ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धजनों की देखभाल

वैसे तो बुढापा सभी लोगो के लिए चुनोतियाँ भरा होता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों की देखभाल में गम्भीर मुश्किलें शामिल होती है। गांवो में बुढापा ज्यादा दिन इंतजार नही करता है। 

गांवो में लोग खेती-बाड़ी और मजदूरी के कामकाज इतनी कड़ी मेहनत से करते है कि उनका शरीर जल्दी ही जवाब दे जाता है। वे अपनी युवावस्था के उत्तरार्द्ध से ही वृद्धावस्था की ओर चले जाते है।  युवावस्था में होने वाले कई शारिरिक विकारों को आर्थिक तंगी के कारण टालते रहते है, कई बार चोटिल हो जाते है, ये सभी समस्याएं बुढापे में फिर उभरकर आती है। इस तरह गांवो में वृद्धावस्था बीमारियों के साथ चलती है।

परिवारों की आर्थिक तंगी का असर भी वृध्दों की देखभाल के दौरान देखने को मिलता है। एक तो उनको होने वाली गम्भीर स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज नही हो पाता, दूसरा उनके अनुसार खानपान की व्यवस्था भी नही हो पाती है। साथ ही आर्थिक तंगी के कारण उनके पुत्र भी उनका भार अपने ऊपर लेने से कतराते है और वे एक दूसरे के ऊपर डालने के चक्कर मे बुजुर्गों की भावनाओं की पूर्णतः उपेक्षा कर देते है। कई बार बुजुर्गों को भी इस खींचतान में प्रताड़ित कर दिया जाता है।

कई सामाजिक योजनाओ का हस्तक्षेप बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में अग्रसर है। वृद्धावस्था पेंशन के माध्यम से बुजुर्गों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सक्षम बनाया जा रहा है। कानूनी अमलीजामा भी बच्चों को वृध्दों की देखभाल के लिए प्रेरित कर रहा है। इसके साथ ही वृध्दों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए स्वास्थ्य केंद्रों को विशेष रूप से निर्देशित किया गया है। मेडिकल टीम साप्ताहिक रूप से होम विजिट करके वृद्धजनों की स्वास्थ्य समस्याओं को बेहतर तरीके से जान सकती

लेकिन बुजुर्गों की सुभेदयता काफी अधिक होती है जिसमे अकेलापन, लाचारी, अवसाद, उत्पीड़न जैसी अवस्थाएं शामिल होती है। पारिवारिक समर्थन जैसे तन्त्रो का तेजी से ह्रास हो रहा है। ऐसे में बुजुर्गों के लिए गांवो में भी बुनियादी संरचना स्थापित करने की आवश्यकता है। बालको और महिलाओं के लिए आंगनबाडी केंद्रों की तर्ज पर बुजुर्गों को भी कुछ दिनों की अवधि में सम्भालने के लिए कोई व्यवस्था होनी चाहिए। उनकी नियमित जांच की व्यवस्था हो।

निष्कर्ष
गांवो में सरकारी और सामाजिक पहलों में बुजुर्गों को जगह देकर उनसे अनुभव प्राप्ति को जारी रखा जा सकता है। बुजुर्गों को बोझ न समझकर बेहतर मार्गदर्शक बनाया जा सकता है। अगर बुजुर्ग स्वास्थ्य और शारीरिक रूप से ठीक रहेंगे तो वे खुद ही उत्पादक कार्यो में लगे रहेंगे। इस प्रकार हमे हमारी वरिष्ठ जनसांख्यकी के महत्व को समझना चाहिए।

किसानों से ऋण बोझ को कम करना

कर्ज और किसानी के बीच नजदीकी सम्बन्ध होता है। शुरू में किसान फसल और अन्य जरूरी कार्यो के लिए कर्ज लेता है और जब फसल तैयार होती है तो उसे चुका देता है। लेकिन वर्तमान में मानसून की विफलता, महंगाई, सामाजिक आयोजनों के खर्चों, शिक्षा और चिकित्सा सम्बंधित वित्तीय जरूरतों, भौतिक सुविधाओं को जुटाने की मंशा आदि कारणों की वजह से कर्ज का बोझ बढ़ गया है और उसे समय पर चुकाना भारी हो गया है। बढ़ते हुए कर्ज और उन्हें चुकाने में असमर्थता ने किसानों के भविष्य को अंधकारमय बना दिया है।

