ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धजनों की देखभाल

वैसे तो बुढापा सभी लोगो के लिए चुनोतियाँ भरा होता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों की देखभाल में गम्भीर मुश्किलें शामिल होती है। गांवो में बुढापा ज्यादा दिन इंतजार नही करता है। 

गांवो में लोग खेती-बाड़ी और मजदूरी के कामकाज इतनी कड़ी मेहनत से करते है कि उनका शरीर जल्दी ही जवाब दे जाता है। वे अपनी युवावस्था के उत्तरार्द्ध से ही वृद्धावस्था की ओर चले जाते है।  युवावस्था में होने वाले कई शारिरिक विकारों को आर्थिक तंगी के कारण टालते रहते है, कई बार चोटिल हो जाते है, ये सभी समस्याएं बुढापे में फिर उभरकर आती है। इस तरह गांवो में वृद्धावस्था बीमारियों के साथ चलती है।

परिवारों की आर्थिक तंगी का असर भी वृध्दों की देखभाल के दौरान देखने को मिलता है। एक तो उनको होने वाली गम्भीर स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज नही हो पाता, दूसरा उनके अनुसार खानपान की व्यवस्था भी नही हो पाती है। साथ ही आर्थिक तंगी के कारण उनके पुत्र भी उनका भार अपने ऊपर लेने से कतराते है और वे एक दूसरे के ऊपर डालने के चक्कर मे बुजुर्गों की भावनाओं की पूर्णतः उपेक्षा कर देते है। कई बार बुजुर्गों को भी इस खींचतान में प्रताड़ित कर दिया जाता है।

कई सामाजिक योजनाओ का हस्तक्षेप बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में अग्रसर है। वृद्धावस्था पेंशन के माध्यम से बुजुर्गों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सक्षम बनाया जा रहा है। कानूनी अमलीजामा भी बच्चों को वृध्दों की देखभाल के लिए प्रेरित कर रहा है। इसके साथ ही वृध्दों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए स्वास्थ्य केंद्रों को विशेष रूप से निर्देशित किया गया है। मेडिकल टीम साप्ताहिक रूप से होम विजिट करके वृद्धजनों की स्वास्थ्य समस्याओं को बेहतर तरीके से जान सकती

लेकिन बुजुर्गों की सुभेदयता काफी अधिक होती है जिसमे अकेलापन, लाचारी, अवसाद, उत्पीड़न जैसी अवस्थाएं शामिल होती है। पारिवारिक समर्थन जैसे तन्त्रो का तेजी से ह्रास हो रहा है। ऐसे में बुजुर्गों के लिए गांवो में भी बुनियादी संरचना स्थापित करने की आवश्यकता है। बालको और महिलाओं के लिए आंगनबाडी केंद्रों की तर्ज पर बुजुर्गों को भी कुछ दिनों की अवधि में सम्भालने के लिए कोई व्यवस्था होनी चाहिए। उनकी नियमित जांच की व्यवस्था हो।

निष्कर्ष
गांवो में सरकारी और सामाजिक पहलों में बुजुर्गों को जगह देकर उनसे अनुभव प्राप्ति को जारी रखा जा सकता है। बुजुर्गों को बोझ न समझकर बेहतर मार्गदर्शक बनाया जा सकता है। अगर बुजुर्ग स्वास्थ्य और शारीरिक रूप से ठीक रहेंगे तो वे खुद ही उत्पादक कार्यो में लगे रहेंगे। इस प्रकार हमे हमारी वरिष्ठ जनसांख्यकी के महत्व को समझना चाहिए।

ग्रामीण पहचान से बचती हुई पीढ़ी

ज्यादातर लोगों में अपनी चीजो को लेकर अभिमान होता है और वे बात-बात में अपना संबंध वहाँ से जोड़ने का प्रयास करते है। इसके विपरीत कुछ लोगो मे अपने स्थान को लेकर हीनभावना होती है और वे अपने को उस स्थान से दूर रखने का प्रयास करते है। जैसे कि विदेशों में पाकिस्तानी अपने देश का नाम नही बताते, उन्हें लगता है कि असलियत बताने पर सामने वाला आतंकियों से जोड़कर देखेगा। वहीँ भारतीय विदेशो में गर्व से कहते है और सामने वाला उनसे पूछता है कि क्या आप डॉक्टर या इंजीनियर है।

