कोरोना संकट से निपटने के लिए पुलिस राज्य पर भरोसा कितना पर्याप्त हैं?

कभी किसी ने सोचा भी नही होगा कि मानव सभ्यता अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इस तरह असहाय नजर आएगी। अब तक केवल परमाणु हमले, खगोलीय पिंड की टक्कर और जलवायु परिवर्तन के खतरों को ही सभ्यता के विनाशकारी कारक के तौर पर देखा जा रहा था। परंतु कोरोना वायरस से उपजे संकट ने दर्शा दिया हैं कि मानव सभ्यता के सामने चुनौतियां अनिश्चित हैं, इसलिए जरुरी नही की उनके विरुद्ध प्रतिक्रिया के लिए  समाधान भी पहले से ही तैयार मिले। उनके लिए उसी समय पर तत्कालीन उपायों की जरुरत पड़ सकती हैं। कई बार सटीक उपाय मिल जाते हैं या वैकल्पिक उपायों से काम चल जाता हैं, जैसे कि-जयपुर में एक कोरोना रोगी को एड्स की दवा से ठीक कर दिया गया। लेकिन सरकारों के पास समस्या से निपटने का एक लोकप्रिय तरीका और भी हैं, और वो हैं पुलिस राज्य।

जब भारत को महसूस हो गया कि कोरोना ने दरवाजे पर शानदार तरीके से दस्तक दे दी हैं। एयरपोर्ट्स पर सतर्कता के माध्यम से, जिस तरह भारत ने इबोला और जिका जैसे वायरसों पर नियंत्रण किया था, वो रणनीति अब यहाँ पर्याप्त नही हैं। अब अंदर की तरफ सक्रीय प्रयास करने की जरुरत हैं। तब भारत ने राष्ट्रव्यापी जनता कर्फ्यू का ट्रायल किया। उसके बाद, कोरोना के संक्रमण को आगे प्रसारित होने से रोकने के लिए 25 मार्च से 21दिन के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई। इसी के साथ सभी आवागमन के साधनों को बंद कर दिया गया। उत्पादन में लगी सभी इकाइयां बंद हो गई। ऐसे समय में विशेषकर प्रवासी लोगोमे बेचैनी बढ़ गई। लोग अपने घरों को जाने के लिए उतावले नजर आए। लोगों की आवाजाही को देखते हुए, तब इसको उचित क्रियान्वयन के लिए कर्फ्यू में परिवर्तित किया गया।

इसी के साथ ही ऐसा लगने लगा कि वेलफेयर स्टेट ने हार मान ली हैं और उसकी असमर्थताओं को दूर करने के लिए राज्य ने पुलिस राज्य को अपना लिया हैं। लोगो की भयंकर पिटाई के विडियो देखकर लगने लगा कि अब तो सिर्फ पुलिस स्टेट ही कोरोना से निपटने में राज्य की मदद कर पाएगा। यही से अब हम विभिन्न पहलुओं पर विश्लेषण करेंगे :

