बीएचयू की स्थापना और मदन मोहन मालवीय

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की एक अमूल्य विरासत हैं। ब्रिटिश शासन के समक्ष स्वदेशी मूल्यों में भारतीयों को शिक्षित करने के लिए स्थापित इस विश्वविद्यालय का एक दीर्घ इतिहास रहा हैं। जितने  प्रयास और संघर्ष इसकी स्थापना से पूर्व के हैं, उससे अधिक संघर्ष इसकी स्थापना के बाद इसे निर्मित और संचालित करने में किया गया। इस विद्या की राजधानी को स्थापित करने में महामना जी ने अपने जीवन का अधिकांश भाग समर्पित किया हैं। इसलिए हम प. मदन मोहन मालवीय को इसकी स्थापना का श्रेय देते हैं। लेकिन हाल ही में एक शोधकर्ता तेजकर झा ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ बीएचयू में बीएचयू के संस्थापक को लेकर मालवीय जी की भूमिका पर सवाल उठाये है। इनका मानना है कि इसमें अन्य सहयोगियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी जिनमें एनी बेसेंट और दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह का नाम प्रमुख है। एनी बेसेंट ने कॉलेज प्रदान किया था और दरभंगा के महाराजा ने धन जुटाने की मुहिम का नेतृत्व किया था। लेकिन इसका श्रेय केवल मालवीय जी को जाता हैं, जबकि उनका योगदान अन्य व्यक्तियों के समकक्ष ही था।

बीएचयू के संस्थापक के रूप में नवीन दावे 

अपनी बात के समर्थन के लिए तेजकर झा निम्न तथ्य प्रस्तुत करते हैं :

  1. विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए गठित की गई बीएचयू सोसायटी के अध्यक्ष दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह थे। उनका यह दायित्व केवल सम्मानार्थ (honorary) नहीं था, बल्कि उन्होंने इस क्षमता से कार्य भी किए थे।
  2. बीएचयू मूवमेंट को लोकप्रिय बनाने और धन जुटाने के लिए उन्होंने कई देशी रियासतों के पास प्रतिनिधि मंडल भेजे थे और स्वंय ने भी 5 लाख रूपये का योगदान प्रदान किया था।
  3. बीएचयू मूवमेंट से संबंधित सभी चर्चाओं में महाराजा का नाम आता था, संबंधित पत्राचार भी महाराजा के नाम से होते थे।
  4. स्थापना समारोह के अवसर पर वायसरॉय लार्ड हार्डिंग के बाद प्रेसिडेंट ऑफ बीएचयू सोसाइटी की हैसियत से महाराजा रामेश्वर सिंह ने ही भाषण दिया था।  स्थापना समारोह की अध्यक्षता भी एनी बेसेंट द्वारा की गई थी। मालवीय जी कही से भी फ्रंट लाइन में दिखाई नही पड़ रहे थे। यहाँ तक कि स्थापना के बाद सभी प्रकार के बधाई संदेश भी महाराजा को ही प्राप्त हुए थे।

इस प्रकार तेजकर झा मानते हैं कि अन्य लोगो के योगदान को इतिहास से मिटा दिया गया हैं और मालवीय जी को एक तरफा श्रेय दिया जा रहा हैं। बीएचयू के हर संस्थान, डिपार्टमेंट और भवनों में मालवीय जी की प्रतिमा लगी हुई हैं, जबकि बाकी लोगो का उल्लेख तक नही हैं। जबकि उनके योगदान के बिना बीएचयू का अस्तित्व में आना कदापि संभव नही था।

मालवीय जी को संस्थापक मानने का तथ्य कब से प्रचलित हुआ, इस बारे में तेजकर झा बताते हैं कि लंबे समय तक इस विषय पर कभी चर्चा ही नहीं हुई कि इस विश्वविद्यालय का संस्थापक कौन है या कौन थे। सबसे पहले विश्वविद्यालय प्रशासन में शामिल एक सीनेट सदस्य सुंदरम ने अपनी पुस्तक “BHU 1905 to 1935” में मालवीय जी को संस्थापक बताया। इस तथ्य का विरोध कर सकने वाले पक्षकारों की तब तक मृत्यु हो गई थी, बीएचयू सोसायटी के सचिव सर सुंदरलाल की वर्ष 1917 और महाराजा रामेश्वर सिंह की वर्ष 1929 में मृत्यु हो गई थी। इस पुस्तक में 1905 से 1919 तक के दस्तावेजों से बचने की कोशिश की गई है। एक संभावना यह भी हो सकती हैं कि बाद में उन दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया हो।