इससे भयभीत होकर किसानों के आत्महत्या तक की घटनाएं हुई है। जिनके कारण किसानों की दरिद्रता को सरकार ने भी जेहन में लिया है और समस्या समाधान में रूचि ली है।

किसानों के ऊपर से कर्ज के बोझ को कम करने के लिए निम्न आयामो पर विचार किया जा सकता है---

  1. सबसे पहले तो किसानों को असंस्थागत ऋण के स्त्रोतों से हटाकर संस्थागत स्त्रोतों (बैंको) से जोड़ने की जरूरत है। अब तक किसान सर्वाधिक शोषित असंस्थागत साहूकारों के द्वारा हुए है, जिनकी किसानों के संसाधनों पर पकड़ होती है जिसे वे स्वपरिभाषित चूक (defaultry) के माध्यम से हड़प लेते है और फिर किसान भूमिरहित हो जाते है। साहूकारी का यह स्वरूप 80 व 90 के दशक की बॉलीवुड फिल्मों में भली भांति दिखाया जाता है।
  2. दूसरी बात यह है कि कर्ज को लक्षित करके उसके अपव्यव रूपी रिसाव को खत्म किया जाए। उदारहण के लिए कई बार ऐसा होता है कि लोग भैस खरीदने या मशीनरी लाने के लिए कर्ज उठाते है और उसे दावतों में खर्च कर देते है। अब यहां यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि  कर्ज के धन का लक्षित प्रयोग हो, भले ही सभी प्रकार के खर्चो को भी यथोचित कर्ज श्रेणी में तब्दील करना पड़े। इसका फायदा यह होगा कि उत्पादक और अनुत्पादक दोनो श्रेणियों में पृथक रूप से कर्ज का उद्देश्य भुनाया जा सकेगा। कर्ज का उद्देश्य पूरा होने पर ही उसकी वापसी सुनिश्चित होगी।
  3. कर्ज के बोझ को रोकने के लिए किसानों को अपव्यव पर भी लगाम लगानी होगी। इसके लिए सामाजिक स्तर पर पहल करनी होगी। अपनी क्षमता से परे जाकर खर्च करने पर बहिस्कार जैसे मापदंड काम में लिए जाए, दहेज, दावते, महंगी शादियों जैसे प्रतिष्ठात्मक व्यव आदि पर रोक लगे।
  4. कर्ज के बोझ से बाहर आने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू है- किसानों की क्षमता का निर्माण ताकि उन्हें कर्ज की जरूरत न्यूनतम पड़े। इसके लिए किसानों को अतिरिक्त आय से जोड़ने की जरूरत है जिनमे पशुपालन, बागवानी, प्रसंस्करण आदि शामिल है।
  5.  इसके अलावा गांवो या गांवो के समूह पर उद्योग या सेवा क्षेत्रों को स्थापित करने के लिए नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है, जैसे कि -पर्यटन, होटल, विनिर्माण आदि। इनसे रोजगार का सृजन होगा और लोग कृषि से इतर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकेंगे। जब आय में इजाफा होगा तो कर्ज लेने और चुकाने की क्षमता भी बढ़ जाएगी।

किये गए प्रयास
इस दिशा में सरकार ने कई प्रयास किए है। सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से फसल-ऋण चक्र में ब्याज के बोझ को न्यूनतम करने का प्रयास किया है। किसानों की क्षमता को विकसित करने के लिए कई योजनाएं शुरू की है।
लेकिन मुख्य मुद्दा यह है की इन योजनाओं की प्रभावशीलता उचित प्रकार की नही रही है। बैंको से मिलने वाला कर्ज थोड़ा होता है और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया कम शिक्षित किसानों के लिए कष्टसाध्य होती है। उसी प्रकार किसानों की विभिन्न जरूरतों को भी ऋण श्रेणियां कवर नही करती है। सामाजिक कार्यो में भी दिखावे के बढ़ते प्रचलन के कारण धन का अविवेकपूर्ण अपव्यव जारी है। इन सबके चलते किसानों को ऋण के बोझ से बचाना मुश्किल होगा।

निष्कर्ष
अगर हमे किसानी को फायदेमंद निर्वाह का माध्यम बनाये रखना है तो हमे किसानों की जरूरतों को लक्षित करना होगा। धन के दक्ष प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देना होगा।