1. कल्याणकारी राज्य की विफलता एवं पुलिस राज्य पर भरोसा

कोरोना संकट से निपटने में कल्याणकारी राज्य की विफलता से बचना आसान नही हैं, क्योंकि इस तरह के संकट से निपटने के लिए राज्यों की तैयारियों में कई प्रकार की खामियां थी, जैसे कि :
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने COVID-19 को वैश्विक महामारी घोषित किया था और सभी राज्यों को इसकी भयावहता के बारे में आगाह किया था। लेकिन सभी राज्यों ने इसकी उपेक्षा की, किसी ने भी इसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता नही समझी।
  • सरकार ने इसको क्षेत्रीय संकट मानने को तवज्जो दी और इस भरोसे में रहे कि जिस तरह जिका, इबोला जैसे संकटों से हम बच गये थे, उसी प्रकार इसको भी संभाल लेंगे।
  • स्वास्थ्य आपातकालीन परिस्थितयों को लेकर पर्याप्त तैयारीयों का अभाव हैं। एपिडेमिक एक्ट मोजूद हैं, लेकिन उन्हें जनसंख्या वृद्धि और सघन आवास, यातायात के तीव्र एवं भीड़ भाड़ युक्त साधन आदि के सन्दर्भ में अद्यतन नही किया गया हैं।
  • संकट से निपटने के लिए मानक परिचालन प्रक्रिया (SOP) का अभाव हैं।
  • स्वास्थ्य अवसंरचना अपर्याप्त और अदक्ष हैं। संसाधनों का गंभीर अभाव हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं का वितरण भी विषमतापूर्ण हैं।
  • स्वास्थ्य को आवंटित होने वाले बजट का हिस्सा जीडीपी का अति अल्प हैं।     
हालांकि ऐसा कहा जा सकता हैं कि वेलफेयर स्टेट विफल नहीं हुआ हैं बल्कि उसे कुछ चुनौतियां मिली हैं। और चुनौतियां किसी भी व्यवस्था के समक्ष आ सकती हैं, इसलिए यह नही कहा जा सकता कि वेलफेयर स्टेट विफल हो गया हैं और वह पुलिस स्टेट की शरण में चला गया हैं। हकीकत में पुलिस स्टेट वेलफेयर स्टेट की ही मदद का कार्य कर रहा हैं। अभी भी समस्या से निपटने के लिए असली भरोसा वेलफेयर स्टेट पर ही हैं, अभी भी मेडिकल सुविधाओं को ही प्राथमिकता देकर समस्या से निपटने के प्रयास किए जा रहे हैं। पुलिस स्टेट की भूमिका तो इतनी हैं कि वेलफेयर स्टेट के प्रयासों मे बाधा नही आए और उसे समस्या से निकलने के लिए ज्यादा संघर्ष नही करना पड़े।

इस बात से सहमत हुआ जा सकता हैं कि राज्य का अंतिम भरोसा अभी भी कल्याणकारी राज्य के माध्यम से संकट समाधान पर ही हैं। लेकिन सवाल वहां से उठना आरंभ हुआ, जब पुलिस की भूमिका नागरिकों के प्रति असंवेदनशील हो गई तो लोगो ने यह पूछना आरंभ कर दिया कि क्या अब संकट से बाहर पुलिस स्टेट की मदद से ही आ पाएंगे, कोरोना अब केवल लाठीचार्ज और कर्फ्यू की मदद से ही रुक पाएगा।

2. नागरिकों के साथ पुलिस का असंवेदनशील व्यवहार किस उद्देश्य की प्राप्त कर रहा हैं?

