जलवायु परिवर्तन के वैश्विक एजेंडे में कोरोना संकट जनित व्यवधान

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ शुरू हुई उपनिवेशों की आजादी ने वैश्विक राजनीति के मंच को नव-स्वतंत्र, विकासशील देशों के लिए भी खोल दिया। द्विध्रुवी विश्व की राजनीति खत्म होने के बाद पश्चिमी देश मुद्दाविहीन होते चले गये तो इन्ह्ने जोर-शोर से जलवायु परिवर्तन का अजेंडा चलाया। जिसके संकट को इन्होने अतिशयोक्तिपूर्ण तरीके से व्यक्त करना शुरू कर दिया था।

वर्ष 1991 में एक तो नव-उदारवाद की शुरुआत हुई, वही अगले साल वर्ष 1992 में पृथ्वी सम्मेलन ने पर्यावरणीय राजनीति की शुरुआत की। तब से वैश्विक राजनीति इन्ही के इर्दगिर्द घूम रही हैं। क्योटो और पेरिस जैसे समझौतों ने लगभग सभी देशों को इस राजनीति का हितधारक बना दिया। लेकिन वर्ष 2020 में आकर कोरोना संकट ने पुरे वैश्विक परिदृश्य को बदल करके रख दिया। इसने बिलकुल ही अलग प्रकार की वैश्विक व्यवस्था को जन्म दिया, जिसमे सभी पीड़ित देश किसी एक जिम्मेदार की खोज करने में विफल हैं। सभी देश दीर्घकालीन अनिश्चित संकट का सामना करने के बजाय वर्तमान में मौजूद निश्चित संकट का समाधान खोजने के लिए प्रयासरत हैं। लेकिन दोनों ही मामलों में भय और उपाय जैसी सामान्य विशेषताएँ दृष्टिगोचर की जा सकती हैं। 

इस समय पर देखा जाए तो हम कह सकते हैं कि कोरोना संकट ने जलवायु परिवर्तन को पछाड़ दिया हैं। इस कथन को कहने के लिए हमारे पास कई तर्क मौजूद हैं -

  • दीर्घकालीन संकट के ऊपर वर्तमान संकट को प्राथमिकता : इस समय पर जलवायु परिवर्तन से ज्यादा शोर कोरोना संकट का हैं। यदि, जलवायु परिवर्तन की कीमत पर भी कोई उपाय इस समस्या से छुटकारा दिला सकता हैं तो दुनिया उसे अपनाना पसंद करेगी। इससे पता चलता हैं कि कम से कम इस समय पर तो जलवायु परिवर्तन का मुद्दा द्वितीयक हैं।
  • कोरोना संकट में जलवायु परिवर्तन का संकट कम हुआ हैं : जलवायु परिवर्तन का एजेंडा इस समय इसलिए भी प्राथमिकता में नही हैं क्योंकि इस महामारी की रोकथाम के लिए लगाए गये लॉकडाउन के कारण प्रदूषण के स्तर में अभूतपूर्व कमी देखने को मिली। ध्रुवों पर ओजोन छिद्र के भी भरने की बात सामने आ रही हैं।  कुछ लोग दूर पहाड़ों को देखने का दावा कर रहे हैं तो कुछ नदियों के जल को  स्वच्छ होने का। यह बात सही भी हैं कि इस दौरान जीवाश्म ईंधन के प्रयोग में कमी से उत्सर्जन में गिरावट आई। यहाँ एक तरह से कोरोना संकट जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उपाय का कार्य कर रहा हैं।
  • प्रायोजित डर में बढ़त : जिस प्रकार वैश्विक एजेंडा जलवायु परिवर्तन की विकटता के प्रति आगाह करने के लिए कई प्रकार की रिपोर्ट और सूचकांक जारी कर रहा था। कोरोना में भी समय के साथ विभिन्न रिपोर्ट इसकी भयावहता के बारे में उत्तरोत्तर वृद्धि की बात कह रही हैं। शुरू में कहा गया कि यह संक्रमित व्यक्ति से स्त्रावित द्रव के संपर्क में आने से होता हैं, अब कहा जा रहा हैं कि यह हवा में भी प्रसारित हो सकता हैं। ऐसा कह सकते हैं कि डर का कोई प्रायोजक उपस्थित हैं, जो मार्केट की डिमांड के अनुसार इसके संस्करण को अपडेट करता रहता हैं। साथ ही कोरोना का यह प्रायोजित डर जलवायु परिवर्तन से आगे निकल गया हैं। लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में कम से कम आठ बार भूकम्प आया था, लेकिन खौप कोरोना का ही ज्यादा था।   
  • समाधानों के लिए प्रयास में कोरोना आगे हैं : जिस प्रकार विभिन्न व्यवसाय समूह वैश्विक राजनीति की सहायता से जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हरित उपकरणों का बाजार खड़ा करने में लगे हुए हैं। उसी प्रकार कोरोना संकट में भी विभिन्न प्रतिभागी निवारक एवं उपचार समाधानों का बाजार खड़ा करने में लगे हुए हैं। रिओ समिट के बाद पुरे विश्व को परिचर्चा की सभा में एकजुट करने के लिए जलवायु परिवर्तन ही सर्वोच्च मुद्दा था, इसने पिछले दशकों के व्यापार वार्ता, परमाणु निशस्त्रीकरण जैसे मुद्दों को पीछे छोड़ दिया था। परन्तु इस समय कोरोना संकट ने इस मुद्दे को नेपथ्य में डाल दिया हैं। इस समय पर सभी देश या तो वैक्सीन को लेकर वार्तारत है या फिर बदहाल स्थिति की बहाली के लिए चर्चाओं में संलग्न हैं।
  • अन्य मुद्दें : जिस तरह जलवायु परिवर्तन ने वैश्विक राजनीति में विकसित बनाम विकासशील देश, समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्व, न्यूनीकरण एवं अनुकूलन जैसे मुद्दें मुख्यधारा में रहते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी ब्लेम गेम, विकासशील देशों की सहायता जैसे मुद्दें मुख्यधारा में हैं।  