अब तेजकर झा द्वारा प्रस्तावित मत पर टिप्पणी करने से पहले हमे बीएचयू की स्थापना से जुड़े घटनाक्रमों को समझ लेना चाहिए।

बीएचयू की स्थापना से संबंधित घटनाक्रम

दरअसल बनारस में उच्च शिक्षा के लिए संस्थान की स्थापना हेतु तीन लोग प्रयासरत थे :

  1. एनी बेसेंट : इन्होने वर्ष 1898 में सेंट्रल हिंदू कॉलेज नामक विद्यालय की स्थापना की थी  तथा इसके बाद वे विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रयास में आगे बढ़ रही थी। वर्ष 1960 में रॉयल चार्टर की अनुमति के लिए उन्होंने आवेदन भी कर दिया था, जिस पर सरकार की तरफ से उन्हें कोई भी प्रतिक्रिया नहीं मिली थी।
  2. महाराजा रामेश्वर सिंह : दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह भी काशी में शारदा विद्यापीठ की स्थापना करने की योजना बना रहे थे।
  3. मदन मोहन मालवीय : इन्होने वर्ष 1905 में कांग्रेस के बनारस सत्र के दौरान विश्वविद्यालय की स्थापना के संदर्भ में अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा की। इन्होने वर्ष 1911 में अपने विचारों को एक योजना के रूप में प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य ऐसी शिक्षा के लिए प्रयास करना था, जो गरीबी उन्मूलन और आय में वृद्धि के लिए भारतीय धर्म और संस्कृति के साथ तकनीकी और विज्ञान को संयोजित करती हो।

इन सभी प्रयासों के सहयोग से वर्ष 1911 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी सोसाइटी की स्थापना हुई। दरभंगा के महाराजा को इसका अध्यक्ष बनाया गया और इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील सुंदरलाल इसके सचिव थे। इसमें 3 सदस्य थे, जिनमें प्रथम मदन मोहन मालवीय जी थे, दूसरे एनी बेसेंट और तीसरे काशी नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह थे।

विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए बीएचयू सोसाइटी को ब्रिटिश इंडिया गवर्नमेंट द्वारा दो शर्ते पूर्ण करनी थी। प्रथम तो सोसाइटी के पास कोई शिक्षा संस्थान का होना जरूरी था, इसके लिए एनी बेसेंट द्वारा स्थापित सेंट्रल हिंदू कॉलेज का अधिग्रहण किया गया था। द्वितीय शर्त के अनुसार 50 लाख रुपए एकत्रित करने थे, जिसे एकत्रित करने के लिए राजा महाराजाओं के सहयोग के अतिरिक्त जन सहयोग का भी सहारा लिया गया था। स्वंय दरभंगा के महाराजा ने 30 लाख रूपए प्रदान किए थे और फंड एकत्रित करने के लिए कई देसी राजा-महाराजाओं के पास प्रतिनिधि मंडल भेजा था। सोसाइटी के सदस्य काशी नरेश ने विश्वविद्यालय परिसर के लिए भूमि प्रदान की थी और आगे भी इस प्रक्रिया में योगदान देते रहे।

अक्टूबर 1915 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री सर हारकोर्ट बटलर के प्रयासों से हिंदू यूनिवर्सिटी एक्ट 1915 केंद्रीय विधानसभा से पारित हो गया, जिस पर वायसराय ने तुरंत स्वीकृति प्रदान कर दी थी।

4 फरवरी 1916 को बसंत पंचमी के दिन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वारा इसका शिलान्यास किया गया। समारोह की अध्यक्षता एनी बेसेंट के द्वारा की गई। जिसमें देसी राजा महाराजाओं, प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा भाषण दिए गए, जिनमें महात्मा गांधी जी की प्रमुख थे और उनका यह भारत में प्रथम सार्वजनिक भाषण था, अन्य व्यक्तियों में सीवी रमन जगदीश चंद्र बसु आदि शामिल थे।

विश्वविद्यालय में विधिवत शिक्षण कार्य अक्टूबर 1917 से सेंट्रल हिंदू कॉलेज में प्रारंभ हुआ। परिसर में सबसे पहले इंजीनियरिंग कॉलेज का निर्माण हुआ, उसके बाद क्रमशः कला संकाय और विज्ञान संकाय के कॉलेज स्थापित हुए। आगे 13 दिसंबर 1921 को प्रिंस ऑफ़ वेल्स द्वारा विश्वविद्यालय का औपचारिक उद्घाटन किया गया। निजी प्रयासों से स्थापित यह प्रथम विश्वविद्यालय था।

आगे भी कई महान हस्तियों ने इसमें मदद की, जिनके माध्यम से भवन, छात्रावास, संकाय भवन और अन्य सुविधाओं का निर्माण हुआ। उदाहरण के लिए :