लोगों ने पहले कोरोना को लेकर जोक्स और मिम्स बनाये और लॉक डाउन की घोषणा के बाद पुलिस के हाथों हुई पिटाई के। राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू में पुलिस का व्यवहार किस प्रकार असंवेदनशील हो सकता हैं, इसको दर्शाने वाले हजारों विडियो सोशल मीडिया पर अपलोड हुए।
  1. लॉक डाउन के कारण आर्थिक गतिविधियाँ बंद हो जाने से कई प्रवासी लोग बड़े-बड़े शहरों में फंस गये, वहां से वापस निकलने के लिए उनके द्वारा अपने मूल स्थानों की तरफ लंबी और पैदल या साइकिल पर यात्रा की गई। पुलिस ने ऐसे लोगों को दोड़ाया, लेटकर, रेंगकर, पलटी मारकर चलने के लिए मजबूर किया।
  2. जरुरी सामानों को लेकर बाहर निकलने वाले लोगों पर अत्यधिक लाठीचार्ज किया गया। घर में रहने का संदेश देने के लिए एक या दो लाठी काफी थी, लेकिन एक ही जने को दस से पन्द्रह तक लाठी मारी गई। कोलकाता में एक जने की मृत्यु पुलिस के लाठीचार्ज से हुई।
  3. पुलिस द्वारा लाठी मारने के लिए सभी सीमाओं को तोडा गया। गाँव में एकेले-दोक्ले मिले लोगो को पकड़ा गया। यहाँ तक कि एक जने को घर से निकालकर तक पिटा गया। घरों और बाड़ों में छापा मारा गया।
  4. पुलिस के अतिचारों के खिलाफ हुई प्रतिक्रियाओं को पुलिस ने अपने अहम् से जोड़कर देखा और फिर अत्यधिक बल का प्रयोग करके उनको सबक सिखाने के लिए अत्यधिक जुल्म किए।
  5. पुरुष सिपाहियों द्वारा महिलाओं और बच्चों पर लाठीचार्ज किया गया। एक बारह साल के लड़के को दस-बारह लाठी मारी गई।
  6. लोगो को आजीविका के साधनों को नष्ट कर दिया गया। दिल्ली में एक सिपाही ने सब्जी की रेहड़ियों को पलट दिया।
इस तरह के अंसख्य विडियो हैं, जो आपको इन्टरनेट पर मिल जाएंगे। सवाल उठता हैं कि पुलिस आखिर किस उद्देश्य की प्राप्ति कर रही हैं। क्या उसे अपने इस लाठी चलाने के अधिकार के लिए अपने कर्तव्य पता हैं। लाठी खाने के बाद उस युवक का क्या हुआ, क्या वह मर गया या जिन्दा हैं, क्या उसके हाथ-पैर टूट गये, इस बारे में पता हैं उनको?  अगर लाठी मारने के बाद उस युवक द्वारा की गई प्रतिक्रिया से आपको क्षति पहुंचती हैं तो आप शहीद-शहीद चिल्लाना शुरू कर देते हो। दुनियाभर की सहानुभूति बंटोरने लग जाते हो। क्या आपके मन में इसी तरह की सहानुभूति पीटने वाले लोगो के प्रति भी हैं। जो राज्य की विफलता की मार खा रहे हैं। एक असंवेदनशील पेशे के लिए कितनी सहानुभूति बंटोरोगे। साथ ही यह भी हैं कि हम मुश्किल वक्त में भी तुम्हारे लिए खड़े होते हैं। इस तरह के बिना वेशभूषा के बहुत सारे पेशे हैं, जो लोगो के लिए बलिदान देते हैं और उसका ढिंढोरा नहीं पिटते। सभी पेशे दूसरों के लिए ही होते हैं। इससे उस सवाल पर प्रशं उठता हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में इतना असंतुलन क्यों हैं।

3. राज्य एवं नागरिकों के मध्य निम्नीकृत संबन्ध : मौजूदा या पूर्व-प्रचलित ? 

कुछ लोगो का मानना हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में पुलिस राज्य की तिलांजलि कभी दी ही नही गई हैं, कल्याणकारी राज्य को अपनाया तो गया हैं लेकिन उसे पुलिस राज्य को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से नही अपनाया गया हैं, उसके लिए राज्य की अपनी मजबूरियां हैं। पुलिस राज्य हमेशा की तरह बना रहा हैं। एक राज्य को हमेशा अपने नागरिकों की चुनौतियां का खतरा रहता हैं। पुलिस राज्य की संप्रभुत्ता को स्थापित करने में राज्य की आंतरिक स्तर पर मदद करती हैं, वह लोगो को उनकी अधीनता का अहसास समय-समय पर करवाती रहती हैं।

दरअसल सभी राज्यों ने अपनी प्रजा की भलाई के लिए कल्याणकारी मॉडल को अपना लिया हैं। इससे लोगों की भूमिका राज्य पर आश्रित की हो गई हैं। आश्रित लोगो को चीजे उपलब्ध करवाने में उच्च निकाय के पास हमेशा अपनी संप्रभुत्ता रहती हैं। लोगो की बगावत की संभावना हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं। अगर फिर भी गुंजाईश रहती हैं तो पुलिस के माध्यम से अपनी सुरक्षा करने में सफल रहता हैं। वैसे भी लोकतंत्र ने चुनौती की मंजिल राज्य से परिवर्तित करके राजनीतिक दलों को कर दिया हैं।

