अवैध बजरी खनन पर रोक के प्रयास, उनकी सीमाएं और समाधान

राजस्थान ऐसा पहला राज्य नहीं है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने बजरी खनन पर रोक लगाई हो। लेकिन दुसरे राज्यों में 2 साल के बाद ही पर्यावरणीय अनुमति के साथ इसे हटा दिया गया था, उदाहरण के लिए उत्तराखंड। लेकिन राजस्थान में राज्य सरकार की लापरवाही को इस स्थिति के लिए उत्तरदायी माना जा रहा है। अगर नियमानुसार खनन होता तो ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती। इसने समय पर रिप्लेसमेंट स्टडी रिपोर्ट पेश नहीं की। साथ ही राज्य सरकार, अवैध खनन पर भी कोई विश्वसनीय रोक नहीं लगा पाई है। अवैध खनन पर रोक नहीं होने के कारण माफिया बेलगाम हो गये हैं। माफियाओं द्वारा निर्मित जोखिमग्रस्त परिस्थितियों को पिछले आलेख में वर्णित किया गया हैं। अवैध वसूली में शामिल रहे उत्तरदायी सरकारी कर्मियों ने स्थिति को ऐसी जगह पहुंचा दिया हैं कि अब समस्या नासूर बन गई हैं। 

इससे पूर्व के 2 आलेख में हम अवैध बजरी खनन की समस्या के कारण एवं प्रभावों के बारे में विभिन्न आयामों की जानकारी दे चुके हैं। जबकि इस आलेख में हमारा ध्यान सीधे इस समस्या से पार पाने के लिए राज्य सरकार द्वारा किए गये प्रयासों एवं उनकी सीमओं का अध्ययन करने पर हैं।

1. अवैध खनन से जुडी विसंगतियों पर सरकार की प्रतिक्रिया और उनकी नियति

अवैध खनन से न तो राजस्व प्राप्त हो रहा है, और न ही पर्यावरण का निम्नीकरण रुक रहा है। इसलिए अवैध खनन से जुडी विसंगतियों को रोकने एवं समाप्त करने के लिए सरकार ने कई प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं, जो कि इस प्रकार हैं :

1.1. अवैध खनन पर रोक

अवैध खनन से जुडी विसंगतियों को रोकने के लिए सबसे पहले तो अवैध खनन पर रोक लगायी जानी चाहिए। इसके लिए जिला स्तर पर डीएम को जवाबदेह बनाया गया है। फिर भी इसके लिए प्रशासन द्वारा किये जाने वाले प्रयास नाकाफी हो रहे हैं। इसके बावजूद भी अवैध खनन, परिवहन एवं भंडारण पर रोक नहीं लग पायी हैं।

1.2. बजरी के वैध खनन को शुरू करवाने का प्रयास

राजस्थान सरकार ने खनन शुरू करवाने के लिए कई प्रयास किए हैं, इसके लिए किए गए विभिन्न उपाय इस प्रकार है :

  • फिर से नीलामी की तैयारी : राजस्थान सरकार ने 2018 में पुरानी नीलामी की खानों पर पर्यावरणीय अनुमति के अभाव में रोक लगा दी थी। ऐसे में सरकार ने फिर से नीलामी की तैयारी शुरू की थी। इस बार सरकार ने नीलामी के लिए 800 छोटे प्लाट राज्य भर में आवंटन के लिए चयनित किए। इनको लेकर आशा व्यक्त की जा रही थी कि इनका आकार छोटा होने के कारण पर्यावरण अनुमति में भी दिक्कत नहीं आएगी। ऐसे में नीलामी के बाद राज्य में बजरी खनन चालू हो सकेगा। लेकिन पुरानी नीलामी के मंशा पत्र धारकों द्वारा न्यायालय में चले जाने के कारण यह योजना अटक गई। [1]
  • निजी खातेदारी भूमि से खनन की अनुमति : सरकारी जमीन पर बजरी खनन पर रोक के बाद एक हेक्टेयर तक की निजी खातेदारी भूमि से खनन के लिए खान विभाग ने आवेदन आमंत्रित किये थे। परंतु इनमें से अधिकतर आवेदनों पर पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त नहीं हो सकी। जहाँ कही अनुमति प्राप्त हुई, वहां खातेदारी भूमि की आड़ में नदी से खनन आरंभ हो गया। लोग नदी से बजरी भरकर लाते और खातेदारी भूमि के पास से रवन्ना लेकर आराम से परिवहन कर रहे थे। (अधिक विस्तृत 2.2 में)