सकरात्मकता को तो हर कोई भुना लेता है, लेकिन जब नकारात्मक चीजो के साथ पहचान जुड़ी हो तो बताने वाला झिझकता रहता है। उनमे आत्मविश्वास की कमी देखी जाती है। उन्हें एक बारगी तो ऐसा भी लगता है कि हमारी गलती यह है कि हम यहां पैदा हुए है। कुछ लोग उनमे ऐसे भी होते है जो अपनी हैसियत को अपने स्थान और वहाँ के लोगो की हैसियत से बढ़कर मानते है। ये सकारात्मक और नकारात्मक पहचान दोनो जगहों पर प्रेक्षित किये जा सकते है। कहने का आशय है कि कुछ लोगो मे विशिष्टता की भावना इस कद्र भर जाती है कि बाहर चाहे वे कुछ भी हो लेकिन अपने स्थान के लोगो के समक्ष किसी प्रकार का सामान्यकरण बर्दाश्त नही है। अपनी हैसियत को उस स्थान और वहाँ के लोगो से जोड़कर अपनी प्रोफाइल में किसी प्रकार का हल्कापन नही लाना चाहते है।

ऐसे लोगो की संख्या गांवो में काफी देखने को मिलती है। यहां नव उच्च-शिक्षित, नव पेशेवर वर्गो में यह मानसिकता जल्दी घर कर जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे नवीन अर्जित प्रतिष्ठा से हासिल विशिष्टता को लेकर सहज नही हो पाते है। इस सिलसिले में वे 'विशिष्टता की महिमा' से प्रेरित व्यवहार को अमल में लाने की कोशिश करते है। वे आभिजात्य संस्कृति से प्रेरित रहन-सहन, बोलचाल, शौक आदि का अनुसरण करने का प्रयास करते है। उनकी गतिविधियों को अगर संसाधनों की उपलब्धता का समर्थन मिल जाता है तो उनका व्यवहार बदल जाता है और जिन्हें संसाधनों का समर्थन नही मिलता, वे सामान्य ही बने रह जाते है।

नवीन प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले समूह में नवीन नोकरी लगने वाले, उच्च शिक्षा की विशिष्ट प्रकृति वाले, कौशल या प्रतिभा आधारित उपलब्धियों वाले व्यक्ति हो सकते है। गांवो में ऐसे लोग आने से बचते है, सामुदायिक कार्यक्रमो से दूर रहते है, ग्रामीण संस्कृति और रीति-रिवाजो में खामिया तलाशकर उसे पिछड़ेपन से जोड़ते है, ग्रामीण स्वछंदता की तुलना अनैतिकता से करते है, बोली और पहनावे में क्रत्रिम अंतराल रखने का प्रयास करते है। लेकिन दूसरी तरफ अगर देशी चीजे बाहर प्रसिद्ध हो जाती है तो ये उसे भुनाने से बाज नही आते है।

इस चीज का असर यह हो रहा है कि ग्रामीण संस्कृति की गतिविधियों युवाओं के मध्य अपना दायरा खोती जा रही है। गांवो में भी शहरों के समान सामुदायिक मूल्यों का ह्रास बढ़ता जा रहा है। इसका नकारात्मक असर गांवो की संस्था को ही नही प्रभावित कर रहा बल्कि खुद वे लोग भी अवसाद और असुरक्षा की भावना से ग्रस्त है।
जरूरी है कि शिक्षा के माध्यम से लोगो मे अपनी चीजो के प्रति आत्मविश्वास उत्पन्न किया जाये ताकि वे अपनी वेशभूषा, बोलचाल और खानपान के प्रति शर्म की बजाय गर्व महसूस करे। शिक्षा के माध्यम से ही आयातित रहन-सहन के दिखावटीपन को स्पष्ट किया जाये और युवाओ को परिपक्व व्यवहार के प्रति तैयार किया जाए।