फसल ऋण चक्र में नई चुनौतियां

किसानों और कर्ज का गहरा नाता है। कहते है कि किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज के साथ बढ़ा होता है और मरते वक्त अपने पुत्रों पर कर्ज का बोझ विरासत में छोड़ जाता है। अगर हम  किसानों की जिंदगी का आंकलन करे तो यह बात उन पर सटीक बैठती है।

कर्ज की शुरुआत फसल बोने से होती है और फसल को बेचकर चुकाने पर खत्म होती है। शुरू में खाद-बीज के लिए कर्ज लेते है, फिर सिंचाई कार्यो के लिए, अंत मे फसल से उत्पादन प्राप्ति को बेचकर उन्हें चुकाया जाता है। इसे फसल-ऋण चक्र कहा जाता है जिसमे ऋण लेकर फसल की जाती है और फसल बेचकर ऋण चुकाया जाता है। यह चक्र हर साल दोहराया जाता है। अगर उत्पादन कम हो तो कर्ज को अगली फसल के भरोसे छोड़ दिया जाता है। बीच मे होने वाले सामाजिक आयोजनों और अन्य आवश्यक खर्चो के लिए भी कर्ज से ही वित्तीयन किया जाता है।
अगर कर्ज और फसल की प्राप्ति का यह चक्र चलता रहता तो ग्रामीण जीवन पूर्ववत चलता रहता, लेकिन नवीन आर्थिक-सामाजिक बदलावों ने इस चक्र को चुनोती दे डाली जिसके कारण कर्ज को चुकाने में एक मौसम की फसल से प्राप्त आय अप्रर्याप्त रहने लग गई और कर्ज को यह बोझ अगली फसल को अतिरिक्त रूप से प्राप्त हुआ।

फसल-ऋण चक्र को चुनोती देने वाले कारको को हम निम्न प्रकार से समझ सकते है----


  1. फसल-ऋण चक्र को पहली चुनोती तो भौगोलिक कारको पर आधारित है। जैसा कि भारत मे कृषि मानसून पर निर्भर करती है और मॉनसूनी जलवायु में अनिश्चितता होती है, जिसके कारण उत्पादन में भी अनिश्चितता आ जाती है। जिस भी वर्ष सूखा , ओलावृष्टि, बाढ़ जैसी घटनाएं होती है उसी वर्ष कर्ज चुकाई का संकट आ जाता है।
  2. महंगाई ने भी फसल-ऋण चक्र को चुनोती दी। दैनिक आवश्यकता की चीजो के भाव अत्याधिक हो गए और फसलों के दामो में ज्यादा अंतर नही आ पाया। साथ ही फसली इनपुटो के भी भाव बढ़ने से लागत कई गुना बढ़ गई, इन सबके चलते उत्पादन में उतना सामर्थ्य नही रहा कि वह कर्ज के बोझ को उठा सके।
  3. शादी-विवाह, दहेज, कई प्रकार की दावते जैसे सामाजिक आयोजनों में भी किसानो की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा चला जाता है। कई बार तो इनमे किया जाने वाला खर्चा कर्ज लेकर किया जाता है। इन सामाजिक आयोजनो में महंगाई और आधुनिक रूप देने का जो सिलसिला चला है उसने भी अतिरिक्त भार डाल दिया है।
  4. किसानों के अपरम्परागत क्षेत्रों में उतरने से भी कर्ज का बोझ बढ़ा है। जैसे कि अब बच्चों की महंगी पढ़ाई-लिखाई का बोझ पड़ा है, भौतिक सुविधाओं को भी जुटाने लगे है। पहले की जीवनशैली में ये खर्चे शामिल नही थे। अब इन व्यवो ने आय के लिए अन्य स्रोतों को अपनाने पर जोर देकर कर्ज के चक्र को चुनोती दी है।

प्रभाव

यह फसल-ऋण चक्र असंस्थागत स्त्रोतों अर्थात साहूकारो पर आधारित था जहां महंगी ब्याज दर होती थी। चुकाने में कोई भी चूक होने पर भूमि या किसी अन्य संसाधन से हाथ धोना पड़ता था।
इसका असर यह हुआ कि खासकर सीमांत किसानों में उत्पादन से ज्यादा चिंता कर्ज को कम करने को लेकर होने लगी। क्योंकि उन्हें भूमिहीन होने की डर लगने लगा। मराठवाड़ा, विदर्भ जैसे सूखे क्षेत्रो से बड़ी मात्रा में किसानों के द्वारा आत्महत्या करने की घटनाएं सामने आने लगी।