कोविड-19 का डर : पूर्व में और अब 

जैसे-जैसे कोरोना की जीवन यात्रा आगे बढ़ी हैं, डर उत्पन्न करने की एक व्यवस्था भी इसके साथ आगे बढ़ी हैं। 

  1. शुरू में इटली और चीन की ख़बरों, मूवीज के दृश्यों को सोशल मीडिया पर साझा करके लोगो को इतना डराया कि उन्हें एक सख्त लॉक डाउन में रहने के लिए मजबूर और प्रताड़ित किया गया। जिसके साथ लोगो की आजीविका चौपट हो गई और उन्हें सैंकड़ों किलोमीटर दूर अपने घरों की और पैदल सफ़र करना पड़ा। जिसकी विभिषका अपने आप में ही एक अध्याय (कोविड-19 लॉकडाउन और मजदूरों का पलायन)हैं।      
  2. आरंभिक दौर में कोरोना के बारे में अपुष्ट, एकतरफा दावे करके मौजूदा स्वास्थ्य अवसंरचना को भी सीमित और संशयित रखा गया। शुरू में लोगो का ईलाज नही करके उन्हें आइसोलेशन वार्ड में बंद कर दिया, जिन्हें समय पर खाना तक नही दिया। इनमे से परेशान होकर कई लोगों ने आत्महत्या कर ली। शायद इस स्तर पर सोच यह थी कि भले ही ये तो मर जाए, लेकिन बाकि लोग इनके संपर्क में नही आये।
  3. आरंभिक दौर ऐसा था, जिसमे लोगों में इस हद तक डर था कि अगर कोई गाँव का आदमी बाहर से आया है तो उससे संपर्क नही रखा गया। अगर किसी आदमी को बुखार है तो मेडिकल वाला दवाई देने से मना कर देता था। एक तरीके से एक आधुनिक अस्पृश्यता की स्थिति देखने को मिल रही थी। मतलब लोग संक्रमण के डर की वजह से अतिरिक्त सतर्क (Extra -Alert) थे।
  4. जब संक्रमित व्यक्ति के संपर्क से भी कई लोगो को नही हुआ तो लोगो को डराने के लिए इसके हवा में प्रसारित होने की बात कही गई। लोग फिर भी नही डरे तो कहा गया कि अभी एक दक्षिण पूर्वी देश में कोरोना के ऐसे उपभेद (strain) मिले हैं, जो अभी तक ज्ञात संक्रमण के मामलों से बहुत अधिक खतरनाक हैं।
  5. अब तो पडौस में हो जाता हैं तो भी कोई तवज्जों नही देता। क्योंकि ठीक होने वाले के अनुसार यह एक प्रकार का बुखार ही हैं। जिसमे आपकी इम्युनिटी ठीक है तो डरने की कोई जरुरत भी नही हैं। इसका आलम यह हुआ कि लोग खुद सामने आकर अपने पॉजिटिव होने का स्टेटस अपडेट कर रहे हैं कि उनको कोरोना था तो उनसे मिलने वाले अपना टेस्ट कराये, जबकि पहले इसके साथ बहुत बड़ा स्टिग्मा जुदा हुआ था। अब लोग कोरोना पॉजिटिव आने के बाद भी धरने और प्रदर्शनों का हिस्सा बन रहे हैं। कोरोना पॉजिटिव आकर किसी परिजन के मरने के बाद भी लोग खुद से उनका अंतिम संस्कार कर रहे हैं। जबकि पहले मृतक को पैक करके देने के कारण कई शवों की आपस में अदला-बदली हो गई। कई शव कॉविड प्रोटोकॉल का पालन करने के कारण लंबे समय तक अस्पतालों में पड़े रहे। कईयों के साथ अस्पतालों में छल-कपट हुआ, जब अच्छे-खासे लोगो को कॉविड से मृतक बता दिया गया।