1.3. बजरी पर रोक से विकास कार्य प्रभावित नही हो, इसलिए वर्क परमिट का प्रावधान 

सरकारी अवसंरचना विकास एवं निर्माण कार्यों में प्रयुक्त होने वाली बजरी के खनन एवं परिवहन के लिए वर्क परमिट जारी किए जाते हैं। ताकि बजरी खनन पर रोक की वजह से विकास कार्य अवरुद्ध नहीं हो। लेकिन वर्क परमिट समस्या के समाधान के बजाय अपने आप में ही अवैध खनन का एक और जरिया बन गया।

1.4. बजरी के विकल्प के रूप में एम-सैंड को प्रोत्साहन

  • एम सैंड को बजरी के विकल्प के तौर पर देखा गया। बजरी खनन पर रोक के बाद राज्य में एम सैंड के संयंत्र लगना शुरू हो गये हैं। एम सैंड उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए राज्य में राजस्थान प्रधान खनिज रियायत नियम 2017 में संशोधन प्रस्तावित है। राजस्थान निवेश प्रोत्साहन नीति 2019 में एम सैंड मैन्युफैक्चरिंग पर दी जाने वाली सहायता का विवरण है।
  • एम सैंड नीति की घोषणा [2]
  • कुछ जगह पर पत्थरों को पीसकर एम-सैंड तैयार की गई, लेकिन यह बजरी मकानों के कार्यों में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाई। 

बजरी का अवैध खनन, भंडारण एवं परिवहन और इनसे संबंधित परिणाम

इस समय राजस्थान में बजरी का खनन एवं परिवहन बहुत बडा मुद्दा बना हुआ है। राजस्थान में बजरी खनन पर न्यायालय द्वारा रोक लगाने का नतीजा अवैध गतिविधियों के प्रारंभ होने के रूप में सामने आया हैं।  बजरी खनन पर 16 नवंबर, 2017 को उच्चतम न्यायालय की रोक के साथ ही बजरी के भंडारण एवं परिवहन जैसी गतिविधियां भी अवैध घोषित हो गई। चूंकि विकास एवं निर्माण कार्य तो बजरी के बिना चल नहीं सकते, इसलिए मांग को देखते हुए आपूर्ति के कई अवैध चैनल खड़े हो गये। समय-समय पर मीडिया और जनता द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं कि इन अवैध तरीकों को स्वंय प्रशासन द्वारा ही शह दी जा रही हैं। कहा जाता हैं कि इनके माध्यम से पुलिस वसूली करके कमाई करती हैं। बजरी के अवैध खनन में पुलिस की संलिप्तता एक पक्ष हो सकती हैं, लेकिन इसका एक और पक्ष भी हैं, जिसमे खुद पुलिस पर ही बजरी माफिया द्वारा हमले किए जाते हैं। कुल मिलाकर बात यह हैं कि अवैध बजरी खनन पर्यावरणीय चिंताओं के साथ-साथ कानून-व्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती हैं। इसके कई आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक पहलु भी हैं। इस आलेख में अवैध बजरी खनन से जुड़े विभिन्न प्रभावों का बहुआयामी अध्ययन किया जाएगा। बजरी खनन के साथ पर्यावरणीय प्रभाव हमेशा जुड़े रहते हैं। लेकिन इस आलेख में मेरा ध्यान उन प्रभावों को बताना हैं, जो कि इस अवैधता के कारण प्रमुखता से हो रहे हैं।

इससे पूर्व पिछले आलेख बजरी खनन पर न्यायिक रोक : कारण एवं समाधान में बताया था कि राजस्थान में किस प्रकार बजरी का खनन अवैध घोषित हो गया। न्यायालय द्वारा लगाईं गई रोक और उनसे संबंधित विभिन्न घटनाक्रमों को भी उसमे बताया गया हैं। 

