कोरोना संकट से निपटने के लिए पुलिस राज्य पर भरोसा कितना पर्याप्त हैं?

कभी किसी ने सोचा भी नही होगा कि मानव सभ्यता अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इस तरह असहाय नजर आएगी। अब तक केवल परमाणु हमले, खगोलीय पिंड की टक्कर और जलवायु परिवर्तन के खतरों को ही सभ्यता के विनाशकारी कारक के तौर पर देखा जा रहा था। परंतु कोरोना वायरस से उपजे संकट ने दर्शा दिया हैं कि मानव सभ्यता के सामने चुनौतियां अनिश्चित हैं, इसलिए जरुरी नही की उनके विरुद्ध प्रतिक्रिया के लिए  समाधान भी पहले से ही तैयार मिले। उनके लिए उसी समय पर तत्कालीन उपायों की जरुरत पड़ सकती हैं। कई बार सटीक उपाय मिल जाते हैं या वैकल्पिक उपायों से काम चल जाता हैं, जैसे कि-जयपुर में एक कोरोना रोगी को एड्स की दवा से ठीक कर दिया गया। लेकिन सरकारों के पास समस्या से निपटने का एक लोकप्रिय तरीका और भी हैं, और वो हैं पुलिस राज्य।

जब भारत को महसूस हो गया कि कोरोना ने दरवाजे पर शानदार तरीके से दस्तक दे दी हैं। एयरपोर्ट्स पर सतर्कता के माध्यम से, जिस तरह भारत ने इबोला और जिका जैसे वायरसों पर नियंत्रण किया था, वो रणनीति अब यहाँ पर्याप्त नही हैं। अब अंदर की तरफ सक्रीय प्रयास करने की जरुरत हैं। तब भारत ने राष्ट्रव्यापी जनता कर्फ्यू का ट्रायल किया। उसके बाद, कोरोना के संक्रमण को आगे प्रसारित होने से रोकने के लिए 25 मार्च से 21दिन के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई। इसी के साथ सभी आवागमन के साधनों को बंद कर दिया गया। उत्पादन में लगी सभी इकाइयां बंद हो गई। ऐसे समय में विशेषकर प्रवासी लोगोमे बेचैनी बढ़ गई। लोग अपने घरों को जाने के लिए उतावले नजर आए। लोगों की आवाजाही को देखते हुए, तब इसको उचित क्रियान्वयन के लिए कर्फ्यू में परिवर्तित किया गया।

इसी के साथ ही ऐसा लगने लगा कि वेलफेयर स्टेट ने हार मान ली हैं और उसकी असमर्थताओं को दूर करने के लिए राज्य ने पुलिस राज्य को अपना लिया हैं। लोगो की भयंकर पिटाई के विडियो देखकर लगने लगा कि अब तो सिर्फ पुलिस स्टेट ही कोरोना से निपटने में राज्य की मदद कर पाएगा। यही से अब हम विभिन्न पहलुओं पर विश्लेषण करेंगे :

1. कल्याणकारी राज्य की विफलता एवं पुलिस राज्य पर भरोसा

कोरोना संकट से निपटने में कल्याणकारी राज्य की विफलता से बचना आसान नही हैं, क्योंकि इस तरह के संकट से निपटने के लिए राज्यों की तैयारियों में कई प्रकार की खामियां थी, जैसे कि :
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने COVID-19 को वैश्विक महामारी घोषित किया था और सभी राज्यों को इसकी भयावहता के बारे में आगाह किया था। लेकिन सभी राज्यों ने इसकी उपेक्षा की, किसी ने भी इसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता नही समझी।
  • सरकार ने इसको क्षेत्रीय संकट मानने को तवज्जो दी और इस भरोसे में रहे कि जिस तरह जिका, इबोला जैसे संकटों से हम बच गये थे, उसी प्रकार इसको भी संभाल लेंगे।
  • स्वास्थ्य आपातकालीन परिस्थितयों को लेकर पर्याप्त तैयारीयों का अभाव हैं। एपिडेमिक एक्ट मोजूद हैं, लेकिन उन्हें जनसंख्या वृद्धि और सघन आवास, यातायात के तीव्र एवं भीड़ भाड़ युक्त साधन आदि के सन्दर्भ में अद्यतन नही किया गया हैं।
  • संकट से निपटने के लिए मानक परिचालन प्रक्रिया (SOP) का अभाव हैं।
  • स्वास्थ्य अवसंरचना अपर्याप्त और अदक्ष हैं। संसाधनों का गंभीर अभाव हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं का वितरण भी विषमतापूर्ण हैं।
  • स्वास्थ्य को आवंटित होने वाले बजट का हिस्सा जीडीपी का अति अल्प हैं।     
हालांकि ऐसा कहा जा सकता हैं कि वेलफेयर स्टेट विफल नहीं हुआ हैं बल्कि उसे कुछ चुनौतियां मिली हैं। और चुनौतियां किसी भी व्यवस्था के समक्ष आ सकती हैं, इसलिए यह नही कहा जा सकता कि वेलफेयर स्टेट विफल हो गया हैं और वह पुलिस स्टेट की शरण में चला गया हैं। हकीकत में पुलिस स्टेट वेलफेयर स्टेट की ही मदद का कार्य कर रहा हैं। अभी भी समस्या से निपटने के लिए असली भरोसा वेलफेयर स्टेट पर ही हैं, अभी भी मेडिकल सुविधाओं को ही प्राथमिकता देकर समस्या से निपटने के प्रयास किए जा रहे हैं। पुलिस स्टेट की भूमिका तो इतनी हैं कि वेलफेयर स्टेट के प्रयासों मे बाधा नही आए और उसे समस्या से निकलने के लिए ज्यादा संघर्ष नही करना पड़े।

इस बात से सहमत हुआ जा सकता हैं कि राज्य का अंतिम भरोसा अभी भी कल्याणकारी राज्य के माध्यम से संकट समाधान पर ही हैं। लेकिन सवाल वहां से उठना आरंभ हुआ, जब पुलिस की भूमिका नागरिकों के प्रति असंवेदनशील हो गई तो लोगो ने यह पूछना आरंभ कर दिया कि क्या अब संकट से बाहर पुलिस स्टेट की मदद से ही आ पाएंगे, कोरोना अब केवल लाठीचार्ज और कर्फ्यू की मदद से ही रुक पाएगा।

2. नागरिकों के साथ पुलिस का असंवेदनशील व्यवहार किस उद्देश्य की प्राप्त कर रहा हैं?