  1. परिसर में चारदीवारी एवं प्रवेश द्वार के निर्माण कार्य का वित्तपोषण बलरामपुर के महाराजा पतेश्वर प्रताप सिंह द्वारा किया गया।
  2.  सेंट्रल लाइब्रेरी के निर्माण में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड तृतीय का अहम योगदान रहा।
  3.  बिरला परिवार द्वारा परिसर में विश्वनाथ मंदिर और एक बड़े छात्रावास का निर्माण किया गया।
  4.  कई राज परिवारों और व्यवसायियों द्वारा छात्रावास और अन्य विभागों के निर्माण में सहायता प्रदान की गई। जैसे कि : लिम्बडी के महाराजा द्वारा लिम्बडी छात्रावास, हैदराबाद के नवाब द्वारा हैदराबाद गेट का निर्माण।

इस प्रकार बीएचयू की स्थापना हुई। अब आते हैं इस विवाद पर 

आखिर मालवीयजी को ही संस्थापक क्यों माना जाना चाहिए ?

यह सही हैं कि बीएचयू की स्थापना में कई लोगो की उल्लेखनीय भूमिका रही। लेकिन मालवीयजी की भूमिका को हम इसलिए खास मान सकते हैं, क्योंकि :  

  1. स्वपनदृष्टा और साकार कर्ता :  मालवीयजी ने ही विश्वविद्यालय की स्थापना का स्वपन देखा और वे उसे साकार करने तक उससे जुड़े रहे। बीएचयू की स्थापना में भले ही अन्य लोगो का भी योगदान हो सकता हैं, लेकिन वे सभी चरणों में विश्वविद्यालय से जुड़े नही रहे। दरभंगा के महाराजा और ऐनी बेसेंट स्थापना के बाद विश्वविद्यालय के संचालन में सक्रिय नही रहे। जबकि मालवीयजी वर्ष 1919 से लेकर वर्ष 1938 तक यहाँ के कुलपति रहे।
  2. औपचारिक बनाम व्यावहारिक योगदान : मालवीयजी भले ही औपचारिक समितियों और समारोह का हिस्सा नही रहे हो, परन्तु उनके द्वारा इस मुहिम को ज़मीनी नेतृत्व प्रदान किया गया। उन्होंने ही देशभर में इस मांग हेतु समर्थन अर्जित करने के लिए भ्रमण किया और तत्कालीन राजनेताओं, शिक्षाविद एवं वैज्ञानिकों को यहाँ पर आमंत्रित किया।
  3. स्थापना के बाद के कार्य : विश्वविद्यालय की स्थापना कोई सरकारी मंजूरी प्राप्त करने का कार्य भर नही थी। विश्वविद्यालय में भवनों का निर्माण शेष था, जिसके लिए पहले से भी ज्यादा धन जुटाने की आवश्यकता थी। पढने वाले छात्रों की सुविधा और पढ़ाने वाले संकायों के लिए भी धन की जरुरत थी। इन सब के लिए धन के स्त्रोत मालवीयजी द्वारा जुटाए गये। कई मौके ऐसे आये जब विश्वविद्यालय सहायता के अभाव में बंद हो सकता था, लेकिन मालवीयजी द्वारा किए गये प्रयासों से यह बच गया। 

इस प्रकार मालवीयजी के पक्ष में औपचारिक साक्ष्य कमजोर प्रतीत होते हो, परंतु व्यावहारिक साक्ष्य केवल और केवल उन्ही के पक्ष में हैं। मालवीयजी,अन्य संस्थापकों से इस मायने में अलग हैं कि उन्होंने विश्वविद्यालय की बगियाँ को सींचकर बढ़ा करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जमीनी स्तर पर इस पहल को लोकप्रिय करने और स्थापना के बाद स्थायित्व प्रदान करने में मालवीय की भूमिका उन्हें अन्य से अलग कर देती हैं। इसलिए तेजकर झा द्वारा किए गये दावे के साथ खड़ा होने से हमे असहजता महसूस होती हैं।

अन्य संस्थापकों और योगदान करने वालो की उपेक्षा नही की गई हैं

ये बात सही हैं कि मालवीयजी की प्रतिमा की स्थापना ज्यादा संख्या में हैं, लेकिन इसका मतलब यह कतई नही हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अन्य संस्थापकों और योगदान करने वालो की उपेक्षा कर दी हैं।

  1. बीएचयू सोसाइटी के सदस्य रहे सुंदरलाल के नाम पर विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज का नाम रखा गया हैं।
  2. जिन भी लोगो ने आर्थिक सहयोग देकर विश्वविद्यालय परिसर के अंदर जो भी भवन, छात्रावास या विभाग बनवाये हैं, उनके नाम उन्ही महापुरुषों के नाम पर रखे गये हैं।
  3. दरभंगा के महाराजा को भी इसी प्रकार का सम्मान दिया गया हैं।