पृष्ठभूमि

दरअसल, राजस्थान में बजरी खनन को लेकर एक याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने नवंबर, 2017 में आदेश दिया था कि बिना पर्यावरण स्वीकृति के चल रही बजरी खानें बंद की जाए। इसके साथ ही बजरी खनन से जुड़े 82 लाइसेंसों को रद कर दिया था। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि बिना पर्यावरणीय मंजूरी और अध्ययन रिपोर्ट के खनन की इजाजत नहीं दी जा सकती है। इसके बाद से राजस्थान में बजरी खनन पर रोक लगी हुई है। उच्चतम न्यायालय ने पर्यावरण मंत्रालय से कहा था कि वो पर्यावरणीय स्वीकृति का काम जल्द पूरा करे। लेकिन यह काम अभी भी चल रहा है। इसका नतीजा अवैध खनन के रूप में सामने आया। अवैध खनन पर रोक लगाने में प्रशासन की विफलता पर न्यायालय द्वारा अवमानना नोटिस तक जारी किये जा चुके हैं। 

राजस्थान के पाली जिले में सुमेरपुर और शिवगंज के बीच बहने वाली जवाई नदी में बजरी का अवैध खनन सबसे ज्यादा हो रहा है। इसके अलावा सुमेरपुर उपखंड क्षेत्र की सभी नदियों में अवैध बजरी खनन का कार्य जोरों पर है। इसके अलावा टोंक जिले में बनास नदी, सवाई माधोपुर जिले के मलारना डूंगर उपखंड के बिलोली नदी और श्यामोली बनास नदी के पास बजरी का अवैध खनन चल रहा है।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार बनास में आज भी 1800 से दो हजार ट्रोलियां रोजाना बजरी का अवैध परिवहन हो रहा है। एक ट्रॉली में 14 से 16 टन तक माल भरा जा रहा है। एक ट्रॉली की कीमत 1000 प्रति टन के हिसाब से 16 हजार तक पडती हैं। इस प्रकार बनास नदी में रोजाना 32 हजार टन अवैध खनन होता हैं, जिसकी कीमत ढाई करोड़ से ज्यादा है। रोज 80% बजरी दौसा की तरफ जाती हैै। बाकी 20% बजरी दूसरे इलाकों से निकल रही है, जो श्योपुर मध्यप्रदेश व टोंक जिले से होकर जयपुर की तरफ सप्लाई की जा रही है। [1]

इस स्तर पर खनन एवं परिवहन ऐसे समय पर हो रहा हैं, जब पूरा प्रशासन बजरी के अवैध खनन और परिवहन को रोकने के लिए विशेष अभियान चला रहा है। इससे समस्या का गंभीरता का अनुमान लगाया जा सकता हैं।

बजरी खनन पर न्यायिक रोक : कारण एवं समाधान

बजरी निर्माण कार्यों में उपयोग होने वाला प्रमुख खनिज हैं। इस समय पर तेजी से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था में निर्माण कार्य पर्याप्त मात्रा में हो रहे है। निर्माण कार्यों के अनुपात में ही बजरी की भी मांग बढ़ रही हैं। राजस्थान के बनास, मोरेल एवं अन्य नदियों जैसे कई बजरी प्राप्त करने के प्रमुख स्त्रोत हैं। राजस्थान के ये बजरी के स्त्रोत न केवल राजस्थान की बल्कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली की बजरी की आवश्यकताओं को काफी हद तक पूर्ण कर सकते हैं। लेकिन राजस्थान में बजरी खनन पर रोक लगी हुई हैं। चूंकि निर्माण कार्य तो बंद हो नहीं सकते, इसलिए इनकी मांग को पूर्ण करने के लिए अवैध तरीके से बजरी का खनन एवं परिवहन किया जा रहा हैं। इस अवैध तरीके से बजरी की आपूर्ति ने एक माफिया-अफसर-राजनेताओं के कुख्यात गठजोड़ को जन्म दिया हैं। इससे रोक का कोई फायदा नहीं निकल रहा हैं। एक तरीके से सरकार की नाक के नीचे से अवैध खनन, भंडारण एवं परिवहन हो रहा हैं। 