लोगों ने पहले कोरोना को लेकर जोक्स और मिम्स बनाये और लॉक डाउन की घोषणा के बाद पुलिस के हाथों हुई पिटाई के। राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू में पुलिस का व्यवहार किस प्रकार असंवेदनशील हो सकता हैं, इसको दर्शाने वाले हजारों विडियो सोशल मीडिया पर अपलोड हुए।
  1. लॉक डाउन के कारण आर्थिक गतिविधियाँ बंद हो जाने से कई प्रवासी लोग बड़े-बड़े शहरों में फंस गये, वहां से वापस निकलने के लिए उनके द्वारा अपने मूल स्थानों की तरफ लंबी और पैदल या साइकिल पर यात्रा की गई। पुलिस ने ऐसे लोगों को दोड़ाया, लेटकर, रेंगकर, पलटी मारकर चलने के लिए मजबूर किया।
  2. जरुरी सामानों को लेकर बाहर निकलने वाले लोगों पर अत्यधिक लाठीचार्ज किया गया। घर में रहने का संदेश देने के लिए एक या दो लाठी काफी थी, लेकिन एक ही जने को दस से पन्द्रह तक लाठी मारी गई। कोलकाता में एक जने की मृत्यु पुलिस के लाठीचार्ज से हुई।
  3. पुलिस द्वारा लाठी मारने के लिए सभी सीमाओं को तोडा गया। गाँव में एकेले-दोक्ले मिले लोगो को पकड़ा गया। यहाँ तक कि एक जने को घर से निकालकर तक पिटा गया। घरों और बाड़ों में छापा मारा गया।
  4. पुलिस के अतिचारों के खिलाफ हुई प्रतिक्रियाओं को पुलिस ने अपने अहम् से जोड़कर देखा और फिर अत्यधिक बल का प्रयोग करके उनको सबक सिखाने के लिए अत्यधिक जुल्म किए।
  5. पुरुष सिपाहियों द्वारा महिलाओं और बच्चों पर लाठीचार्ज किया गया। एक बारह साल के लड़के को दस-बारह लाठी मारी गई।
  6. लोगो को आजीविका के साधनों को नष्ट कर दिया गया। दिल्ली में एक सिपाही ने सब्जी की रेहड़ियों को पलट दिया।
इस तरह के अंसख्य विडियो हैं, जो आपको इन्टरनेट पर मिल जाएंगे। सवाल उठता हैं कि पुलिस आखिर किस उद्देश्य की प्राप्ति कर रही हैं। क्या उसे अपने इस लाठी चलाने के अधिकार के लिए अपने कर्तव्य पता हैं। लाठी खाने के बाद उस युवक का क्या हुआ, क्या वह मर गया या जिन्दा हैं, क्या उसके हाथ-पैर टूट गये, इस बारे में पता हैं उनको?  अगर लाठी मारने के बाद उस युवक द्वारा की गई प्रतिक्रिया से आपको क्षति पहुंचती हैं तो आप शहीद-शहीद चिल्लाना शुरू कर देते हो। दुनियाभर की सहानुभूति बंटोरने लग जाते हो। क्या आपके मन में इसी तरह की सहानुभूति पीटने वाले लोगो के प्रति भी हैं। जो राज्य की विफलता की मार खा रहे हैं। एक असंवेदनशील पेशे के लिए कितनी सहानुभूति बंटोरोगे। साथ ही यह भी हैं कि हम मुश्किल वक्त में भी तुम्हारे लिए खड़े होते हैं। इस तरह के बिना वेशभूषा के बहुत सारे पेशे हैं, जो लोगो के लिए बलिदान देते हैं और उसका ढिंढोरा नहीं पिटते। सभी पेशे दूसरों के लिए ही होते हैं। इससे उस सवाल पर प्रशं उठता हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में इतना असंतुलन क्यों हैं।

3. राज्य एवं नागरिकों के मध्य निम्नीकृत संबन्ध : मौजूदा या पूर्व-प्रचलित ? 

कुछ लोगो का मानना हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में पुलिस राज्य की तिलांजलि कभी दी ही नही गई हैं, कल्याणकारी राज्य को अपनाया तो गया हैं लेकिन उसे पुलिस राज्य को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से नही अपनाया गया हैं, उसके लिए राज्य की अपनी मजबूरियां हैं। पुलिस राज्य हमेशा की तरह बना रहा हैं। एक राज्य को हमेशा अपने नागरिकों की चुनौतियां का खतरा रहता हैं। पुलिस राज्य की संप्रभुत्ता को स्थापित करने में राज्य की आंतरिक स्तर पर मदद करती हैं, वह लोगो को उनकी अधीनता का अहसास समय-समय पर करवाती रहती हैं।

दरअसल सभी राज्यों ने अपनी प्रजा की भलाई के लिए कल्याणकारी मॉडल को अपना लिया हैं। इससे लोगों की भूमिका राज्य पर आश्रित की हो गई हैं। आश्रित लोगो को चीजे उपलब्ध करवाने में उच्च निकाय के पास हमेशा अपनी संप्रभुत्ता रहती हैं। लोगो की बगावत की संभावना हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं। अगर फिर भी गुंजाईश रहती हैं तो पुलिस के माध्यम से अपनी सुरक्षा करने में सफल रहता हैं। वैसे भी लोकतंत्र ने चुनौती की मंजिल राज्य से परिवर्तित करके राजनीतिक दलों को कर दिया हैं।

हम कह सकते हैं कि कल्याणकारी राज्य का मतलब राज्य द्वारा न तो पुलिस में कटौती से हैं और न ही उसके विस्तार को रोकने से हैं। हमारी आदत हो गई हैं कि हम दो विपरीत या प्रतिद्वंदी चीजों में से किसी स्थान विशेष पर एक की ही उपस्थिति को देखते हैं। दोनों भी साथ-साथ और एक दुसरे के पूरक के रूप में हो सकती हैं।       

इस प्रकार हम देखते हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में यह निम्नीकरण मोजुदा नही हैं, यह पूर्व में प्रचलित ही हैं। हालांकि उसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट नही होती हैं। मानव अधिकारों जैसी सीमाएं उन पर आरोपित रहती हैं।

 4. क्या यह निम्नीकरण मूल अधिकारों से संबंधित सुरक्षा उपायों का खोखलापन दर्शाता हैं? 

सड़क पर चल रहे आदमी के क्या मूल अधिकार हैं। अगर वह किसी साधन पर हैं तो पुलिस उसे किसी न किसी जुर्म में फंसा ही सकती हैं या फिर किसी भी जुर्म के शक में जितनी मर्जी हो उतने डंडे मार ही सकती हैं। डंडे मारने के लिए किसी जुर्म का होना जरुरी थोड़े ही हैं। आदमी कानून व्यवस्था को बनाए रखने में बाधक बन रहा था या फिर सहयोग नही कर रहा था, इस तरह की शब्दावली के माध्यम से पुलिस अपने गंभीर कृत्य को धक् ही देती हैं। डंडे मारना तो बहुत छोटी बात हैं, लोगो की पुलिस कस्टडी में हत्या तक हो जाती हैं। उन पर कोई प्रगति नही होती, जिनमे दोषियों को सजा मिल सके। इसलिए विशेषकर डंडे मारने के बारे में मूल अधिकारों की सीमाएं तो स्पष्ट हैं।

लेकिन कई बार हम देखते हैं कि पुलिस कार्यवाही में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती हैं या पुलिस द्वारा मानवीय गरिमा के विपरित कार्य किए जाते हैं और उनकी व्यापक आलोचना होती हैं या फिर पुलिस को ही छवि खराब होने का अंदेशा रहता हैं तो उन पर कार्यवाही होती हैं। इसलिए बात यह हैं कि आपको खुद सजग बनना होगा और मार खाने की बजाय सवाल करना होगा। वरना सुरक्षा उपायों के साथ-साथ आपका भी खोखलापन सामने आ जाएगा। 

5. अपने अधिकारों की बहाली या उत्थान के लिए, क्या  लोग आगे प्रयास करेंगे ?

