जलवायु परिवर्तन के वैश्विक एजेंडे में कोरोना संकट जनित व्यवधान

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ शुरू हुई उपनिवेशों की आजादी ने वैश्विक राजनीति के मंच को नव-स्वतंत्र, विकासशील देशों के लिए भी खोल दिया। द्विध्रुवी विश्व की राजनीति खत्म होने के बाद पश्चिमी देश मुद्दाविहीन होते चले गये तो इन्ह्ने जोर-शोर से जलवायु परिवर्तन का अजेंडा चलाया। जिसके संकट को इन्होने अतिशयोक्तिपूर्ण तरीके से व्यक्त करना शुरू कर दिया था।

वर्ष 1991 में एक तो नव-उदारवाद की शुरुआत हुई, वही अगले साल वर्ष 1992 में पृथ्वी सम्मेलन ने पर्यावरणीय राजनीति की शुरुआत की। तब से वैश्विक राजनीति इन्ही के इर्दगिर्द घूम रही हैं। क्योटो और पेरिस जैसे समझौतों ने लगभग सभी देशों को इस राजनीति का हितधारक बना दिया। लेकिन वर्ष 2020 में आकर कोरोना संकट ने पुरे वैश्विक परिदृश्य को बदल करके रख दिया। इसने बिलकुल ही अलग प्रकार की वैश्विक व्यवस्था को जन्म दिया, जिसमे सभी पीड़ित देश किसी एक जिम्मेदार की खोज करने में विफल हैं। सभी देश दीर्घकालीन अनिश्चित संकट का सामना करने के बजाय वर्तमान में मौजूद निश्चित संकट का समाधान खोजने के लिए प्रयासरत हैं। लेकिन दोनों ही मामलों में भय और उपाय जैसी सामान्य विशेषताएँ दृष्टिगोचर की जा सकती हैं। 

इस समय पर देखा जाए तो हम कह सकते हैं कि कोरोना संकट ने जलवायु परिवर्तन को पछाड़ दिया हैं। इस कथन को कहने के लिए हमारे पास कई तर्क मौजूद हैं -

  • दीर्घकालीन संकट के ऊपर वर्तमान संकट को प्राथमिकता : इस समय पर जलवायु परिवर्तन से ज्यादा शोर कोरोना संकट का हैं। यदि, जलवायु परिवर्तन की कीमत पर भी कोई उपाय इस समस्या से छुटकारा दिला सकता हैं तो दुनिया उसे अपनाना पसंद करेगी। इससे पता चलता हैं कि कम से कम इस समय पर तो जलवायु परिवर्तन का मुद्दा द्वितीयक हैं।
  • कोरोना संकट में जलवायु परिवर्तन का संकट कम हुआ हैं : जलवायु परिवर्तन का एजेंडा इस समय इसलिए भी प्राथमिकता में नही हैं क्योंकि इस महामारी की रोकथाम के लिए लगाए गये लॉकडाउन के कारण प्रदूषण के स्तर में अभूतपूर्व कमी देखने को मिली। ध्रुवों पर ओजोन छिद्र के भी भरने की बात सामने आ रही हैं।  कुछ लोग दूर पहाड़ों को देखने का दावा कर रहे हैं तो कुछ नदियों के जल को  स्वच्छ होने का। यह बात सही भी हैं कि इस दौरान जीवाश्म ईंधन के प्रयोग में कमी से उत्सर्जन में गिरावट आई। यहाँ एक तरह से कोरोना संकट जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उपाय का कार्य कर रहा हैं।
  • प्रायोजित डर में बढ़त : जिस प्रकार वैश्विक एजेंडा जलवायु परिवर्तन की विकटता के प्रति आगाह करने के लिए कई प्रकार की रिपोर्ट और सूचकांक जारी कर रहा था। कोरोना में भी समय के साथ विभिन्न रिपोर्ट इसकी भयावहता के बारे में उत्तरोत्तर वृद्धि की बात कह रही हैं। शुरू में कहा गया कि यह संक्रमित व्यक्ति से स्त्रावित द्रव के संपर्क में आने से होता हैं, अब कहा जा रहा हैं कि यह हवा में भी प्रसारित हो सकता हैं। ऐसा कह सकते हैं कि डर का कोई प्रायोजक उपस्थित हैं, जो मार्केट की डिमांड के अनुसार इसके संस्करण को अपडेट करता रहता हैं। साथ ही कोरोना का यह प्रायोजित डर जलवायु परिवर्तन से आगे निकल गया हैं। लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में कम से कम आठ बार भूकम्प आया था, लेकिन खौप कोरोना का ही ज्यादा था।   
  • समाधानों के लिए प्रयास में कोरोना आगे हैं : जिस प्रकार विभिन्न व्यवसाय समूह वैश्विक राजनीति की सहायता से जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हरित उपकरणों का बाजार खड़ा करने में लगे हुए हैं। उसी प्रकार कोरोना संकट में भी विभिन्न प्रतिभागी निवारक एवं उपचार समाधानों का बाजार खड़ा करने में लगे हुए हैं। रिओ समिट के बाद पुरे विश्व को परिचर्चा की सभा में एकजुट करने के लिए जलवायु परिवर्तन ही सर्वोच्च मुद्दा था, इसने पिछले दशकों के व्यापार वार्ता, परमाणु निशस्त्रीकरण जैसे मुद्दों को पीछे छोड़ दिया था। परन्तु इस समय कोरोना संकट ने इस मुद्दे को नेपथ्य में डाल दिया हैं। इस समय पर सभी देश या तो वैक्सीन को लेकर वार्तारत है या फिर बदहाल स्थिति की बहाली के लिए चर्चाओं में संलग्न हैं।
  • अन्य मुद्दें : जिस तरह जलवायु परिवर्तन ने वैश्विक राजनीति में विकसित बनाम विकासशील देश, समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्व, न्यूनीकरण एवं अनुकूलन जैसे मुद्दें मुख्यधारा में रहते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी ब्लेम गेम, विकासशील देशों की सहायता जैसे मुद्दें मुख्यधारा में हैं।  

कोविड-19 का डर : पूर्व में और अब 

जैसे-जैसे कोरोना की जीवन यात्रा आगे बढ़ी हैं, डर उत्पन्न करने की एक व्यवस्था भी इसके साथ आगे बढ़ी हैं। 