इसका असर मानव संसाधनो के विकास पर भी पड़ा है। सीधी सी बात है ये अपने बच्चों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा नही उपलब्ध करवा सकते जिस कारण वे खेती के अलावा रोजगार का कोई विकल्प भी नही प्राप्त कर सकते। अगर ऐसा होता तो वे गरीबी के जाल से आसानी से बाहर आ जाते। न ही इनके बच्चे अपने अन्य किसी हूनर की आजमाइश कर पाते है। इस प्रकार गरीबी का चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।

निष्कर्ष

अब सरकार ने संस्थागत स्त्रोतों (बैंको) को बढ़ावा देकर इस चक्र के दुष्प्रभावो को कम करने की कोशिश की है। लेकिन अभी भी इस समस्या के समाधान के लिए बुनियादी कारणों को लक्षित करने की आवश्यकता है।

How far Democracy is The Rule of People

लोकतंत्र को जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन माना जाता है। जनता के शासन का तात्पर्य है कि जनता ही सरकार को चुनती है इसलिए जनता और सरकार के बीच मे कोई अंतराल(Gap) नही है। भारतीय परिपेक्ष्य में लोकतंत्र की स्थापना के लगभग 65 साल बाद क्या यह बात पूरी तरह से सही ठहरती है ? चलिए हम इसका मूल्यांकन करते है।

दरअसल सरकार और लोगो के बीच सम्बन्धो का जो निर्धारण लोकतंत्र ने किया है। एक तरफ तो सरकार को अभी भी भरोसा नही हो पा रहा है कि हमे सत्ता जनता के behalf पर प्राप्त हुई है इसलिए हमारा दायित्व जनता की भलाई के लिए कार्य करना है। सरकार तो अभी भी परम्परागत सोच का अनुसरण कर रही है कि सत्ता को अपनी मर्जी से लोगो को शासित करने का अधिकार है, जिस पर जनता को प्रश्न नही करना चाहिए और जो मिल रहा है उससे खुश रहना चाहिए।

दूसरी तरफ जनता भी यह यकीन नही कर पा रही है कि लोकतंत्र में सत्ता के असली सम्प्रभु वे है, लोग अभी भी सरकार को सेवक के बजाय स्वामी ही मानते है। लोगो के जेहन में सरकार की छवि अभी भी माय-बाप की ही है। सरकारी दफ्तरों में गुहार लेकर आने वाले जरूरतमंद और पीड़ित लोग अपराधियों की भांति डरे रहते है। लोग सीधे संपर्क करने में संकोच करते है और वे दलालो के माध्यम से अपने काम करवाते है। अपनी चीजो से भला कौन डरता है इतना, लेकिन यह साफ है कि लोग सरकार से डरते है क्योंकि उसे समाधान की बजाय समस्या के तौर पर ही देखते है।

जिस प्रकार की सेवा सरकार दे रही है जनता उसे निर्विरोध रूप से स्वीकार कर रही है। जनता न तो उनकी खामिया गिना रही है और न ही उनमे सुधार हेतु कुछ सुझाव दे रही है। जनता और सरकार के बीच इस प्रकार की खाई के लिए हम निम्न कारणों को देख सकते है--

1. भारतीयों का ऐतिहासिक रूप से ही सरकार के साथ अनुभव ठीक नही रहा है और भारतीयों की मानसिकता 'शासको' की बजाय 'शासितों' की ही रही है। यहां सत्ता परिवर्तन, आक्रमणों और बाहरी लोगों के द्वारा शासकीय भूमिका निभाने से राजनीतिक अस्थिरता बनी रही जिससे कोई ऐसी राजनीतिक उपलब्धि प्राप्त नही हुई जो लोगो को स्वतंत्रता का अहसास करा सके, उन्हें भरोसा दिला सके कि सत्ता जनता के हितों के लिए ही कार्य करती है। यहां तो राजाओ और नवाबो ने केवल अपने हित के लिए जैसा चाहा वैसा शासन किया। लोग भुखमरी, अकाल, ऋणों से ग्रस्त थे, बेगारी कर रहे थे, बीमार पड़ रहे थे, लेकिन ऐसी चिंताओं से शासको को कोई मतलब नही था। उनका मतलब तो समय पर लगान और करो की प्राप्ति था चाहे दुखो से ही ग्रस्त हो। ब्रिटिश काल मे स्थिति और दयनीय हो गई जब लोगो ने किसी मांग को उठाया तो उनका बुरी तरह दमन कर दिया गया, लाठीचार्ज किया गया और जेलों में बंद कर दिया गया। अतः हम देख सकते है कि सत्ता और लोगो के बीच दूरी का लंबा इतिहास रहा है। इसे कम करने में, जनता व सरकार को नई भूमिका अहसास कराने में अभी समय लगेगा।