जिस तरह लॉक डाउन में लोगो ने गांधीवादी तरीके से लाठी खाई हैं, उससे तो नही लगता कि लोग आगे भी इस तरह की असंवेदनशीलता के प्रति आवाज उठाएंगे। यह कोई प्रथम मौका नही हैं, ऐसी घटनाए क्षेत्रीय स्तरों पर होती रहती हैं और इस पर कोई प्रतिक्रिया नही आती हैं। दूसरी तरफ पुलिस के साथ-साथ लोगो की भी संवेदना मरती जा रही हैं, जो मार खाते लोगो के वीडियोज बना रहे हैं और उन पर जोक्स बना रहे हैं। इसलिए लोग भी खुश हैं कि हम तो बच गये, वो फंस गया, इसी में ख़ुशी हैं। इसलिए इन संबंधों में परिवर्तन के लिए प्रयास की बात असंभव सी हैं।

निष्कर्ष        

पुलिस में संवेदनशीलता के गुणों के विकास पर विशेष कार्य करने की जरुरत हैं। जरुरतमंद लोगो की मांग को पुलिस कर्मी खुद समझे, इस तरह के मूल्यों को विकसित करने की आवश्यकता हैं। इसी संकट में कुछ ऐसे पुलिस कर्मियों के भी विडियो सामने आये, जिन्होंने लोगों की मदद की और उन्हें सयंमित होकर प्यार से समझाया। लेकिन यह अपवाद न होकर सामान्य विशेषता होनी चाहिए। लॉकडाउन के आरंभिक चरण में ही पुलिस कर्मियों द्वारा अनियंत्रित पीटना दर्शाता हैं कि उनके पेशेवर मूल्यों में गंभीर खामियां हैं। यह कहने के लिए कि आपको घर से बाहर नही निकलना हैं, क्या पुलिस द्वारा तब तक पीटना चाहिए, जब तक वह आदमी उनकी पहुँच में हो। इस तरह की पिटाई तो बार-बार उल्लंघन की दशा में ही कुछ हद तक न्यायोचित ठहराई जा सकती हैं। इसलिए पुलिस में शामिल करने वाले लोगो में विवेक को भी समान रूप से महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता हैं। इसी तरह की पुलिस व्यवस्था कल्याणकारी राज्य का अंग मानी जा सकती हैं।

दूसरी बात इस संकट से निपटने में पुलिस स्टेट की भूमिका कुछ भी नही हो सकती, लोगों को घरों में खदेड़ने के अलावा। इसलिए कल्याणकारी राज्य को ही अपनी खामियों पर विचार करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से दूर करना चाहिए ।

गुर्जर आरक्षण आंदोलन : ट्विस्ट एंड टर्न्स की कहानी

malarana dungar gurjar aarakshan aandolan
गुर्जर आंदोलन सँघर्ष
(पीलूपुरा से पीलू किनारे तक) :

लोकसभा चुनावों से कुछ दिनों पहले गुर्जरों ने अपने अधिकार की मांग को लेकर 9 दिनों तक रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया। यह जाम मलारना डूंगर क्षेत्र में लगाया गया था। जहाँ से गुजर रही बनास नदी के चारों ओर कुछ गृर्जर बाहुल्य गांव स्थित है। इन क्षेत्रों में पीलू के पेड़ बहुतायत में पाए जाते है। 2008 में गुर्जरों ने जिस जगह पर जाम लगाया था उसका नाम पीलूपुरा था। अब इन दो जामो में पीलू शब्द गृर्जर इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान लेगा।

जब पीलूपुरा में जाम लगाया गया था तब लोगो ने गुर्जरों के भोलेपन पर बनने वाले चुटकलों में एक ओर इजाफा कर लिया था। लोग कहने लगे कि आरक्षण कोई पटरी के नीचे थोड़ी रखा है जो पटरी उखड़ते हो। लेकिन अब मलारना में मिली सफलता के बाद खुद बैंसला ने गर्व से कहा है कि पटरी पर आरक्षण मांगा था और वो पटरी पर ही मिला। हालांकि  इस आंदोलन की कहानी कई तरह के ट्विस्ट और टर्न से भरी हुई थी -

पृष्ठभूमि :
(अनुसूचित जनजाति की मांग को त्यागना और उम्मीद का भाजपा से कांग्रेस की और खिसकना )
इस आंदोलन की शुरुआत अनुसूचित जनजाति में शामिल होने को लेकर हुई थी।  मीना समाज ने इसे अतिक्रमण के तौर पर देखा। जिससे दोनों समाज एक दूसरे के आमने सामने आ गए थे और दोनो के बीच मे जमीनी सँघर्ष हुआ। जिन गांवों से लोग आंदोलन के लिए बाहर गए थे, उन गांवो में दूसरे समाज के लोगो ने पहुचकर महिलाओ के सम्मान को क्षति पहुचाई। इस मामले में दोनो ही समाज दूध के धुले नही है। इन व्यथा कथाओं को पीड़ित लोग ही जानते है। दोनो समाजो के बीच नफरत हिन्दू मुस्लिम जैसी होती गई। उसके तुरंत बाद हुए चुनावो में राजनीतिक दलों ने कई जगहों पर मीना बनाम गृर्जर के बीच मुकाबले करवाये। जिससे यह नफरत आगे तक बढ़ती। लेकिन चुनावो में बैंसला की नमोनारायण मीना से हार हो गई। और उन्होंने भांप लिया कि भाजपा दो समाजो के धुर्वीकरण में गृर्जर समाज के अंदर अपना वोट बैंक बनाना चाहती है। तो उनका रुझान कांग्रेस की तरफ बढ़ता चला गया।

मीना प्रतिरोध की वजह से उन्होंने ST की मांग छोड़कर अलग से 5 प्रतिशत आरक्षण की मांग शुरू कर दी। अब अगली राजनीति इस बिंदु के इर्दगिर्द घूमने लगी। जैसी ही सरकारो ने आरक्षण दिया , वह 50 प्रतिशत की सीमा को तोड़ने की वजह से हाइकोर्ट में जाकर अटक गया। तब उन्हें 1 प्रतिशत आरक्षण ही दिया। जब गुर्जरों की मांग पूरी करना अव्यवहारिक लगने लगा तो भाजपा ने गुर्जरों के बजाय मीनाओ से नजदीकी बनाना शुरू किया। यहां तक कि उनके कांग्रेस परस्त लोगो को भी टिकट दे दिए।

वही दूसरी तरफ 2014 के चुनावों के बाद सचिन पायलट ने कांग्रेस का नेतृत्व सम्भाला। तो भाजपा से आरक्षण की बात पर खपा चल रहे नेता अपने समाज के नेता पर ही भरोसा करने लगे। गुर्जर समाज ने पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के तो पायलट ने गुर्जरो को आरक्षण दिलाने के सपने दिखाए। कांग्रेस ने इस वाडे को अपने घोषणा पत्र का हिस्सा बना लिया तो गुर्जरो ने उस पर भरोसा किया और कांग्रेस के पक्ष में  अंधाधुंध वोट दिए। नतीजतन 2018 में कांग्रेस की सरकार भी बन गई।

