Survival Against The Fittest

survival against the fittest
डार्विन ने प्रकृति को ध्यान में रखते हुए सक्षमों की उत्तरजीवता का सिद्धांत दिया था। औधोगिक क्रांति के दौर में हर्बर्ट स्पेंसर ने इसे मानव समाजो पर भी लागू कर दिया। तो समाजवादी लोगो ने इसकी आलोचना की और अक्षमों को भी अस्तित्त्व के योग्य माना है। समय का पहिया घूमता रहा और केन्सवाद ने पूंजीवाद को मानवीय चेहरा दिलाकर फिर से मान्यता दिलाई। अब नव-उदारवाद का जमाना है जिसमे राज्य निजी क्षेत्रो को आज़ादी दे रहा है और अक्षमों को पाल भी रहा है। लेकिन इस जमाने में क्या ये दोनों साथ-साथ सफर तय कर पाएंगे। या फिर अक्षमों को अस्तित्व के लिए विशेष प्रयास करने होंगे। इस विषय को विभिन्न उदाहरणों की सहायता से समझने की कोशिश करते है। 

क्या अब भी कोई समाजवाद की तरह प्रासंगिक विचारधारा होगी जो यह कहेगी कि अक्षमों को भी अस्तित्त्व का गरिमापूर्ण हक़ है। क्या इस दौर में भी मार्क्स, लेनिन, माओ, कास्त्रो जैसे लोग होंगे। 

Issue of  Survival Against Fittest

पहला प्रश्न तो यह है कि क्या सक्षमों के विरुध्द उत्तरजीविता वास्तविक मुद्दा है या फिर अपवादों को सामान्यकरण किए जाने की कोशिश है। इसके अलावा सक्ष्मो के साथ उत्तरजीविता भी तो सिद्धांत हो सकता है जो की समाज में पाया जाता हो और उसकी संख्या भी ज्यादा हो। 

कुछ उदाहरण लेते है -
  1. आजकल बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनिया देशो में खड़े होने वाले छोटे छोटे स्टार्टअप्स और छोटे प्लेयर्स का अधिग्रहण करती जा रही है। छोटी कम्पनिया बड़ी कम्पनियो के द्वारा दिए जाने वाले ऑफर्स के सामने उपभोक्ता के लिए वहनीय नहीं है। अत वे खुद का विलय करने को ही उचित समझती है। इन बड़ी कम्पनियो से टक्कर के लिए दूसरी कम्पनिया भी विलय करके बड़ी कम्पनिया बना रही है। इसके बाद कुछ ही प्लेयर मार्किट में रह जाएंगे या फिर एकाधिकार स्थापित हो जाएगा। उसके बाद उपभोक्ता के पास विकल्प कम हो जाएंगे और उसे महंगी दर पर भी सामान खरीदना पड़ेगा। यहां से लाभों का एकतरफा हस्तांतरण बड़ी कंपनियों की तरफ होगा। तब ये साम्राज्यों का रूप ग्रहण कर चुकी होगी और राजनितिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर रही होगी। 
  2. सिविल सेवाओं की तैयारी कराने के लिए जो बड़े संस्थान है उनके पास बहुत सारा पैसा इकठ्ठा हो गया है। जिसकी बदौलत ये सभी क्षेत्रो में निवेश कर रहे है। जिसके कारण विकेद्रीकृत प्लेयर्स को टक्कर  मिल रही है। ये अपने लाभों को अधिकतम करने के लिए सभी क्षेत्रो में कूदना चाह रहे है। इससे नए प्लेयर्स का इस क्षेत्र में प्रवेश करने के बारे में सोचना भी असंभव है। 
  3. क्या हिंदी दूसरी बोलियों को खत्म कर रही है।
यहां से हम देख सकते है कि निजी क्षेत्र आपस की गलाकाट स्पर्द्धा में ही लगा हुआ है। वे कैसे अपने लाभों को अधिकतम करे। इसके लिए कैसे प्राकृतिक संसाधनों तक किफायती पहुंच हो,कैसे सेवा मानको में रियायत हो। इन सबके लिए मूक समर्थन देने वाली सरकारों की स्थापना हो। इन सब चीजों में निजी क्षेत्र लगा हुआ है। ऐसे में उनको सामाजिक न्याय के मुद्दे याद दिलाना बहुत ही गलत चीज है।

मतलब जो सक्षम है वो और अधिक सक्षम होता जा रहा है। वही औसत लोगो को इनसे कड़ी प्रतिस्पर्द्धा  मिल रही है। बाकी अक्षम लोगो की बात यहां पर अप्रासंगिक हो जाती है। 

Public Affairs in Corpoarte 

ऐसा भी नहीं है कि कॉर्पोरेट को लोगो की बिल्कुल भी परवाह नहीं है। हम जानते है कि अगर लोगो के पास खरीदने की क्षमता ही नई होगी तो कॉर्पोरेट का अस्तित्व कैसे रहेगा। इसलिए लोगो के पास आय की उच्च मात्रा हो यह तो वे चाहते है। लेकिन इसके लिए किसकी क्या जिम्मेदारी होगी इसको लेकर ही तो संशय की स्थिति है।
  1. कॉर्पोरेट का यह भी मानना है कि यह जिम्मेदारी वे क्यों ले। यह तो राज्य का काम है। इसलिए राज्य को ही इसका पालन करना चाहिए।  
  2. कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी को अब वैधानिक अनिवार्यता बना दिया गया है। इसके लिए सभी निकायों को कुछ योगदान करना होता है। कई कॉर्पोरेट इसका उल्लंधन भी कर रहे है, जिससे दुसरो को भी यही लगता है की वे भी क्यों करे।  
  3. इसके अलावा एक और आयाम भी मौजूद है। जो जनसंख्या वृद्धि के आधार पर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। दरअसल भारत में आर्थिक विषमता के असंख्य स्तर मौजूद है। कोर्पोर्टे को लगता है कि जितनी उसकी उत्पादन क्षमता है उतने स्तर के पास क्रय शक्ति है। इसलिए बाकी लोग उपभोक्ता भी नहीं है। इसलिए उन पर खर्च क्यों किया जाए या फिर उनके हितो के लिए क्यों सोचा जाए। 
इस प्रकार कॉर्पोरेट की मनोवृत्ति  में हम असंवेदनशीलता की झलक देख सकते है। हालांकि यह उम्मीद ही बेमानी है। 

Survival With fittest

हम देख चुके है कि कॉर्पोरेट का लालच निम्नतरो की उत्तरजीविता में बाधक है। अगर कॉर्पोरेट पर अंकुश नहीं लगाया गया तो यह व्यवस्था अनवरत चलती रहेगी। अब इसके लिए निम्न प्रयास किए जा सकते है जिसके आधार पर हम श्रेष्ठो के साथ उत्तरजीविता के सिद्धांत की परिकल्पना कर सकते है। 
  1. हमे टैक्स हैवन की अवधारणा का विरोध करना होगा। कर अपवंचना से सख्ती से निपटना होगा। कर अनुपालन की संस्कृति विकसित करनी होगी। 
  2. कॉर्पोरेट रेस को रोकने के लिए हमे अधिक कर लगाना पड़ेगा। ताकि हम बिलेनियर की अवधारणा को हतोत्साहित करना होगा। 
  3. कॉर्पोरेट घराने की व्यवस्था भी न केवल अर्थव्यवस्था के लिए खरतनाक है बल्कि राजनितिक और सामाजिक तौर पर भी इसके कई नकारात्मक प्रभाव होंगे।
  4. प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में भी उचित नीति के निर्माण की जरुरत है। ताकि उसका दोहन किसी एक इकाई के हित में नहीं हो। 
  5. कॉर्पोरेट जगत के मूल्यों में बदलाव भी जरुरी है। मुनाफा रेस का कोई गंतव्य होना चाहिए। बिना गंतव्य के यह सफर सामाजिक और आर्थिक अन्याय का कारण बनेगा। 
शेर और बकरी के एक घाट पर पानी पीने की कहानी के समान यह अवधारणा है। जिसमे एक के दांतो की तीक्ष्णता को थोड़ा कम करना पड़ेगा वही दूसरे की खाल को मजबूत बनाना होगा। इस प्रकार एक तरफ कॉर्पोरेट पर अंकुश लगाना होगा , वही दूसरी तरफ निम्नतरो के लिए सुरक्षोपाय बढ़ाने होंगे।

खंड II

Force Survival - Life With fittest

हम यह मानकर चलते है कि सभी की उत्तरजीविता के लिए बाह्य समर्थन की जरूरत होती है। अगर हम जैसे-तैसे करके लोगो को बचा भी लेते है तो क्या होगा। क्या वे उस स्तर पर बने रहेंगे ? क्या उस स्तर पर भी प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न नहीं होगी। क्या फिर हम आगे के अस्तित्व के लिए फिर से हस्तक्षेप करेंगे। ये चक्र फिर तो चलता ही रहेगा, जब तक कि हम Theory of Internal Development  के अनुसार आगे नहीं बढ़ जाते।

अगर ऐसा है तो क्यों न हम, रेस की बजाय खुद के हस्तक्षेप को रोके। हमारे भूमिका को हम निष्पक्ष अंपायर की बनाये। हम जानते है कि सभी लोग समान रूप से कर्मठ, मेहनती तो नहीं होते। ऐसे में उन्हें कमजोर व्यक्तित्व के लोगो के लिए रोकना कहां तक सही हो सकता है। जो आलसी है वो तो फिर से नीचे आ जाएगा और जो मेहनती है वो फिर से ऊपर जाएगा। ऐसे में विभाजन तो प्राकृतिक पहलु है, इसलिए इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा।

हाँ, हमे इतना जरूर ध्यान रखना है कि ये विभाजन अनैतिक या अनुचित साधनो के माध्यम से अर्जित नहीं किया जाए। आगे यह विभाजन दुसरो के अवसरों को ही खत्म नहीं कर दे। साथ ही समाज का आर्थिक विभाजन सांस्कृतिक विभाजन में नजर नहीं आये। लेकिन यह तो साथ में जुड़े होते है, इससे इंकार कैसे किया जा सकता है। जब ऊपरी वर्ग का आदमी नीचे के वर्ग को हिकारत, घृणा से देखता है। जब यह बात निम्न वर्ग के बुद्धिजीवी लोगो को खटकती है तो उनमे चेतना जाग्रत होती है। यहां से फिर उच्च वर्ग को चुनौती की जमीं तैयार होती है।

अब जो कॉर्पोरेट आपसी लाभ के लिए लड़ रहे थे, निम्नस्थ वर्ग के खिलाफ एकजुट हो जाते है। वे सरकार को प्रभावित करने में अधिक मजबूत स्थिति में होते है। वे निम्न तबके के आंदोलनों को कॉर्पोरेट मीडिया, बुद्दिजीवियो और नेताओ के गठबंधन के माध्यम से कुचल देते है। सबसे बड़ी बात तो यह है की इस चेतना का दमन करने के लिए लोगो को जाति, धर्म, भाषा के आधार पर बाँट देते है।