2. ब्रिटिश काल के प्रशासनिक ढांचे को ही आज़ादी के बाद अपना लेने से भी जनता और सरकार के बीच की दूरी कम नही हुई । ब्रिटिश अफसरों ने लोगो मे भय कायम करके राज करने पर जोर दिया। लोगो से सम्पर्क न रखकर नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा दिया ताकि लोगो को अहसास हो जाये कि वे उन जैसे श्रेष्ठ नही है। ये चीजें वीआईपी कल्चर के तौर पर आज भी प्रचलित है। सरकारी अफसरों  और मंत्रियों के दौरों तथा निरीक्षण के समय जनता और सरकार के बीच की दूरी को प्रत्यक्ष महसूस किया जा सकता है, जनता को बेरिकेड्स लगाकर दूर कर दिया जाता है। यह एक तरह का वर्गीय विभाजन है जो शासकीय मानसिकता  से जुड़ा हुआ है। इस Ruling Class Mentality के कारण ही जनता के प्रति संवेदनाओ का खात्मा हो जाता है जिस कारण से लोगो की जरूरत से परिचित होने की सरकार कोई आवश्यकता ही नही समझती है। इस वर्ग को यह बात नही पच सकती कि जनता और सरकार के बीच कोई अंतराल नही है, इन्हें तो लगता है कि कल के दबे-कुचले लोग आज सत्ता को प्रश्न करने लग गए। इस तरह जनता को सरकार एक समस्या के तौर पर देखती है जिसके समाधान के लिए वह अपनी कल्याणकारी छवि का प्रयोग करती है। 

3 अगर वर्तमान में यह अंतर मौजूद है तो इसका सबसे बड़ा कारण है सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही का अभाव। लोकतंत्र में जनता के प्रति सरकार को जवाबदेह बनाया गया है। लेकिन सरकार इस जिम्मेदारी से बचती रही है। इसके लिए लोगो मे शिक्षा के कम स्तर और लोकतांत्रिक जागरूकता के अभाव को प्राथमिक कारण मान सकते है। इस कारण जनप्रतिनिधियों पर नीचे से कोई दबाव नही पड़ता है।
     सरकार को जवाबदेह तय करवाने वाले खुद जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही जब जनता के प्रति नही रहेगी तो वे क्या सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करवाएंगे। चुनाव जीतते ही सांसद/विधायक जनता से दूरिया बना लेते है और फिर उनके दर्शन किसी समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर ही होते है। संसद की कार्यवाहीयो में कम भागीदारी के कारण ही सरकार को मनमर्जी करने का मौका मिला है।
     प्रचंड बहुमत और विपक्ष की खामियों का फायदा उठाकर सरकारे जवाब देने से बच रही है। सदन के सत्रों को तात्कालिक विषयो में उलझाया जा रहा है और सरकार बिना कोई गंभीर जवाब दिए अपने कार्यकाल पूरा कर रही है। इस कारण लोकतांत्रिक सरकार भी निरंकुश होती जा रही है और एक आदमी के सरकार पर हावी होने का प्रचलन बढ़ रहा है। ऐसी सरकारो के लिए जनता की आकांक्षाओ की उपेक्षा करना आसान हुआ है। इस तरह जवाबदेही की कमी के कारण भी यह अन्तराल नजर आता है।