राजस्थान में बनास सहित अन्य नदियों में बजरी खनन 16 नवंबर 2018 से सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशानुसार बंद हैं। कुछ जगहों पर पहले से ही बंद हैं, जैसे- नागौर, बीकानेर। इस आलेख में हम उन कारणों की पड़ताल करेंगे, जिनके कारण ऐसी परिस्थितियां निर्मित हुई हैं।

पृष्ठभूमि

दरअसल केंद्र सरकार ने खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत बजरी जैसे कुछ खनिजों को लघु खनिज (Minor Mineral) घोषित किया हैं, जिनके लिए शक्तियों को राज्य सरकार को हस्तांतरित किया गया हैं। इन शक्तियों का प्रयोग करते हुए राजस्थान सरकार बजरी खनन के लिए खानों का आवंटन करती हैं। चूंकि खनन के परिवेश पर प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव होते हैं, इसलिए खनन शरू करने से पहले पर्यावरण विभाग से अनुमति की भी आवश्यकता होती हैं। पर्यावरणीय अनुपालन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण का भी गठन किया हैं। चूंकि बजरी खनन नदी के पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित करता हैं, इसलिए पर्यावरणीय कारणों से इसके खनन को विनियमित किया जाता हैं। अथार्त किसी खान विशेष की पृष्ठभूमि, खनन के बाद वापस बजरी आने की संभावना एवं समयावधि, संपार्श्विक परिवेश पर प्रभाव आदि पहलुओं को ध्यान में रखते हुए खनन की अनुमति दी जाती हैं। राजस्थान में खानों का आवंटन करने के बाद इस प्रक्रिया के पालन में चुक हुई और न्यायालय द्वारा रोक लगा दी गई। चलिए इस संदर्भ में हुए घटनाक्रमों को समझते हैं।

1. दुर्गा शक्ति नागपाल वाद, 2013 और बिना EC बजरी खनन पर रोक

दुर्गा शक्ति नागपाल उत्तर प्रदेश कैडर में एक आईएएस अधिकारी थी, जिन्हें अगस्त 2013 में गौतम बुध नगर एसडीएम के पद पर रहते हुए बजरी माफिया पर कार्रवाई के कारण शासन द्वारा निलंबित कर दिया गया था। एनजीटी ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए 5 अगस्त 2013 को एनजीटी बार एसोसिएशन की याचिका पर संपूर्ण देश में बिना पर्यावरणीय मंजूरी के बजरी खनन पर रोक लगा दी। NGT ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत कार्यवाही करते हुए इस आदेश को जारी किया तथा जिले के पुलिस अधिकारियों को इसका अनुपालन सुनिश्चित कारने के लिए अधिकृत किया। NGT का मानना हैं कि बजरी खनन संबंधित क्षेत्र की पारिस्थितिकी को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता हैं। [1]

इस निर्णय में NGT ने दीपक कुमार बनाम हरियाणा सरकार वाद में उच्चतम न्यायालय के निर्णय (फरवरी,2012 ) की भी पुष्टि की, जिसमे पांच एकड़ से कम भाग में खनन करने के लिए भी सक्षम अधिकारीयों से पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त करने की बात कही गई थी। इस आदेश के साथ ही पर्यावरणीय अनुमति के बिना बजरी खनन बंद हो गया।

मन में एक संदेह यह रहता हैं कि जब 2012 में ही उच्चतम न्यायालय ने बजरी के खनन पर रोक लगा दी थी, तो 2013 में NGT को फिर से प्रतिबन्ध लगाने की जरुरत क्यों पड़ी। इसका उत्तर यह हैं कि बजरी राज्य द्वारा नियंत्रित खनिज हैं, इसलिए NGT के निर्णय में इसका सभी खनिजो, राज्यों एवं नदियों तक विस्तार किया गया।