इसलिए यह कहना सही नही हैं कि अन्य संस्थापकों और योगदान करने वालो की उपेक्षा कर दी गई हैं।

निष्कर्ष 

बीएचयू की स्थापना एक महान उद्देश्य से जुडी हुई हैं, जिसके तहत हमारे महापुरुष ऐसी शिक्षा के लिए प्रयासरत थे, जो गरीबी उन्मूलन और आय में वृद्धि के लिए भारतीय धर्म और संस्कृति के साथ तकनीकी और विज्ञान को सयोंजित करती हो। इस उद्देश्य को पूरा करने में बहुत सार्थक रहा हैं, जिसने साबित किया कि धर्म और संस्कृति तथा तकनीकी और विज्ञान एक दुसरे के विरोधी नही हैं, बल्कि एक साथ अस्तित्व में आने पर प्रगति के द्वार खोलते हैं। इस प्रकार के मूल्यों को स्थापित करने वाले विश्वविद्यालय की स्थापना से जुड़े सभी महापुरुषों का सम्मान होना चाहिए।

नेपोलियन बोनापार्ट का जीवन परिचय

नेपोलियन बोनापार्ट फ्रांस का महान बादशाह था। एक आम आदमी से बादशाह की गद्दी तक का नेपोलियन की ज़िंदगी का सफ़र जितना दिलचस्प रहा था, उरूज से उनके पतन तक की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है। कद-काठी में छोटे नेपोलियन ने अपनी बहादुरी से दुनिया के एक बड़े हिस्से पर अपना राज क़ायम किया था। ब्रिटेन के महान योद्धा ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन ने कहा था कि जंग के मैदान में नेपोलियन, 40 हज़ार योद्धाओं के बराबर है। नेपोलियन के सैनिक उससे मोहब्बत करते थे, तो दुश्मन उससे ख़ौफ़ खाते थे। आज की तारीख़ में भी बहुत कम ऐसे लोग हैं जो नेपोलियन की ऊंचाई तक तक पहुंचे।

नेपोलियन का जन्म कोर्सिका द्वीप के अजाचियो में 15 अगस्त 1769 को हुआ था।  फ्रांस ने कोर्सिका द्वीप को नेपोलियन के पैदा होने से एक साल पहले ही जेनोआ से जीता था। जब फ्रांस की सेना ने कोर्सिका पर हमला किया था, तो स्थानीय लोग फ्रांस के विरोध में खड़े हुए थे। हालांकि बाद में उन्होंने फ्रांस की सत्ता मान ली थी। नेपोलियन के मां-बाप बहुत अमीर नहीं थे। वो सामंती परिवार से नहीं थे, हालांकि वो इसका दावा बहुत करते थे। नौ साल की उम्र में नेपोलियन पढ़ाई के लिए फ्रांस चले आए। वो ख़ुद को बाहरी महसूस करते थे। फ्रांस के रीति-रिवाज से नावाक़िफ़ नेपोलियन की शुरुआती पढ़ाई ऑटुन में हुई। इसके बाद वो पांच साल तक ब्रिएन में रहे। पढ़ाई का आख़िरी साल उन्होंने पेरिस की मिलिट्री एकेडमी में गुज़ारे।  नेपोलियन को सितंबर 1785 में ग्रेजुएट की डिग्री मिली।  58 लोगों की क्लास में वो 45वें नंबर पर रहे थे। जब नेपोलियन पेरिस में थे तभी उसके पिता की मौत हो गई। परिवार पैसे की तंगी झेल रहा था।

नेपोलियन की उम्र उस वक़्त सिर्फ़ 16 बरस थी। वो परिवार के सबसे बड़े लड़के भी नहीं थे। फिर भी उन्होंने परिवार की ज़िम्मेदारी उठा ली। फ्रांस की सेना में नेपोलियन को तोपखाना रेजिमेंट में सेकेंड लेफ्टिनेंट की रैंक मिली थी। वो उस दौरान सेना की रणनीति और लड़ाई से जुड़ी क़िताबें ख़ूब पढ़ते थे।

फ्रांस में लोकतांत्रिक क्रांति


फ्रांस में रहने के दौरान उन्हें कोर्सिका की बहुत याद आती थी। अपनी क़िताब लेटर्स सुर ला कोर्स में नेपोलियन ने आज़ाद कोर्सिका की कल्पना उकेरी थी, जो फ्रांस के क़ब्ज़े से मुक्त था। डिग्री मिलने के साल यानी 1786 में ही वो कोर्सिका लौट आए और अगले दो साल तक वापस सेना की नौकरी पर नहीं गए।