एक बात और उसी समय केंद्र सरकार ने आर्थिक पिछडो को दस प्रतिशत आरक्षण के लिए संविधान संसोधन करके गुर्जरो को पांच प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ़ कर दिया था। इस बार कोई कारण नही बनता था कि गुर्जरों की मांग को खारिज कर दिया जाता। क्योंकि बिना आंदोलन किए ही जनरल को दस प्रतिशत आरक्षण दे दिया गया था। जबकि गुर्जरों ने एक लंबा सँघर्ष किया था। उनके 73 लोग शहीद भी हुए थे।

अब बात आती है कांग्रेस के वादे को पूरा करने की। जब गुर्जरो को पता है कि खुद उनके समाज का नेता सरकार में शीर्ष पर बैठा है तो फिर उस पर भरोसा करते, अभी सरकार बने 2 महिने ही तो हुए हैं। इतनी क्या जल्दी थी कि ज्यादा इंतजार ही नहीं किया। वही कांग्रेस ने इसे घोषणापत्र में शामिल कर रखा था और मंशा भी साफ़ थी , फिर एक समयबध्द आश्वाशन क्या नहीं दिया।

आंदोलन को जानबूझकर होने दिया गया। ऐसा लग रहा था जानो यह कांग्रेस की साजिश हो। जो यह सोचती है कि इतनी बड़ी चीज अगर शांति से ही दे दी तो किसी को क्या पता चलेगा, लोकसभा चुनाव आ रहे है इसलिए थोड़ा बहुत हो हल्ला तो होना चाहिए। वही बैंसला भी यही मान रहे थे कि अगर शांति से ही मिल गया तो जो पिछला लम्बा संघर्ष किया है, वह अर्थहीन हो जाएगा। इसलिए ऐसा लगना चाहिए कि हमे दिया गया नहीं है बल्कि हमने लिया है। इसी जिद में 7 फरवरी को गुर्जरो ने मलारना डूंगर में रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया।


प्रशासन की भूमिका :
आंदोलन कारियो के साथ जरूरत से ज्यादा उदारता बरती गई। अगर प्रशासन चाहता तो देश को 9 दिनों के ट्रैन बंदी से मुक्ति दिला सकता था। एक तो पहले दिन ही ट्रेन रोकने जाने वाले लोगो की संख्या एक बारात में जाने वाले लोगो से ज्यादा नही थी। उल्टा प्रशासन ने एक दिन पहले शांतिपूर्ण सभा करने की बात तक अपनी हिदायत सीमित रखी थी। उसके बाद जयपुर ट्रैक भी जाम होने दिया। राज्य सरकार को तो जैसे कोई परवाह ही नही थी। वही केंद्र भी लोकसभा चुनावों को देखते हुए चुप रहा।

प्रशासन बेहद ढिलाई से पेश आ रहा था। उसने रोकने के लिए, हटाने के लिए कोई गम्भीरता नही दिखाई। यह जांच का विषय होना चाहिए कि क्या ऐसा ऊपर के निर्देशों के कारण था। लोगो की परेशानी पर मानवाधिकार आयोग की कठोर चिट्ठी का सम्प्रेषण भी प्रशासन ने बहुत ही उदारतापूर्ण किया।

इस जाम के दौरान लोग यकायक फंस गए, जिन्हें अपने गंतव्यों तक पहुचने के लिए परेशानी उठानी पड़ी। कई छात्रों की परीक्षाए छूट गई। कई लोगो को जरूरी काम के लिए परिवहन वालो की मनमर्जी का शिकार होना पड़ा। रेलवे को लगभग 2 करोड़ रुपए तो आरक्षित टिकटो के ही वापस करने पड़े। राजस्व हानि हुई वो अलग है।

आंदोलन की प्रकृति :
इसके बाद भी गुर्जर कहते है कि यह आंदोलन अहिंसक था। क्या अहिंसा का पैमाना केवल खून का बहना ही है, लोगो की योजनाओं और गतिविधियों को खत्म कर देना अहिंसा नही है। अहिंसा का आवरण ओढ़ने के लिए बैंसला आंदोलन स्थल पर गांधीजी की किताब पढ़ रहे थे। लेकिन इस तरह के पाखंड वाले आंदोलन को गांधी जी की ढाल नही मिल सकती।
इसके बावजूद भी गुर्जरों ने अपने किए पर औपचारिकता भर के लिए गम्भीर खेद नही व्यक्त किया। गृर्जरो का रवैया राजस्थानियत से बिल्कुल उलट था। सरकार की तरफ से वार्ता के लिए आने वाले अफसरों से बहुत ही अभिमान पूर्ण तरीके से बात की। जिसे नीरज के पवन जैसे अफसर ने अनदेखा कर अपने कर्तव्य पर ध्यान दिया।
वार्ता प्रक्रियाओ को जान बूझकर गुर्जरों ने लंबा खींचा। वार्ता के दौरान आवागमन के बाधित होने से लोगो को होने वाली परेशानियों से बेफिक्र होकर बात कर रहे थे।

वही आंदोलन स्थल का माहौल किसी मेले से कम नही था। रात में रुकने के लिए टैंट, रजाई गद्दों की व्यवस्था थी। गुर्जर भी भाई चारे के नाम पर आसपास के गांवो से लोग दूध और आटे-सब्जियों की व्यवस्था कर दे रहे थे। इन सब के लिए पैसा किधर से आ रहा था, ये सब सन्देह के विषय है। रोजना की शाम सुबह बढ़िया मिठाई या अन्य लजीज व्यंजनों की रसोई रहती थी। दिन में महिला पुरुषो के रसिया और डांस के कार्यक्रम होते थे। पुरानी कथाओं के चटकारे भी उड़ते थे। दुसरो को परेशान कर मनोरंजन में लिप्त आंदोलन का यह तरीका निराला था। शायद ही कोई लेखक इसका बचाव करे।

पीलूपुरा के सबक :
2008 में इनके द्वारा की गई परेशानियों को देखते हुए हाइकोर्ट ने दिशानिर्देश दिए थे। जिनकी अवमानना पर सुनवाई चल रही है। इसके अलावा नए मुकदमो का क्या होगा, यह भी देखना है क्या सरकार उन्हें वापस ले लेगी।


इससे सबक लेते हुए बैंसला ने आंदोलनकारियों को शपथ दिलाई कि वे हिंसा का सहारा नही लेंगे। और तो और बच्चों को परेशान नही करेंगे।

गुर्जर नेतृत्व की भूमिका :
आंदोलन में गुर्जरों की आंतरिक राजनीति की भी झलक मिलती है। बैंसला ने पहले आंदोलन को ढाल बनाकर राजनीति में असफल पारी खेली थी। कई गुर्जर नेता इसमे उसी का प्रसार देख रहे थे। बैंसला खुद को मसीहा के तौर पर दिखाना चाहता था, जिसमे वो कामयाब रहा है। इसमे मदद मिली सचिन पायलट से। अब इन दो के अलावा बाकी किसी का योगदान होगा तो वो नेपथ्य में चला जायेगा।

इसके असर कुछ इस तरह होंगे-
राजस्थान की राजनीती में गुर्जरो का कद बढ़ेगा। जो समाज अब तक हाशिए पर चल रहा था वो अब मुख्यधारा में आ जाएगा। दिल्ली और अन्य क्षेत्रो के गुर्जर भी अपने राजनितिक कॅरिअर  के लिए राजस्थान की और रुख करेंगे।  हो सकता है गुर्जरो के उत्पात से तंग आकर दूसरे समाज भी प्रत्युत्तर में संगठित होने लगे। 