हम कह सकते हैं कि कल्याणकारी राज्य का मतलब राज्य द्वारा न तो पुलिस में कटौती से हैं और न ही उसके विस्तार को रोकने से हैं। हमारी आदत हो गई हैं कि हम दो विपरीत या प्रतिद्वंदी चीजों में से किसी स्थान विशेष पर एक की ही उपस्थिति को देखते हैं। दोनों भी साथ-साथ और एक दुसरे के पूरक के रूप में हो सकती हैं।       

इस प्रकार हम देखते हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में यह निम्नीकरण मोजुदा नही हैं, यह पूर्व में प्रचलित ही हैं। हालांकि उसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट नही होती हैं। मानव अधिकारों जैसी सीमाएं उन पर आरोपित रहती हैं।

 4. क्या यह निम्नीकरण मूल अधिकारों से संबंधित सुरक्षा उपायों का खोखलापन दर्शाता हैं? 

सड़क पर चल रहे आदमी के क्या मूल अधिकार हैं। अगर वह किसी साधन पर हैं तो पुलिस उसे किसी न किसी जुर्म में फंसा ही सकती हैं या फिर किसी भी जुर्म के शक में जितनी मर्जी हो उतने डंडे मार ही सकती हैं। डंडे मारने के लिए किसी जुर्म का होना जरुरी थोड़े ही हैं। आदमी कानून व्यवस्था को बनाए रखने में बाधक बन रहा था या फिर सहयोग नही कर रहा था, इस तरह की शब्दावली के माध्यम से पुलिस अपने गंभीर कृत्य को धक् ही देती हैं। डंडे मारना तो बहुत छोटी बात हैं, लोगो की पुलिस कस्टडी में हत्या तक हो जाती हैं। उन पर कोई प्रगति नही होती, जिनमे दोषियों को सजा मिल सके। इसलिए विशेषकर डंडे मारने के बारे में मूल अधिकारों की सीमाएं तो स्पष्ट हैं।

लेकिन कई बार हम देखते हैं कि पुलिस कार्यवाही में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती हैं या पुलिस द्वारा मानवीय गरिमा के विपरित कार्य किए जाते हैं और उनकी व्यापक आलोचना होती हैं या फिर पुलिस को ही छवि खराब होने का अंदेशा रहता हैं तो उन पर कार्यवाही होती हैं। इसलिए बात यह हैं कि आपको खुद सजग बनना होगा और मार खाने की बजाय सवाल करना होगा। वरना सुरक्षा उपायों के साथ-साथ आपका भी खोखलापन सामने आ जाएगा। 

5. अपने अधिकारों की बहाली या उत्थान के लिए, क्या  लोग आगे प्रयास करेंगे ?

जिस तरह लॉक डाउन में लोगो ने गांधीवादी तरीके से लाठी खाई हैं, उससे तो नही लगता कि लोग आगे भी इस तरह की असंवेदनशीलता के प्रति आवाज उठाएंगे। यह कोई प्रथम मौका नही हैं, ऐसी घटनाए क्षेत्रीय स्तरों पर होती रहती हैं और इस पर कोई प्रतिक्रिया नही आती हैं। दूसरी तरफ पुलिस के साथ-साथ लोगो की भी संवेदना मरती जा रही हैं, जो मार खाते लोगो के वीडियोज बना रहे हैं और उन पर जोक्स बना रहे हैं। इसलिए लोग भी खुश हैं कि हम तो बच गये, वो फंस गया, इसी में ख़ुशी हैं। इसलिए इन संबंधों में परिवर्तन के लिए प्रयास की बात असंभव सी हैं।

