओ के लिए काम करो, चाहे कोई नाराज हो या फिर विरोध करे।
-मोदीजी ने कई प्रोजेक्ट अपनी मर्जी से निर्धारित किए, विपक्षी दलों ने खूब आलोचना की, लेकिन उन पर कोई फर्क नही पड़ा। उन्होंने अधिकतर प्रोजेक्ट में गुजरात को फायदा पहुचाया। इसलिए अपने प्राधिकार का प्रयोग अपने लोगो को उठाने के लिए जरूर करो। वरना कल को लोग कहेंगे कि खुद तो अफसर बन गया लेकिन भाई तो गांव में ही घूम रहे है।

4. लोगो से जुड़ने की क्षमता।

  • लोगो से बात करने के अधिकतम प्रयास किये जाने चाहिए। ध्यान रहे केवल सकारात्मक वार्तालापों का ही हिस्सा बने, डिबेट में कभी नही उलझना चाहिए (bcoz debates exchange negative energy)। मन की बात इसी तरह का प्रयास है।
  • मोदीजी मे उच्च स्तर की भावनात्मक बुद्धिमत्ता है। उनमें किसी भी आदमी से बात करने की क्षमता है, वे बच्चों से बच्चों की तरह, युवाओ से युवाओ की तरह, अन्य लोगों से भी उनकी जगह पर खुद को मानकर बात करना।
  • विपक्षियों से भी सकारात्मक तरीके से बात करना, उनसे समर्थन और सुझाव मांगना, चाय पे आमंत्रित करना आदि।मतलब औपचारिक शिष्टाचार कायम रखना चाहिए, विरोध के बावजूद भी।

5. बुनियादी समस्याओ को पहचान करने की क्षमता है कि आखिरकार गड़बड़ क्या है और उसे सही कैसे किया जा सकता है।
यह क्षमता गवर्नेन्स में बहुत ही ज्यादा मायने रखती है, इनसे हम योजनाबध्द तरीके से आगे बढ़ सकते है, जैसे कि स्वच्छ भारत योजना, उदय और उज्जवल स्कीम आदि।
अगर यह क्षमता हमारे पास नही होगी तो पॉलिसी पैरालिसिस की समस्या उत्पन्न हो जाएगी।

6.योजनाओ को जमीन पर उतारने की प्रतिबध्दता है, भले ही लोगो को परेशानी हो सकती है, परन्तु यह तनिक समस्या आगे के समय और आगे की पीढ़ी के लिए सुविधा बन जाएगी, यह सोच होनी चाहिए।
- स्वच्छ भारत मिशन में लोगो को शौचालय बनवाने के लिए मजबूर किया गया, विरोध से बचने के लिए अनुदान की व्यवस्था की। लोगो के पास पानी तक कि व्यवस्था नही थी फिर भी बनवाने पड़े। नोटबन्दी में लोगो की परेशानी की कीमत पर प्रतिबद्धता दर्शाई गई।

7.मौजूद अव्यवस्थाओ को समाप्त करने या कम करने के लिए लोगो को भरोसे में लेने की क्षमता।

  • गैस सब्सिडी को खत्म करने के लिए लोगो को राजी किया कि बड़ा दिल दिखाओ और give up करो। इसी पैसे से गांवो में चूल्हे की धूणी से मुक्ति दिलाएंगे। अगर बिना give it up campaign के सब्सिडी खत्म की जाती तो पक्की बात है कि हो-हल्ला होता।
  • हालांकि भूमि अधिग्रहण बिल पर किसानों को भरोसे में नही ले सके तो उन्होंने हार मान लेने में भी कोई आनाकानी नही की।

8. किसी क्षेत्र पर फोकस करने के लिए, दूसरे क्षेत्रों को भी प्रयोग करो।
- मोदीजी का पूरा जोर इंडस्ट्रियल/मैनुफैक्चरिंग के विकास पर रहा तो हर विभाग के कामो को इंडस्ट्रियल-फ्रेंडली बना दिया।
यह सबसे बड़ी चीज है, अगर किसी को किसी विशेष क्षेत्र में कोई वादा पूरा करना हो तो उसे इसी तरीके से पूरा करना चाहिए। सारी कायनात को उसी मकसद की पूर्ति के लिए लगाना पड़ता है।

9. योजनाओ और कार्यक्रमो का प्रचार।
-मोदीजी आसान से आसान भाषा मे हर स्कीम के बारे में लोगो को किसी न किसी प्लेटफार्म के माध्यम से अवगत करा देते है। कह सकते है कि प्रधानमंत्री खुद अपनी योजनाओ के ब्रांड अम्बेसडर है।

10. तकनीकी के प्रयोग को सुशासन का जरिया बनाना चाहते है। प्रशासकों को नवीन उपायों के प्रति सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए।

मोदीजी की प्रशासक के तौर पर तारीफ की विदेशी अखबार भी कर चुके है। प्रशासनिक सुधारो के मामले में मोदीजी के प्रयास शेरशाह शूरी की याद दिला देते है, जो अपने  एक छोटे से कार्यकाल में दिल्ली सल्तनत के सारे प्रशासनिक विकासक्रमो को संगठित कर देता है। उसी प्रकार कांग्रेस के दौरान जो भी प्रशासनिक प्रगति हुई थी, मोदीजी भी उसी को संगठित और परिष्कृत कर रहे है। साथ ही उभरते भारत की जटिलताओं के लिए प्रशासनिक तैयारियों में लगे हुए है।