  1. शुरू में इटली और चीन की ख़बरों, मूवीज के दृश्यों को सोशल मीडिया पर साझा करके लोगो को इतना डराया कि उन्हें एक सख्त लॉक डाउन में रहने के लिए मजबूर और प्रताड़ित किया गया। जिसके साथ लोगो की आजीविका चौपट हो गई और उन्हें सैंकड़ों किलोमीटर दूर अपने घरों की और पैदल सफ़र करना पड़ा। जिसकी विभिषका अपने आप में ही एक अध्याय (कोविड-19 लॉकडाउन और मजदूरों का पलायन)हैं।      
  2. आरंभिक दौर में कोरोना के बारे में अपुष्ट, एकतरफा दावे करके मौजूदा स्वास्थ्य अवसंरचना को भी सीमित और संशयित रखा गया। शुरू में लोगो का ईलाज नही करके उन्हें आइसोलेशन वार्ड में बंद कर दिया, जिन्हें समय पर खाना तक नही दिया। इनमे से परेशान होकर कई लोगों ने आत्महत्या कर ली। शायद इस स्तर पर सोच यह थी कि भले ही ये तो मर जाए, लेकिन बाकि लोग इनके संपर्क में नही आये।
  3. आरंभिक दौर ऐसा था, जिसमे लोगों में इस हद तक डर था कि अगर कोई गाँव का आदमी बाहर से आया है तो उससे संपर्क नही रखा गया। अगर किसी आदमी को बुखार है तो मेडिकल वाला दवाई देने से मना कर देता था। एक तरीके से एक आधुनिक अस्पृश्यता की स्थिति देखने को मिल रही थी। मतलब लोग संक्रमण के डर की वजह से अतिरिक्त सतर्क (Extra -Alert) थे।
  4. जब संक्रमित व्यक्ति के संपर्क से भी कई लोगो को नही हुआ तो लोगो को डराने के लिए इसके हवा में प्रसारित होने की बात कही गई। लोग फिर भी नही डरे तो कहा गया कि अभी एक दक्षिण पूर्वी देश में कोरोना के ऐसे उपभेद (strain) मिले हैं, जो अभी तक ज्ञात संक्रमण के मामलों से बहुत अधिक खतरनाक हैं।
  5. अब तो पडौस में हो जाता हैं तो भी कोई तवज्जों नही देता। क्योंकि ठीक होने वाले के अनुसार यह एक प्रकार का बुखार ही हैं। जिसमे आपकी इम्युनिटी ठीक है तो डरने की कोई जरुरत भी नही हैं। इसका आलम यह हुआ कि लोग खुद सामने आकर अपने पॉजिटिव होने का स्टेटस अपडेट कर रहे हैं कि उनको कोरोना था तो उनसे मिलने वाले अपना टेस्ट कराये, जबकि पहले इसके साथ बहुत बड़ा स्टिग्मा जुदा हुआ था। अब लोग कोरोना पॉजिटिव आने के बाद भी धरने और प्रदर्शनों का हिस्सा बन रहे हैं। कोरोना पॉजिटिव आकर किसी परिजन के मरने के बाद भी लोग खुद से उनका अंतिम संस्कार कर रहे हैं। जबकि पहले मृतक को पैक करके देने के कारण कई शवों की आपस में अदला-बदली हो गई। कई शव कॉविड प्रोटोकॉल का पालन करने के कारण लंबे समय तक अस्पतालों में पड़े रहे। कईयों के साथ अस्पतालों में छल-कपट हुआ, जब अच्छे-खासे लोगो को कॉविड से मृतक बता दिया गया।

इन सब उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता हैं कि आरंभिक दिनों में कोरोना को लेकर कितना अन्याय हुआ हैं। देश ने वाकई पिछले चार-पांच महीने बहुत कष्ट झेला हैं।

क्या कोरोना की तुलना जलवायु संकट से की जा सकती हैं?

जलवायु संकट की चिंताएं भी वास्तविक हैं, लेकिन जो समाधान किए जा रहे हैं, वे व्यावसायिक हैं। सभी व्यवसायी वैकल्पिक हरित समाधानों को विकसित करने का दावा करके हाशिए पर पड़े लोगो के परम्परागत आजीविका निर्वाह को समाप्त करना चाहते हैं। इनके द्वारा किए गये उपाय लक्ष्यहीन हैं, जो असली चुनौतियों को संबोधित नही करते हैं। इन उपायों के लिए जनता को भरी कीमत चुकानी पड़ रही हैं, जिसे हम ओजोन संरक्षण से जुड़े वियना समझौते से समझ सकते हैं। जिसके लक्ष्यों को तथाकथित तौर पर प्राप्त कर लिया गया हैं। लेकिन आम लोगो की जिन्दगी में इससे कोई फर्क नही पड़ा, जबकि उन्हें चीजे प्राप्त करने से रौकने के लिए कीमतों में वृद्धि की गई। साथ ही यह राजनीति में विकासशील देशों के प्रति ऐतिहासिक न्याय किए बिना उन पर दायित्व थोपना चाहते हैं। कोरोना संकट में भी यही स्थिति हैं, जिम्मेदार पक्ष की न तो पहचान की गई हैं और न ही उसके दायित्व निर्धारित किए गये हैं। अगर ऐसा नही किया गया तो यह इस प्रकार के अग्रिम दुस्साहसों को प्रोत्साहित करेगा।

दूसरी बात डर की बात भी दोनों में प्रायोजित हैं, जो वैश्विक संगठनों द्वारा इर्धारित किया जाता हैं। इसका नुकसान यह रहा हैं कि यह मूल और अति आवश्यक मुद्दों से ध्यान को विमुख कर दे रहा हैं। यही कारण हैं कि निर्धनता उन्मूलन, पोषण एवं भूख जैसे मुद्दें वैश्विक राजनीति से गायब हो गये हैं या फिर गिलोटिन की भेट चढ़ने वाले उप-खंडों में बदल गये हैं।

राष्ट्रीय-राज्य की अक्षमता

कोरोना संकट में राष्ट्रीय-राज्य की अक्षमता उजागर हुई कि वह आगामी अप्रत्याशित संकटों के प्रति अनुक्रिया करने के लिए तैयार नही हैं। चाहे वह कोरोना हो या फिर कोई प्राकृतिक आपदा हो।

लॉक डाउन के बारे में सरकार को आरंभ में पता ही नही था कि इसके लिए किस कानून का सहारा लिया जाए। इसलिए देश भर में इसका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए CrPC की धारा 144 का प्रयोग किया गया। लॉक डाउन 2.0 में जाकर NDMA ने आपदा प्रबंधन अधिनियम से शक्तियों को ग्रहण किया। 