1789 में फ्रांस में लोकतांत्रिक क्रांति हो गई। जनता ने बस्तील जेल पर हमला करके क़ैदियों को आज़ाद करा लिया।  फ्रांस में एक नए युग की शुरुआत हो चुकी थी।  फ्रांस की नई संसद ने कोर्सिका के नेता पास्कल पाओली को वापस जाने की इजाज़त दे दी। नेपोलियन भी एक बार फिर कोर्सिका लौट गए।

नेपोलियन का स्वागत


शुरू में तो कोर्सिका में नेपोलियन का स्वागत हुआ। लेकिन जब उनके छोटे भाई लुसिएन ने पाओली को ब्रिटिश एजेंट कहकर विरोध शुरू किया तो कोर्सिका के लोग बोनापार्ट परिवार के ख़िलाफ़ हो गए। नेपोलियन और उनका परिवार इसके बाद फ्रांस में आकर रहने लगे। फ्रांस के प्रति वफ़ादारी दिखाने के लिए नेपोलियन को ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

फ्रांस की सरकार का विरोध कर रहे सैनिकों ने टूलों शहर को अंग्रेज़ों के हवाले कर दिया था। दक्षिणी फ्रांस स्थित टूलों, भूमध्यसागर में बड़ा सैनिक अड्डा था। फ्रांस के लिए टूलों को दोबारा जीतना ज़रूरी थी। अगर फ्रांस का उस पर क़ब्ज़ा नहीं होता, तो फ्रांस में हुई क्रांति पर बड़ा धब्बा लग जाता।

24 की उम्र में ब्रिगेडियर जनरल


टूलों को जीतने की ज़िम्मेदारी नेपोलियन को दी गई। आख़िर में ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पड़ा। इस जीत के बाद नेपोलियन को महज़ 24 बरस की उम्र में ब्रिगेडियर जनरल बना दिया गया। युद्ध में नेपोलियन की कामयाबियों के क़िस्से मशहूर होने लगे। सेना के कमिश्नर ने नेपोलियन की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते हुए चिट्ठी लिखी।

उस वक़्त फ्रांस की सत्ता मैक्सीमिलियन रॉब्सपियर के क़ब्ज़े में थी। देश उनके ज़ुल्मो-सितम से बेहाल था। हज़ारों लोगों को उसने गुलेटिन या सूली पर चढ़ा दिया था। 1794 की शुरुआत में आल्प्स पर्वत इलाक़े मे तोपखाने का इंचार्ज बनाया गया। रॉब्सपियर की ताक़त कम होने से नेपोलियन के तेज़ी से चमकते करियर पर ब्रेक लगा।

सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत


लेकिन ये कुछ वक़्त के लिए ही था। जब शाही परिवार के भक्तों ने लोकतांत्रिक सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत की, तो सरकार को बचाने की ज़िम्मेदारी नेपोलियन पर आई। पांच अक्टूबर 1795 को शाही परिवार के समर्थकों ने पेरिस के नेशनल कन्वेंशन को घेर लिया।

नेपोलियन ने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ क़रीब बीस हज़ार लोगों की सेना का सामना किया। उसने अपनी बहादुरी से विरोधियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। नेपोलियन ने नए गणतंत्र को तो बचाया ही, अपनी तरक़्क़ी का रास्ता भी खोल लिया। नेपोलियन ने मार्च 1796 में जोसेफ़ीन नाम की महिला से शादी की।

जोसेफ़ीन और नेपोलियन


जोसेफ़ीन के पति को रॉब्सपियर ने सूली पर चढ़ा दिया था। वो किसी दौर में फ्रांस के सबसे ताक़तवर शख़्स रहे पॉल बारा की रखैल रह चुकी थीं। जोसेफ़ीन, नेपोलियन से कई साल बड़ी थी। नेपोलियन उन्हें टूटकर प्यार करते थे। लेकिन जोसेफ़ीन के लिए ये शादी महज़ मौक़ा परस्ती थी।

पॉल के छोड़ देने के बाद उन्होंने सिर्फ़ सहारे के लिए नेपोलियन का हाथ थामा था। शादी के दो दिन बाद नेपोलियन इटली रवाना हो गए थे। उन्हें इटली में सेना का कमांडर बनाया गया था। जब उन्होंने मुआयना किया तो सेना को बेहद कमज़ोर हालत में पाया। इसके बावजूद उसने कई जंगों में जीत हासिल की।