निष्कर्ष        

पुलिस में संवेदनशीलता के गुणों के विकास पर विशेष कार्य करने की जरुरत हैं। जरुरतमंद लोगो की मांग को पुलिस कर्मी खुद समझे, इस तरह के मूल्यों को विकसित करने की आवश्यकता हैं। इसी संकट में कुछ ऐसे पुलिस कर्मियों के भी विडियो सामने आये, जिन्होंने लोगों की मदद की और उन्हें सयंमित होकर प्यार से समझाया। लेकिन यह अपवाद न होकर सामान्य विशेषता होनी चाहिए। लॉकडाउन के आरंभिक चरण में ही पुलिस कर्मियों द्वारा अनियंत्रित पीटना दर्शाता हैं कि उनके पेशेवर मूल्यों में गंभीर खामियां हैं। यह कहने के लिए कि आपको घर से बाहर नही निकलना हैं, क्या पुलिस द्वारा तब तक पीटना चाहिए, जब तक वह आदमी उनकी पहुँच में हो। इस तरह की पिटाई तो बार-बार उल्लंघन की दशा में ही कुछ हद तक न्यायोचित ठहराई जा सकती हैं। इसलिए पुलिस में शामिल करने वाले लोगो में विवेक को भी समान रूप से महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता हैं। इसी तरह की पुलिस व्यवस्था कल्याणकारी राज्य का अंग मानी जा सकती हैं।

दूसरी बात इस संकट से निपटने में पुलिस स्टेट की भूमिका कुछ भी नही हो सकती, लोगों को घरों में खदेड़ने के अलावा। इसलिए कल्याणकारी राज्य को ही अपनी खामियों पर विचार करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से दूर करना चाहिए ।

क्या राजस्थान तेलंगाना-करण से निपटने के लिए तैयार है?

राजस्थान के नक़्शे में विभिन्न केंद्रीय और राज्य स्तर के संस्थानों के वितरण पर गौर किया जाए तो हमे एक उच्च स्तर की विषमता नजर आएगी। राजस्थान के पश्चिमी भाग में अधिकतर संस्थानों का जमावड़ा मिलेगा। ऐसे में अभी कुछ साल पहले ही राज्य बने तेलंगाना की याद आती है। आंध्रप्रदेश की राजधानी सहित तमाम उच्च संस्थान हैदराबाद जैसे शहरो में थे जो कि तेलंगाना में रह गए। हालाँकि दस सालो के लिए हैदराबाद को सयुंक्त राजधानी के तौर पर स्वीकार कर लिया गया। लेकिन   विभाजन के बाद आंध्र प्रदेश को जो हिस्सा प्राप्त हुआ उसमे प्रशासनिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विकास से जुड़े सभी संस्थानों को फिर से बनाना होगा। एक तरीके से हम कह सकते है कि नए राज्य के रूप में भले ही दुनिया तेलंगाना को देखती हो, लेकिन हकीकत में तो नया राज्य आंध्रप्रदेश ही बना है। जैसे ही तेलंगाना राज्य का निर्माण हुआ तो राजस्थान के पश्चिमी भाग में मरू प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने की मांग शुरू हो गई। ऐसे में यह प्रश्न प्रासंगिक हो जाता है कि क्या राजस्थान भी तेलंगाना-करण की तरफ बढ़ रहा है। 

 ऐसे में यह सवाल अहम् हो गए है कि क्या पश्चिमी राजस्थान इतने सारे संस्थानों को प्राप्त करके बगावत कर देगा। तथा इस बगावत को रोजगार, आर्थिक विकास जैसे पिछड़ेपन के आधार पर उसी तरीके से न्यायोचित ठहराएगा, जिस तरीके से तेलंगाना ने ठहराया था।

कुल मिलकर राजस्थान के तेलंगाना करण का सिद्धांत इस डर पर आधारित है कि अगर किसी भी वजह से राजस्थान का विभाजन हो गया तो अधिकतर संस्थान पश्चिमी भाग में रह जाएंगे। तथा पूर्वी भाग में उनको फिर से निर्मित करने के लिए भारी निवेश करना होगा। जिस वजह से उस काल में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता उत्पन्न हो जायेगी, जैसा की आंध्रप्रदेश में हुआ है। वहां तेलुगु देशम पार्टी को जब नए राज्य के लिए केंद्र से पर्याप्त सहयोग नहीं मिला तो वे सत्तारूढ़ गठबंधन से बाहर निकल गए। हालांकि केंद्र सरकार राज्य को स्पेशल पैकेज दे रही थी तो टीडीपी नेता स्पेशल राज्य के दर्जे पर अड़ गए, ताकि लोगो की जन भावना को आगामी चुनावो में उत्तेजित कर सके। लेकिन विपक्षी दल ने राजधानी के चक्कर में बाकी जनता की उपेक्षा को मुद्दा बनाते हुए सत्ता हासिल कर ली। इस प्रकार विभाजन ने राजनितिक अस्थिरता को जन्म दिया।