इन सब उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता हैं कि आरंभिक दिनों में कोरोना को लेकर कितना अन्याय हुआ हैं। देश ने वाकई पिछले चार-पांच महीने बहुत कष्ट झेला हैं।

क्या कोरोना की तुलना जलवायु संकट से की जा सकती हैं?

जलवायु संकट की चिंताएं भी वास्तविक हैं, लेकिन जो समाधान किए जा रहे हैं, वे व्यावसायिक हैं। सभी व्यवसायी वैकल्पिक हरित समाधानों को विकसित करने का दावा करके हाशिए पर पड़े लोगो के परम्परागत आजीविका निर्वाह को समाप्त करना चाहते हैं। इनके द्वारा किए गये उपाय लक्ष्यहीन हैं, जो असली चुनौतियों को संबोधित नही करते हैं। इन उपायों के लिए जनता को भरी कीमत चुकानी पड़ रही हैं, जिसे हम ओजोन संरक्षण से जुड़े वियना समझौते से समझ सकते हैं। जिसके लक्ष्यों को तथाकथित तौर पर प्राप्त कर लिया गया हैं। लेकिन आम लोगो की जिन्दगी में इससे कोई फर्क नही पड़ा, जबकि उन्हें चीजे प्राप्त करने से रौकने के लिए कीमतों में वृद्धि की गई। साथ ही यह राजनीति में विकासशील देशों के प्रति ऐतिहासिक न्याय किए बिना उन पर दायित्व थोपना चाहते हैं। कोरोना संकट में भी यही स्थिति हैं, जिम्मेदार पक्ष की न तो पहचान की गई हैं और न ही उसके दायित्व निर्धारित किए गये हैं। अगर ऐसा नही किया गया तो यह इस प्रकार के अग्रिम दुस्साहसों को प्रोत्साहित करेगा।

दूसरी बात डर की बात भी दोनों में प्रायोजित हैं, जो वैश्विक संगठनों द्वारा इर्धारित किया जाता हैं। इसका नुकसान यह रहा हैं कि यह मूल और अति आवश्यक मुद्दों से ध्यान को विमुख कर दे रहा हैं। यही कारण हैं कि निर्धनता उन्मूलन, पोषण एवं भूख जैसे मुद्दें वैश्विक राजनीति से गायब हो गये हैं या फिर गिलोटिन की भेट चढ़ने वाले उप-खंडों में बदल गये हैं।

राष्ट्रीय-राज्य की अक्षमता

कोरोना संकट में राष्ट्रीय-राज्य की अक्षमता उजागर हुई कि वह आगामी अप्रत्याशित संकटों के प्रति अनुक्रिया करने के लिए तैयार नही हैं। चाहे वह कोरोना हो या फिर कोई प्राकृतिक आपदा हो।