निम्नस्थ की प्रतिक्रिया को फिर प्रशासनिक आश्वासनों के नीचे दबा दिया जाता है। क्योकि समाधान तो इसी व्यवस्था के तहत होने होते है। कई बार निम्नस्थो की चेतना का दोहन करके कोई चुनावी नेता और निर्मित हो जाता है। उच्चस्थ और निम्नस्थो के बीच आपसी प्रतिक्रिया की अब लगभग यह संस्कृति बन गई है। अब एक ही उपाय बचता है कि आप भी पढाई,प्रतिभा,नौकरी के बल पर अपनी हैसियत को ऊंची करो। और इस विभेदकारी व्यवहार वाली व्यवस्था के पीड़ित होने से बच जाओ।

इसलिए अब समाधान के तोर पर लॉन्चिंग ही विकल्प उभरकर आता है। Launching of Individuals को हम पहले ही शक की दृष्टि  से देख चुके है। ऐसे में लॉन्चिंग के लिए दूसरे उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। मतलब लांच होने की इच्छा की तीव्रता भी हर किसी में समान नहीं होती। इसलिए जिनकी इच्छा तीव्र है वे कही न कही से अपना प्लेटफार्म तलाश लेंगे। अगर हम थोड़ा सा उनका यहां पर सहयोग करे और उन्हें प्लेटफार्म की तलाश में मदद करे। तो फिर संघर्षो को किसी दूसरे लाभदायक जगह पर प्रयुक्त किया जा सकता है। 

1. Launching Will

लॉन्चिंग की चाहत की तीव्रता लोगो में भिन्न- भिन्न होती है। कोई हर कीमत पर लांच होना चाहता है, तो कोई थोड़े बहुत त्याग के साथ। कुछ लोग बिलकुल भी त्याग नहीं करना चाहते, वे अपनी निम्नस्थ हालत में भी सुकून तलाश लेते है। इलसिए निम्नस्थ स्तर वाले लोगो को ये विभाजनकारी समाज वाली व्यवस्था ज्यादा नहीं कचोटती है। वे बुरा बर्ताव भी अपनी किस्मत मानकर झेल लेते है। कई बार ये निम्नतरो के उच्च्तरो पर चुटकले सुनकर खुश रहते है। 

यह इच्छा उन लोगो में ज्यादा होती है जिनमे स्वाभिमान, आत्म सम्मान जैसे गुणों का समावेश किसी माध्यम से प्रवेश करता है। अब वे अपने इन मूल्यों की प्राप्ति के लिए संघर्ष करके आगे बढ़ना चाहते है। लोगो को गरिमामय जीवन का महत्व समझा कर आगे बढ़ने की चेतना जाग्रत करना यहां पर जरूरी हो जाता है। 

2. Bridging the Will Gap

एक तरफ कॉर्पोरेट की इच्छा आगे बढ़ने की है वही निम्नतरो की केवल अस्तित्व बनाये रखने की है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इच्छाओ के इस अंतराल को हम कैसे देखे - सकारात्मक या नकारत्मक। सीधी सी बात है सकारात्मक रूप में ही देखेंगे। 

3. Options of Minimum Launching 

हम सभी जानते है कि निर्धनता जाल किसी परिवार की लॉन्चिंग में बाधा है। इसलिए हमे उन चीजों की उपलब्धता सभी के लिए बढ़ा देनी चाहिए जो निर्धनता जाल को तोड़ने के लिए जरूरी होती है। अब सरकार इनकी उपलब्धता, गुणवत्ता बढ़ा रही है।

4. People Without Launching

कई बार आदमी लॉन्चिंग के प्रयास करने के बाद भी कक्षा में परिवर्तन करने में विफल रहता है। ऐसे में हताशा, निराशा जैसे विकार उसे घर कर जाते है। वह अपनी बाकी जीवन भी आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए अभावो से जूझता रहता है। इस वजह से उसकी सक्रिय नागरिकता में भी कमी आती है। जिसकी वजह से रुग्ण राजनीती का भी चक्र कायम रहता है।

5. Lessions for Launching At All

बिल गेट्स का मानना है कि आप गरीबी में जन्म लेते है ये आपकी गलती नहीं है, लेकिन अगर आप गरीबी में मर जाते है तो आप निश्चित तौर पर अपराधी है। इसलिए हमे अपनी परिस्थिति को बदलने का प्रयास हर हाल में करना चाहिए। साधन की पवित्रता से समझौता अगर निचली कक्षा से आगे बढ़ने के लिए किया जाए तो उसमे ज्यादा बुराई नहीं है। चूँकि निचले स्तर पर अनैतिक कदम के दुष्परिणाम नगण्य होंगे। जिन्हे सकारात्मक परिणाम के कारण आसानी से स्वीकार कर लिया जाएगा।    

इस प्रकार हमने निम्नतरो की दयनीय हालत को सुधारने के मार्ग का अवलोकन किया और इस मार्ग में मौजूद रुकावटों को हटाने के लिए उठाये जाने वाले कदमो पर भी विचार किया।

खंड III

Absent of Mission Against Distortions

जब उन्नीसवीं सदी में औधोगिक क्रांति के बाद समाज में असमानता फैली और उसकी वजह से जो विसंगतिया उत्पन्न हुई, उनका विभिन्न विचारको ने पुरजोर विरोध किया। जिनमे मार्क्स के विचारो से आगे बढ़ा समजवादी आंदोलन प्रमुख था। वर्तमान में औधोगिक क्रांति का चतुर्थ चरण चल रहा है लेकिन अब कोई भी इसके द्वारा निर्मित विसंगतियों का विरोध कर रहा है। इतना तो स्पष्ट हो गया है कि आज की विसंगतियों को पुराना समाजवादी आंदोलन सम्बोधित नहीं करता है। अब सवाल उठता है कि  क्या इस दौर में मार्क्स, लेनिन, माओ, कास्त्रो जैसे लोग नहीं रहे।

बहुत हद तक कहा जा सकता है कि बाजारवाद ने जिस हद तक व्यक्तिवाद को आगे बढ़ाया है कि अब कोई भी आदमी समाज के बारे में सोचने और करने के लिए खुद के हितो को दांव पर नहीं लगा सकता। अब आदमी में पहले के समान धैर्य भी नहीं रहा, जो दीर्घकालीन संघर्ष की सोचे। इसके अलावा कॉर्पोरेट यह स्थापित करता है कि समाज के लिए सोचना और करना भी एक बिज़नेस है। इस  वजह से भी लोग सामाजिक सरोकारों से कट रहे है। कुछ लोग सामाजिक सरोकारों को केवल चुनावी राजनीती की विषयवस्तु मानता है। ऐसे में अब निम्नतरो के हितो के संरक्षण के लिए दबाव समूहों का अभाव महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है।

अत: ऐसे लोगो को आगे बढ़ाना चाहिए जो समाजिक विसंगतियों के विरोध को मिशन के तौर पर लेकर उन्हें न्यून करने के लिए सरकार के साथ संवाद कर सके।
खंड IV

Trends of Survival Efforts

शुरुआती पूंजीवाद ने अक्षमों के खिलाफ नकारात्मक रुख अपनाया, जिसकी बदौलत लोगो में वर्गीय चेतना का संचार जल्दी से हो गया। आगे जब केन्सवाद आ गया तो राज्यों ने पब्लिक आक्रोश के सामने खुद को बचा लिया। लेकिन अब नवउदारवाद के चरण में राज्य पर जनकल्याणकारी कार्यक्रमों से हटने का भारी दबाव है। लेकिन निजी क्षेत्र की भूमिका भी प्रोत्साहन योग्य नहीं है। इसलिए अब नागरिको को सरकार के अटेंशन से वंचित रहना पड़ेगा। लेकिन प्रशासन के पास लोगो तक पहुंचने की क्षमता में इजाफा हुआ है। इसलिए निम्नतरो के हितो को आगे बढ़ाने वाले संस्थानों को आगे करने की जरूरत है।

कई जगह पर कॉर्पोरेट भी कल्याण के कार्यक्रम चला रहा है इसलिए अब उसे सीधे आरोपी नहीं ठहरा  सकते। इस वजह से मामले में जटिलता बढ़ गई है।

Conclusion :

सक्षमों के खिलाफ उत्तरजीविता के लिए हमने यहां पर प्रयासों की आवश्यकता महसूस की। जिस प्रकार शेर और बकरी के विभाजन प्राकृतिक है, जिसमे एक का सृजन ही दूसरे के किसी न किसी निर्भरता को ध्यान में रखकर किया गया है। उसी प्रकार सक्षम और अक्षमों की उपस्थिति भी दुनिया के संचालन के लिए निर्मित की गई व्यवस्था के हिस्से है। इसलिए हम इस विभाजन को समाप्त नहीं कर सकते। हमारी आपत्ति सिर्फ इस विभाजन के असंतुलन को लेकर हो सकती है।  

Theory of Internal Interference

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जैसा की हमने व्यक्ति के भौतिक विकास के लिए बाहरी हस्तक्षेप की अवधारणा (Theory of Individual Interference) देखी थी। उसमे हमने पाया था की आदमी के भौतिक विकास को अगर संधारणीय बनाना है तो हमे उसके मानसिक विकास (Internal Development ) पर भी ध्यान देना होगा। इसके लिए हमे उसके व्यक्तित्व विकास (Persoanality Development के क्षेत्र में कार्य करना होगा। इसके आधार पर हम उसे ज्यादा मजबूत कर सकते है अपने बलबूते पर ही खुद को खड़ा करने के लिए। व्यक्तित्व का विकास बेहद ही जरूरी हो जाता है। जिसमे शामिल किए जाने वाले बिन्दुओ का हम यहां पर अध्ययन करेंगे।

व्यक्तित्व विकास के लिए व्यक्ति के आंतरिक पटल में हस्तक्षेप करना होगा। हम जानते है यह कार्य परिवार, समाज और विद्यालय के माध्यम से किया जाता है। जो व्यक्ति की समाजीकरण प्रकिया का हिस्सा रहता है। बाद में किताबो,साथियो के माध्यम से भी यह निर्धारित होता है। लेकिन जो लोग इन सभी चीजों के त्रुटिपूर्ण स्वरूपों के सम्पर्क में रहे है, उनके व्यक्तित्व के विकास में भी त्रुटि होगी। वही भोले और सीधे समाज के द्वारा सीधे सादे व्यक्तित्व का विकास होगा। इसके विपरीत जिस समाज में हमेशा बिज़नेस की बाते होती है , वहां के बच्चो में भी यह बिज़नेस भावना व्यक्तित्व का हिस्सा बन जायेगी। इस तरह व्यक्तित्व हमारे मनोवृत्ति को दिशा देता है। जिसके आधार पर हमारे आचरण में अपनी स्थिति सुधारने के लिए किए जाने वाले प्रयासों की तीव्रता शामिल होती है।