जयसिंहपुरा गाँव का अतिक्रमण विरोधी प्रदर्शन

धरना प्रदर्शन को लोकतंत्र में अपनी मांग मनवाने का सबसे सशक्त एवं शांतिपूर्ण माध्यम माना जाता हैं। हालांकि सरकार द्वारा ऐसे प्रदर्शनों को ज्यादा महत्त्व देने के परम्परा कमजोर पड़ी हैं। जैसे कि दिल्ली में किसान अपनी मांगों के लिए 25 नवंबर से प्रदर्शन कर रहे हैं,लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं आया हैं। फिर भी धरना प्रदर्शन ही वह हथियार हैं, जो अकर्मण्य एवं उदासीन शासन व्यवस्था को गहराई तक प्रभावित करता हैं। ऐसी ही एक घटना एक दिन मैंने सवाई माधोपुर के अखबार में पढ़ी। जो इस प्रकार थी कि खण्डार तहसील क्षेत्र के जयसिंहपुरा गांव (ग्राम पंचायत गोठड़ा) के लोग 11 दिन से धरने पर बैठे हुए हैं। इनकी मांग थी कि चरागाह भूमि पर हो रहे अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की जाए। यह धरना 4 जनवरी से शुरू हुआ था और 12 दिन तक जारी रहा था। शुरू में तो प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की, लेकिन जब धरना लंबा चलता हुआ दिखाई दिया तो प्रशासन द्वारा समस्या समाधान के लिए विधिवत प्रक्रिया शुरू की गई। लेकिन यह अपने आप में ही एक अनूठा उदाहरण था, जिसमे अतिक्रमण जैसी समस्या के लिए लोग स्वंय आगे आ रहे थे। सरकारी भूमि पर अतिक्रमण एक समस्या हैं, और किसी ने इसके खिलाफ एकजुट होकर पहल करने का साहस जुटाया हैं। यह सब सोचने पर मजबूर करने वाला था। 

हम इस आलेख में इस धरने में हुए घटनाक्रमों के माध्यम से अतिक्रमण की समस्या से जुडी जटिलताओं को समझाने की कोशिश करेंगे। साथ ही अतिक्रमण के लिए उत्तरदायी कारणों, उत्तरदायी व्यक्तियों की भूमिका एवं समाधानों पर भी विचार करेंगे।

मौजूदा घटनाक्रम : 

दरअसल, 4 जनवरी 2021 को सुबह करीब 8 बजे जयसिंहपुरा के दर्जनों ग्रामीण तहसील कार्यालय खंडार पर ज्ञापन देने पहुंचे थे। यहां ग्रामीणों द्वारा खंडार तहसीलदार को ज्ञापन सौंपकर गांव की चरागाह, सिवायचक व आबादी भूमि से अतिक्रमण हटाने की मांग की गई। जिस पर प्रशासन द्वारा उन्हें कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। इससे एक दिन पूर्व भी इस मामले में उनके द्वारा प्रशासन को ज्ञापन दिया गया था। और आज भी कार्रवाई के लिए प्रशासन की कोई गंभीरता नजर नहीं आ रही थी। ऐसे में देर शाम तक भी सुनवाई नहीं होने पर ग्रामीण भड़क गए और तहसील कार्यालय में ही करीब 30 लोग धरने पर बैठ गए। इनका कहना था कि जब तक संपूर्ण सरकारी जमीन से अतिक्रमण नहीं हटाया जाता है, तब तक वे धरनास्थल से किसी भी सूरत में नहीं उठेंगे।

अब बात यह हैं कि यह समस्या तो कई जगह देखने को मिल जाती हैं फिर इनकी समस्या में क्या गंभीरता थी, जो इन्होने इतना बड़ा कदम उठाया।