लॉक डाउन के बारे में सरकार को आरंभ में पता ही नही था कि इसके लिए किस कानून का सहारा लिया जाए। इसलिए देश भर में इसका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए CrPC की धारा 144 का प्रयोग किया गया। लॉक डाउन 2.0 में जाकर NDMA ने आपदा प्रबंधन अधिनियम से शक्तियों को ग्रहण किया। 

लेकिन धारा 144 के अखिल भारतीय प्रयोग ने पुरे देश का एक साथ आपराधिक-करण कर दिया गया। लोगो को घरों से निकालकर भी पीटा गया, धार्मिक स्थलों और कही जरुरी जगह से आते अकेलें आदमियों को भी पीटा गया। इसका क्षेत्राधिकार विस्तृत था। यह आपातकाल से भी बदतर था, जिसमे अनुच्छेद 359 के तहत प्राप्त अनुच्छेद 20 और 21 का समर्थन भी प्राप्त नही था। प्रधानमंत्री ने कहा कि जनता इसे अपने आप पर लगाया हुआ आपातकाल माने। यह एक राष्ट्रीय-राज्य की विफलता थी कि वो अपनी आवाम को अपनी क्षमताओं पर भरोसा दिलाने में नाकामयाब रहा। अधिकतर राष्ट्रीय-राज्यों ने अपनी अक्षमताओं के लिए लोगो को दंडित किया। इस दौरान कईयों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए और कईयों के वाहन जब्त हुए, जिनके लिए वे आज भी (22 सितंबर 2020) पुलिस थानों और अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। 

इस सख्त लॉक डाउन के बाजवूद भी लोगों ने पलायन किया। उनके लंबे सफ़र, साथ में बच्चे और बूढ़े, रास्ते में दुर्घटना, बसों को अनुमति देने में राजनीति आदि मुद्दों की कारण उत्पन्न मानवीय संकट की चर्चा सोशल मीडिया में जमकर हुई। जिसके कारण सरकार पर दबाव पड़ा और वह लॉकडाउन को सरल बनाने के लिए मजबूर हुई। साथ ही अर्थव्यवस्था की बहाली के लिए घोषित आत्मनिर्भर भारत पैकेज के नाम के पीछे काफी हद तक प्रवासी मजदूरों को गृह राज्य में ही रोजगार देने की अवधारणा थी, हालाँकि आत्म निर्भर पैकेज का विश्लेषण एक अलग अध्याय में समझाया जाएगा।

कोविड-19 केन्द्रित आगामी राजनीति

ये बात तो सही हैं कि आगामी समय में कोविड-19 केन्द्रित राजनीति ही मुख्यधारा में रहेगी क्योंकि इस समय पर सभी देश वैक्सीन का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। सभी देश वैक्सीन को प्राप्त करने, वितरण करने और सुरक्षित रखने जैसे कार्यों में संलग्न हैं। जो व्यवसायी जलवायु परिवर्तन के लिए समाधान विकसित करने हेतु कार्यरत थे, वे अब वैक्सीन से जुड़े कार्यों में संलग्न हो गये हैं। वैक्सीन आने पर कंपनियों द्वारा मोटी कमाई किए जाने की आशंका बताई जा रही हैं, हो सकता हैं तब सामान्य बुखारों को कोरोना बताने के चलन में वृद्धि हो।

निष्कर्ष

जलवायु परिवर्तन और कोरोना दोनों संकट वास्तविक हैं और दोनों के ही प्रति समान रूप से सतर्कता बरतने की आवश्यकता हैं। लेकिन केवल व्यावसयिक हितों के कारण ही डर को प्रायोजित नही करना चाहिए क्योंकि इससे लोगो के मध्य भारी अराजकता उत्पन्न होती हैं, जो उनकी जान और आजीविका के लिए विध्वन्श्कारी होती हैं। दोनों के लिए ही समाधानों और नवाचारों का समर्थन करने की आवश्यकता हैं। 

कोरोना संकट से निपटने के लिए पुलिस राज्य पर भरोसा कितना पर्याप्त हैं?