व्यक्तित्व विकास में निम्न चीजे शामिल हो सकती है - नैतिक मूल्य आदि। अब इनका हम पृथक-पृथक अध्ययन करते है।

खंड I  नैतिक विकास  

नैतिक विकास आदमी के विकास से सीधा जुड़ा हुआ है। हम देखते है कि गरीब आदमी में नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पण ज्यादा होता है। वही जैसे-जैसे यह स्तर बढ़ता जाता है ,नैतिकता का स्तर भी कम होता जाता है। इसके लिए हमे इस नैतिक अंतराल की खाई पर सेतु निर्मित करना होगा। इसके लिए हमे यह देखना होगा कि लोगो के विकास को नैतिक मूल्यों ने किस प्रकार प्रभावित किया है। वे किस प्रकार उसके विकास में बाधा बन रहे है। फिर उन्हें किस तरीके से अपडेट किया जाए। साथ ही इस कर्म में वे कही अनैतिक नहीं बन जाए। इसका भी ध्यान रखना है।

वर्तमान की नैतिकता का मूल्यांकन
वर्तमान में हमारा नैतिकता का दायरा बहुत भोला है। जिसमे छोटी-छोटी खामियों को भी अनैतिक मान लिया जाता है। यह लोगो के एम्पोवेर्मेंट में रुकावट के रूप में उभर कर सामने आती है। लोगो को सक्रिय नागरिक बनने से रोकती है। इसका कारण यह है कि हमारे पूर्वज भी हमारे सामने भोली नैतिकता को मानदंड बनाकर चले गए।

हमे गांधी की बजाय तिलक की नैतिकता की जरूरत थी। जिसमे अपने हक़ के लिए कोई परीक्षा नही देनी पड़ती थी। जबकि गाँधीजी आग्रह पर आधारित थी। आग्रह को ठुकराना कभी भी अनैतिक नही रहा। आज के प्रशासन ने यह तक कर दिया कि आपको आग्रह करने के लिए भी अनुमति की आवश्यकता होगी। अतः गाँधीजी की नैतिकता युग के हिसाब से सही नही थी। आज के युग मे गाँधीजी अप्रभावी है। मतलब जनता के लिए गाँधीजी का संघर्ष व्यर्थ चला गया। सारे सँघर्ष को नेताओ ने भुना लिया।
Question : गांधीजी आज के समय में अप्रभावी है। वह उस समय भी अप्रासंगिक ही थे। फिर किन कारणों ने गाँधी की सफलता सुनिश्चित की। विश्लेषण करो।  
हम इतना जानते है कि गांधी जी की नैतिकता दीर्घकाल में लाभ देती है। आम आदमी रोटी, कपड़े और मकान को दीर्घकाल के लिए नहीं छोड़ सकता है। यह नैतिकता केवल राज्य या फिर संगठनों के लिए फायदेमंद हो सकती है। लोग आजीविका का भी संचार नही कर पा रहे। इतने ज्यादा भोले भी नही होना चाहिए। अब इन्हें कैसे सजग करे। यह मुद्दा है।

नैतिकता में बदलाव का रोडमैप 
हमारी मौजूदा नैतिकता बहुत ही ज्यादा भोलेपन पर आधारित है। इसमें लोगो को छोटी -छोटी चीजों के  प्रति भी रोक दिया जाता है। इसे हमे अधिकार आधारित तो कम से कम बनाना ही चाहिए।
  1. भारतीय मूल्य व्यवस्था या संस्कृति में कुछ खामिया है, जो कि अपने परिवार, मित्रो और रिश्तेदारों को ज्यादा महत्व देती है। उनके लिए हम योग्यता, प्रतिभा, निष्पक्षता और व्यापक भलाई की हत्या करने को भी तैयार रहते है। यही वजह है कि कुछ उद्धमि आते ही सफलता प्राप्त करने लग जाते है।
  2. हमारी नैतिकता समाज द्वारा निर्धारित होती है। अगर हमने समाज के बंधन तोड़ दिए तो इस नैतिकता से भी मुक्त हो जाएंगे। इसके बाद चतुर लोगो की नैतकता को अंगीकार कर लेंगे। हो सकता है जिसके बाद सामाजिक -आर्थिक स्थिति में सुधार हो जाए। 
यह नैतिकता में बदलाव का प्रयास नहीं है बल्कि नैतिकता के परिष्करण की कोशिश है। जो कि समय के अनुसार बदलती रहती है। इसलिए इसको वर्तमान में भी अद्यतन करना कोई गलत बात नहीं है। 

खंड II  व्यक्तित्व विकास  

नैतिक मूल्यों के दायरे का निर्धारण करने के बाद हमे विभिन्न क्षेत्रो का विश्लेषण करना चाहिए। किस क्षेत्र में कोनसा कार्य उत्पादक साबित हो सकता है।इसके अलावा इसमें यह चीज भी प्रदान करने की आवश्यकता होगी कि किस तरह से वे खुद को इस गला काट स्पर्द्धा  वाली दुनिया में टिकाये रख सकेंगे।

इसके लिए कुछ क्षेत्रो के बारे में संकेत किया जा सकता है -
  1. लोगो में पुलिस से डील करने का आत्मविश्वास नहीं है। जैसे ही सामना होता है तो लोग उससे लड़ने पे उतारू हो जाते है। वे उसे ट्रबल मेकर समझते है। हमे लोगो को कानूनों के बारे में स्कूल स्तर पर बताकर अनुपालन संस्कृति की शुरुआत करनी चाहिए।
  2. लोगो को सरकारी योजनाओ के लाभ लेने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। इसलिए उनमे अधिकार आधारित मूल्यों को बिठाया जाना चाहिए। 
  3. सरकार से डील करने में ही नहीं लोगो को निजी क्षेत्र के लोगो, किसी व्यक्तिगत आदमी से डील करने के लिए भी एम्पावरमेंट करने की जरूरत है। इसलिए निजी जिंदगी हेतु भी कौशल इसमें शामिल है।  
इन सभी चीजों को स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। जिनमे अध्ययन के अलावा संबंधित विभाग के अधिकारियो को भेजकर व्यवहारिक प्रयोग दिखाना भी चाहिए। तब जाकर ये चीजे बच्चो के मूल्यों का हिस्सा बनकर उनके आचरण में उजागर होगी। 

खंड III  Theory Analysis  

अब हम वापस से आदमी के विकास में इस सिद्धांत के योगदान के मूल्यांकन पर आ जाते है। 
व्यक्ति का आंतरिक विकास उसके भौतिक विकास को टिकाऊ बनाता है। जिसकी बदौलत वह उसे संधारणीय बनाये रख सकता है। विकास पर ध्यान देते वक्त यह भी बहुत ही अनिवार्य पहलु है।  

लेकिन नकारात्मक पहलू की बात की जाए तो वो यह हो सकता है कि लोगो का एक सीमा से नीचे के कामो के प्रति मोहभंग हो सकता है। या फिर लोगो में कामो के चयन के प्रति विशिष्टता विकसित हो सकती है। तब हमे जरूरी लेकिन निम्न दर्जे के कामो को स्वयं करना होगा ,यह इस चीज का फायदा हो सकता है कि इससे दलित संकल्पना की समाप्ति हो जाए। इसके बाद अन्य निम्न स्तरीय कार्यो में भी लोगो की भागीदारी हेय दृष्टि से नहीं देखी जायेगी और उनके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाएगा। 

इस प्रकार इस सिद्धांत के फायदे और नुकसान की सीमा अधिव्याप्त है। जहां हम नुकसान खोजने जाते है वही पर हमे कुछ फायदा मिल जाता है। 

निष्कर्ष :
व्यक्ति के आंतरिक विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति के बाद हम मुख्यधारा का आदमी प्राप्त कर सकते है। हालांकि यह मुख्यधारा की अवधारणा भी परतीय(Layered)है लेकिन कम से कम यहां से उसकी शुरुआत भी होती है तो भी घाटे का सौदा नहीं है। उसके बाद यह वर्ग उपभोगवादी वर्ग में शामिल हो जाएगा। जिससे यह मार्केट के अनुसार खुद को ढलने में सक्षम होगा। अत: ऐसा करके हम लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना में आर्थिक न्याय की पहली सीढ़ी को प्राप्त कर लेंगे। बाकी प्रकार के न्याय लगातार हलने वाले प्रक्रम होते है, जिनके प्रति अनुकूलन यही से विकसित होगा। इसके बाद अगर कोई छल-कपट करके भी आगे बढ़ेगा तो अनैतिक नहीं समझा जाएगा, यही माना जाएगा कि उसने समान समझ के लोगो के मध्य उच्च कोटि की चालाकी की प्रदर्शन किया। 

After the Launching of Individuals

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जैसा कि हम सोचते है कि अगर आदमियों को निम्न कक्षा से उच्च कक्षा में एक बार लांच कर दिया तो उसके बाद वह लाचार स्थिति से निकल जाएगा। वह अगली कक्षा में अधिक बेहतर स्थिति का आनंद  उठा सकेगा। उसके बाद वह इस चक्र से निकल जाएगा। लेकिन दूसरी आशंका सामने आ जाती है कि वह अगर अपनी कक्षा में और इजाफा करना चाहे तो क्या उसकी मदद की जानी चाहिए या नहीं। अगर इस तरह मदद करेंगे तो कक्षाओं का स्तरण तो आगे भी समान प्रकार से जारी रहेगा और राज्य कहां तक मदद करेगा। कोई सीमा भी तो होगी। क्या भौतिक चीजों की उपलब्धता बढ़ाकर किया गया कक्षा में इजाफा टिकाऊ होगा या फिर भौतिक चीजों की प्राप्ति ही आदमी का मकसद होता है।  ये सब प्रश्न विचार करने के योग्य है। जिन पर आगे हम विचार करते है।

कक्षा के स्थानांतरण से जुडी Theory of Individual Interference में निम्न बाते उभर कर सामने आती है -