नेपोलियन की शोहरत


आख़िर में वो उत्तरी इटली के बेताज बादशाह बन गए थे। अब उन्हें राज करना आ गया था। वो समझने लगे थे कि कैसे लोगों से काम कराया जाए। कैसे संविधान बनाया जाए। एक साल के भीतर नेपोलियन की शोहरत नई ऊंचाई छूने लगी थी। इटली में नेपोलियन के अच्छे दिन बीते। उस वक़्त सिर्फ़ ब्रिटेन ही था जो फ्रांस के विरोध में था।

साल 1798 में नेपोलियन ने मिस्र पर हमला बोल दिया। वो भारत और ब्रिटेन के बीच का रास्ता रोक कर ब्रिटेन को घुटने टेकने पर मजबूर करना चाहते थे। साथ ही वो पूर्वी दुनिया में फ्रांस के साम्राज्य का विस्तार भी करना चाहते थे। लेकिन नेपोलियन का ये सपना साकार नही हुआ।

ताक़तवर सेना की ज़रूरत


होरासियो नेल्सन नाम के ब्रिटिश कमांडर ने नेपोलियन के 35 हज़ार सैनिकों को घेर लिया। वो घर भी वापस नहीं जा पा रहे थे। ब्रिटेन और रूस ने फ्रांस के ख़िलाफ़ गठजोड़ कर लिया था। फ्रांस में सरकार के नए अगुवा इमैनुअल सीस को महसूस हुआ कि सत्ता के लिए ताक़तवर सेना की ज़रूरत है।

इमैनुअल को ऐसे सेनापति की ज़रूरत महसूस हुई जो पेरिस में रहकर सरकार की हिफ़ाज़त करे। मौक़ा अच्छा देख नेपोलियन ने अपने सैनिको को मिस्र में छोड़ा और जा पहुंचे फ्रांस। जब नेपोलियन पेरिस पहुंचे तब तक फ्रेंच सेनाओं ने स्विट्ज़रलैंड और हॉलैंड में जीत हासिल कर के हालात अपने हक़ में कर लिए थे।

सत्ता के शिखर पर


लेकिन इमैनुअल और नेपोलियन ने उस वक़्त की सरकार का तख़्ता पलट करके सत्ता अपने हाथ में ले ली। अब नेपोलियन यूरोप के सबसे ताक़तवर देश के अगुवा बन चुके थे। सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद पूरे यूरोप में नेपोलियन का डंका बज रहा था। एक तरफ़ तो वो जंग के मैदान में कामयाबी के झंडे बुलंद कर रहा था।

तो, दूसरी तरफ़ उसने प्रशासनिक सुधार की ऐसी हवा चलाई जो आज तक मिसाल बनी हुई है। 1802 तक नेपोलियन ने यूरोप में शांति बहाल कर ली थी। ऑस्ट्रिया को इटली के मोर्चे पर शिकस्त दी जा चुकी थी। वहीं जर्मनी और ब्रिटेन ने फ्रांस की ताक़त देखकर समझौता करने में ही भलाई समझी।

फ्रांस के बादशाह का पद


जंग से फ़ुरसत पाने पर नेपोलियन ने क्रांति के बाद के फ्रांस की नींव रखी। उन्होंने लोगों को निजी आज़ादी का अधिकार दिया। लोगों को अपनी पसंद का धर्म मानने का अधिकार दिया। नेपोलियन ने ही क़ानून के सामने सब को बराबरी के अधिकार के सिद्धांत की बुनियाद रखी। इस दौरान उन्होंने फ्रांस में सबसे ताक़तवर सेना भी तैयार की।

इन कामयाबियों के चलते नेपोलियन को ज़िंदगी भर के लिए कॉन्सुल यानी सत्ता के बड़े अधिकारी की पदवी दी गई। लेकिन, यूरोप में लंबे वक़्त तक अमन क़ायम नहीं रह सका। फ्रांस की अंदरूनी खींचतान और दूसरे देशों से युद्ध के चलते हालात ऐसे बने कि नेपोलियन को फ्रांस के बादशाह का पद संभालना पड़ा।

सबसे बड़ी जंग


फ्रांस की सरकार के विरोधी दो लोगों ने नेपोलियन की हत्या की साज़िश रची। जब इसका पर्दाफ़ाश हुआ, तो नेपोलियन को लगा कि जब तक राजशाही नहीं होगी, तब तक फ्रांस में अमन क़ायम नहीं हो सकता। तब 1804 में उसने पोप की मौजूदगी में ख़ुद को बादशाह घोषित कर दिया।

फ्रांस का राजा बनने के एक साल बाद यानी 1805 में नेपोलियन ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग जीती। ये युद्ध आज के चेक रिपब्लिक में ऑस्टरलित्ज़ में हुआ था। नेपोलियन के मुक़ाबले ऑस्ट्रिया और रूस की सेनाएं थीं। नेपोलियन ने जाल बिछाकर दुश्मन के 26 हज़ार सैनिकों को मार डाला।