निष्कर्ष :
शायद अब आरक्षण की वजह से शिक्षा और रोजगारो का स्तर बढ़ेगा और वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को भली भांति समझेंगे। और एक जिम्मेदार नागरिक बनेंगे।
जिस आरक्षण के लिए इन्होंने इतना सँघर्ष किया है। अब इन्हें उसके अवसरों की तरफ टूट पड़ना चाहिए ताकि गांवो के गरीब गुर्जरों के सामाजिक आर्थिक जीवन मे बदलाव आए।
आगे पता नही क्या होगा। लेकिन सरकार ने सकारात्मक संकेत दिए है। परंतु गुर्जरों ने पटरी चालू करके सही काम किया क्योंकि इसे अभी वही से दिल्ली भी पहुँचाना है। इन सबके बीच कई तरह की राजनीतियो की गुंजाइश है, हो सकता है गुर्जरों का सँघर्ष अभी बकाया हो। मतलब twist and turns के मौके अभी भी है।

इतिहास के साथ हमारी असुविधा

भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है जिसका एक विस्तृत इतिहास रहा है। इन इतिहास के पन्नो में तमाम उतार-चढ़ाव भरे पड़े है, इनमे जीत और हार, सम्मान और अपमान, वीरता और कायरता के असंख्य उदाहरण भरे पड़े है। इन उदाहरणो के माध्यम से कुछ लोग आज भी गर्व महसूस करते है और अपनी महिमा का बखान करते है। वही कई उदाहरणो के द्वारा कुछ लोग शर्मिंदगी महसूस करते है और वे नही चाहते कि किसी भी कहानी, फ़िल्म, किताब या अन्य माध्यमों के द्वारा वे यादे ताजा हो। एक तरीके से ये लोग इतिहास को अपनी सुविधा के अनुकूल नही मानते है।

भारतीय इतिहास का मूल्यांकन करे तो इसमे सुविधाओं और असुविधाओं के तमाम उदाहरण भरे पड़े है। सुविधाओं के तौर पर हम जीत, सम्मान, वीरता के किस्से याद करते है। जैसे महाराणा प्रताप ने अकबर के आगे जीवनपर्यंत समर्पण नही किया तो इस बात से राजपूत गर्व महसूस करते है और अपनी वीरता को सबके सामने रखते है। मराठा भी शिवाजी के कौशल का बखान करने में सुविधा महसूस करते है। मुस्लिम भी मूक रूप से इस बात में गर्व करते है कि उन्होंने इस देश पर लंबे समय तक शासन किया था। इसके अलावा तमाम धर्मो और जातियों के लोग भी कई आयामो पर सुविधा देखते है, जैसे सिक्खों, जाटो ने औरंगजेब का प्रतिकार किया।

लेकिन समस्या इतिहास से जुड़ी हुई असुविधाओं को लेकर है। जिनके कारण सम्बंधित वर्ग का आदमी सार्वजनिक विमर्शों में आत्मविश्वास को कमजोर महसूस करता है।कोई भी दूसरे वर्ग का आदमी उनको इतिहास याद दिलाकर अपमानित कर देता है। उनकी भूमिका को भी वे लोग हल्के में ले लेते है जिनका कोई दागरहित या समृद्ध इतिहास रहा होता है। उदाहरण के लिए - मुगलों के साथ वैवाहिक गठबंधन की नीति के कारण राजपूत अब असुविधा महसूस करते है। उनकी महिलाओं पर आधारित अब कोई भी रचनाये उनकी भावनाओं को दुख पहुचाती है।
यहां पर समय-समय पर बाहरी तत्वों का आगमन होता रहा जिन्होंने स्थानीय तत्वों का दमन किया। विदेशियों के द्वारा आक्रमण किया गया, लुटपाट मचाई गई, संसाधनों का दोहन किया गया और स्त्रियों के सम्मान को क्षति पहुचाई गई। ये सब ज्यादतियां विदेशियों द्वारा ही नही की गई अपितु स्थानीय स्तर पर भी हुई।एक वर्ग के लोगो द्वारा दूसरे वर्ग के लोगो को उत्पीड़ित किया गया, दूसरे क्षेत्र के लोगो का दमन किया गया और वहां के संसाधनों का दोहन किया गया। प्राचीन काल मे ग्रीक और मध्य एशिया की लड़ाकू जनजातियों ने, मध्य काल मे अरब व तुर्को द्वारा तथा आधुनिक काल मे अंग्रेजों द्वारा स्थानीय तत्वों के सम्मान को क्षति पहुचाई। वही स्थानीय शासको द्वारा भी आदिवासियों व दलितों के साथ अत्याचार किया गया, मुस्लिम शासकों के काल में हिन्दू कुलीन भी प्रताड़ित किए गए। ब्रिटिश काल मे सभी भारतीयों को नस्लीय आधार पर अपमानित और वंचित किया गया। ये सब मोटे-मोटे उदाहरण है जिनके आधार पर हम ऐतिहासिक किताबो और फिल्मो को देखते हुए असुविधा महसूस करते है।

इन असुविधाओं के स्वरूप को हम और ढंग से समझ सकते है---

  1. प्राचीन काल मे दलितों व आदिवासियों का उच्च वर्गो के द्वारा शोषण किया गया। अब प्राचीन काल का इतिहास पढ़ेंगे तो दलितों के मन मे यह बात बैठेगी ही कि हमारा भूतकाल अगरिमामय रहा है।
  2. मध्य काल मे मुस्लिम शासकों के अधीन हिन्दू जनता की भावनाओ को तवज्जों नही मिली और कई जगह अपमानजनक समझौते भी करने पड़े। इस काल के इतिहास को लेकर मुस्लिम और हिन्दू दोनो असुविधा महसूस करते है। मुस्लिम यह कह नही सकते कि फलां मुस्लिम शासक हमारा आदर्श है, अगर ऐसा किया तो बहुसंख्यक लोगो के सामने उनकी निष्ठा तक पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। हिन्दू इसलिए असुविधाग्रस्त है कि उनके पास इस काल के बुरे अनुभव है, उनके राजवंशो को खत्म किया गया, स्त्रियों के सम्मान को चोट पहुचाई गयी, औरतो को जोहर करना पड़ा, उन्हें जबरदस्ती हरमो में डाल दिया गया।
  3. ब्रिटिश काल मे भारतीयों को नस्लीय आधार पर वंचित और अपमानित किया गया था। लेकिन इन सब को भारतीयों ने राष्टवादी आंदोलन का जरिया बना लिया। इसलिए यहां का इतिहास भारत से ज्यादा ब्रिटिश को असुविधा ग्रस्त करता है क्योंकि उनके आधुनिक मूल्य खोखले साबित होते है।


राजनीतिक असुविधा सम्बन्धित उदाहरण
टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ो का जीवनपर्यंत विरोध किया और उन्हें खदेड़ने की सोची, इसलिए कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने उसकी जयंती मनाई। वही भाजपा ने उसे हिन्दू विरोधी बताते हुए इसका विरोध किया। एक तरीके से यह भाजपा की असुविधा को दर्शा रहा है। बंगाल में टीटू मीर की अंग्रेज़ो के खिलाप बगावत की कहानी की पाठ्यक्रम में जगह देने को भी भाजपा ने इसी आधार पर विरोध किया। भाजपा की एक और सबसे बड़ी असुविधा इस तथ्य को लेकर है कि स्वतन्त्रता संग्राम में इनका कोई योगदान नही है।