1. कक्षा के स्थानांतरण में बाहरी समर्थन की आवश्यकता के पात्र कोन होंगे ? 
इस प्रश्न का सीधा सा जवाब है कि निम्न वर्ग को ही केवल सरकारी हस्तक्षेप का लाभ मिलना चाहिए। जिसके माध्यम से ये निम्न-मध्यम वर्ग में प्रवेश कर सके। या फिर मध्यम वर्ग में पहुंचने का सामर्थ्य प्राप्त कर सके। लेकिन यहां पर एक प्रश्न खड़ा होता है कि निम्न वर्ग हस्तक्षेप के माध्यम से ऊपरी वर्ग में पहुंचते वक्त निम्न-मध्यम वर्ग को पीछे छोड़ देता है तो उसको कैसे न्योचित ठहराया जाएगा। निम्न वर्ग को निम्न -मध्यम वर्ग में पहुंचाने के लिए क्या मानदंड उसकी योग्यता के निर्धारण में प्रयुक्त किए जाएंगे। दूसरी तरफ यह वर्ग हस्तक्षेप के माध्यम से उस वर्ग के समकक्ष पहुंच जाएगा जो उस समय tax का भुगतान कर रहा होगा। इसके बाद वह इस वर्ग को भी चुनौती देगा, जो क्या इसे स्वीकार्य होगा। इस प्रकार सिद्धांत तो आकर्षक लगता है। लेकिन इसकी डिज़ाइन जटिल होगी और कई तरह की प्रशासनिक जटिलताओं को शामिल करके मौजूदा हस्तक्षेपों के समकक्ष ही पहुंच जायेगी। और आखिर में पूरा सिद्धांत अप्रभावी साबित होगा। 

2. मध्यम वर्ग की भी अपनी मांगो का होना 
वही निम्न वर्ग को प्रगति करते हुए देखने वाला मध्यम वर्ग उस समय क्या चुप थोड़ी रहेगा। वह भी अपने लिए उच्चतर कक्षा में पहुंचने के लिए हस्तक्षेपों की मांग करेगा। इससे आगे उच्च वर्ग भी इसी तरह की मांग समान समय पर करेंगे। वोटबैंक की राजनीती किसी भी वर्ग को नाराज रहने का मौका नहीं देना चाहेगी। वह इन सबको लॉन्चिंग के लिए ड्राइव प्रदान करेगी। जिसकी वजह से संसाधन किसी एक वर्ग के लिए संकीर्ण हो जाएंगे। जिससे उद्देश्य की प्राप्ति समय लेगी। वही ऊपरी वर्गो की भी समान समय पर उच्च स्तर में जाने की मांग असमानता को और अधिक बढ़ा देगी। इससे उद्देश्य प्राप्ति अप्रभावी होना तय है। अगर एक उद्देश्य को प्राप्त करेंगे, उस समय पर जाकर अभावो की दूसरी खाई मौजूद मिलेगी और पुराणी प्रगति इस समय पर आकर अप्रभावी लगना तय है।

3. सरकारी हस्तक्षेप के लिए बुनियादी मापदंड 
यहां से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि कक्षाओं की उपस्थिति एक कटु सत्य है। हम कभी भी एक देश एक कक्षा के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकते। ऐसे में निम्न कक्षाओं के लिए ऊपर की कक्षा में जाने का सपना हमेशा मन में बना रहेगा। वह अपनी इसी आकांशा के साथ जीवन व्यतीत कर देगा। लेकिन हमने देखा कि जो जिंदगी निम्न वाले के लिए आदर्श है वह मध्यम वाले के लिए नीरस है और वह आगे उच्च की जिंदगी को आदर्श मानेगा। ऐसे में संतुष्टि का प्रश्न सामने आ जाता है कि ऐसी क्या बुनियादी चीजे हो जिनके बाद आदमी के जीवन को सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं रहे। इसके लिए उसके उच्च वर्ग में पहुंचने के लिए आवश्यक कौशल को प्राप्त करने में लगने वाले संसाधनों को आधार बनाया जाना चाहिए। 

4. संसाधनों का जमावड़ा करने की होड़ 
इसके अलावा यहां से यह चीज भी उठती है कि संसाधनों का जमावड़ा करने की होड़ कभी भी समाप्त नहीं हो सकती। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम लोगो की प्राथमिकता को अन्य क्षेत्रो की तरफ मोड़े। जैसे कि रचनात्मकता, खेलकूद और अन्य प्रतिभा का क्षेत्र। ताकि जिसके आधार पर आदमी अपने अहम् को संतुष्टि प्रदान करे, बजाय संसाधनों के जमावड़े के आधार पर। लेकिन हम देखते है कि प्रतिभा सम्पन्न लोगो ने भी एक नवीन कुलीन वर्ग को जन्म दिया है। जिससे यह होड़ फिर आगे बढ़ जाती है। ऐसे में हमारे सामने प्रश्न यही है कि इस होड़ को कैसे रोके। इसकी वजह से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव पड़ता जा रहा है।  पत्थर और रेत जंगलो और पहाड़ो से निककर घरो में आके जमा हो गई। इससे जंगल तबाह हो गए, स्थानीय समुदाय विस्तापित हो गए, ग्रीन हाउस गेसो का उतसर्जन बढ़ गया। इसलिए इसे भी साथ में रोककर आगे बढ़ना होगा। पर्यावरण क्षति की वजह से निम्न लोगो के विकास को तो रोक नहीं सकते ।

5. अल्टीमेट रियलिटी की तलाश 
अगर आदमी निचली कक्षाओं से ऊपर की कक्षाओं में पलायन कर गए। तो निचली कक्षा के कामो को कोन सम्पादित करेगा। लेकिन इसकी गारंटी तकनीकी ले रही है। फिर तो इस पलायन से आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन सच्चाई इन दोनों बातो के बीच में है। मतलब तकनीकी पूरी तरीके से आदमी की जगह नहीं ले सकती। इसलिए आदमी की निम्न कार्यो में भूमिका बची रहेगी। अगर ऐसा नहीं रहेगा, फिर तो मध्यम स्तर पर रोजगारो की मांग करने वालो की भीड़ और बढ़ जायेगी। इसलिए यहां से बुनियादी प्रश्न उठता है कि अल्टीमेट रियलिटी क्या है। आदमी का पैसेकमा कर उच्च वर्ग की जिंदगी जीना ही उद्देश्य नहीं हो सकता। वही निम्न वर्ग में रहकर अपनी सभी आवश्यकताओं और इच्छाओ को दबाना भी उद्देश्य नहीं हो सकता। इसलिए बुनियादी चीजों की प्राप्ति के बाद इस रंगमंच पर अभिनय करने की बात यहां से उभर कर सामने आती है।


खंड II
अब हमारे सामने प्रश्न यह है कि जब इतने सारे बुनियादी प्रश्नो का समर्थन इस सिद्धांत को नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में क्या इसे आगे बढ़ाना चाहिए या नहीं। इसके अलावा यह बात भी उठती है कि फिर किस तरह से इसका क्रियान्वन किया जाए कि ये प्रश्न खड़े नहीं हो।

1. सबसे पहले तो यह बात स्पष्ट हो जाती है की लांच करने का नियम सभी कक्षाओं पर लागू नहीं होता। यह केवल निम्न कक्षाओं के लिए ही उपुक्त है। जिसका मकसद उनके गरीबी के चक्र में रोकने के लिए जिम्मेदार कारको का खात्मा करना है।  जिस प्रकार अगर गरीबी की वजह से पढाई नहीं कर पाता तो उसे पढाई के लिए बेहतरीन सुविधा उपलब्ध करानी है। यह नहीं कि उसे बीस लाख रूपए देकर कार दिलवा दी। और बोल दिया कि जा अब तू हो गया मध्यम वर्ग का आदमी।

2.  दूसरी तरफ समाज को समानता की तरफ धकेलने के प्रयास किए जाएंगे। इसके लिए कई क्षेत्रो में कार्य किया जाएगा। जो करो के माध्यम से प्राप्त हो सकता है। या फिर सरकारी समर्थनों के माध्यम से।
इसके अलावा संसाधनों की संकीर्णता को रोकने के लिए जनसंख्या नीति पर भी विचार किया जाएगा। साथ ही किसी एक ही आदमी को प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक प्रयोग से रोका जाएगा। एक व्यक्ति को साल में उत्पादित संसाधनों का कितनी सीमा तक उपयोग करना चाहिए। इस पर विचार किया जाएगा। देश को निरंकुश पूंजीवाद के जाल से निकाला जाएगा। इस वजह से कई चीजों की मनमर्जी की कीमतों से भी मुक्ति मिलेगी।

3. राजनीती आश्वासन दिलाने का काम कर सकती है कि वह सभी के उत्थान का कार्य कर रही है। लेकिन इस समय की विभाजनकारी राजनीती में अलग अलग समय पर शासन से उम्मीद लगा सकते है। एक वर्ग को आगे बढ़ना है तो दूसरे को पीछे छोड़ना पड़ेगा। इस प्रकार यह सिद्धांत पुन: प्रासंगिक हो जाता है कि एक ही समय पर सभी लोगो को खुश करना सम्भव नहीं है। वही इस तरह के प्रयास किसी सरकार द्वारा किए जाएंगे, ऐसे में जरुरी तो नहीं कि सभी राज्य इसी तरह के कार्यक्रम लागू करे। इसलिए स्थानीय सर्कार पर भरोसा भी रखना होगा और उसकी नीतियों को जनोन्मुखी बनाने के लिए दबाव भी रखना होगा। यह सब विरोध की राजनीती की बजाय थिंकटैंक की राजनीती के माध्यम से करना होगा।

4. अब प्रश्न यह हो जाता है कि यह कोई अद्वितीय सिद्धांत नहीं है। लेकिन इसमें निम्न वर्ग को ऊपर उठाने का पवित्र उद्देश्य शामिल है, जिसे कैसे प्राप्त किया जाए। इसके लिए मौजूदा कौशल विकास, उद्यम स्थापना के कार्यक्रमों के माध्यम से कैसे अधिकतम जरुरतमंदो को सम्बोधित किया जाए। इसके लिए मौजूदा कार्यक्रमों की प्रभाविता बढ़ाने के सरकारी प्रयासों की मदद करनी होगी।

5. इस कार्य के लिए अब हमे दूसरे क्षेत्रो की भी मदद लेनी होगी। तब जाकर यह उद्देश्य पूरा किया जा सकता है। बिज़नेस सेक्टर को ऐसे उत्पाद निर्मित करने चाहिए, जो इस वर्ग के लिए किफायती हो। जिनको उपभोग करने में निम्न वर्ग पर भर नहीं पड़े। वही ऐसे उत्पाद भी हो जो आसान और वहनीय तरिके से घर की बुनियादी चीजे बसाने में मदद करे।

निष्कर्ष :
प्रत्येक व्यक्ति के उत्थान में सक्रिय हस्तक्षेप का रास्ता जटिल है। लेकिन हम उन्हें दुसरो के द्वारा उत्पीड़ित होते नहीं देख सकते। उनके मानवाधिकारों को उच्च वर्ग के मनोरंजन का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता। इसलिए बुनियादी चीजे उपलब्ध कराने के अलावा उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए भी कार्य करना होगा। बिना व्यक्तित्व के क्या गारंटी है कि वे भेजे गए ऊपरी वर्ग में ठीके रहेंगे या फिर दमित या शोषित नहीं होंगे। इसलिए भौतिक विकास  के साथ-साथ आंतरिक विकास के लिए भी हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।