लेकिन धारा 144 के अखिल भारतीय प्रयोग ने पुरे देश का एक साथ आपराधिक-करण कर दिया गया। लोगो को घरों से निकालकर भी पीटा गया, धार्मिक स्थलों और कही जरुरी जगह से आते अकेलें आदमियों को भी पीटा गया। इसका क्षेत्राधिकार विस्तृत था। यह आपातकाल से भी बदतर था, जिसमे अनुच्छेद 359 के तहत प्राप्त अनुच्छेद 20 और 21 का समर्थन भी प्राप्त नही था। प्रधानमंत्री ने कहा कि जनता इसे अपने आप पर लगाया हुआ आपातकाल माने। यह एक राष्ट्रीय-राज्य की विफलता थी कि वो अपनी आवाम को अपनी क्षमताओं पर भरोसा दिलाने में नाकामयाब रहा। अधिकतर राष्ट्रीय-राज्यों ने अपनी अक्षमताओं के लिए लोगो को दंडित किया। इस दौरान कईयों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए और कईयों के वाहन जब्त हुए, जिनके लिए वे आज भी (22 सितंबर 2020) पुलिस थानों और अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। 

इस सख्त लॉक डाउन के बाजवूद भी लोगों ने पलायन किया। उनके लंबे सफ़र, साथ में बच्चे और बूढ़े, रास्ते में दुर्घटना, बसों को अनुमति देने में राजनीति आदि मुद्दों की कारण उत्पन्न मानवीय संकट की चर्चा सोशल मीडिया में जमकर हुई। जिसके कारण सरकार पर दबाव पड़ा और वह लॉकडाउन को सरल बनाने के लिए मजबूर हुई। साथ ही अर्थव्यवस्था की बहाली के लिए घोषित आत्मनिर्भर भारत पैकेज के नाम के पीछे काफी हद तक प्रवासी मजदूरों को गृह राज्य में ही रोजगार देने की अवधारणा थी, हालाँकि आत्म निर्भर पैकेज का विश्लेषण एक अलग अध्याय में समझाया जाएगा।

कोविड-19 केन्द्रित आगामी राजनीति

ये बात तो सही हैं कि आगामी समय में कोविड-19 केन्द्रित राजनीति ही मुख्यधारा में रहेगी क्योंकि इस समय पर सभी देश वैक्सीन का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। सभी देश वैक्सीन को प्राप्त करने, वितरण करने और सुरक्षित रखने जैसे कार्यों में संलग्न हैं। जो व्यवसायी जलवायु परिवर्तन के लिए समाधान विकसित करने हेतु कार्यरत थे, वे अब वैक्सीन से जुड़े कार्यों में संलग्न हो गये हैं। वैक्सीन आने पर कंपनियों द्वारा मोटी कमाई किए जाने की आशंका बताई जा रही हैं, हो सकता हैं तब सामान्य बुखारों को कोरोना बताने के चलन में वृद्धि हो।

निष्कर्ष

जलवायु परिवर्तन और कोरोना दोनों संकट वास्तविक हैं और दोनों के ही प्रति समान रूप से सतर्कता बरतने की आवश्यकता हैं। लेकिन केवल व्यावसयिक हितों के कारण ही डर को प्रायोजित नही करना चाहिए क्योंकि इससे लोगो के मध्य भारी अराजकता उत्पन्न होती हैं, जो उनकी जान और आजीविका के लिए विध्वन्श्कारी होती हैं। दोनों के लिए ही समाधानों और नवाचारों का समर्थन करने की आवश्यकता हैं। 

अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बहुआयामी निहितार्थ


भारत ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करते हुए राज्य का पुनर्गठन किया है।अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम के दो अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेश होंगे, जिसमे से जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी, वही लद्दाख में विधानसभा नही होगी।दोनों राज्यों के लिए उप-राज्यपाल के पद का प्रावधान होगा। इसके साथ ही सात दशक पुराना कश्मीर का मसला एक बार फिर पूरी चर्चा के केंद्र में आ गया है।एक तरफ भारत में इसे ऐतिहासिक निर्णय मानते हुए ख़ुशी मनाई जा रही हैं, वही पाकिस्तान इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में लगा हुआ हैं। कश्मीर घाटी में इसे हटाने को लेकर असंतोष देखा जा रहा हैं।इस प्रकार इस मुद्दे के बहुआयामीय निहितार्थ हैं।जिन पर हम पृथक-पृथक विमर्श करेंगे ।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :
आजादी के बाद पाकिस्तान ने इसकी स्वतंत्र स्थिति को नकारते हुए कबाइली भेष में अपनी सेना को युद्ध के लिए भेज दिया। तब महाराजा हरिसिंह द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के साथ ही जम्मू-कश्मीर का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के प्रावधानों के तहत कानूनी तौर पर विलय हो गया था। पाकिस्तान द्वारा इस मसले पर युद्द थोपने के कारण  स्थिति को नाजुक होने से बचाने के लिए जवाहर लाल नेहरु इस मुद्दे को सुरक्षा परिषद् में ले गये। सुरक्षा परिषद ने इस पर जनमत संग्रह कराने और विवादित क्षेत्र से सेना हटाने का आश्वासन देते हुए कुछ शर्ते रखी थी।जिन पर पाकिस्तान ने कभी अमल नहीं किया, उसने पाक अधिकृत कश्मीर का विसैन्यीकरण करना तो दूर उस क्षेत्र की जनसांख्यिकी परिवर्तन करने के प्रयास किए। पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी के लोगो में भी उग्रवादी भावनाओ को भड़काने के लिए कार्य किया।

1990 के दशक में कश्मीर घाटी से से पंडितो का निर्वासन करने के बाद जनसांख्यिकी में पर्याप्त परिवर्तन हो गये।इसके साथ ही सयुंक्त राष्ट्र का जनमतसंग्रह का प्रस्ताव अप्रासंगिक हो गया।हालाँकि सयुंक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप की गुंजाईश 1972 के शिमला समझौते के साथ ही नेपथ्य में चली गई, जिसमे दोनों देश सभी मुद्दों को आपसी बातचीत से सुलझाने के लिए सहमत हुए थे।पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित सीमापार आतंकवाद की घटनाओ ने बातचीत की कोशिशो को नाकाम कर दिया।जम्म-कश्मीर में राजनीतिक अस्थिरता भी स्थानीय लोगो में भारत-विरोधी भावनाये भड़काने में सहायक रही। जम्मू कश्मीर का राजनीतिक नेतृत्व जनता का विश्वास जितने में नाकाम रहा।इस तरह के परिदृश्य में पाकिस्तान द्वारा सीमापार घुसपैठ के प्रयासों को बढ़ावा देना, सुरक्षा बलों पर हमला करना, शहीदों के शवो को देखकर भारतीय राष्ट्रवाद का उग्र होना जैसी घटनाये नियमित तौर पर होने लगी।ऐसी स्थितिओ में यह अपरिहार्य हो गया था कि भारत सरकार स्थितियों को सुधारने के लिए धारा 370 को निरस्त करने जैसा क्रांतिकारी कदम उठाये ।