मुस्लिम, दलितों, आदिवासी सभी को कुछ न कुछ आश्वासन देकर कांग्रेस ने इन सबकी असुविधाओ को भुना लिया । अब भाजपा ने भी इन असुविधाओ को भुनाने के लिए स्वतंत्रता के बाद के इतिहास को पकड़ा है। इन्होंने कहा है कि नेहरू के कारण अन्य नेताओ की उपेक्षा कर दी गयी, जैसे कि- सरदार पटेल, अम्बेडकर, सुभाष चन्द्र बोस आदि। फिर इन्होंने उन सबको अपने खेमे में पकड़ लिया। इसके अलावा अपनी धर्मनिरपेक्ष अंधता के कारण हिन्दुओ की भावनाओं की हुई अनदेखी को भी कांग्रेस की गलती माना है। यहां से कांग्रेस को असुविधा हुई है। हाल में इंदु सरकार को लेकर कांग्रेस का विरोध भी इंदिरा गांधी के काल की असुविधाओ को लेकर था। इस कारण दोनों पार्टियां इतिहास के प्रति संवेदनशील हो गयी है।


असुविधाओं का असर

  1. राजनीतिक तौर पर ऐतिहासिक असुविधाओ की संवेदनशीलता अधिक होती है। दरअसल चुनाव उम्मीदवार की प्रतिष्ठा के नाम पर लड़े जाते है जिसमे उसके अतीत को भी शामिल किया हुआ होता है। ऐसे में कोई भी उम्मीदवार या दल नही चाहता कि कोई भी फ़िल्म, गाना, किताब व नाटक उसके अतीत की याद दिलाकर उनकी छवि को न्यून करके दिखाए। इन्हें रोकने के लिए भावनाओ को ठेस पहुचाने का आरोप लगाकर अभिव्यक्ति की आज़ादी तक को सीमित कर दिया जाता है। यही कारण था कि पद्मावती पर बनने वाली फिल्म के विरोध में पूरे राजपूत नेता खड़े हो गए,  भाजपा ने भी इन्हें समर्थन दिया।
  2.  कई वर्ग अपनी ऐतिहासिक असुविधाओं से बचने के लिए इतिहास की ही दोबारा व्याख्या पर जोर दे रहे है। कई राज्यों की सरकारों ने इतिहास के पाठ्यक्रमो में बदलाव किया है। वे इतिहास की मनमर्जी से व्याख्या करके खुद को सुविधा में रख रहे है। जैसे कहा जा रहा है कि दलितों की खराब दशा प्राचीन काल मे न होकर मुस्लिम शासकों के समय हुई है। यह नया तथ्य उच्च वर्गों के प्रभुत्व वाली भाजपा के फायदे के अनुकूल है। इस प्रकार अन्य तथ्यों को भी विभिन्न वर्ग अपने फायदे के अनुकूल पुनर्परिभाषित कर रहे है।
  3. इन असुविधाओ का फायदा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा भी उठाया जा रहा है। पहले वे  ऐतिहासिक कमजोरिया पर बनने वाली फिल्मों, किताबो को वित्तीय समर्थन प्रदान करते है। इसके बाद जब स्थानीय वर्गो का अपनी चीजो के प्रति विश्वास कम हो जाता है, तब वे अपने उत्पादों को श्रेष्ठ विकल्पों के तौर पर लेकर आ जाते है। 

आगे क्या किया जाना चाहिए ?
हमने देखा कि इतिहास से जुड़ी हुई असुविधाएं एक तरफ तो भावनाओ को ठेस पहुचाती है, वही उनके कलात्मक प्रदर्शन का विरोध रचनात्मक कला के सृजन को तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकता है। ऐसे में हमारे सामने निम्न विकल्प है-

  1. अगर हम भावनाओ को ठेस पहुंचाने के आधार पर असुविधाओं से सम्बंधित रचनात्मक कार्यो को रोकेंगे तो कोई भी ऐतिहासिक फ़िल्म बन ही नही पायेगी। मान लो राजपूतो की हार की कहानियों से उनकी भावनाओं को ठेस पहुचती है लेकिन उन्होंने जो वीरता हासिल की है वह भी तो जनजातीय और दलितों के उत्पीड़न पर आधारित है। कहने का मतलब है कि एक वर्ग के लिए सकारात्मक चीज दुसरो के लिए नकारात्मक है।ऐसे में जरूरी है कि हम इतिहास के बुरे प्रसंगों को सभी के लिए बुरे अनुभव माने। इस प्रकार की मानसिकता का निर्माण जरूरी है।
  2. फिल्मो की फंडिंग में पारदर्शिता को बढ़ावा दिया जाए । हो सकता है कोई बाहरी तत्व जान बूझकर ही असुविधाओ को भड़का रहा हो या हीन साबित कर रहा हो।
  3. राजनेताओं को भी इतिहास सम्बन्धित छेड़छाड़ करने से बचना चाहिए। अनावश्यक पाठ्यक्रम में बदलाव से बचे।


निष्कर्ष
असुविधाओ को हमे व्यक्तिगत तौर पर ज्यादा नही लेना चाहिए क्योंकि हमें कई बार उस काल की परिस्थितियों का पता नही होता है। हो सकता है उस काल मे उन चीजों में कोई गलत रहा ही नही हो। जैसे वैवाहिक गठबंधन राजपूतो में ही नही विदेशो में भी खूब प्रचलन में था।
और अच्छा-बुरा कुछ नही होता, इतिहास इसी का नाम होता है। कोई भी काल कभी भी ऐसा नही होता जो सभी की सुविधाओं के अनुकूल हो। इसलिए असुविधा को इतिहास में नही राजनीति में तलाशा जाना चाहिए

कट्टरता का स्त्रोत - धार्मिक दर्शन या राजनीति ?

दुनिया ऐसी  बावरी कि         पत्थर पूजन जाये। 
घर की चकिया कोई न पूजे जेही का पीसा खाये। । 
कंकर-पत्थर जोड़   कर लई मस्जिद        बनाए। 
ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय । । 

भक्ति आंदोलन के निर्गुणपंथी संत कबीर की यह पंक्ति तो आपने सुनी ही होगी।जिसमे वे मूर्तिपूजा का विरोध कर रहे हैं , इसमें आगे वे मुस्लिमो के अजान को लेकर भी सवाल उठाते हैं । 


हम जानते हैं की कबीर धार्मिक आडंबरों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानो दोनों पर जमकर कटाक्ष किये थे। उनसे तत्कालीन दिल्ली सुल्तान सिकंदर लोदी तो इतना चिढ गया था की उसकी हत्या करने  तक के आदेश दे दिए, और इसके लिए हर संभव प्रयास किये।
दरअसल भक्ति आंदोलन ऐसा काल था जिसमे संतो ने धर्म के वास्तविक अर्थ को पुन: परिभाषित किया। इन्होने मानव और ईश्वर के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्धो की बात की , जो की भक्ति पर आधारित थे। उसमे एकाग्र निष्ठा पर बल दिया था जो बढ़ते-बढ़ते गहन प्रेम तक पहुचती थी। दूसरी तरफ परम्परागत , कठोर और निरर्थक कर्मकांडो का विरोध किया जो की समाज में घुल चुके थे। इनका मानना था की किताबी ज्ञान और साधु जीवन मोक्ष का आधार नही हो सकता।
भक्ति आंदोलन के समकालीन सूफी आंदोलन ने भी इस्लाम को हिंसा और कट्टरता से हटकर पहचान दी थी।नानक ने भी उसी दौरान जातियों और रूढ़ियों से रहित धर्म की शिक्षा दी थी और फलस्वरूप सिक्ख धर्म अस्तित्व में आया था। 