Theory of individual interference

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भारतीय संविधान में लोगों के आर्थिक, सामाजिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए नीति निदेशक तत्वों का प्रावधान किया गया है। जिसके अनुसार राज्य लोगो के उत्थान के लिए सक्रिय हस्तक्षेप करता है। हम देखते है की वर्तमान में यह हस्तक्षेप लोगो को राहत ही प्रदान करता है , न की उन्हें उठने का सामर्थ्य देता है। जिस सामर्थ्य के सहारे ये अभावो के चक्र से मुक्त हो सके और फिर अगले आर्थिक स्तर में प्रवेश कर सके। ऐसा करना समाज के निचले तबके के लिए बहुत ही जरुरी है क्योकि उनकी वर्तमान लाचार हालत उनके मानवीय विकास को अवरुद्द करने का पाप करती है। साथ ही उन्हें जन्म दर जन्म एक ही चक्र में घुमाती रहती है। ऐसे लोगो की उपलब्धता प्राइवेट कंपनी को सस्ते श्रमिक प्रदान करने की वजह से अच्छी लग सकती है। लेकिन तकनीकी समृध्द इस युग में दबी कुचली चेतना के लोगो की उपस्थिति खासकर किसी भी संवेदनशील मन को तो अवश्य कचोट रही होती है। ऐसे में जरूरी है कि हम प्रत्येक व्यक्ति की लॉन्चिंग पर आधारित Theory of Individual Interference के सिद्धांत पर विचार करना चाहिए।

क्या योजना है  (What) : 
प्रत्येक व्यक्ति को चयनात्मक हस्तक्षेप उपलब्ध कराने के बजाय लॉन्चिंग हस्तक्षेप उपलब्ध कराने चाहिए।  मौजूदा हस्तक्षेप केवल उनकी बेहतरी की बजाय कमतरी को ज्यादा सम्बोधित करते है। यह प्रणाली केवल उन्हें निर्वाह सक्षम उपाय प्रदान करती है। जबकि इससे आगे जाने के लिए किसी बाह्य समर्थन की जरूरत को पूरा किया जाना चाहिए।

वर्तमान में लॉन्चिंग के लिए हम सरकार के बहुआयामी उपायों  के माध्यम से समर्थ व्यक्ति के आगे आने की उम्मीद करते है। अगर समर्थ व्यक्ति बनाकर आगे लाने के उपाय किए जाए तो स्थिति अलग हो सकती है।

किस प्रकार (How) :
अब इसे किस प्रकार क्रियान्वित किया जा सकता है, इस पर भी विचार कर लेते है -
यूनिवर्सल बेसिक इनकम को पायलट मोड पर शुरू किया जाना चाहिए। यह शुरू में आर्थिक पैमाने पर परिवार आधारित हो सकती है। यह इतनी पर्याप्त हो कि संबंधित आदमी को शिक्षा, स्वस्थ्य जैसे क्षेत्रो में निवेश के लिए समर्थ कर सके।
उसके बाद मुद्रा योजना का प्रसार किया जा सकता है। इसे मांग आधारित की बजाय अधिकार आधारित बनाया जा सकता है। इसके लिए लाभार्थियों से काम की प्राथमिकता आमंत्रित करके कौशल विकास किया जाए, फिर ट्रायल एंड एरर मेथड पर आधारित गतिविधियों में भेजा जाए। उसकी लगातार तीन साल तक मॉनिटरिंग की जाए, अगर वह लांच हो जाता है तो हमारा मकसद सफल हो जाएगा। अन्यथा बचे हुए लोगो के लिए फिर से प्रयास किए जाएंगे। या फिर उन्हें अधीनस्थता के ढांचे में खपा लिया जाएगा।

व्यवहार्यता  (Feasibility) : 
योजना की व्यवहार्यता पूरी तरीके से क्रियान्वित करने योग्य है। मौजूदा समय में लॉन्चिंग की योजना के तोर पर मनरेगा को लिया जा सकता है। लेकिन हम जानते है की मनरेगा अधिकार आधारित से आकड़े भरपाई आधारित हो गई है। अब लॉन्चिंग के लिए दूसरे प्लेटफार्म की आवश्यकता है और प्रत्येक जरूरतमंद को सक्रिय हस्तक्षेप निश्चित तोर पर बेहतर विकल्प होगा।

नकारात्मक (Negative) :
इस योजना के नकारत्मक बिंदु यह हो सकते है की आदमी अब ज्यादा निकम्मे हो सकते है। वे संसाधनों का दुरूपयोग कर सकते है। इसके बाद वे अधिक निकम्मे हो सकते है।  जिससे मानव पूंजी की उत्पादकता में कमी हो सकती है।

परिणाम (Outcomes ):
इस योजना के परिणाम का आंकलन करे तो यह है कि इसके बाद आदमी की नागरिक गतिविधि अधिक सक्रियता की परिचायक हो जायेगी। इससे अभिशासन और राजनीती की गुणवत्ता में बढ़ोतरी होगी। जिससे आगे भी लोगो में सुधार के मूल्यों का समायोजन होगा।

खंड II
अब हम दूसरे सहायक मुद्दों पर विचार करते है। जो इस कदम की सार्थकता को सिध्द करने में मददगार होंगे।

1. समाजवाद की अवधारणा आज के युग में 
समाजवाद की अवधारणा आज के युग में पहले से ज्यादा मायने रखती है। भले ही १९ वि सदी से जीवन स्तर में सुधार हुआ है जिस कारण सम्पतियो का विषम वितरण दृष्टिगोचर नहीं होता है। वर्तमान में यह खाई बढ़ती जा रही है। आदमी आदमी को गुलाम बनाने की हालत पहले भी थी और आज भी वह संवर्द्धित हुई है , जिससे अनुमान लगा सकते है कि इस समय पर भी समाजवाद पूरी तरीके से प्रासंगिक है। 


लेकिन इसके उद्देश्यों को किस प्रकार प्राप्त किया जाए, यह असली चुनौती है। इसके लिए हमे निचले लोगो को मौजूदा हालत में राहत आधारित समर्थनों से आगे जाकर उन्हें अगले स्तर पर लांच करना होगा। तब जाकर वे भी अगली कक्षाओं में दोड़ने के लिए समर्थ हो सकेंगे।  वरना वे अपने मौजूदा चक्र में ही वे घूमते रहेंगे।

2. विकास अधिकार या फिर भाग्य के रूप में 
मौजूदा समय में विकास के जो अवसर उपलब्ध है, उनका वितरण असमान रूप से है। जो नए प्रवेशार्थी  है अगर वे इन विकास अवसरों के पास में है तो वे भी लाभदायक स्थिति में होंगे। वही जो लोग दूरस्थ क्षेत्रो में है उनको इन विकल्पों की उपलब्धता प्राप्त नहीं हो सकेगी। ऐसे में एक बात सामने आती है कि विकास तक पहुँच कोई अधिकार की बात नहीं होकर के भाग्य की बात होती है। अगर विकास के भाग्य रूपी स्वरूप को बदलना है तो दूरस्थ क्षेत्रो को भी लॉन्चिंग करनी होगी।

3. सभी कार्यो को करने की सुगमता 
अगर हम लॉन्चिंग ड्राइव शुरू करना चाह रहे है तो हमे निम्न वर्ग के लिए उत्थान के कार्यक्रमों की क्रियान्वयन रुकावटों को न्यून करना होगा। यह एक तरीके से व्यापार की सुगमता के समान होगा। लेकिन इसके क्षेत्र भिन्न होंगे और उनके लिए सुगमता के पैरामीटर भी भिन्न प्रकार के ही होंगे। जिनकी सबसे पहले तो हमे पहचान करनी होगी। उसके बाद उन्हें आसान बनाने के प्रयासों को लागू करना होगा।

4. दूसरे क्षेत्रो की भागीदारी 
दूसरे क्षेत्रो की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। जिसके तहत हम कॉर्पोरेट की सामाजिक जिम्मेदारी, अकेडमिक सामाजिक जिम्मेदारी, सोसाइटी की सामाजिक जिम्मेदारी जैसे नवाचारी प्रयासों की मदद लेनी होगी। इससे यह कार्य एक आंदोलन की शक्ल लेगा। जिससे सभी प्रयासों की प्रभावशीलता में इजाफा होगा और हम उद्देश्य के अधिक करीब पहुंचेंगे।

निष्कर्ष :
भारतीय संस्कृति सर्वे भवन्तु सुखिनः की रही है। जिसमे सभी लोगो के सुखी होने के आदर्श को स्थापित किया गया है।  इसलिए हमे सरकारी रवैये में भी कष्ट निवारण  से कष्ट उन्मूलन की तरफ बढ़ना होगा। इस कार्य के लिए सरकार को अपनी जिम्मेदारी को एक योजना के लागू करने से बढाकर विभिन्न योजनाओ के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। 

नव उदारवाद काल में गाँव

नव-उदारवाद के दौर में गाँवो ने सरकार को एक प्रकार की उलझन में शुरू से ही डाले रखा, एक तरफ तो सरकार तेजी से विकास के सपने संजोये मार्केट के साथ चलना चाहती थी वही दूसरी तरफ कल्याकारी राज्य के टैग को बचाना चाहती हैं। जहां मार्केट के साथ आगे बढ़ने से कई समस्याओ के समाधान की संभावना थी, वही गाँवो को इसके  तैयार करने की भी जरुरत थी। गाँवो को नव-उदारवादी मैराथन में दौड़ाने के लिए विशेष सुविधा दिए जाने की जरुरत भी थी। भारत में स्वतंत्रता के बाद इस चीज को समझते हुए बाजार को नियंत्रित कार्यक्षेत्र ही प्रदान किया गया था।

1991 के बाद भारत में आर्थिक सुधारो के साथ बाजार को आज़ादी देने के वो प्रयास होने लगे जिनकी विश्व जनमत की तरफ से भी मांग हो रही थी। इस पहल  को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा था जिनमे आईएमएफ, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और कई अन्य मंचो के द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा था। ये संस्थान वित्तीय और तकनिकी सहायताओ के बदले देशो की संप्रभुता से आगे बढ़कर कानूनी और संरचनात्मक सुधारो के लिए मजबूर कर रहे हैं। ऐसे सरकारी विनियमो को तोडा और मरोड़ा जा रहा हैं जो मुनाफे को नुकसान पहुंचाए। सार्वजनिक संसाधनों की अवधारणा अब ख़त्म हो चुकी हैं और सरकार उन पर से अपना नियंत्रण हटाकर उन्हें निजी क्षेत्रो में भेज रही हैं। सामाजिक सेवाओ में  भी अब मुनाफा नजर आने लगा हैं और सरकार वहां से अपनी भूमिका को सीमित करके उनमे निजी क्षेत्रो को प्रवेश दे रही हैं। ये सब चल रहा हैं व्यापार करने में सुविधा के लिए अपनी स्थिति सुधारने के नाम पर।