इस प्रकार अनुच्छेद 370 को निरस्त करते ही जम्मू-कश्मीर राज्य की संवैधानिक स्थिति भारत के बाकी राज्यों के समान हो गई।इसके साथ ही यह एक ऐतिहासिक कदम हो गया, जिसने भारत के एकीकरण की प्रक्रिया को पूर्ण कर दिया।वही ऐसा भी माना जा रहा हैं कि जवाहर लाल नेहरु के द्वारा भारतीय सेना ने कबाइलियो को नही खदेड़कर तथा मामले को सुरक्षा परिषद् में ले जाकर जो भूल की गई थी, उसे इस फैंसले के बाद सुधार लिया गया हैं।हालांकि उसे किसी व्यक्ति की भूल बताने की बाते अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन इतना तो तय हैं कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के दूरगामी सकारात्मक प्रभाव सामने आयेंगे ।


राजनीतिक निहितार्थ :
अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निरस्त होने से जम्म-कश्मीर को मिले विशेष प्रावधान खत्म हो गये हैं।अब बाकी राज्यों की तरह वहाँ पर भी भारतीय कानून लागू होंगे।कुछ ऐतिहासिक कानूनी बदलाव वहाँ देखने को मिलेंगे जो कि इस प्रकार हैं -
  • संसद की ओर से बनाए गए हर क़ानून अब वहां प्रदेश की विधानसभा की मंज़ूरी के बिना लागू होंगे ।
  • सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर भी अमल लागू हो जाएगा ।
  • जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल छह से घटकर पांच साल का हो जाएगा.
  • संसद या केंद्र सरकार तय करेगी कि इसके बाद आईपीसी की धाराएं प्रदेश में लागू होंगी या स्थानीय रनबीर पीनल कोड (RPC)। साथ ही इस पर भी फ़ैसला लिया जाएगा कि पहले से लागू स्थानीय पंचायत क़ानून जारी रहेंगे या उन्हें बदल दिया जाएगा ।
  • अब तक क़ानून व्यवस्था मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी होती थी, लेकिन अब वह सीधे केंद्र सरकार के अधीन होगी और केन्द्रीय गृह मंत्री प्रदेश में अपने प्रतिनिधि उपराज्यपाल के ज़रिये क़ानून-व्यवस्था को संभालेंगे ।
  • अब तक सिर्फ़ 'स्थायी नागरिक' का दर्जा प्राप्त कश्मीरी ही वहां ज़मीन ख़रीद सकते थे, नौकरी प्राप्त कर सकते थे, लेकिन 370 हटने के बाद बाकी लोगो की भी इन तक पहुँच हो जायेगी ।
  • प्रदेश के अलग झंडे की अहमियत नहीं रहेगी ।
  • महिलाओं पर लागू स्थानीय पर्सनल क़ानून बेअसर हो जाएंगे ।
इस प्रकार जम्मू-कश्मीर में व्यापक राजनीतिक परिवर्तन दिखाई देंगे।लेकिन जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के साथ ही भारतीय राजनीती पर भी इसके गहन निहितार्थ सामने आयेंगे। उदाहरण के लिए -
  1. अब तक किसी क्षेत्र में मौजूद असंतोष का समाधान करने के लिए उस क्षेत्र को संवैधानिक रियायते प्रदान की जाती रही हैं , उदाहरण के लिए बोडोलैंड, गोरखालैंड और लद्दाख के लिए स्वायत पहाड़ी परिषदों का प्रावधान करना, पुंडुचेरी को केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा देना या मेघालय को केंद्र शासित प्रदेश से राज्य का दर्जा देना।लेकिन पहली बार किसी क्षेत्र के असंतोष को शांत करने के लिए राज्य का दर्जा घटाकर केंद्र शासित प्रदेश का कर दिया गया हैं।
  2. अनुच्छेद 370 के समान ही कुछ विशेष प्रावधान 371 के तहत किये गये हैं।अब उन राज्यों में भी आशंका बढ़ रही हैं कि उनकी विशिष्ट संस्कृतियों को संरक्षित करने वाले कानूनों को केंद्र सरकार एकतरफा खत्म कर सकती हैं।
  3. विधानसभा युक्त केन्द्रशासित प्रदेशो में चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर टकराव देखने को मिलता हैं।ऐसे में कश्मीर में भी इन मुद्दों के कारण राजनीतिक स्थितियों के अधिक जटिल होने की संभावना हैं ।
  4. लद्दाख के लिए अलग से केंद्र शासित प्रदेश बनाकर भले ही लम्बे समय से चली आ रही मांग को पूरा कर दिया गया हो लेकिन विधानसभा का नहीं होना स्थानीय जनता के लोकतान्त्रिक अधिकारों की अवहेलना करेगा, साथ ही मुस्लिम बाहुल्य कारगिल जिले को लद्दाख में शामिल करने से कारगिल के लोगो में असंतोष उत्पन्न होगा।
  5. कश्मीरी पंडितो को वापस घाटी में बसाने में मदद मिलेगी।वर्षो से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे समुदाय को न्याय प्रदान करने में मदद मिलेगी।
राजनयिक निहितार्थ :
ऐतिहासिक और संवैधानिक साक्ष्य पर्याप्त रूप से साबित करते हैं कि जम्मू कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग हैं, लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीर को हमेशा विवादित मुद्दे के तौर पर पेश किया हैं।पाकिस्तान ने इसे बहुपक्षीय मंचो पर उठाने के प्रयास किए हैं।  अपने हितो के कारण कई देशो की पाकिस्तान के साथ सहानुभूति वाली नीति भी रही हैं।वर्तमान में भारत एक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था हैं, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा बाजार हैं।अधिकतर विकसित देश इसीलिए भारत को आकर्षक निवेश गन्तव्य के तौर पर देख रहे हैं।शायद यही कारण हैं कि भारत को अनुच्छेद 370 निरस्तीकरण के कारण किसी बाहरी देश की बयानबाजी का सामना नही करना पड़ा।