1. आइये इस मामले की पृष्ठभूमि को समझते हैं 

इस मामले को हम शुरू से ही समझते हैं।

  • सरकारी भूमि पर अतिक्रमण : ग्रामीणों ने बताया हैं कि वे पिछले 15 सालों से लगभग 150 बीघा चरागाह, शिवायचक व आबादी भमि पर अतिक्रमण से परेशान हैं। सरकारी खाली भूमि की अनुपलब्धता के कारण उन्हें मवेशी चराने में परेशानी का सामना करना पड़ता हैं। जबकि अतिक्रमियों द्वारा उस पर खेती की जा रही हैं या घर बना लिए गये हैं।
  • भूमाफियाओं द्वारा सरकारी भूमि पर ही प्लाट काट कर बेचना : यह गांव खंडार तहसील मुख्यालय से थोड़ी ही दुरी पर हैं। इसलिए शहरी क्षेत्र के आसपास रहने को इच्छुक लोगो को भूमाफियाओं द्वारा इन जमीनों पर प्लाट काट कर बेच दिए गये।
  • ग्राम पंचायत द्वारा पट्टे जारी कर देना : जयसिंहपुरा गाँव, गोठड़ा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता हैं। ऐसे में अतिक्रमियों को गोठड़ा ग्राम पंचायत से आसानी से अवैध पट्टे भी प्राप्त हो गये। जब जयसिंहपुरा के पुरे ग्रामीण इन अतिक्रमियों के विरुद्ध हैं तो उन्हें किस की शह प्राप्त हो रही हैं, तो इसका जवाब यहाँ से प्राप्त किया जा सकता हैं। हो सकता हैं, इसमें दोनों गांवों की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता का आयाम भी शामिल हो।  
  • शिकायत : जब इन लोगो को फर्जी पट्टे भी प्राप्त हो गये तो जयसिंहपुरा के लोगो ने प्रशासन से शिकायत की। 
  • संपूर्ण भूमि का सीमांकन : प्रशासन द्वारा वर्ष 2011 में संपूर्ण भूमि का सीमांकन करवाया गया। 
  • फर्जी तरमीम का खुलासा :  वर्ष 2011 में राजस्व विभाग के तत्कालीन अधिकारियों द्वारा गांव की संपूर्ण चरागाह व सिवायचक भूमि का सीमाज्ञान करवाकर रिपोर्ट तैयार की गई थी। जिसमें कई खातेदारों का मौके पर कब्जा काश्त ही नहीं पाया गया था। जबकि राजस्व विभाग के तत्कालीन अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा बिना कब्जा काश्त भूमियों पर ही कई फर्जी तरमीम भी की गई थी। इन सबका सीमाज्ञान के दौरान खुलासा हो गया था।
  • न्यायालय द्वारा फर्जी तरमीम खारिज : राजस्व न्यायालय द्वारा इनमे से कई फर्जी तरमीम को खारिज कर दिया गया।
  • राजस्व विभाग द्वारा बेदखली की कार्यवाही नहीं करना : राजस्व न्यायालय द्वारा फर्जी तरमीम खारिज होने के बावजूद राजस्व विभाग के अधिकारियों की नाकामी के चलते मौके पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है।
  • भूमाफियाओं के हौसले बुलंद/प्रोत्साहन : कोई कार्यवाही नहीं होने से भूमाफियाओं को प्रोत्साहन मिला और उन्होंने फिर से निरस्त तरमीम वाली भूमि पर ही प्लाट काटकर बेच दिए। ग्रामीणों का यह भी मानना हैं कि अतिक्रमण राजस्व कर्मियों की भूमाफियाओं के साथ मिलीभगत के कारण हुआ है।
  • शिकायत पर कार्यवाही नही होना : इनके विरुद्ध जयसिंहपूरा गाँव के लोगों ने बार-बार प्रशासन को अपनी शिकायत प्रस्तुत की। अब तक करीब एक दर्जन से अधिक बार प्रशासन को ज्ञापनों के माध्यम से शिकायत कर चुके है, लेकिन प्रशासन द्वारा हर बार अतिक्रमण हटाने का आश्वासन देकर उनके साथ धोखा किया जाता रहा है। प्रशासन द्वारा कार्यवाही के लिए कभी भी कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई। ऐसे में पूरे गांव में प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश व्याप्त है।

इस प्रकार इस समस्या की दीर्घकालिक प्रकृति के कारण इस आन्दोलन की पृष्ठभूमि निर्मित हुई।