इस प्रकार हम यूँ कह सकते हैं की इन आंदोलनों ने धर्म को दर्शन के रूप में देखा था , ना की उपासना पद्धतियों में। जिससे धार्मिक सामंजस्य कायम होने का रास्ता तैयार हुआ क्यूंकि दूसरे धर्मो के प्रति एक समझ विकसित हुई थी। अकबर के पोते दारा शिकोह ने कुरान और उपनिषदों का अध्यन किया और अपनी पुस्तक "मज्म-अल-बहरैन" में लिखा की हिन्दू और मुसलमान दोनों जुड़वाँ भाई हैं और दोनों के दर्शनों में केवल शाब्दिक अंतर हैं। 

हमने भक्ति आंदोलन के माध्यम से जाना की जैसे ही हिन्दू , इस्लाम  के संपर्क में आया तो एकेश्वरवाद ,समानता ,भाईचारा जैसे गुणों से प्रभावित हुआ और इनके आधार पर  मूर्तिपूजा, जातिप्रथा, सामाजिक भेदभाव  के खिलाफ भक्ति संतो ने आवाज उठाई। इसी प्रकार अंग्रेजो के आगमन पर लोकतंत्र, मानव अधिकार , महिला अधिकार, अन्धविश्वास जैसे गुणों से प्रभावित हुआ। इस प्रकार हिन्दू धर्म ने हमेशा अपने में बदलावों के साथ खुद को ढालने की परवर्ती दिखाई और फिर नए रूप के साथ अवतरित होता गया। 
इसी प्रकार इस्लाम भारत में आया तो वह भी हिन्दू धर्म से प्रभावित हुआ। सूफी आंदोलन ने इस्लाम की अनोखी छवि प्रदान की जिसने इस्लाम का मानवतावादी और आध्यात्मिक पहलु उजागर किया। जिसके फलस्वरूप इन्होने धार्मिक सामंजस्य की बात को स्वीकार किया। और बादशाह अकबर ने माना था की 
"सभी धर्मो में कुछ ना कुछ सत्य हैं ,ना केवल इस्लाम में"। 
हम यूँ कह सकते हैं की एक दौर था जिसमे दोनों धर्मो ने एक दूसरे के धर्मो  का अध्यन किया और उसके बाद जो धारणा निकली उसे शाह अब्बास के पत्रो में निम्न शब्दों में व्यक्त किया गया हैं-  
"किसी भी व्यक्ति को लोगो की धार्मिक भावना में हस्तक्षेप नही करना चाहिए क्यूंकि जानबूझकर कोई भी गलत धर्म स्वीकार नही करता हैं "

यहाँ धर्म का आशय दर्शन से था जो भक्ति पर आधारित था। भक्ति का मतलब निष्ठा से होता हैं  सन्यासी बनने या फिर कर्मकांड से नही। 

कट्टरता की तरफ बढ़ना 

दोनों धर्मो के बीच भक्ति काल में  सामंजस्य कायम हुआ, जो अकबर के काल में चरम पर पहुंचा। अकबर द्वारा अपने गयी उदार धार्मिक प्रवृतियों से मुस्लिम रूढ़िवादी नाराज हो गए। उनका मानना था की अकबर द्वारा अपने गयी उदार नीतियों के कारण इस्लाम की पवित्रता प्रदूषित हुई हैं जिसके कारण मुस्लिमो का राजनैतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक पतन हुआ हैं। 
दरअसल अकबर ने धार्मिक सामंजस्य के लिए किया जो शायद ही अब कोई करेगा। इस काल में हिन्दुओ को ना केवल काफ़िर के दर्जे से हटाकर समानता का दर्जा दिया ,अपितु व्यवहार में भी सामंजस्य लाने की कोशिस की। उसने हिन्दुओ पर से जजिया नामक कर हटा लिया , उन्हें उच्च पदो पर नियुक्ति दी, कई हिन्दू त्यौहार और प्रथाओ को अपनाया, यहां तक की दरबार में तिलक लगाकर बैठ जाता था। इसके विपरीत इमामो का प्रभाव ख़त्म कर खुद को इस्लामिक कानूनो का सर्वोच्च निर्णायक घोषित कर दिया। अकबर की धार्मिक सामंजस्य की नीति मौलवियो को भड़काने के लिए पर्याप्त थी। उन्होंने अकबर के धार्मिक प्रयोगो पर जरा भी ध्यान नही दिया। 
शाहजहाँ का असली उत्त्तराधिकारी युवराज दारा शिकोह, अकबर की धार्मिक नीति का अनुसरण कर रहा था।  अब यह बात रूढ़िवादियों को हरगिज हजम नही हो सकती थी उत्तराधिकार के युद्ध में  इन्होने  औरंगज़ेब का साथ दिया ,जिसमे वह विजयी रहा और इस्लाम की उदार वाख्या के लिए दारा शिकोह को मृत्युदंड दिया गया। 
औरंगज़ेब कट्टर सुन्नी रूढ़िवादी था ,उसने सिक्को पर कलमा लिखवाना बंद करवा दिया क्यूंकि वो काफिरो के हाथ में पड़कर अपवित्र हो जाता था।मथुरा और वाराणसी के  हिन्दू मंदिरो को गिराया गया और मस्जिदे बनवाई गयी , हिन्दुओ पर जजिया, तीर्थ यात्रा कर, चुंगी कर लगा दिए , सरकारी पदो से हटा दिया , संस्कृत पाठशाला बंद करवा दिए ,इस्लाम ग्रहण करने के लिए लालच दिया, युद्ध बंदियों का धर्मांतरण करवा दिया, दिवाली पर बाजारों में रौशनी नही कर सकते थे और सड़को पर होली नही खेल सकते थे। ये सब औरंगज़ेब की करतुते थी , इनको हिन्दू कैसे भूल सकते थे। बदला नही ले सकते तो वैर तो पाल ही सकते हैं। 
जब ज्यादतियां घाव बन चुकी हो तो वे कैसे आदमी को  सोने दे सकती हैं। इसी परिपेक्ष्य में हम बाबरी मस्जिद विध्वंश को समझ सकते हैं, जो मंदिर को तोड़कर बनाया गया था और उसके जगह पर बनी मस्जिद उनके जख्मो को हरा करती थी। इसी दौरान ऐसे नारे लगे थे की "अभी अयोध्या की बारी है , काशी मथुरा बाकी हैं "  
इस तरह औरंगज़ेब ने हिन्दू कट्टरपंथियों के उदय का आधार छोड़ा था । औरंगज़ेब के बाद मुग़ल साम्राज्य का पतन हो गया और एक लम्बा समय राजनितिक अस्थिरता में बिता जब तक की अंग्रेजो ने पुरे भारत को काबू में नही कर लिया  