ट्रैफलगर की लड़ाई


इसके मुक़ाबले नेपोलियन के सिर्फ़ 9 हज़ार सैनिक मारे गए। ऑस्ट्रिया को हराकर नेपोलियन ने एक बार फिर यूरोप पर अपना सिक्का जमा लिया था। वो अपने दौर का सबसे महान सैन्य कमांडर बन चुका था। साथ ही उसने रूसी साम्राज्य की सेना को भी धूल चटा दी।

ट्रैफलगर की लड़ाई के बाद ब्रिटेन पर हमले की नेपोलियन की उम्मीदें टूटती जा रही थीं। इस वजह से ब्रिटेन के साथ शांति समझौते की उम्मीद भी। नेपोलियन ने एक बार फिर से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर करने की कोशिश की। उन्होंने ब्रिटेन के साथ हर तरह के कारोबार पर रोक लगाने की कोशिश की।

ब्रिटेन से व्यापार


ब्रिटेन से हर तरह का व्यापार रोक दिया गया। ब्रिटेन आने-जाने वाले हर जहाज़ को लूटने की पूरी छूट दे दी गई। नेपोलियन को उम्मीद थी कि दबाव में आने पर ब्रिटेन समझौते के लिए राज़ी हो जाएगा। मगर पुर्तगाल ने नेपोलियन का ब्रिटेन से कारोबार न करने का फ़रमान मानने से इनकार कर दिया।

नेपोलियन ने स्पेन और पुर्तगाल पर क़ब्ज़ा कर लिया। दोनों देशों में नेपोलियन के ख़िलाफ़ बग़ावत हो गई। ब्रिटेन ने आर्थर वेलेज़ली की अगुवाई में एक सैन्य टुकड़ी पुर्तगाल और स्पेन की मदद के लिए भेज दी। इससे ब्रिटेन को यूरोपीय महाद्वीप में पैर जमाने का मौक़ा मिल गया।

नेपोलियन की ताक़त


स्पेन और पुर्तगाल में नाकामी के बावजूद नेपोलियन की ताक़त में कमी नहीं आई थी। उनका साम्राज्य हॉलैंड, इटली और जर्मनी के एक बड़े हिस्से तक फैल चुका था। अब नेपोलियन को ज़रूरत थी अपने वारिस की। उसने 1810 में जोसेफ़ीन को तलाक़ दे दिया। इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रिया के राजा फ्रांसिस प्रथम की बेटी मेरी लुई से शादी कर ली।

जल्द ही नेपोलियन को बेटा हुआ। उनके बेटे का नाम भी उनके ही नाम पर रखा गया। नेपोलियन ने रोम के राजा की उपाधि भी ले रखी थी। साल 1812 में ब्रिटेन की आर्थिक नाकेबंदी को कामयाब बनाने के लिए फ्रांस ने रूस की सीमा पर छह लाख सैनिक जमा कर दिया। उसका मक़सद ब्रिटेन की आर्थिक नाकेबंदी के लिए रूस को राज़ी करना था।

रूस में नाकामी


इधर स्पेन में ब्रिटेन के कमांडर ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन ने नेपोलियन की सेना को शिकस्त दे दी। रूस के मोर्चे पर भी नेपोलियन को कुछ ख़ास कामयाबी नहीं मिल रही थी। कोई भी जंग जीतता नहीं दिख रहा था। 1812 में नेपोलियन ने मॉस्को पर क़ब्ज़ा कर लिया। लेकिन सर्दियां आ रही थीं। मजबूरी में नेपोलियन को पीछे हटना पड़ा।

जब तक वो अपने वतन लौट पाते उनकी सेना में महज दस हज़ार सैनिक ही युद्ध के लायक़ बच रहे थे। रूस में नाकामी और स्पेन में हार के बाद ऑस्ट्रिया और प्रशिया एक बार फिर से नेपोलियन को हराने की फिराक़ में थे। उनकी बादशाहत बिखर रही थी। 1814 के मार्च महीने में दुश्मनों ने राजधानी पेरिस को घेर लिया।

फ्रांस के हालात


नेपोलियन को गद्दी छोड़नी पड़ी। उन्हें एल्बा नाम के एक जज़ीरे पर क़ैद कर के रखा गया था। फ्रांस की गद्दी पर लुई 16वें को बैठाया गया। क़ैद से भी नेपोलियन की निगाह फ्रांस के हालात पर थी। 1815 में वो क़ैद से भाग निकले और पेरिस पहुंच गए। पेरिस पहुंचने के बाद नेपोलियन ने संविधान में तेज़ी से बदलाव किए।