राजस्थान को तेलंगाना-करण की तरफ ले जाने वाले कारक 
राजस्थान के तेलंगाना करण की हमारी आशंका को निम्न कारक बल देते है। इन्हे हम सूचीबद्ध कर रहे है -
  1. राजस्थान के पश्चिमी भाग में संस्थानों के जमावड़े की बात वास्तविकता है, यह कोई दुर्भावना पर आधारित नहीं है। बीकानेर, बाड़मेर , जोधपुर, नागौर जैसे क्षेत्रो में बहुत सारे संस्थान स्थित है। इसलिए यह दोतरफा अलगाववाद को बढ़ावा देता है। जिनके पास संस्थान है वे बाकी राजस्थानियों की तुलना में उनके अधिक प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त करेंगे। जबकि जिनके पास नहीं है उनके मन में भी सयुंक्त राजस्थान की भावना कमजोर होगी। 
  2. पश्चिमी भाग में पृथक राज्य बनाने की मांग का वास्तविक रूप से अस्तित्व में होना। मरू प्रदेश के नाम से कई ब्लॉग, लोगो और अन्य सामग्री इंटरनेट पर आपको मिल जायेगी। मरू प्रदेश की मांग करने वाले कई संगठन सक्रिय है। कई संगठनों के बैनर तले भूख हड़ताल हो चुकी है। उच्च नेतृत्व से अपनी पृथक राज्य की भावना के बारे में अवगत करा दिया गया है। इंटरनेट पर इस पृथक राज्य के बारे में कई अन्य सामग्री भी मौजूद है।
  3. पश्चिम राजस्थान के पास मरुस्थलीय भूभाग के कारण कमजोर आर्थिक विकास का बहाना होना। जबकि आर्थिक विकास के स्तर में सभी भागो की निम्न स्थिति होना। तेलंगाना ने भी समुद्री जुड़ाव नहीं होने और आंतरिक भूभाग की समस्याओ तथा कृषिगत समस्याओ को मुद्दा बनाया था। लेकिन राज्य की मांग करते समय ऐसी बाते उठा देना। 
  4. राजस्थान में सत्ता को आधार मानकर प्रयास करने वाले दो क्षेत्रीय दलों के प्रयास विफल हो चुके है। २०१३ के चुनाव में पूर्वी राजस्थान में राजपा और २०१८ के चुनाव में पश्चिमी राजस्थान में रालोसपा के प्रयास को सफलता नहीं मिल पाई थी। ऐसे में कोई भी क्षेत्रीय दल यह सोचकर लोगो की भावना को भड़का सकता है कि हो सकता है अगर राज्य छोटा होता तो हम शायद सत्ता पर पहुंच सकते थे। 
क्या राजस्थान के तेलंगाना कारण की अवधारणा वास्तविकता से परे अतिशयोक्तीपूर्ण कल्पना है ?
हालांकि हमने देखा की राजस्थान की विभाजन के लिए कई आकर्षक कारक रहे है। फिर भी निम्न कारण दर्शाते है कि यह सही नहीं है। 
  1. १. भारत में केवल राजस्थान ही ऐसा राज्य है जो विभिन्न रियासतो के सयोंजन से बना है। अन्य राज्य किसी ने किसी राज्य से पृथक हुए है। इसलिए ऐसा राज्य टूट नहीं सकता। 
  2. २. पश्चिमी भूभाग में अर्थव्यवस्था का इतना सुदृढ़ नहीं होना कि वह पृथक राज्य की बात भी सोच सके। 