सामाजिक सेवाओ में सरकार जो सुविधा उपलब्ध करा रही थी वे अपनी अकुशलता के कारण तो पहले ही कारगर नहीं थी। अब सरकार उनसे पलायनवादी रुख अपना कर लोगो को मुनाफा आधारित निकायों के भरोसे छोड़ने की नीति अपना रही हैं। जहां पहले शिक्षा और स्वास्थय जैसी चीजे पहले सरकार उपलब्ध करा देती थी अब ये ही सुविधा निजी क्षेत्र के अधीन मिल रही हैं। यह बात सही भी बैठती हैं की इस से  सेवा प्रदायगी में गुणवत्ता और दक्षता आयी है। लेकिन इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि इन सुविधाओ तक पहुँच क्या सभी लोगो की हैं। खासकर यह समस्या ग्रामीणों को ज्यादा उठानी पड़ रही हैं क्योंकि उनमे से ही अधिकांश निम्न आय के कारण इन तक पहुँच नहीं रखते हैं। जब ये  सुविधा सरकार उपलब्ध  कराती हैं तो उन से  गरीब और वंचित लोगो  के लाभान्वित होने की उम्मीद ज्यादा रहती हैं। अब नव-उदारवादी नीति का अनुसरण   करके सरकार इन क्षेत्रो से वापस होती हैं तो शोषण करने वाली शक्तिया ही विकल्प के रूप में रह जायेगी।


सार्वजनिक संसाधनों की अवधारणा से जो नाता तोडा जा रहा हैं उसका सर्वाधिक असर गाँवो को ही उठाना पड़  रहा हैं क्योंकि वे अभी भी उन से लाभान्वित हो रहे हैं या फिर उनसे जुड़े हुए हैं। जो प्राकृतिक संसाधन पहले समुदाय के नियंत्रण में थे वे अब या तो निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहित किये जा चुके हैं या  फिर उनसे लोगो को वंचित किया जा चूका हैं।

नव उदारवाद से गाँवो के मुलभुत हितो पर चोट पहुंची हैं इसके साथ ही गाँवो में रहने वालो के हित भी बुरी तरीके से प्रभावित हो रहे हैं। समावेशी विकास की मुहीम भी इससे  बुरी तरीके से प्रभावित हो रही हैं इसी चीज ने पापुलिज्म जैसी चीजो को जन्म दिया।   

सामुदायिक विकास की अवधारणा


हमारी संस्कृति आपस में सहयोग करने की हैं ,जिसे हम संस्कृत के वाक्य "वसुधैव कुटुंबकम" से समझ सकते हैं। भारतीय संस्कृति को ये पहलु ही सबसे अलग बनाता हैं की यहां लोग एक दूसरे के काम काज में हाथ बढ़ाते हैं तथा मिलजुलकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। अब हम इस बात को एक समूह के ऊपर ले जाते हैं की लोग मिलजुल कर एक साझा उद्देश्य के लिए काम करते हैं। तो हम यहां से एक समुदाय जो किसी भी कारण से संगठित हो वह अपने विकास का मार्ग मौजूद संसाधनो के द्वारा एक सामूहिक प्रयास से  तय करता हैं। इस प्रकार हम देख सकते हैं की समुदाय स्तर पर विकास करने का बीज भारतीय संस्कृति में पहले से मौजूद हैं।

क्या हैं सामुदायिक विकास ?
सामुदायिक विकास ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत समुदाय के लोग साथ आकर अपनी एक जैसी समस्याओ के समाधान के लिए सामूहिक प्रयास करते हैं। यह एक व्यापक शब्द हैं जो कई प्रकार के समुदायों का प्रतिनिधित्व करता हैं जिनमे  नागरिक, व्यावसायिक या सरकारी वर्ग हो सकते हैं।
सामुदायिक विकास एक प्रकार की पहल हैं जो समान रूचि या फिर समान समस्याओ वाले लोगो द्वारा सामूहिक प्रयास करके शुरू की जाती हैं। यह एक स्वप्रेरित भावना हैं।
सामुदायिक विकास शब्द का अधिकतर प्रयोग अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय देशो , ऑस्ट्रेलिया आदि देशो में किया जाता हैं।


सामुदायिक विकास के विभिन्न  प्रकार 
अब हम इसके विभिन्न आयामों के बारे में भारतीय परिप्रेक्ष्य से नजर डालेंगे
1. क्षमता निर्माण
इसके तहत उन गुणों के विकास पर जोर दिया जाता हैं जो समाज को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम बनाते हैं।
2. सामाजिक पूंजी निर्माण 
इसके तहत उन कार्यो पर फोकस किया जाता हैं जिनसे आपसी सहयोग से लाभ की प्राप्ति होती हो।
3.अर्थिक विकास 
इसके तहत समुदाय को स्थानीय संसाधनो का प्रयोग करते हुए आर्थिक विकास के लिए प्रेरित किया जाता हैं।
4.समुदाय संचालित विकास
इसके तहत योजना का उन्मुखीकरण विकेन्द्रित होता हैं और समुदाय स्तर पर नियोजन पर अधिक भरोसा किया जाता हैं।
5 परिसंपत्ति आधारित सामुदायिक विकास
इसके तहत समुदाय के प्रयासों का उन्मुखीकरण स्थायी सम्पति के निर्माण पर होता हैं। यह एक प्रकार से टिकाऊ विकास के समान हैं।
6.सहभागितापूर्ण नियोजन
इसके तहत पूरा समुदाय योजना निर्माण में भाग लेता हैं।



समावेशी विकास का अप्राप्य उद्देश्य


आजकल, समावेशी विकास का लक्ष्य हमारी सरकारों की प्राथमिकता बन गया हैं। और इसको मीडिया में मिले कवरेज से ये शब्द इतना लोकप्रिय हो गया हैं की इसे ज्यादातर सभी लोग जान गए हैं।  इस बार मैंने दूसरे पहलुओ पर भी गौर किया और चिंतन किया की क्या समावेशी विकास के उद्देश्य को  प्राप्त किया जा सकता हैं, या फिर ये एक योजनागत शब्दावली बना रह जाएगा और बुद्धिजीवी लोगो के लिए एक बहस का माध्यम बनकर रह जाएगा ।

समावेशी विकास 
समावेशी विकास का सीधा मतलब ऐसा विकास होना चाहिए जो समानता की और ले जाए  जो  की समाजवाद की याद दिलाता हैं और यह  उदारीकरण के इस दौर में  अप्रासंगिक हो गया हैं। पर हम समावेशी विकास का नाम अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के विकास के नाम पर करते हैं तो हम इस अवधारणा से मुह कैसे मोड़ सकते हैं।
हम कुछ आर्थिक आकड़ो पर गौर करते हैं। आर्थिक सर्वे का अध्यन करने पर हम पाते हैं की देश की अधिकांश जनसँख्या जो कृषि पर निर्भर हैं की जीडीपी में भागीदारी केवल 13 प्रतिशत हैं और इस पर देश की 65प्रतिशत जनसँख्या निर्भर हैं , इस प्रकार हम कह सकते हैं की पैसठ प्रतिशत जनसँख्या के पास केवल देश के 13 प्रतिशत संसाधन हैं। असमानता का पहला कारण तो यही से समझ आता हैं।और शेष बची जनसँख्या के पास ही देश के 85 प्रतिशत संसाधनो का कब्ज़ा हैं। उनमे भी माना जाता हैं की टॉप के5 प्रतिशत लोग ही उनकी 95 प्रतिशत संसाधनो की हकदारी रखते हैं , इन सब के बाद हम यह भली भाति अंदाज़ा लगा सकते हैं की हमारे नीति-निर्माता किस प्रकार के समावेशी विकास की बात कर रहे हैं।

इस प्रकार हमने देखा की समावेशी विकास का तात्पर्य कदापि भी आर्थिक या सामाजिक समानता नही हैं। इसका मतलब केवल सबको उन विकल्पों तक पहुँच प्रदान करना हैं जिनसे की कथित तौर पर विकास  के रास्ते पर चला जा सकता हैं। इसमें यह भी तय नही हैं की उन विकल्पों की गुणवत्ता कैसी हैं। इसे हम इस तरीके से देख सकते हैं की सरकार समावेशी विकास के नाम पर वो सुविधाये प्रदान करेगी जो लोगो की शिक्षा , स्वास्थय, कौशल विकास आदि पर जोर देती हैं।

नागरिको की भूमिका 
समावेशी विकास के समबन्ध में हम नागरिको की भूमिका पर आते हैं,  जो लोग कृषि क्षेत्र से तालुक रखते हैं, हम उनकी जीडीपी में कम भागीदारी से देख चुके हैं की उनकी प्रति व्यक्ति आय उन लोगो से कम हैं  जो की उद्योग या  फिर सर्विस क्षेत्र में लगे  हुए हैं।
साथ ही हमारे आर्थिक सर्वेक्षण के नतीजे  यह रुझान दे रहे  हैं की इसमें और कमी होने की सम्भावना हैं, इस तरह मान सकते हैं की काफी लोग बहुत ही कम आय के साथ गुजारा कर रहे हैं उनकी संख्या में इजाफा होने वाला हैं।
अब हम आते हैं माध्यम वर्ग पर जो किसी ना किसी माध्यम से एक निशिचित आय प्राप्त कर रहा हैं इस वर्ग को अगर सरकार से सामाजिक सुरक्षा नही मिले तो इसकी हालत भी निम्न वर्ग की तरह ही हैं यह वर्ग सामाजिक तौर पर जागरूक रहने के कारण सभी सरकारी पहलो से लाभान्वित होने की क्षमता रखता हैं

आय और समावेशी विकास
हम नागरिको की भूमिका देख चुके हैं की उनकी आय उनके द्वारा तय गए कार्यक्षेत्र पर निर्भर हैं। और हम ने ये भी निष्कर्ष निकला था की अधिकतर लोगो की आय कम हैं। अब हम बात करते हैं  इस    अधिकतर जनसँख्या के जीवनयापन की

इन्हे अपनी इस छोटी आय में से इस महंगाई के जमाने में अपनी दैनिक जरुरत की चीजे जुटानी पड़ती हैं, यहां पर एक और विडंबना हैं की कृषि उत्पादों की कीमत  बढ़ती नही हैं इसलिए  उनकी आय वही हैं और उनके पास महंगाई के कारण कम पैसे ही बचते हैं। इस प्रकार यह तय हैं की उनकी क्रय शक्ति बढ़ने के बजाय काम हो रही हैं  और ना ही वे गुणवत्ता वाली शिक्षा, चिकित्सा व्यवस्था प्राप्त कर रहे हैं इस प्रकार हम कह सकते हैं की कृषि पर लोगो की निर्भरता रखकर समावेशी विकास के मकसद को कभी भी प्राप्त नही किया जा सकेगा