इससे कई विरोधी नेपोलियन के पाले में आ गए। 1815 में मार्च महीने तक यूरोप के कई देशों ने मिलकर नेपोलियन के ख़िलाफ़ मोर्चा बना लिया था। जून में नेपोलियन ने बेल्जियम पर हमला कर दिया। लेकिन 18 जून को वाटरलू की लड़ाई में ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन ने उन्हें शिकस्त दे दी। इसके बाद वो फिर कभी क़ैद से नहीं छूट सके।

यूरोप का नक़्शा


ब्रिटेन ने नेपोलियन को क़ैद करके दक्षिणी अटलांटिक स्थित सेंट हेलेना नाम के द्वीप पर रखा। उन्हें न तो परिवार से मिलने दिया गया, न ही उनकी कोई ख़बर दी गई। अगले छह साल नेपोलियन ने तन्हाई में बिताए। वो खाते थे। ताश खेलते थे। लिखते थे। उन्होंने बोलकर अपना ज़िंदगीनामा भी लिखवाया।

1821 में पेट के कैंसर से नेपोलियन की मौत हो गई। मगर दुनिया को अलविदा कहने से पहले नेपोलियन ने यूरोप के नक़्शे पर कभी न मिटने वाली इबारत लिख डाली थी।

समाजवादी चिंतक मस्तराम कपूर का साहित्यिक योगदान

मस्तराम कपूर मशहूर समाजवादी लेखक और चिंतक थे। समाजवादी चिंतन से संबंधित उन्होंने 100 से अधिक किताबें लिखी हैं। राम मनोहर लोहिया की जीवनी पर उनके लिखे अंग्रेजी में दस और हिंदी में नौ खंड प्रकाशित हुए थे। इससे उन्हें काफी लोकप्रियता मिली थी।  समाजवादी नेता मधु लिमये के वह काफी करीबी थे। अपने जीवन के अंतिम दिनों तक वह गैर कांग्रेस और गैर बीजेपी युक्त तीसरी शक्ति के गठबंधन के लिए कोशिश करते रहे। मस्तराम कपूर का जन्म  22 दिसंबर1926 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में हुआ था। वे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यश भारती पुरस्कार से भी सम्मानित किए जा चुके हैं। अप्रैल 2013 में उनका 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं में अपना योगदान दिया हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं -

उपन्यास : 
विमथगामी, रास्ता बंद, कान चालू, नाक का डॉक्टर, एक सदी बाँझ तथा बिषय-पुरुष ।

कहानी-संग्रह : 
एक अदद औरत, ग्यारह पत्ते, ब्रीफकेस, हेनी और अन्य कहानियाँ (प्रेस में) ।

नाटक : 
पत्नी ऑन ट्रायल, सॉप आदमी नहीं होता ।

कविता : 
कूडेदान से साभार ।

निबंध : 
हम सब गुनहगार, समसामयिक प्रतिक्रियाएँ, पं० चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी', साहित्यकार का संकट, अस्तित्ववाद से गांधीवाद तक, राष्ट्रीय एकता का संकट और साम्प्रदायिक शक्तियां, मंडल रिपोर्ट : वर्णव्यवस्था से समाजवादी व्यवस्था की ओर, साम्यवादी विश्व का विघटन और समाजवाद का भविष्य ।

पैम्फलेट : 
हिन्दूवाद आत्महत्या की ओर, नर-नारी समता के मायने, साम्प्रदायिक दंगों का समाजशास्त्र, अंग्रेजी हटाओ' आंदोलन की प्रासंगिकता, भ्रष्टाचार : उपभोगवादी संस्कृति का ब्रह्मराक्षस, वर्तमान सभ्यता का संकट और गांधी-लोहिया ।

बाल-साहित्य : निर्भयता का वरदान, दंड का पुरस्कार, सहेली, बेजुबान साथी, मुँहमाँगा इनाम, पहला पडाव, बीजू की दादी, पारस की खोज (कहानी-संग्रह);
नीरू और हीरू, सपेरे की लड़की, भूतनाथ, सुनहरा मेमना (उपन्यास); एक थी चिड़िया (चित्रकथा) स्पर्धा, बच्चों के नाटक, बच्चों के एकांकी पाँच बाल-नाटक (नाटक) ।

अनुवाद : 
ग्यारह तुर्की कहानियां, आंध्र प्रदेश : लोक संस्कृति और साहित्य, डॉ० आंबिडकर : एक चिंतन, सरदार पटेल : व्यवस्थित राज्य के निर्माता, एशिया के बाल-नाटक, स्वामी और उसके दोस्त आदि ।