जम्मू-कश्मीर को लेकर बहुआयामी राजनयिक निहितार्थ निम्न प्रकार हैं -
  1. पाकिस्तान के लिए कश्मीर का मुद्दा बेहद अहम् हैं।वह मुस्लिम जनसँख्या होने के कारण इसे अपना स्वभाविक भाग मानता हैं।पाकिस्तान की घरेलु राजनीति कश्मीर मुद्दे से काफी गहराई तक जुडी हुई हैं।इसलिए वह इस मुद्दे को लेकर तनाव बढ़ाने के प्रयास करने में लगा हुआ हैं और आपसी व्यापारिक संबंधो को स्थगित कर दिया हैं। वही इस मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण करने के प्रयास  में लगा हुआ हैं।उसने अन्तराष्ट्रीय न्यायालय में भी इस मुद्दे को ले जाने की घोषणा की हैं।
  2. भारत का जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अक्साई चीन को लेकर विवाद हैं, लेकिन भारत ने इसे आंतरिक मामला बताया हैं, जो कि राजव्यवस्था से सम्बन्धित हैं और किसी भी प्रकार से सीमाओं में परिवर्तन नहीं करता हैं।इसलिए चीन ने आपसी विवाद को लेकर तो कोई टिप्पणी नहीं की हैं।लेकिन पाकिस्तान में अपने निवेश की रक्षा के लिए पाकिस्तान के हित में कुछ बयान दिए हैं और सुरक्षा परिषद् में इसे उठाने की कोशिश की हैं। 
  3. अमेरिका इस समय अफगानिस्तान से बाहर निकलने के लिए तालिबान से समझौता करने में लगा हैं ।इस कार्य में पाकिस्तान का सहयोग उसके लिए उपयोगी हो सकता हैं।इस वजह से पाकिस्तान को राजी करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दोनों देशो के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश की हैं ।
  4. अगर दुसरे देशो की भूमिका को देखे तो वे बयानबाजी तक सीमित रहे हैं। केवल तुर्की ने पाकिस्तान के पक्ष में बयान दिए हैं।बाकी देशो ने सक्रीय या मूक रूप से भारत के पक्ष में अपना रुख रखा हैं ।
  5. दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को छोड़कर बाकि सभी देशो ने इसे भारत का आंतरिक मामला बताया हैं।श्रीलंका ने बोद्ध बाहुल्य लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने का स्वागत किया हैं ।
  6. सयुंक्त राष्ट संघ की भूमिका - 1972 के शिमला समझौते के बाद सयुंक्त राष्ट की भूमिका इस मामले पर अप्रासंगिक होती चली गई।इसलिए सयुंक्त राष्ट्र का इस विषय पर विमर्श क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को ध्यान में रखकर ही हो सकता हैं। खासकर पाकिस्तान द्वारा सीमापार युद्धविराम के उल्लंघन की घटनाओ की स्थिति में ।
राजनयिक समीकरणों की भविष्य की राह को लेकर अभी कयास नही लगाये जा सकते।लेकिन भारत के अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था और सशक्त राजनयिक पहुँचो की बदौलत इस मामले में फायदे में रहने की संभावना हैं।अब भारत ने अपनी परमाणु हथियारों को ‘पहले उपयोग नही करने’ की नीति में भी संशोधन करने के संकेत दिए हैं तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर अब बात करने को एजेंडा बनाने की घोषणा की हैं।इन सबसे लगता हैं कि भारत ने पाकिस्तान के साथ आक्रामक व्यवहार को अपनाने को तवज्जो दी हैं।दरअसल पाकिस्तान का व्यवहार इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं।उसने भारत द्वारा किए गये पिछले शांति प्रयासों को प्रभावहीन कर दिया था।ऐसे में उसे शांति का व्यवहार करने हेतु प्रेरित करने के लिए वैश्विक मंचो पर अलग-थलग करने की जरुरत हैं ।

जम्मू कश्मीर को मुख्यधारा में शामिल करना : 
अनुच्छेद 370 को निरस्त करके राज्य का पुनर्गठन कर दिया गया हैं।लेकिन कश्मीर के लोगो को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए प्रयास करने की जरुरत हैं। ऐसे में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का “इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत ” का विचार एक मार्गदर्शन सूत्र हो सकता हैं। जम्मू-कश्मीर के लोगों को भरोसा दिलाना होगा कि कि केन्द्र सरकार उनके दुख-दर्द में उनके साथ है।राज्य की सभी की समस्याओं को सुना जाएगा और मिलजुल कर हल किया जाएगा।लोगो को विश्वास दिलाना होगा कि दिल्ली का दरवाजा और दिल हमेशा राज्य की जनता के लिए खुला हैं।इस प्रकार के उदार माहौल के द्वारा ही कश्मीर क्षेत्र के लोगो के मन से उग्रवादी विचारो को दूर किया जा सकता हैं।इसके लिए युवाओ को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए निवेश को बढ़ावा देना होगा।खेलकूद और रंगमंच जैसी गतिविधियों में युवाओ की भागीदारी बढ़ानी होगी ।
अभी हालात समान्य होने में थोडा समय लगेगा।लेकिन अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद लोगो में विशिष्टता के भाव का अंत होगा, जिससे अलगाववादी विचारो को पनपने से रोका जा सकेगा।फिलहाल कानून व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कार्य करना होगा।पाकिस्तान भी इस समय प्रतिशोधवश आतंकी घटनाओ को अंजाम दे सकता हैं।इसलिए नियंत्रण रेखा और अन्य भागो में सुरक्षा व्यवस्था चौकस रखने की जरुरत होगी ।

केंद्र सरकार ने खुद यह आश्वासन दिया हैं कि एक दिन जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होंगे और उसे फिर से राज्य का दर्जा दिया जाएगा।इसलिए संक्रमण काल के लिए केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा एक अहम् कड़ी साबित होगा।इस दौरान कानून व्यवस्था भी बेहतर रखी जा सकती हैं और कल्याणकारी योजनाओ का भ्रष्टाचार मुक्त क्रियान्वयन करके राज्य के लोगो को भरोसा भी दिलाया जा सकता हैं ।

निष्कर्ष :
संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर को मिल रहे विशेष दर्जे को हटाने से क्षेत्र में आतंकवाद का खात्मा होने की उम्मीद हैं।अब ऐसे कदम उठाने की जरुरत हैं कि वह विकास के मार्ग पर अग्रसर हो।इस मामलें में सर्वसम्मति से फैंसले लिए जाने चाहिए । जिससे सहकारी संघवाद को भी बढ़ावा मिलेगा और कश्मीर के युवाओं तथा निवासियों को भी यह आश्वाशन प्राप्त होगा कि कश्मीर देश की आर्थिक प्रगति का हिस्सा है और भारत का अभिन्न अंग है ।

प्रतिबद्धताओं से परे बदलते अंतरराष्ट्रीय संबंध


MASTRAM MEENA

बात उन दिनों की है जब दुनिया विश्व युध्द की त्रासदी को झेल रही थी। लगभग छः साल चले इस युध्द में करोड़ो की संख्या में जान माल की क्षति हुई। जाते-जाते परमाणु बम का विध्वंस भी दुनिया ने देखा। आधी शताब्दी के इन दो युद्धों की भयानकता को देखकर अल्बर्ट आइंस्टीन  को कहना पड़ा था कि "मुझे यह नहीं मालूम कि तीसरा विश्व युद्ध कैसे लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्व युद्ध अवश्य ही डंडों और पत्थरों से लड़ा जाएगा"।