कभी किसी ने सोचा भी नही होगा कि मानव सभ्यता अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इस तरह असहाय नजर आएगी। अब तक केवल परमाणु हमले, खगोलीय पिंड की टक्कर और जलवायु परिवर्तन के खतरों को ही सभ्यता के विनाशकारी कारक के तौर पर देखा जा रहा था। परंतु कोरोना वायरस से उपजे संकट ने दर्शा दिया हैं कि मानव सभ्यता के सामने चुनौतियां अनिश्चित हैं, इसलिए जरुरी नही की उनके विरुद्ध प्रतिक्रिया के लिए  समाधान भी पहले से ही तैयार मिले। उनके लिए उसी समय पर तत्कालीन उपायों की जरुरत पड़ सकती हैं। कई बार सटीक उपाय मिल जाते हैं या वैकल्पिक उपायों से काम चल जाता हैं, जैसे कि-जयपुर में एक कोरोना रोगी को एड्स की दवा से ठीक कर दिया गया। लेकिन सरकारों के पास समस्या से निपटने का एक लोकप्रिय तरीका और भी हैं, और वो हैं पुलिस राज्य।

जब भारत को महसूस हो गया कि कोरोना ने दरवाजे पर शानदार तरीके से दस्तक दे दी हैं। एयरपोर्ट्स पर सतर्कता के माध्यम से, जिस तरह भारत ने इबोला और जिका जैसे वायरसों पर नियंत्रण किया था, वो रणनीति अब यहाँ पर्याप्त नही हैं। अब अंदर की तरफ सक्रीय प्रयास करने की जरुरत हैं। तब भारत ने राष्ट्रव्यापी जनता कर्फ्यू का ट्रायल किया। उसके बाद, कोरोना के संक्रमण को आगे प्रसारित होने से रोकने के लिए 25 मार्च से 21दिन के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई। इसी के साथ सभी आवागमन के साधनों को बंद कर दिया गया। उत्पादन में लगी सभी इकाइयां बंद हो गई। ऐसे समय में विशेषकर प्रवासी लोगोमे बेचैनी बढ़ गई। लोग अपने घरों को जाने के लिए उतावले नजर आए। लोगों की आवाजाही को देखते हुए, तब इसको उचित क्रियान्वयन के लिए कर्फ्यू में परिवर्तित किया गया।

इसी के साथ ही ऐसा लगने लगा कि वेलफेयर स्टेट ने हार मान ली हैं और उसकी असमर्थताओं को दूर करने के लिए राज्य ने पुलिस राज्य को अपना लिया हैं। लोगो की भयंकर पिटाई के विडियो देखकर लगने लगा कि अब तो सिर्फ पुलिस स्टेट ही कोरोना से निपटने में राज्य की मदद कर पाएगा। यही से अब हम विभिन्न पहलुओं पर विश्लेषण करेंगे :

1. कल्याणकारी राज्य की विफलता एवं पुलिस राज्य पर भरोसा

कोरोना संकट से निपटने में कल्याणकारी राज्य की विफलता से बचना आसान नही हैं, क्योंकि इस तरह के संकट से निपटने के लिए राज्यों की तैयारियों में कई प्रकार की खामियां थी, जैसे कि :
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने COVID-19 को वैश्विक महामारी घोषित किया था और सभी राज्यों को इसकी भयावहता के बारे में आगाह किया था। लेकिन सभी राज्यों ने इसकी उपेक्षा की, किसी ने भी इसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता नही समझी।
  • सरकार ने इसको क्षेत्रीय संकट मानने को तवज्जो दी और इस भरोसे में रहे कि जिस तरह जिका, इबोला जैसे संकटों से हम बच गये थे, उसी प्रकार इसको भी संभाल लेंगे।
  • स्वास्थ्य आपातकालीन परिस्थितयों को लेकर पर्याप्त तैयारीयों का अभाव हैं। एपिडेमिक एक्ट मोजूद हैं, लेकिन उन्हें जनसंख्या वृद्धि और सघन आवास, यातायात के तीव्र एवं भीड़ भाड़ युक्त साधन आदि के सन्दर्भ में अद्यतन नही किया गया हैं।
  • संकट से निपटने के लिए मानक परिचालन प्रक्रिया (SOP) का अभाव हैं।
  • स्वास्थ्य अवसंरचना अपर्याप्त और अदक्ष हैं। संसाधनों का गंभीर अभाव हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं का वितरण भी विषमतापूर्ण हैं।
  • स्वास्थ्य को आवंटित होने वाले बजट का हिस्सा जीडीपी का अति अल्प हैं।     
हालांकि ऐसा कहा जा सकता हैं कि वेलफेयर स्टेट विफल नहीं हुआ हैं बल्कि उसे कुछ चुनौतियां मिली हैं। और चुनौतियां किसी भी व्यवस्था के समक्ष आ सकती हैं, इसलिए यह नही कहा जा सकता कि वेलफेयर स्टेट विफल हो गया हैं और वह पुलिस स्टेट की शरण में चला गया हैं। हकीकत में पुलिस स्टेट वेलफेयर स्टेट की ही मदद का कार्य कर रहा हैं। अभी भी समस्या से निपटने के लिए असली भरोसा वेलफेयर स्टेट पर ही हैं, अभी भी मेडिकल सुविधाओं को ही प्राथमिकता देकर समस्या से निपटने के प्रयास किए जा रहे हैं। पुलिस स्टेट की भूमिका तो इतनी हैं कि वेलफेयर स्टेट के प्रयासों मे बाधा नही आए और उसे समस्या से निकलने के लिए ज्यादा संघर्ष नही करना पड़े।