4. सरकार और जनता के बीच अंतराल के कारण को बढ़ावा देने में सिविल सोसाइटी की उदासीनता भी महत्वपूर्ण कारण रही है। जब भी सरकार कोई ज्यादती करती है, निरंकुश होती है या कायदे कानूनों से बाहर जाकर कार्य करती है तो समाज के बुद्दिजीवी लोगों का दायित्व है कि वे उसकी कड़ी निंदा करे, मीडिया के माध्यम से आलोचना करे और ऐसा करके सरकार को अपनी उचित भूमिका निभाने की सलाह दे। लेकिन व्यवहार में इस चीज का अभाव रहा है, अगर किसी ने विरोध किया भी है तो वह जनहित की बजाय राजनीतिक हित से किया है। अधिकांश बार ऐसा हुआ कि विरोध करने वाले अल्प मात्रा में थे इसलिए उन्हें आसानी से नजरअंदाज कर दिया गया।
     विरोध प्रदर्शनों के प्रति सरकार ने नकारात्मक रुख अपनाया है। अनशन और धरना, विरोध प्रदर्शन के तरीके जिनको भारतीयों ने ब्रिटिश के खिलाफ प्रयोग किया था वह अब इन सरकारो के सामने निष्प्रभावी हो गया है। लम्बे दिनों के अनशन के बाद कइयों की मौत हो जाती है लेकिन सरकार का कोई प्रतिनिधि उनसे बात करने नही पहुचता है। कई बार विरोध प्रदर्शनो की अनुमति नही दी जाती और जबरदस्ती धरना स्थलों से खदेड़ दिया जाता है। यहाँ एक बुनियादी सवाल उठता है कि क्या हम जिसके खिलाफ विरोध करना चाह रहे है, हमे इसके लिए उस व्यक्ति/संस्था/सत्ता की अनुमति लेनी चाहिए? नही, फिर क्यों जनता को मनमाने तरीके से प्रश्न पूछने से रोका जा रहा है। यह सब सिविल सोसाइटी की उदासीनता के कारण हो रहा है।

मौजूदा रुझान
पहले के राजा-महाराजा निरकुंश शासन की बदौलत जनता को काबू में करते थे, वे लोगो की अभिव्यक्ति की आज़ादियों को प्रतिबंधित करते रहते थे ताकि कोई विद्रोही विचार नही पनप सके। वर्तमान में सरकार का लोगो पर अविश्वास बढ़ता जा रहा है, उन्हें लग रहा है कि लोग उनके अकुशल शासन को चुनौती देने के लिए बड़े आंदोलन कर सकते है और बुनियादी सेवाओ को ठप करके बड़े बदलावों के लिए मजबूर कर सकते है। जिस कारण सत्ता पर उस तरह की सुविधाएं नही रह पाएगी जो कि सत्ताधारी वर्ग को अभी प्राप्त है। इसलिए सरकार चौकस हो गई है, वह अब लोगो की गतिविधियों पर मोबाइल, बैंक खाते, आधार जैसी चीजो के माध्यम से नजदीक से नजर रख रही है। लोगो की कमाई की कड़ी निगरानी की जा रही है ताकि वे अनावश्यक बगावतों को वित्तपोषित नही कर सके। बाहरी स्त्रोतों से मिलने वाले अनुदानों को प्रतिबंधित कर दिया गया हैं। जनता की छोड़ो, अब तो विपक्षियों को भी CBI, IB, ED जैसी संस्थाओ के माध्यम से परेशान किया जाता है और उन्हें जनता के मुद्दों को उठाने से रोक दिया जाता है। जनलोकपाल आंदोलन के बाद सिविल सोसायटी पर लगाए जा रहे अंकुश को इसी पृष्टभूमि में समझ सकते है।

पंचायती राज व्यवस्था और सूचना प्रौद्योगिकी का आगमन दो ऐसी घटनाएं थी जिनसे लगा कि अब शासन में जनता की भागीदारी बढ़ेगी।लेकिन इन्हें भी सरकार ने अपने फायदे का जरिया बना दिया। पंचायतों के माध्यम से एक तो अपने दायित्व कम कर लिए वही गांवों पर पकड़ मजबूत बना ली। सूचना प्रौद्योगिकी के द्वारा भी जनता के आक्रोश को कम करने की कोशिश की है।