दरअसल तकनीकी प्रगति ने परम्परागत लड़ाइयों के स्वरूप को बदल कर रख दिया था। इसने सभी देशों को अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित कर दिया। सभी देश अब ऐसे विध्वंशो से बचने के उपायों पर आगे बढ़ने लगे। कुछ देशों ने रक्षा बजट बढ़ा दिया, रक्षा क्षेत्र में अनुसन्धान होने लगा, हथियार निर्मित और आयात किए जाने लगे। रक्षा सन्धिया होने लगी।

युध्द के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू हो गई, उसमे भी बहुत ज्यादा संसाधन प्रयुक्त हुए। जिसके लिए अमेरिका जैसे देशों से विकास में सहयोग हेतु साझेदारी की जरूरत महसूस हुई। उसी समय पर आज़ाद हो रहे उपनिवेशों को भी रक्षा और विकास के लिए बाह्य सहायता की जरूरत थी। ऐसे में कई जगहो पर सामुहिक संगठन निर्मित हुए, राजनीतिक एकीकरण पर ध्यान दिया गया। फिर उसी समय शुरू हुए शीत युद्ध मे विश्व दो खेमो में बंट गया, प्रत्येक खेमा सामरिक स्थिति वाले अधिकतम देशो को अपने पक्ष में करने के लिए उपरोक्त सुविधा उपलब्ध कराने लगा, बदले में उन्हें भी कुछ बाते माननी पड़ी होगी। मतलब एक देश दूसरे देश के साथ विभिन्न प्रतिबद्धता से बंधने लगा था और शीत युध्द की शुरुआत ने इन प्रतिबध्दताओ को आवश्यकता बना दिया।

लेकिन हम जानते है कि द्वितीय विश्वयुद्ध हो या शीत युद्ध कोई भी अकेले ताकत का प्रदर्शन तो होता है नही। वह आर्थिक हितों में टकराहट का नतीजा ज्यादा होता है। आर्थिक पहलू कभी भी ज्यादा दबकर नही रह सकता। शीत युध्द में दो खेमो के टकराने की संभावना वैश्विक राजनीति को भले ही प्रभावित करती रही, लेकिन उसमे आर्थिक पक्षो की जो उपेक्षा चल रही थी,  उसका 1991 की घटनाओं से उभार हुआ।

फिर सभी देश अपने हितों के अनुसार आगे बढ़ने लगे। साम्यवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्थाओ ने खुद को खोलना उचित समझा। सभी विकासशील देशों ने निवेश की आवश्यकता महसूस की, भले ही वह शत्रु देश से ही क्यों न मिले। विकसित देशों को भी पूंजी को श्रम व बाजार वाले देशों में निवेश करने से भारी मुनाफा मिलने वाला था। विश्व बैंक और आईएमएफ जैसे अंतराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों को इसके लिए माहौल बनाने की जिम्मेदारी दी गई। वैसे तो यह एक तरीके का उपनिवेशवाद ही है जहां पहले उपनिवेश का आर्थिक दोहन केवल एक देश द्वारा ही किया जाता था, लेकिन इस व्यवस्था में तो सभी देश वहां पहुंच सकते है।

हालांकि यहाँ दूसरा पक्ष भी है- भारत और चीन जैसे देशों की प्रगति ।  भारत और चीन ने पहले निवेश आमंत्रित किया और आर्थिक विकास में उच्च स्तर पर पहुच गए। यहाँ के मानव संसाधन भी पश्चिमी देशों के जनसांख्यकी अभाव को दूर करने पहुंच गए थे। लेकिन इसी बीच पश्चिमी देशों को लगने लगा कि वैश्वीकरण की व्यवस्था तो उनके खिलाफ चली गई। इसस स्थानीय लोगो के रोजगार खत्म हो गए, प्रवासी और शरणार्थियों का जमावड़ा हो गया, व्यापार में घाटा जाने लगा है। इसी समय आतंकवाद ने भी पश्चिम के देशो को निशाना बनाया। वही जलवायु समझौते भी उसके ऊपर दायित्व लादते हुए प्रतीत हुए।  सूचना प्रौद्योगिकी की वजह से ऐसी बाते नमक मिर्ची लगा कर स्थानीय लोगो को बताई गई, मतलब फेक न्यूज़ कल्चर की शुरुआत हुई। ऐसे में कई पश्चिमी देशों में दक्षिणपंथी दलों और नेताओं की लोकप्रियता बढ़ी, जिन्होंने पोस्ट ट्रुथ वादों की बदौलत सत्ता भी प्राप्त की। इस तरह के माहौल ने घरेलू राजनीति को अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धो से जोड़ दिया। इसमे एकाधिकार वाले नेताओं के उदय के बीज निहित थे। जिन्होंने आते ही संरक्षणवादी कदम उठाने शुरू कर दिए और वैश्वीकरण की आत्मा को पाताल में पहुचा दिया। जलवायु प्रतिबध्दताओ को नकार दिया, वीजा प्रतिबंध शुरू किए गए। भूतकाल में इन दलों को सहयोग करने वाले या इनके लिए सुविधाजनक देशो के साथ सम्बन्धो की शुरुआत की गई, वही दूसरे दलों के द्वारा किए गए अंतराष्ट्रीय व्यवहारों की उपेक्षा की गई। पुरानी प्रतिबद्धताओ को तोड़ना ही इन नेताओं का शगल बन गया,  हार्डकोर मनोरंजन की आदि हो रही स्थानीय जनता को भी यह मनोरंजन के समान लगा।

मतलब अब यह स्थापित हो चुका है कि पुरानी प्रतिबध्दता उनके कामकाज को सीमित करती है । जिससे बचने के लिए वे 1991 से 2010 तक तो दोगलेपन के सहारे चलते रहे। लेकिन अब वैश्वीकरण के दौर में सभी देश अपने लोगो की खुशहाली के लिए स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ना चाहते है। यही वजह है कि वैश्विक व्यवस्था को मार्ग प्रदान करने वाली प्रतिबध्दताए अब खत्म की जा रही है और ज्यादातर देशो द्वारा इसे बेवफाई से जोड़कर भी नही देखा जाता है।
Question for upsc aspirants : why old commitment in international relations consider as a troublemaker in today's diplomacy ? what factor led to broken these commitments ? 
अब पर्याप्त उदाहरणो द्वारा इस विषय को अधिक स्पष्ट किया जा रहा है।