इस बात से सहमत हुआ जा सकता हैं कि राज्य का अंतिम भरोसा अभी भी कल्याणकारी राज्य के माध्यम से संकट समाधान पर ही हैं। लेकिन सवाल वहां से उठना आरंभ हुआ, जब पुलिस की भूमिका नागरिकों के प्रति असंवेदनशील हो गई तो लोगो ने यह पूछना आरंभ कर दिया कि क्या अब संकट से बाहर पुलिस स्टेट की मदद से ही आ पाएंगे, कोरोना अब केवल लाठीचार्ज और कर्फ्यू की मदद से ही रुक पाएगा।

2. नागरिकों के साथ पुलिस का असंवेदनशील व्यवहार किस उद्देश्य की प्राप्त कर रहा हैं?

लोगों ने पहले कोरोना को लेकर जोक्स और मिम्स बनाये और लॉक डाउन की घोषणा के बाद पुलिस के हाथों हुई पिटाई के। राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू में पुलिस का व्यवहार किस प्रकार असंवेदनशील हो सकता हैं, इसको दर्शाने वाले हजारों विडियो सोशल मीडिया पर अपलोड हुए।
  1. लॉक डाउन के कारण आर्थिक गतिविधियाँ बंद हो जाने से कई प्रवासी लोग बड़े-बड़े शहरों में फंस गये, वहां से वापस निकलने के लिए उनके द्वारा अपने मूल स्थानों की तरफ लंबी और पैदल या साइकिल पर यात्रा की गई। पुलिस ने ऐसे लोगों को दोड़ाया, लेटकर, रेंगकर, पलटी मारकर चलने के लिए मजबूर किया।
  2. जरुरी सामानों को लेकर बाहर निकलने वाले लोगों पर अत्यधिक लाठीचार्ज किया गया। घर में रहने का संदेश देने के लिए एक या दो लाठी काफी थी, लेकिन एक ही जने को दस से पन्द्रह तक लाठी मारी गई। कोलकाता में एक जने की मृत्यु पुलिस के लाठीचार्ज से हुई।
  3. पुलिस द्वारा लाठी मारने के लिए सभी सीमाओं को तोडा गया। गाँव में एकेले-दोक्ले मिले लोगो को पकड़ा गया। यहाँ तक कि एक जने को घर से निकालकर तक पिटा गया। घरों और बाड़ों में छापा मारा गया।
  4. पुलिस के अतिचारों के खिलाफ हुई प्रतिक्रियाओं को पुलिस ने अपने अहम् से जोड़कर देखा और फिर अत्यधिक बल का प्रयोग करके उनको सबक सिखाने के लिए अत्यधिक जुल्म किए।
  5. पुरुष सिपाहियों द्वारा महिलाओं और बच्चों पर लाठीचार्ज किया गया। एक बारह साल के लड़के को दस-बारह लाठी मारी गई।
  6. लोगो को आजीविका के साधनों को नष्ट कर दिया गया। दिल्ली में एक सिपाही ने सब्जी की रेहड़ियों को पलट दिया।
इस तरह के अंसख्य विडियो हैं, जो आपको इन्टरनेट पर मिल जाएंगे। सवाल उठता हैं कि पुलिस आखिर किस उद्देश्य की प्राप्ति कर रही हैं। क्या उसे अपने इस लाठी चलाने के अधिकार के लिए अपने कर्तव्य पता हैं। लाठी खाने के बाद उस युवक का क्या हुआ, क्या वह मर गया या जिन्दा हैं, क्या उसके हाथ-पैर टूट गये, इस बारे में पता हैं उनको?  अगर लाठी मारने के बाद उस युवक द्वारा की गई प्रतिक्रिया से आपको क्षति पहुंचती हैं तो आप शहीद-शहीद चिल्लाना शुरू कर देते हो। दुनियाभर की सहानुभूति बंटोरने लग जाते हो। क्या आपके मन में इसी तरह की सहानुभूति पीटने वाले लोगो के प्रति भी हैं। जो राज्य की विफलता की मार खा रहे हैं। एक असंवेदनशील पेशे के लिए कितनी सहानुभूति बंटोरोगे। साथ ही यह भी हैं कि हम मुश्किल वक्त में भी तुम्हारे लिए खड़े होते हैं। इस तरह के बिना वेशभूषा के बहुत सारे पेशे हैं, जो लोगो के लिए बलिदान देते हैं और उसका ढिंढोरा नहीं पिटते। सभी पेशे दूसरों के लिए ही होते हैं। इससे उस सवाल पर प्रशं उठता हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में इतना असंतुलन क्यों हैं।