समावेशी विकास की अवधारणा की आवश्यकता

आजकल समावेशी विकास समाचार पत्रों में एक प्रमुख शब्द बना हुआ हैं ,हालांकि इसकी प्रसिद्धि केवल अखबारों की वजह से न होकर, बल्कि नीति निर्माताओ द्वारा इस पर दिए जा रहे जोर के कारण हैं। पूरा राजनितिक वर्ग भी इस  पर  ध्यान दे रहा हैं, जिसका अंदाज़ा हम 'आम आदमी' और 'सबका साथ, सबका विकास' जैसे प्रभावित करने वाले स्लोगनों से लगा सकते हैं।

भारत में समावेशी विकास की अवधारण कोई नई नहीं है। प्राचीन धर्म ग्रन्थों का यदि अवलोकन करें, तो उनमें भी सभी लोगों को सात लेकर चलने का भाव निहित है। सर्वे भवन्तु सुखिन में भी सबको साथ लेकर चलने का ही भाव निहित है, लेकिन नब्बे के दशक से उदारीकरण की प्रक्रिया के प्रारम्भ होने से यह शब्द नए रूप में प्रचलन में आया, क्योंकि उदारीकरण के दौर में वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को भी आपस में निकट से जुड़ने का मौका मिला और अब यह अवधारणा देश और प्रान्त से बाहर निकलकर वैश्विक सन्दर्भ में भी प्रासंगिक बन गई है। सरकार द्वारा घोषित कल्याणकारी योजनाओं में इस समावेशी विकास पर विशेष बल दिया गया और 12वीं पंचवर्षीय योजना 2012-17 का तो सारा जोर एक प्रकार से त्वरित, समावेशी और सतत् विकास के लक्ष्य हासिल करने पर है, ताकि 8 फीसद की विकास दर हासिल की जा सके।

क्या है समावेशी विकास?

समान अवसरों के साथ विकास करना ही समावेशी विकास है। दूसरे शब्दों में ऐसा विकास जो न केवल नए आर्थिक अवसरों को पैदा करे, बल्कि समाज के सभी वर्गो के लिए सृजित ऐसे अवसरों की समान पहुंच को सुनिश्चित भी करे हम उस विकास को समावेशी विकास कह सकते हैं। जब यह समाज के सभी सदस्यों की इसमें भागीदारी और योगदान को सुनिश्चित करता है। विकास की इस प्रक्रिया का आधार समानता है। जिसमें लोगों की परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा जाता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि समावेशी विकास में जनसंख्या के सभी वर्गो के लिए बुनियादी सुविधाओं यानी आवास, भोजन, पेयजल, शिक्षा, कौशल, विकास, स्वास्थ्य के साथ-साथ एक गरिमामय जीवन जीने के लिए आजीविका के साधनों की सुपुर्दगी भी करना है, परन्तु ऐसा करते समय पर्यावरण संरक्षण पर भी हमें पूरी तरह ध्यान देना होगा, क्योंकि पर्यावरण की कीमत पर किया गया विकास न तो टिकाऊ होता है और न समावेशी ही वस्तुपरक दृटि से समावेशी विकास उस स्थिति को इंगित करता है। जहां सकल घरेलू उत्पाद की उच्च संवृद्धि दर प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की उच्च संवृद्धि दर में परिलक्षित हो तथा आय एवं धन के वितरण की असमानताओं में कमी आए।

समावेशी विकास की दशा और दिशा

आजादी के 65 वर्ष बीत जाने के बाद भी देश की एक चौथाई से अधिक आबादी अभी भी गरीब है और उसे जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसी स्थिति में भारत में समावेशी विकास की अवधारणा सही मायने में जमीनी धरातल पर नहीं उतर पाई है। ऐसा भी नहीं है कि इन छह दशकों में सरकार द्वारा इस दिशा में प्रयास नहीं किए गए केन्द्र तथा राज्य स्तर पर लोगों की गरीबी दूर करने हेतु अनेक कार्यक्रम बने, परन्तु उचित अनुश्रवण के अभाव में इन कार्यक्रमों से आशानुरूप परिणाम नहीं मिले और कहीं तो ये कार्यक्रम पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। यही नहीं, जो योजनाएं केन्द्र तथा राज्यों के संयुक्त वित्त पोषण से संचालित की जानी थीं, वे भी कई राज्यों की आर्थिक स्थिति ठीक न होने या फिर निहित राजनीतिक स्वार्थो की वजह से कार्यान्वित नहीं की जा सकीं।

समावेशी  विकास ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों के संतुलित विकास पर निर्भर करता है। इसे समावेशी विकास की पहली शर्त के रूप में भी देखा जा सकता है। वर्तमान में हालांकि मनरेगा जैसी और भी कई रोजगारपरक योजनाएं प्रभावी हैं और कुछ हद तक लोगों को सहायता भी मिली है, परन्तु इसे आजीविका का स्थायी साधन नहीं कहा जा सकता, जबकि ग्रामीणों के लिए एक स्थायी तथा दीर्घकालिका रोजगार की जरूरत है। अब तक का अनुभव यही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सिवाय कृषि के अलावा रोजगार के अन्य वैकल्पिक साधनों का सृजन ही नहीं हो सका, भले ही विगत तीन दशकों में रोजगार सृजन की कई योजनाएं क्यों न चलाई गई हों। सके अलावा गांवों में ढ़ांचागत विकास भी उपेक्षित रहा फलतःगांवों से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन होता रहा और शहरों की ओर लोग उन्मुख होते रहे। इससे शहरों में मलिन बस्तियों की संख्या बढ़ती गई तथा अधिकांश शहर जनसंख्या के बढ़ते दबाव को वहन कर पाने में असमर्थ ही हैं। यह कैसी विडम्बना है कि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहीं जाने वाली कृषि अर्थव्यवस्था निरन्तर कमजोर होती गई और वीरान होते गए, तो दूसरी ओर शहरों में बेतरतीब शहरीकरण को बल मिला और शहरों में आधारभूत सुविधाएं चरमराई यही नहीं रोजी-रोटी के अभाव में शहरों में अपराधों की बढ़ ई है।

वास्तविकता यह है कि भारत का कोई राज्य ऐसा नहीं है जहां कृषि क्षेत्र से इतर वैकल्पिक रोजगार के साधन पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हों, परन्तु मूल प्रश्न उन अवसरों के दोहन का है सरकार को कृषि में भिनव प्रयोगों के साथ उत्पादन में बढ़ोतरी सहित नकदी फसलों पर भी ध्यान केन्द्रित करना होगा। यहां पंचायतीराज संस्थाओं के साथ जिला स्तर पर कार्यरत् कृषि अनुसंधान संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है जो किसानों से सम्पर्क कर कृषि उपज बढ़ाने की दिशा में पहल करे तथा उनके समक्ष आने वाली दिक्कतों का समाधान भी खोजे तभी कृषि विकास का इंजन बन सकती है। कृषि के बाद सम्बद्ध राज्य में मौजूद घरेलू तथा कुटीर उद्योगों के साथ पर्यटन पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। सरकार को आर्थिक सुधारों के साथ-साथ कल्याणकारी योजनाओं जैसे मनरेगा, सब्सिडी का नकद अन्तरण आदि पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

भारत की विकास दर, जो वर्ष 2012-13 में पांच फीसद है, वह पिछले दस वर्षो में सबसे कम है वर्ष 2013-14 की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है भारतीय रिजर्व बैंक ने विकास दर की सम्भावना को घटाकर 5.5 कर दिया है। वर्ष 2002-03 में विकास दर चार फीसद थी, लेकिन उस समय भयंकर सूखे की वजह से ऐसा हुआ था, लेकिन इस बार ऐसी कोई बात नहीं है। समावेशी विकास हेतु श्रम बहुल विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देना ही होगा। यदि विकास दर में 8-9 फीसद प्रतिवर्ष चाहते हैं, तो विनिर्माण क्षेत्र को 14-15 फीसद प्रतिवर्ष की दर से सतत् आधार पर विकास करना होगा। जापान,कोरिया तथा चीन में विनिर्माण क्षेत्र की स्थिति देखें, तो यह संघ के संघटक रूप में भारत की तुलना में काफी अच्छी है।

चीन में जहां यह 42 फीसद, दक्षिण कोरिया में 30 फीसद तो भारत में मात्र 16 फीसद है। कुच समय पहले घोषित राष्ट्रीय विनिर्माण नीति एनएमपी का उद्देश्य भारत में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को 2021-22 तक 16 फीसद से बढ़ाकर 25 फीसद करना और अतिरिक्त 100 मिलियन रोजगार अवसर प्रदान करना है इस हेतु भारत के प्राचीनतम श्रम कानून में जो विश्व में सबसे ज्यादा सख्त है, संशोधन करना होगा, ताकि वे कामगारों की सुरक्षा के उनकी रोजी-रोटी को भी बचा सके पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिण क्षेत्रों के समर्पित माल ढुलाई गलियारा डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर्स का त्वरित कार्यान्वयन करना होगा। स्मरम रहे कि इसमें दक्षता विकास के जरिए जॉब प्रशिक्षण की व्यवस्था है। जारी…  

समावेशी विकास से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उम्मीदों की सच्चाई


आजादी के 65 वर्ष बीत जाने के बाद भी देश की एक चौथाई से अधिक आबादी अभी भी गरीब है और उसे जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसी स्थिति में भारत में समावेशी विकास की अवधारणा सही मायने में जमीनी धरातल पर नहीं उतर पाई है। ऐसा भी नहीं है कि इन छह दशकों में सरकार द्वारा इस दिशा में प्रयास नहीं किए गए केन्द्र तथा राज्य स्तर पर लोगों की गरीबी दूर करने हेतु अनेक कार्यक्रम बने, परन्तु उचित अनुश्रवण के अभाव में इन कार्यक्रमों से आशानुरूप परिणाम नहीं मिले और कहीं तो ये कार्यक्रम पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। यही नहीं, जो योजनाएं केन्द्र तथा राज्यों के संयुक्त वित्त पोषण से संचालित की जानी थीं, वे भी कई राज्यों की आर्थिक स्थिति ठीक न होने या फिर निहित राजनीतिक स्वार्थो की वजह से कार्यान्वित नहीं की जा सकीं।