आधुनिक कट्टरता की नीव
आधुनिक कट्टरता की नीव अंग्रेजो ने डाली। १८५७ के विद्रोह में उन्होंने देखा था की हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ लड़े थे और विद्रोह को चिंगारी भी धार्मिक भावनाओ के कारण ही मिली थी। अंग्रेजो को भारत की कमजोरी की नब्ज मिल चुकी थी। इसके बाद उन्होंने भारतीयों की राजनितिक मांगो की उपेक्षा की ,परन्तु धार्मिक मांगो को हमेशा गंभीरता से लिया। 
१८५७ के विद्रोह को उन्होंने अपना राज पुन: पाने के लिए मुस्लिमो के षड्यंत्र के रूप में देखा था, और उनका निर्ममता से दमन किया। अकेले दिल्ली में ही अट्ठाइश हजार मुसलमानो को क्रांति के बाद फांसी पर लटका दिया , अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह के दो बेटो को नंगा करके गोली मारी गयी। जबकि हिन्दुओ को शिक्षा, सरकारी पदो में प्रोत्साहन दिया। शिक्षा के कारण हिन्दुओ ने जागरूकता हासिल की और उपनिवेशिक सरकार के नुकसानों के खिलाप आवाज उठाई। अब अंग्रेजो को मुसलमानो की याद आई। और कांग्रेस को हिन्दुओ की संस्था करार देकर मुस्लिमो के लिए अलग से संगठन बनवाया ,मुस्लिम लीग,जिसे बाद में जिन्ना ने  नेतृत्व प्रदान करके विभाजन रूपी परिणाम तक पहुँचाया।
मुस्लिम लीग को अंग्रेजो ने स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करने के लिए आगे बढ़ाया। उनके तुष्टिकरण के लिए साम्प्रदायिक निर्वाचन क्षेत्रो का प्रावधान किया।  आगे इनकी मांग बढ़ती गयी, इक़बाल ने इलाहबाद में  मुस्लिम राज्य की बात की जो लाहौर प्रस्ताव से अलग देश में बदल गयी। 

कांग्रेस को लीग ने हमेशा ब्लैकमेल किया , कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग की उम्मीद से लखनऊ पैक्ट में साम्प्रदायिक निर्वाचन को स्वीकार किया , खिलाफत आंदोलन में भाग लिया  और हमेशा सहयोग की उम्मीद रखी। पर राष्ट्रभक्ति जिन्ना के डीएनए में ही नही थी वह मरते दम तक सौदेबाजी करता रहा। 
जब मुस्लिम लीग का रवैया स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग नही करने, उसमे बाधा डालने, उसे धार्मिक रंग देने का बन गया। तो आरएसएस का उदय हुआ , जिसने इनकी मांगो का सीधा विरोध किया। हालांकि इन हिन्दू रूढ़िवादियों को भी अंग्रेजो ने  स्वतंत्रता आंदोलन में बाधक तत्व के रूप में देखकर आगे बढ़ाया था, पर इनका रुख देश को तोड़ने की अंग्रेजी राज की साजिशो के विरोध के रूप में ही रहा। इन्होने साम्प्रदायिक निर्वाचन, दलितों के लिए अलग क्षेत्रो का विरोध किया। और बिभाजन से पहले के दशक में इन्होने मुस्लिम लीग का जबरदस्त विरोध किया ,परन्तु मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों ने अपनी राजनीति के आगे देशहित को बलि चढ़ा दिया और देश का रक्तरंजित विभाजन हो हुआ ।  

विभाजन 
देश आजाद हुआ साथ में विभाजन, दो देश बने जो कुछ समय बाद तीन हो गए। परन्तु यह वाकया   सवाल छोड़ गया की - देश का विभाजन किस आधार पर हुआ ?
पाकिस्तान में यह सिद्धांत काफी प्रचलित हैं की देश का विभाजन  दो कौमी नजरिया (2 Nation Theory) के तहत हुआ हैं। मतलब विभाजन का आधार धर्म रहा। यह बात उसको कश्मीर पर अपना पक्ष रखने में मजबूत बनाती हैं। साथ ही पाकिस्तान में घटती हिन्दुओ की आबादी को भी इसी सिद्धांत से न्यायोचित ठहराता हैं। परन्तु बांग्लादेश का बनना और बलोचिस्तान में चल रहा संघर्ष उसके इस दावे को कठघरे में खड़ा करता हैं। दूसरी तरफ भारत का धर्मनिरपेक्ष होना भी पाकिस्तान के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाता हैं। 

परन्तु दो कौमी नजरिया भारत स्वीकार नही करता , भारत का मानना हैं की अंग्रेजो ने  फुट डालो राज करो की नीति के तहत जिन्ना की मांग को ऐसी परिस्थिति में पहुंचा दिया, जिसने आखिर में व्यापक तौर पर लोगो के व्यक्तिगत टकराव की जमीन तैयार  कर दी। जिन्ना को कांग्रेस ने साइड लाइन करने  की भरपूर कोशिस की लेकिन अंग्रेजो ने उसे बराबर लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ से पीछे लोटना असंभव था ,अंत  में उसने जिहाद की घोषणा की और डायरेक्ट एक्शन डे के नाम पर १६ अगस्त को बंगाल जैसी जगहों पर हाजरो लोग मरे। उन दंगो के और बढ़ने की आशंका थी , इसी आशंका में कांग्रेस ने विभाजन की बात मान ली।  

बाद में पाकिस्तान और बांग्लादेश ने अपने आपको  इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर दिया, जिससे हिन्दुओ की आकांक्षाओं को सीमित कर दिया गया जबकि भारत ने अपने आपको पंथ-निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया और मुसलमानो को भी समान अवसर प्रदान किये।  
विभाजन और अधिकारों की व्यवस्था ने यह अहसास करवाया की विभाजन हिन्दुओ के साथ एक धोखा था। मुसलमानो को तीन देश मिल गए जबकि हिन्दुओ  को किसी  भी देश में स्वायत्तता नही मिली , पाकिस्तान और बांग्लादेश तो हिन्दुओ के लिए नरक समान हैं  परन्तु भारत में भी उनकी स्वायत्तता की सीमित कर दिया गया। भारत में वे गर्व से हिन्दू नही कह सकते, क्यूंकि साम्प्रदायिक होने का सर्टिफिकेट जो मिल जाएगा। अपने आध्यात्मिक चीजो पर दावा नही कर सकते, क्यूंकि राम के जन्म और राम सेतु के सबूत अदालत में पेश करने पड़ते हैं , राम मंदिर नही बना सकते ,हिन्दू संस्कृति का पोषण नही कर सकते। इन सब बातो ने उनमे कट्टरपंथिता का उदय किया। 

इसके अलावा धर्मनिरपेक्षता ने भी हिन्दुओ को निराश  किया क्यूंकि यह तुष्टिकरण का रूप ले चूका हैं , जिसे हिन्दू , छदम-इस्लाम (Pseudo-Islam) मानने लगे हैं। 

निष्कर्ष 

अत: हम कह सकते  हैं की कट्टरता राजनीति के कारण आती हैं और पोषित होती हैं। यह कार्य प्रतिक्रियावादी तत्वों द्वारा संपन्न होता हैं। इसलिए इसका समाधान भी तभी हो सकता हैं जब धर्म को राजनीति से पृथक कर दिया जाए।