3. राज्य एवं नागरिकों के मध्य निम्नीकृत संबन्ध : मौजूदा या पूर्व-प्रचलित ? 

कुछ लोगो का मानना हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में पुलिस राज्य की तिलांजलि कभी दी ही नही गई हैं, कल्याणकारी राज्य को अपनाया तो गया हैं लेकिन उसे पुलिस राज्य को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से नही अपनाया गया हैं, उसके लिए राज्य की अपनी मजबूरियां हैं। पुलिस राज्य हमेशा की तरह बना रहा हैं। एक राज्य को हमेशा अपने नागरिकों की चुनौतियां का खतरा रहता हैं। पुलिस राज्य की संप्रभुत्ता को स्थापित करने में राज्य की आंतरिक स्तर पर मदद करती हैं, वह लोगो को उनकी अधीनता का अहसास समय-समय पर करवाती रहती हैं।

दरअसल सभी राज्यों ने अपनी प्रजा की भलाई के लिए कल्याणकारी मॉडल को अपना लिया हैं। इससे लोगों की भूमिका राज्य पर आश्रित की हो गई हैं। आश्रित लोगो को चीजे उपलब्ध करवाने में उच्च निकाय के पास हमेशा अपनी संप्रभुत्ता रहती हैं। लोगो की बगावत की संभावना हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं। अगर फिर भी गुंजाईश रहती हैं तो पुलिस के माध्यम से अपनी सुरक्षा करने में सफल रहता हैं। वैसे भी लोकतंत्र ने चुनौती की मंजिल राज्य से परिवर्तित करके राजनीतिक दलों को कर दिया हैं।

हम कह सकते हैं कि कल्याणकारी राज्य का मतलब राज्य द्वारा न तो पुलिस में कटौती से हैं और न ही उसके विस्तार को रोकने से हैं। हमारी आदत हो गई हैं कि हम दो विपरीत या प्रतिद्वंदी चीजों में से किसी स्थान विशेष पर एक की ही उपस्थिति को देखते हैं। दोनों भी साथ-साथ और एक दुसरे के पूरक के रूप में हो सकती हैं।       

इस प्रकार हम देखते हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में यह निम्नीकरण मोजुदा नही हैं, यह पूर्व में प्रचलित ही हैं। हालांकि उसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट नही होती हैं। मानव अधिकारों जैसी सीमाएं उन पर आरोपित रहती हैं।

 4. क्या यह निम्नीकरण मूल अधिकारों से संबंधित सुरक्षा उपायों का खोखलापन दर्शाता हैं? 