वर्तमान में यह अंतराल की मानसिकता बढ़ती जा रही है। ऐसे कानून बनाये जा रहे है जो भेदभावों को बढ़ावा दे रहे है। अफसरों और नेताओं के लिए विशेष छूट (special treatment) के प्रावधान किए जा रहे है। वही तकनीकी के माध्यम से जनता पर शिकंजा कसा जा रहा है। वर्तमान में तथ्यों के प्रस्तुतिकरण में चालाकी करके भी जवाबदेही से बचा जा रहा है। पोस्ट-ट्रुथ के रंग में रंगी हुई प्रेस रिलीजो के माध्यम से सरकारी लापरवाही और कुशासन को छिपाया जा रहा है।

निष्कर्ष  -
ऐसा शासन जो न तो जनता को जवाब देता है, न ही विरोध करने देता है, न ही जनता से मिलने में रुचि रखता है, क्या ऐसे शासन को जनता का राज कह सकते है?  उत्तर है - नही । अब हम कह सकते है कि भले ही जनता को अवसर मिलता हो लेकिन वह है तो शासन ही। कुल मिलाकर जनता और एक सत्ता कभी एक नही हो सकते। दोनो के बीच मे एक सीमा तक अंतराल तो हमेशा मौजूद रहता है। लेकिन समस्या यह है कि जो अंतराल भारत में अभी देखा जा रहा है वह लोकतंत्र के हिसाब से सही नही है।

Indian Culture Today- The Myth or Reality

वर्तमान में पूरी दुनिया वैश्वीकरण के प्रभावों का सामना कर रही है। वैश्वीकरण की बदौलत हो रहे विचारो और सूचनाओ के आदान-प्रदान का असर सांस्कृतिक क्षेत्र में भी महसूस हो रहा है। वैसे तो बदलावों की शुरुआत आधुनिक शिक्षा और तकनीकी विकास के द्वारा ही मिल गयी थी लेकिन वैश्वीकरण के कारण विचारों और सूचनाओ का आदान-प्रदान भारी मात्रा में हुआ। जिससे सांस्कृतिक क्षेत्र में परिवर्तन इतनी तेजी से हो रहे है कि कुछ लोग तो इन बदलावों की दिशा ही नही पकड़ पा रहे है और कुछ लोगो को लग रहा है कि भारतीय संस्कृति खत्म हो रही है और हम पाश्चात्य संस्कृति को अपनाते जा रहे है। लेकिन भारतीय संस्कृति के स्वरूप को समझा जाये तो हम अलग ही तस्वीर पाते है।

भारत का सम्पर्क जब उपनिवेश काल मे पाश्चात्य विचारो से हुआ तो यहां भी लोगो मे स्वतंत्रता, समानता जैसे तत्वों के प्रति लोगो मे रुचि बढ़ी। वैश्वीकरण के दौर में अधिक भारतीय पश्चिमी विचारो के साथ ज्यादा नजदीकी से सम्पर्क में आये। इस समय भारतीयों की आत्मनिर्भरता बढ़ी तो पश्चिमी भौतिक संस्कृति के प्रति तेजी से आकर्षित हुए। इन लोगो ने खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन, बोलचाल में पश्चिमी तत्वों की मात्रा बढ़ती चली गईं। विदेशी टीवी चैनल और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने पश्चिमी चीजो और व्यवहारों को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। दिखावटीपन को बढ़ावा मिला, फैशन और महंगी चीजो को अपनाने लगे, खुलेआम स्नेह दर्शाने लगे, कामुक विचारो पर खुलेआम राय रखने लगे। लोगो के व्यवहारों में औपचारिकता हावी होने लग गयी। रिश्तों का निर्धारण नए तरीके से होने लगा है, शादी-विवाहों में घरवालो की बजाय लड़के-लड़कियों की इच्छा महत्वपूर्ण हो गयी है।

हम देख रहे है कि वैश्वीकरण के कारण हो रहे तीव्र बदलाव परम्परागत संस्कृति को चुनोती देते हुए दिख रहे है। इनमे कुछ बदलाव सकारात्मक है जो कि स्वतंत्रता और समानता जैसी चीजों से जुड़े हुए है। जैसे कि लोग खुलकर अपनी मर्जी को दुसरो से बेपरवाह होकर अभिव्यक्त कर रहे है। परम्परागत नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है जिससे महिलाओं, दलित, आदिवासीओ की मुक्ति सुनिश्चित हो रही है। लोग खुलकर अपने को सोशल मीडिया पर व्यक्त कर रहे है। कुल मिलाकर बात यह है कि लोग गरिमामय तरीके से जीवन जीने की ओर प्रयासरत है।