समावेशी  विकास ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों के संतुलित विकास पर निर्भर करता है। इसे समावेशी विकास की पहली शर्त के रूप में भी देखा जा सकता है। वर्तमान में हालांकि मनरेगा जैसी और भी कई रोजगारपरक योजनाएं प्रभावी हैं और कुछ हद तक लोगों को सहायता भी मिली है, परन्तु इसे आजीविका का स्थायी साधन नहीं कहा जा सकता, जबकि ग्रामीणों के लिए एक स्थायी तथा दीर्घकालिका रोजगार की जरूरत है। अब तक का अनुभव यही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सिवाय कृषि के अलावा रोजगार के अन्य वैकल्पिक साधनों का सृजन ही नहीं हो सका, भले ही विगत तीन दशकों में रोजगार सृजन की कई योजनाएं क्यों न चलाई गई हों। सके अलावा गांवों में ढ़ांचागत विकास भी उपेक्षित रहा फलतःगांवों से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन होता रहा और शहरों की ओर लोग उन्मुख होते रहे। इससे शहरों में मलिन बस्तियों की संख्या बढ़ती गई तथा अधिकांश शहर जनसंख्या के बढ़ते दबाव को वहन कर पाने में असमर्थ ही हैं। यह कैसी विडम्बना है कि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहीं जाने वाली कृषि अर्थव्यवस्था निरन्तर कमजोर होती गई और वीरान होते गए, तो दूसरी ओर शहरों में बेतरतीब शहरीकरण को बल मिला और शहरों में आधारभूत सुविधाएं चरमराई यही नहीं रोजी-रोटी के अभाव में शहरों में अपराधों की बढ़ ई है।


ग्रामीण क्षेत्र में समावेशी विकास से जो उम्मीद 

ग्रामीण क्षेत्र में समावेशी विकास से जो उम्मीद की जाती हैं उनको हम इस तरीके से देख सकते हैं-
1. शिक्षा
कई गाँवो तक अब सरकारी स्कूल पहुँच चुके हैं। अब शायद ही कोई बदनसीब गांव होगा जहां पर कोई स्कूल नही होगा। समावेशी विकास के तहत उम्मीद की गयी थी की बच्चे पढ़ेंगे लिखेंगे तो आगे बढ़ेंगे और अपने पैरो पर खड़े होंगे। 
परन्तु हम स्कूलों की संख्या से खुश नही रह सकते हमे इनकी गुणवत्ता को जानने का रुख करना ही होगा। इस दौरान हम पाते हैं की मिड डे मिल या फिर सर्व शिक्षा अभियान ने स्कूलों से ड्रॉपआउट करने वालो की संख्या में कमी कराइ हो पर हम उनके और एक सभ्य वर्ग के उसी लेवल के  बच्चो की तुलना करने पर पाते हैं की दोनों के बीच एक बहुत बढ़ी खाई हैं। 

एक बच्चा पब्लिक स्कूल में बिलकुल ही अलग क्वालिटी का अध्यन कर रहा हैं दूसरी और एक बच्चा गांव के स्कूल में पढाई के नाम की टाइमपास कर रहा हैं। यहां तक की दोनों की शिक्षा का माध्यम भी अलग-अलग हैं,  हम इस सम्बन्ध में आगे नही बढ़ेंगे परन्तु हम यह निष्कर्ष जरूर निकालेंगे की अगर आप समावेशी विकास की बात कर रहे हो तो वह अलग अलग प्रकार की शिक्षा अलग-अलग तरह की सुविधाओ के साथ प्रदान करके किस प्रकार प्राप्त करोगे। 

2. चिकित्सा 
कई गांव इस मामले में खुशनसीब  हैं की उनके वहां पर कोई न कोई  चिकत्सीय इकाई मौजूद हैं। वरना अभी भी अधिकांश गाँवो के लोग अपने इलाज के लिए निकटवर्ती कस्बे या शहर का रुख करते हैं।
अगर गांव में कोई प्राथमिक केंद्र हैं भी तो वो भी अपने आप में  एक समस्या हैं क्यूंकि अगर नही  होता  तो  लोग यह सोचकर सब्र कर लेते की उनको ऐसी सुविधा मिली ही नही हैं परन्तु अब वे  समय पर नही खुलने,  समय पर कम्पाउण्डर/डॉक्टर नही आने, प्राइवेट क्लिनिक चलाने जैसी समस्याओ से जूझ रहे हैं। 
समय पर चिकित्सा सुविधा नही मिल पाने के कारण कई दुर्घटनाऍ भी होती हैं। हालांकि कई राज्य सरकारों ने जिला मुख्यालयों पर 108 एम्बुलेंस सर्विस शुरू की हैं , जो ग्रामीण स्तर पर मौजूद नही सुविधाओ की कमी को विकल्प प्रदान करती हैं ,जो भी अपनी कम संख्या और अन्य कठिनाइयों के कारण सही विकल्प नही बन पाया हैं। 

सबसे संवेदनशील समस्या प्रसूताओं की मानी जा सकती हैं वो इन सबके अभाव में पारम्परिक तरीको पर ही निर्भर रहती हैं। और असहनीय दर्द को सहती हैं। 


3. सड़क 
ये गाँवो को दूसरे माध्यमो से जोड़ने का साधन हैं। अगर गांव शहर या फिर कस्बे से अच्छी तरीके से जुड़ा हुआ होगा तो वहां के लोग मुख्यधारा से जुड़ पाएंगे। जो समावेशी विकास की दिशा में ही प्रयास होगा। ग्रामवासियो को शहर पहुँचने में सुविधा होगी तो वे अपने कृषि उत्पादों  को आसानी से बाज़ार तक पहुंचा सकेंगे और अपनी आवश्यकता की चीजे भी खरीद सकेंगे।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की बदौलत अब सभी गाँवो को बहुमासिक संपर्क सुविधा प्राप्त हो रही हैं। कुछ गांव अभी भी इससे वंचित हैं , तथा कई जगहों पर तो ऐसे निर्माण किये गए हैं जो निर्धारित आवश्यकताओं की पूर्ति बहुत ही  काम मात्रा में करते हैं।
अब सम्पर्को के साथ -साथ गतिशील सम्पर्कसाधनो की भी आवश्यकता महशूस हो रही हैं। इस दिशा में होने वाली प्रगति की अगर गति तीव्र कर दी जाए तो यह संतोषजनक साबित हो सकती हैं।

4.पेयजल
गाँवो को पेयजल की आपूर्ति की व्यवस्था करना भी एक चुनौती हैं। गाँवो में नलकूपों के माध्यम से नलो या टंकियों की व्यवस्था की गयी हैं। गाँवो में पहले पीने के पानी  का  साधन कुए हुआ करते थे।   परन्तु पानी के लगातार निचे होते स्तर के कारण ये अब अप्रासंगिक हो गए हैं।  हैंडपंप जैसे माध्यम गाँवो में पानी की पूर्ति में सहायक हो रहे हैं।

5. सिंचाई 
गाँवो की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर हैं और कृषि, मानसूनी जलवायु होने के कारण सिंचाई पर निर्भर हैं। गाँवो में खेती के लिए पहले कई प्राकृतिक साधनो से पानी मिलता था परन्तु अब वे सब संशाधन जलवायु परिवर्तन या अन्य कारणों से इस लायक नही रहे हैं। इन सबका नतीजा किसान को उत्पादन में भुगतना पड़ रहा हैं। जिस कारण उसकी आय में कमी आ रही हैं। साथ ही महंगाई में वृद्धि के कारण उस पर वित्तीय भर बढ़ता जा रहा हैं और किसानो की आत्महत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं।

5. आवास 
गाँवो में जीवनयापन का सदन केवल कृषि होती हैं ,वर्तमान बढ़ती हुई महंगाई के कारण कृषि की उत्पादन लागत में वृद्धि हुई हैं जिससे   उनके फायदे में कमी हुई हैं और साथ ही उनके खर्चे भी काफी अधिक होते हैं  इस कारण उनके पास गुजारा करने के अलावा आय का स्त्रोत नही होता हैं।  ऐसी हालत में उनके घर निर्माण के कम ही अवसर होते हैं। 
गाँवो में बड़े किसानो को अगर छोड़ दिया जाए तो सबी छोटे किसानो की यही हालत हैं। पक्के मकानो के अभाव में उनको सर्दी ,बरसात और गर्मियों में काफी परेशानी उठानी पड़ती हैं। 
आवास के लिए सरकार की योजनाओ के लिए योगतया मानक बहुत ही अव्यवहारिक हैं। आवास के अभाव में गांव के लोग फिर शौचालयों का भी निर्माण नही करते और फिर खुले में जाकर गंदगी फैलाते हैं और बीमारियो को न्यूता देते हैं।

6. सामाजिक सुरक्षा 
सामाजिक सुरक्षा भी समावेशी विकाश का ही भाग हैं। समावेशी विकाश के लिए सामाजिक सुरक्षा की सूनिशिचतता एक जरुरी आवश्यकता हैं। जब भी  समाजिक सुरक्षा की बात होती हैं तो उसमे केवल उन्ही पक्षों का अध्यन किया जाता हैं जोकि उनको प्रभावित नही कर पाते हैं उसका अध्यन शहरी या ग्रामीण तौर पर नही किया जाता।

गाँवो में हम सबसे पहले वृद्धजनों की बात करते हैं तो हम देखते हैं की इस अनुत्पादक उम्र में बड़े-बूढो को काफी धक्के खाने पड़ते हैं जो ज्यादातर उसके परिवारजनो में बेटे या बहुओ के द्वारा होते हैं।
वहां पर कोई ऐसा माध्यम भी नही होता जसके कारण वे अपना जी बहला सके। साथ ही वित्तीय तौर पर भी सुदृढ़ नही होने के कारण उनको अपमानजनक हालत से गुजरना पड़ता हैं। गाँवो में प्रचार प्रसार के अभाव में वे सरकारी पेंशन जैसी चीजो से भी वंचित रह जाते हैं।

महिलाओ से संबंधित मामले गाँवो में बहुत सामने आते हैं एक तो उनसे दिनभर काम करवाया जाता हैं और फिर छोटी-छोटी गलतियों पर पीटा जाता हैं। कई बार उन्हें घर से निकाल दिया जाता हैं ,उन्हें खाना नही दिया जाता और दहेज़ जैसी चीजो के लिए तंग किया जाता हैं। गांव में औरते ज्यादातर अशिक्षित होती हैं और वे अपने शोषण को पहचान नही पाती हैं। गाँवो में जो महिला शोषण के जो तरीके सामने आते हैं वो बहुत ही जघन्य श्रेणी के होते हैं जैसे की - आग लगाकर मार डालना , कुए में लटका देना , ट्रैन से कट जाना , फंदे से झूल जाना आदि ऐसे ही उदहारण हैं।

बच्चो को भी गाँवो में सामजिक सुरक्षा नही मिल पाती हैं। उनको छोटी उम्र में ही कृषि या फिर कमाने के कार्यो में लगा दिया जाता हैं। उनकी शिक्षा जैसी चीजो की कोई परवाह नही की जाती ,साथ ही उनको खेलने तक भी नही दिया जाता , यह कहकर की खेलकूद ठाले लोगो के काम हैं। इस प्रकार बच्चो को सर्वांगीण विकास करने से वंचित कर दिया जाता हैं। कई बच्चे उचित देखभाल के अभाव में कुपोषण के शिकार हो जाते हैं।



इस प्रकार हम देख सकते हैं की समावेशी विकास के ग्रामीण व्यवस्था के सम्बन्ध में चुनौतियां बिलकुल ही अलग हैं ,और उनका अलग तरीके से ही समाधान जरुरी हैं।