सड़क पर चल रहे आदमी के क्या मूल अधिकार हैं। अगर वह किसी साधन पर हैं तो पुलिस उसे किसी न किसी जुर्म में फंसा ही सकती हैं या फिर किसी भी जुर्म के शक में जितनी मर्जी हो उतने डंडे मार ही सकती हैं। डंडे मारने के लिए किसी जुर्म का होना जरुरी थोड़े ही हैं। आदमी कानून व्यवस्था को बनाए रखने में बाधक बन रहा था या फिर सहयोग नही कर रहा था, इस तरह की शब्दावली के माध्यम से पुलिस अपने गंभीर कृत्य को धक् ही देती हैं। डंडे मारना तो बहुत छोटी बात हैं, लोगो की पुलिस कस्टडी में हत्या तक हो जाती हैं। उन पर कोई प्रगति नही होती, जिनमे दोषियों को सजा मिल सके। इसलिए विशेषकर डंडे मारने के बारे में मूल अधिकारों की सीमाएं तो स्पष्ट हैं।

लेकिन कई बार हम देखते हैं कि पुलिस कार्यवाही में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती हैं या पुलिस द्वारा मानवीय गरिमा के विपरित कार्य किए जाते हैं और उनकी व्यापक आलोचना होती हैं या फिर पुलिस को ही छवि खराब होने का अंदेशा रहता हैं तो उन पर कार्यवाही होती हैं। इसलिए बात यह हैं कि आपको खुद सजग बनना होगा और मार खाने की बजाय सवाल करना होगा। वरना सुरक्षा उपायों के साथ-साथ आपका भी खोखलापन सामने आ जाएगा। 

5. अपने अधिकारों की बहाली या उत्थान के लिए, क्या  लोग आगे प्रयास करेंगे ?

जिस तरह लॉक डाउन में लोगो ने गांधीवादी तरीके से लाठी खाई हैं, उससे तो नही लगता कि लोग आगे भी इस तरह की असंवेदनशीलता के प्रति आवाज उठाएंगे। यह कोई प्रथम मौका नही हैं, ऐसी घटनाए क्षेत्रीय स्तरों पर होती रहती हैं और इस पर कोई प्रतिक्रिया नही आती हैं। दूसरी तरफ पुलिस के साथ-साथ लोगो की भी संवेदना मरती जा रही हैं, जो मार खाते लोगो के वीडियोज बना रहे हैं और उन पर जोक्स बना रहे हैं। इसलिए लोग भी खुश हैं कि हम तो बच गये, वो फंस गया, इसी में ख़ुशी हैं। इसलिए इन संबंधों में परिवर्तन के लिए प्रयास की बात असंभव सी हैं।

निष्कर्ष        

पुलिस में संवेदनशीलता के गुणों के विकास पर विशेष कार्य करने की जरुरत हैं। जरुरतमंद लोगो की मांग को पुलिस कर्मी खुद समझे, इस तरह के मूल्यों को विकसित करने की आवश्यकता हैं। इसी संकट में कुछ ऐसे पुलिस कर्मियों के भी विडियो सामने आये, जिन्होंने लोगों की मदद की और उन्हें सयंमित होकर प्यार से समझाया। लेकिन यह अपवाद न होकर सामान्य विशेषता होनी चाहिए। लॉकडाउन के आरंभिक चरण में ही पुलिस कर्मियों द्वारा अनियंत्रित पीटना दर्शाता हैं कि उनके पेशेवर मूल्यों में गंभीर खामियां हैं। यह कहने के लिए कि आपको घर से बाहर नही निकलना हैं, क्या पुलिस द्वारा तब तक पीटना चाहिए, जब तक वह आदमी उनकी पहुँच में हो। इस तरह की पिटाई तो बार-बार उल्लंघन की दशा में ही कुछ हद तक न्यायोचित ठहराई जा सकती हैं। इसलिए पुलिस में शामिल करने वाले लोगो में विवेक को भी समान रूप से महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता हैं। इसी तरह की पुलिस व्यवस्था कल्याणकारी राज्य का अंग मानी जा सकती हैं।

दूसरी बात इस संकट से निपटने में पुलिस स्टेट की भूमिका कुछ भी नही हो सकती, लोगों को घरों में खदेड़ने के अलावा। इसलिए कल्याणकारी राज्य को ही अपनी खामियों पर विचार करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से दूर करना चाहिए ।