मौजूदा बदलावों के द्वारा ऐसे प्रभाव भी पड़ रहे है जो भारतीय संस्कृति के मूल्यों के विपरीत है जैसे कि लोग दिखावे के चक्कर मे खूब अपव्यव कर रहे है। भौतिक संसाधनों को प्राप्त करने के चक्कर मे लोग अनैतिक तरीके से कमाई करने लगे है, रिश्वत ले रहे है, धोखाधड़ी हो रही है। सम्पन्न जीवनशैली के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन किया जा रहा है। खुलेपन के नाम पर अश्लीलता को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप महिलाओ की सुरक्षा का मुद्दा उभरने लगा है। तकनीकियों के प्रयोग ने आदमी की जिंदगी को सुगम बनाया है इसलिए आदमी अकेला रहना पसंद करने लगा है और समाज से दूरी बनाने लगा है। रिश्तों में भी तनाव उभरने लगा है जिससे उनमे भावनात्मक लगाव कम हो गया है। पहले की कई बुराइयों का भी आधुनिकीकरण हो गया है, जैसे कि दहेज, इस कारणे जो प्रयास महिलाओ को शसक्त करने के लिए किए जा रहे है वे प्रभावहीन होते जा रहे है।

कुछ प्रतिक्रियावादी लोगो का मानना है कि मौजूदा बदलाव भारतीय संस्कृति को दूषित कर रहे है। इसे वे पश्चिम के सांस्कृतिक आक्रमण के तौर पर देखते है जिसके कारण भारतीय संस्कृति लगातार अनुपस्थित होती जा रही है। इनका मानना है कि लोग आधुनिक चीजो को ग्रहण करने के चक्कर मे परम्परागत चीजो को पिछड़ी समझ कर भूलते जा रहे है। सम्पन्न लोगों की देखा देखी दूसरे लोग भी उनकी नकल करने में लगे हुए है जिससे एक सांस्कृतिक अराजकता  का माहौल बन गया है। ऐसा माहौल बन गया है जिसमे सांस्कृतिक बदलावों की दिशा  को पहचानना मुश्किल हो गया है। ऐसा लगने लगा है की पश्चिमी संस्कृति का ही एकमात्र विकल्प बचा है, भारतीय संस्कृति अब एक भ्रम मात्र रह गयी है

लेकिन इन आशंकाओ का मूल्यांकन करने पर पाते है कि भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्व तो अभी भी मजबूत स्थिति में है। भारतीय संस्कृति का अभी भी पृथक वजूद है, पहचान है जो विदेशो में भी लोकप्रिय हो रहा है। इसका एक उदाहरण यह है कि योग दिवस घोषित करने के भारत के सयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव को 177 देशो का समर्थन मिला था। बॉलीवुड भारत का विदेशो में प्रतिनिधित्व कर रहा है। बाहरी दिखाई देने वाली चीजें जरूर पश्चिम के रंग में रंगी है लेकिन आंतरिक चीजे पर तो विदेशो में भी भारत का ही रंग जम रहा है।

ऐसा कोई पहली बार नही हो रहा है जब भारतीय संस्कृति बाहरी चीजो के सम्पर्क में आई हो। इससे पहले इस्लामिक संस्कृति का जब भारत मे आगमन हुआ तो वह भारतीय संस्कृति को पचा नही सकी, जबकि उसने इराक और ईरान की संस्कृतियों को पचा लिया था। भारतीय संस्कृति के साथ मिलकर एक समन्वित संस्कृति विकसित की जो आज भी बहुलता में सामंजस्य का उदाहरण प्रस्तुत करती है। उस समय भी कई लोगो को लगा था कि ये किसी न किसी मे विलय हो जाएगी लेकिन ऐसा नही हुआ। उसी प्रकार पश्चिम के साथ भी भारतीय संस्कृति के सम्पर्क से नई परिष्कृत संस्कृति सामने आएगी । रही बात मौजूदा सांस्कृतिक परिदृश्य की खामियों की , तो उन्हें गम्भीर प्रयास किया जाए तो दूर किया जा सकता है।

निष्कर्ष : 
अतः हम कह सकते है कि भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्व न केवल स्थापित है बल्कि परिष्कृत भी हो रहे है। यह किसी मिथक तक सीमित नही है, इसकी पहचान वास्तविक तौर पर की जा सकती है।