प्रशासक के तौर पर मोदीजी से क्या सीखे

वैसे तो एक प्रशासक राजनीतिक रूप से निष्पक्ष होता है और उसके पास अनुभव और ज्ञान ही इतना होता है कि वह पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सोच सकता है और वह इसी तरीके से कार्य करता भी है। उसके लिए सभी दल एक जैसे होते है और वह किसी भी दल या समूह के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ नही होता है। वही प्रधानमंत्री मोदीजी राजनीतिक कौशल में तो महारत रखते ही है  लेकिन प्रशासक के तौर पर अपने कामकाज को इस तरह से अंजाम दिया है कि वे भविष्य के अफसरों के लिए कुछ पदचिन्ह छोड़ जाते है।
उनके कार्य करने की शैली अनूठी है जिसे हम निम्न बिन्दुओ के माध्यम से समझ सकते है-



1. खुद की कमियों के बजाय खुद की क्षमताओं पर भरोसा

  • खुद की भाषा, संस्कृति पर गौरव की भावना होनी चाहिए, न कि शर्म और हो सके तो उन्हें दूसरे लोगो मे भी विस्तारित करना चाहिए। मोदीजी ने विदेशी मंचो पर भी हिंदी का धड़ल्ले से प्रयोग किया, भारतीय वेशभूषा को अपनाया, योग के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करवाया।
  • कभी भी नकारात्मक राजनीति को नही अपनाना चाहिए। जब 2014 के चुनाव हो रहे थे तो केजरीवाल ने यह फैलाया की देश तो बिकने वाला है, कुछ दिनों बाद आपको देश नही मिलेगा। ऐसा कहकर निराशा फैलाने की कोशिश की। मोदीजी ने उसी समय कहा कि देश विकास कर रहा है और बहुत जल्दी अच्छे दिन आने वाले है। लोगों को आशा पसन्द आयी।

2. सही समय का इंतजार करो, धैर्य रखो तब तक।

  • अगर आप कुछ बड़ा करना चाहते हो तो बीच मे हो-हल्ला मत करो, सही समय का इंतजार करो। वरना ईर्ष्या, द्वेष वाले लोग तुम्हे हतोत्साहित करेंगे और तुम उनसे निपटने में ही अपनी ऊर्जा गवां दोगे। यह भी हो सकता है फिर लोग आप जो करना चाहते  है वहाँ से पहले ही रोक दे।
  • टी.एन. शेषन ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त बनने पर सुधारो को सख्ती से लागू किया था। उससे पहले तो सभी नेता उसे सीधा-साधा अफसर ही मानते थे। और नेताओं को पता लग जाता कि यह इतना कड़क अफसर निकलेगा तो वे उसे कभी चुनाव आयुक्त नही बनाते।

3. अपनी खुद की प्राथमिकताओ के लिए काम करो, चाहे कोई नाराज हो या फिर विरोध करे।
-मोदीजी ने कई प्रोजेक्ट अपनी मर्जी से निर्धारित किए, विपक्षी दलों ने खूब आलोचना की, लेकिन उन पर कोई फर्क नही पड़ा। उन्होंने अधिकतर प्रोजेक्ट में गुजरात को फायदा पहुचाया। इसलिए अपने प्राधिकार का प्रयोग अपने लोगो को उठाने के लिए जरूर करो। वरना कल को लोग कहेंगे कि खुद तो अफसर बन गया लेकिन भाई तो गांव में ही घूम रहे है।

4. लोगो से जुड़ने की क्षमता।

  • लोगो से बात करने के अधिकतम प्रयास किये जाने चाहिए। ध्यान रहे केवल सकारात्मक वार्तालापों का ही हिस्सा बने, डिबेट में कभी नही उलझना चाहिए (bcoz debates exchange negative energy)। मन की बात इसी तरह का प्रयास है।
  • मोदीजी मे उच्च स्तर की भावनात्मक बुद्धिमत्ता है। उनमें किसी भी आदमी से बात करने की क्षमता है, वे बच्चों से बच्चों की तरह, युवाओ से युवाओ की तरह, अन्य लोगों से भी उनकी जगह पर खुद को मानकर बात करना।
  • विपक्षियों से भी सकारात्मक तरीके से बात करना, उनसे समर्थन और सुझाव मांगना, चाय पे आमंत्रित करना आदि।मतलब औपचारिक शिष्टाचार कायम रखना चाहिए, विरोध के बावजूद भी।