डर,असुरक्षाये और हितों के संवर्धन के कारण उपजी विभिन्न प्रतिबध्दताए निम्न है :

  1.  द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपजी अधिकतर प्रतिबध्दता ओ का कारण तो शीत युद्ध था। जिसकी पृष्टभूमि रूस में साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना से ही निर्मित हो गई थी। द्वितीय विश्व युध्द खत्म होते ही यूरोप और सयुंक्त राज्य अमेरिका दोनो ही रूस के प्रति संशयग्रस्त थे। यूरोप के देशों को लग रहा था कि रूस ने जिस तरह पूर्वी यूरोप के देशों में साम्यवादी सरकार बनवाकर अपना प्रभाव जमाया है, उसी तरह यह बाकी यूरोप पर भी कब्जा कर लेगा। वही अमेरिका को लग रहा था कि अगर साम्यवादी सरकारो वाले देशों की संख्या बढ़ गई तो पूंजीवाद की प्रगति प्रभावित होगी। इसलिए यहाँ से यूरोपीय देश अमेरिका के साथ रक्षा प्रतिबद्धताओ में बंध गए, जो नाटो (NATO) के रूप में सामने आया।
  2. यूरोप के देशों को खुद को भी लग गया था कि अब औधोगिक क्रांति के कारण दूसरे देश भी उभर रहे है। ऐसे में आपस मे ऐसे ही लड़ते रहे तो वैश्विक राजनीति में यूरोप हाशिए पर चला जायेगा। ऐसे में अगर सब एक हो जाये तो अंतरराष्ट्रीय संगठनों में दूसरे देशों से बातचीत करने में हमारा पक्ष मजबूत रहेगा। इससे शांति भी रहेगी तो पुनर्निर्माण में भी मदद मिलेगी। वही वैश्विक मंच पर उभर रहे अमेरिका जैसे देशो को संतुलित करने में मदद मिलेगी। यूरोपीय यूनियन, इसी तरह की सोच का नतीजा था।
  3. शीत युद्ध के साए में रूस की साम्यवादी व्यवस्था का खोप दिखाकर अमेरिका ने तीसरी दुनिया के देशों को भी रक्षा सन्धियो और गुटों में शामिल कर दिया। उसने मध्य पूर्व के देशों के लिए सेंट्रो, दक्षिण पूर्व के लिए डोमिनो इफ़ेक्ट जैसे विचार करके अपना प्रभाव छोड़ा। कई देशो को आर्थिक और तकनीकी मदद देकर अहसान की प्रतिबद्धता के दायरे में लाया गया। यही काम रूस ने भी किया।
  4. औपनिवेशिक ताकतों ने उपनिवेशों के आर्थिक शोषण और जल्दबाजी के निकास से उत्पन्न विसंगतियों के प्रति स्थानीय लोगो के आक्रोश से बचने के लिए इन देशों को आर्थिक मदद देना शुरू किया। वैसे इन देशों को पकड़कर रखना इसलिए भी जरूरी था कि ये बड़े बाजार के रूप में देखे जा रहे थे।
  5.  तीसरी दुनिया के देशों ने भी अपने हितों की पैरवी के लिए आपस मे कई प्रतिबद्धता की, जैसे कि-गुट निरपेक्षता। फिर इन्होंने एक स्वर में अपनी बात रखकर विकसित देशो को अपने ऊपर हावी नही होने दिया।
  6. तीसरी दुनिया के देश भी कम नही थे। इन्होंने भी LDCs पर कई प्रतिबध्दता थोप दी। जैसे कि -भारत द्वारा नेपाल और भूटान के साथ सामरिक समझौते।
  7. जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए प्रयास शुरू हुए। सभी देश उत्सर्जन कटौती की बात पर सहमत हुए। विकसित देशों ने विकासशील देशों में अनुकूलन और अल्पीकरण के लिए वित्त और तकनीकी मदद की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
ये आपसी प्रतिबद्धताए वैश्विक सम्बन्धो को लगभग तीन-चार दशक तक मार्ग प्रदान करती रही। लेकिन आगे निम्न घटनाक्रमो ने आपसी सम्बंधो में परिवर्तनों को दिशा प्रदान की :
  1. जब 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। उस समय पूंजीवाद का परिष्कृत रूप नव-उदारवाद बाकी के सभी देशों को भी प्रभावित करने लगा , क्योकि लगभग चार दशक के शीत युद्ध मे पूंजीवाद विजेता बनकर निकला था और उसके जश्न को टीवी , अखबार द्वारा देखा जा सकता था। साम्यवाद के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव से निकले देशो को लगने लगा कि वे विकास प्रक्रम में कही पीछे रह गए है। ऐसे में परम्परागत व्यवहारों को भुलाकर जहां से जो भी मिले उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। 
  2. भारत जैसी मिश्रित अर्थव्यवस्था भी पूंजीवाद को अब ज्यादा अछूत मानकर नही चल सकती थी। इन देशों को ऋण, अनुदान के लिए पश्चिमी प्रभुत्व वाले वित्तीय संस्थानों के पास जाना पड़ा। जिन्होंने बदले में अर्थव्यवस्था को खोलने की शर्त रखी। फिर विकासशील देशों को निवेश के लिए खोल दिया गया। इन देशों के बाजार, श्रम आदि को भुनाने के लिए विकसित देश आपस मे प्रतिस्पर्धा करने लगे।
  3. भारत, चीन समेत ब्रिक्स देशों के उदय ने पश्चिमी देशों के कान खड़े कर दिए,अब वे इन्हें गम्भीरता से ले रहे है। अब अधिकतर अध्ययन इन्हें बड़ी अर्थव्यवस्थाओ के तौर पर दर्शाने लगे। इससे पश्चिम देशो के समक्ष खुद को फिर से साबित करने की चुनोती आ खड़ी हुई। चीन ने तो सामरिक क्षेत्र में भी प्रगति करके बाकी देशों को चिंतित कर दिया।
  4. विकसित देशों ने जो बीज बोए थे वो अब उन्हें कड़वे लगने शुरू हो गए। अफगानिस्तान में रूस को निकालने के लिए बनाए गए मुजाहिदीन अब आतंक के दूत बन गए।
  5. घरेलू राजनीति में आये बदलावों ने भी दूसरे देशों के साथ सम्बन्धो को फिर से प्राथमिकता देना शुरू किया। 
बस यही से पुरानी प्रतिबध्दताओ से उत्पन्न रिश्तों में बदलाव आ गया। यह बदलाव चरणबध्द रूप से था। जिसे कई दूसरे कारक भी प्रभावित कर रहे थे।

प्रतिबद्धताओ में बदलाव के उदाहरण :
  1. अमेरिका को लगने लगा कि यूरोप के देश उसे एंकर के तौर पर उपयोग कर रहे है। यह सोचकर उनके साथ से मुक्त व्यापार के समझौते से बाहर हो गया। ट्रम्प ने नाटो के प्रति भी संशय व्यक्त किया है। साथ ही अब उसने विकासशील देशों को पार्टनर के तौर पर तवज्जो देनी शुरू की, जैसे कि -भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि को।
  2. यूरोप के देशों को लगने लगा कि अमेरिका के चक्कर मे हमने रूस से दुश्मनी बढ़ा ली, जिसके कारण उसके विशाल प्राकृतिक संसाधनों के फायदे से वंचित हो गए। अब ये रूस की तरफ नरम हो रहे है। रही बात सुरक्षा की तो इन्हें लग रहा है कि अब पहले जैसे युध्द नही होंगे। वही रूस भी उनके दर्जे की ही शक्ति है।
  3. विकासशील देशों को उपलब्ध कराई जा रही अहसान लादने वाली आर्थिक मदद भी अब बंद की जा रही है। क्योंकि पाकिस्तान उसे पाकर आतंकवाद को पोषित कर रहा है। वही ब्रिटेन ने कहा था कि हम अब अनुदान बंद करेंगे क्योकि भारत कुछ ज्यादा ही विकसित हो गया है।
  4.  विभिन्न मंचो और संगठनों की एकता भी भंग हुई है, जैसे कि ब्रिटेन eu से निकल गया, गुट निरपेक्ष फीकी पड़ रही है, सार्क जैसे संगठन लगभग मृत अवस्था मे है। केवल आसियान ही सफल माना जा रहा है।
  5. अमेरिका जलवायु परिवर्तन के पेरिस समझौते से बाहर निकल गया है। उसका मानना है कि विकासशील देशों के द्वारा चलाया गया एक्सटॉर्शन रैकेट है।
  6. चीन को संतुलित करने के लिए अमेरिका अंधेरे में हाथ पैर मार रहा है। देखते है कोई लात निशाने पर पड़ती है या नही। वह इसके लिए एशिया के देशो को ही ढाल बना रहा है। जिनमे भारत को चीनी बिरोध का पोस्टर बॉय बनाने की फिराक में है।
  7. मुस्लिम देश का परम्परागत तेल ग्राहक- अमेरिका चला गया है, अब वो खुद आत्मनिर्भर हो गया है। साथ ही उसने इन्हें दहशत फैलाने का जिम्मेदार मानकर हड़काना भी शुरू कर दिया है। अब ये देश नए ग्राहक तलाश रहे है। इसके लिए रूस, भारत , चीन जैसे देशों से सम्बंध सुधारने में लगे हुए है।
  8. कभी वैश्वीकरण की पैरवी करने वाले पश्चिमी देश अब संरक्षणवाद पर फोकस कर रहे है। खुद के देशो में बढ़ी हुई बेरोजगारी को इसका कारण बता रहे है।  शरणार्थियों के संकट ने भी उन्हें चौकस बनाया है क्यों कई बार वे चरमपंथ से जोडकर देखे गए है। अब बाहरी लोगों से रक्षा के नाम पर एकाधिकारवादी सरकारे सत्ता में आ रही है।
  9. भारत और रूस की मित्रता कमजोर पड़ी है। रूस पाकिस्तान के साथ सामरिक सम्बन्धो पर आगे बढ़ रहा है। वही भारत की अमेरिका से सामरिक नज़दीकी बढ़ी है।
  10. इजरायल के साथ सम्बन्धो में खुलापन आया है। फिलिस्तीन को अकेला छोड़कर अरब देश आगे बढ़ रहे है। इनका मित्र अमेरिका अब चला गया, अब ये भी बाजार की तलाश में इस्लामिक पहचान से आगे बढ़ रहे है।
  11. कोरियाई प्रायद्वीप स्वीकृति के लिए प्रयासरत है। ईरान भी कोई ज्यादा खुश नही है।
  12. अफगानिस्तान में अमेरिका खुद को खलनायक बताने से बचने के उपाय तलाश रहा है।

महत्वपूर्ण रुझान
  • जो  भी हो अब सभी देश आर्थिक राष्ट्रवाद को तवज्जो देने में लगे हुए है। यह बड़ा ही मजेदार है न, कि एक तरफ तो विदेशी कम्पनियों को आमंत्रित कर रहे है दूसरी तरफ़ खुद के हितों की रक्षा के लिए  सभी नियमो से परे भी जा रहे है।
  • प्रतिबध्दताओ से पार जाने के क्रम में अप्रत्याशित चीजे घटित होती जा रही है। जो पहले घनिष्ठ मित्र हुआ करता था अब उसके साथ कोई गर्मजोशी नही है। वही जो पहले दुश्मन थे उनसे घनिष्टता तलाशी जा रही है। जैसे कि भारत और रूस के सम्बन्धो में पहले जैसी गर्मी नही है, वही रूस के पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधार रहे है।
  • दो धुर विरोधियों के साथ सम्बन्ध भी स्थापित है, पहले जैसी रोकटोक नही है। जैसे कि भारत के इजरायल और फिलिस्तीन के साथ सम्बन्ध , भारत का अमेरिका से lemoa करके रूस से परमाणु ऊर्जा समझौता करना आदि। एक तरीके से अब डिप्लोमेसी सन्तुलन की कठिन परीक्षा दे रही है। पहले यह काम आर्मी करती थी।
  • सीधी सी बात है प्रतिबध्दता नियम बनाती है। जो गतिविधियों को सीमित करते है वही किसी एक पक्ष को लाभान्वित करते है। इस रैंकिंग कल्चर के समय मे कौन देश चाहता है कि वह खुद को नुकसान करके दूसरे को फायदा पहुचाये। लोकतंत्र में ये रैंकिंग कल्चर देशो को आत्मकेंद्रित बना रही है। वही घरेलू राजनीति वैश्विक घटनाओ से जुड़ती जा रही है। इसलिए इस तरह के गतिशील रिश्ते जनता को भा भी रहे है।
आगे क्या होगा
पहले "शत्रु का मित्र भी शत्रु " ही समझा जाता था। लेकिन अब सभी देशों को विकास करना है इसलिए शत्रुता का दायरा संकीर्ण हो गया है। अब ये देश तक भी सीमित नही रही बल्कि यह केवल मुद्दों पर आधारित हो गई है। होना भी यही चाहिए।

लेकिन बिना प्रतिबद्धता के माहौल अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है। कोई भी देश किसी के साथ कभी भी बेवफाई कर सकता है। सभी देशों को इस बारे में अपनी तैयारी करके रखनी चाहिए।