5. बुनियादी समस्याओ को पहचान करने की क्षमता है कि आखिरकार गड़बड़ क्या है और उसे सही कैसे किया जा सकता है।
यह क्षमता गवर्नेन्स में बहुत ही ज्यादा मायने रखती है, इनसे हम योजनाबध्द तरीके से आगे बढ़ सकते है, जैसे कि स्वच्छ भारत योजना, उदय और उज्जवल स्कीम आदि।
अगर यह क्षमता हमारे पास नही होगी तो पॉलिसी पैरालिसिस की समस्या उत्पन्न हो जाएगी।

6.योजनाओ को जमीन पर उतारने की प्रतिबध्दता है, भले ही लोगो को परेशानी हो सकती है, परन्तु यह तनिक समस्या आगे के समय और आगे की पीढ़ी के लिए सुविधा बन जाएगी, यह सोच होनी चाहिए।
- स्वच्छ भारत मिशन में लोगो को शौचालय बनवाने के लिए मजबूर किया गया, विरोध से बचने के लिए अनुदान की व्यवस्था की। लोगो के पास पानी तक कि व्यवस्था नही थी फिर भी बनवाने पड़े। नोटबन्दी में लोगो की परेशानी की कीमत पर प्रतिबद्धता दर्शाई गई।

7.मौजूद अव्यवस्थाओ को समाप्त करने या कम करने के लिए लोगो को भरोसे में लेने की क्षमता।

  • गैस सब्सिडी को खत्म करने के लिए लोगो को राजी किया कि बड़ा दिल दिखाओ और give up करो। इसी पैसे से गांवो में चूल्हे की धूणी से मुक्ति दिलाएंगे। अगर बिना give it up campaign के सब्सिडी खत्म की जाती तो पक्की बात है कि हो-हल्ला होता।
  • हालांकि भूमि अधिग्रहण बिल पर किसानों को भरोसे में नही ले सके तो उन्होंने हार मान लेने में भी कोई आनाकानी नही की।

8. किसी क्षेत्र पर फोकस करने के लिए, दूसरे क्षेत्रों को भी प्रयोग करो।
- मोदीजी का पूरा जोर इंडस्ट्रियल/मैनुफैक्चरिंग के विकास पर रहा तो हर विभाग के कामो को इंडस्ट्रियल-फ्रेंडली बना दिया।
यह सबसे बड़ी चीज है, अगर किसी को किसी विशेष क्षेत्र में कोई वादा पूरा करना हो तो उसे इसी तरीके से पूरा करना चाहिए। सारी कायनात को उसी मकसद की पूर्ति के लिए लगाना पड़ता है।

9. योजनाओ और कार्यक्रमो का प्रचार।
-मोदीजी आसान से आसान भाषा मे हर स्कीम के बारे में लोगो को किसी न किसी प्लेटफार्म के माध्यम से अवगत करा देते है। कह सकते है कि प्रधानमंत्री खुद अपनी योजनाओ के ब्रांड अम्बेसडर है।

10. तकनीकी के प्रयोग को सुशासन का जरिया बनाना चाहते है। प्रशासकों को नवीन उपायों के प्रति सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए।

मोदीजी की प्रशासक के तौर पर तारीफ की विदेशी अखबार भी कर चुके है। प्रशासनिक सुधारो के मामले में मोदीजी के प्रयास शेरशाह शूरी की याद दिला देते है, जो अपने  एक छोटे से कार्यकाल में दिल्ली सल्तनत के सारे प्रशासनिक विकासक्रमो को संगठित कर देता है। उसी प्रकार कांग्रेस के दौरान जो भी प्रशासनिक प्रगति हुई थी, मोदीजी भी उसी को संगठित और परिष्कृत कर रहे है। साथ ही उभरते भारत की जटिलताओं के लिए प्रशासनिक तैयारियों में लगे हुए है।