जलवायु परिवर्तन के वैश्विक एजेंडे में कोरोना संकट जनित व्यवधान

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ शुरू हुई उपनिवेशों की आजादी ने वैश्विक राजनीति के मंच को नव-स्वतंत्र, विकासशील देशों के लिए भी खोल दिया। द्विध्रुवी विश्व की राजनीति खत्म होने के बाद पश्चिमी देश मुद्दाविहीन होते चले गये तो इन्ह्ने जोर-शोर से जलवायु परिवर्तन का अजेंडा चलाया। जिसके संकट को इन्होने अतिशयोक्तिपूर्ण तरीके से व्यक्त करना शुरू कर दिया था।

वर्ष 1991 में एक तो नव-उदारवाद की शुरुआत हुई, वही अगले साल वर्ष 1992 में पृथ्वी सम्मेलन ने पर्यावरणीय राजनीति की शुरुआत की। तब से वैश्विक राजनीति इन्ही के इर्दगिर्द घूम रही हैं। क्योटो और पेरिस जैसे समझौतों ने लगभग सभी देशों को इस राजनीति का हितधारक बना दिया। लेकिन वर्ष 2020 में आकर कोरोना संकट ने पुरे वैश्विक परिदृश्य को बदल करके रख दिया। इसने बिलकुल ही अलग प्रकार की वैश्विक व्यवस्था को जन्म दिया, जिसमे सभी पीड़ित देश किसी एक जिम्मेदार की खोज करने में विफल हैं। सभी देश दीर्घकालीन अनिश्चित संकट का सामना करने के बजाय वर्तमान में मौजूद निश्चित संकट का समाधान खोजने के लिए प्रयासरत हैं। लेकिन दोनों ही मामलों में भय और उपाय जैसी सामान्य विशेषताएँ दृष्टिगोचर की जा सकती हैं। 

इस समय पर देखा जाए तो हम कह सकते हैं कि कोरोना संकट ने जलवायु परिवर्तन को पछाड़ दिया हैं। इस कथन को कहने के लिए हमारे पास कई तर्क मौजूद हैं -

  • दीर्घकालीन संकट के ऊपर वर्तमान संकट को प्राथमिकता : इस समय पर जलवायु परिवर्तन से ज्यादा शोर कोरोना संकट का हैं। यदि, जलवायु परिवर्तन की कीमत पर भी कोई उपाय इस समस्या से छुटकारा दिला सकता हैं तो दुनिया उसे अपनाना पसंद करेगी। इससे पता चलता हैं कि कम से कम इस समय पर तो जलवायु परिवर्तन का मुद्दा द्वितीयक हैं।
  • कोरोना संकट में जलवायु परिवर्तन का संकट कम हुआ हैं : जलवायु परिवर्तन का एजेंडा इस समय इसलिए भी प्राथमिकता में नही हैं क्योंकि इस महामारी की रोकथाम के लिए लगाए गये लॉकडाउन के कारण प्रदूषण के स्तर में अभूतपूर्व कमी देखने को मिली। ध्रुवों पर ओजोन छिद्र के भी भरने की बात सामने आ रही हैं।  कुछ लोग दूर पहाड़ों को देखने का दावा कर रहे हैं तो कुछ नदियों के जल को  स्वच्छ होने का। यह बात सही भी हैं कि इस दौरान जीवाश्म ईंधन के प्रयोग में कमी से उत्सर्जन में गिरावट आई। यहाँ एक तरह से कोरोना संकट जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उपाय का कार्य कर रहा हैं।
  • प्रायोजित डर में बढ़त : जिस प्रकार वैश्विक एजेंडा जलवायु परिवर्तन की विकटता के प्रति आगाह करने के लिए कई प्रकार की रिपोर्ट और सूचकांक जारी कर रहा था। कोरोना में भी समय के साथ विभिन्न रिपोर्ट इसकी भयावहता के बारे में उत्तरोत्तर वृद्धि की बात कह रही हैं। शुरू में कहा गया कि यह संक्रमित व्यक्ति से स्त्रावित द्रव के संपर्क में आने से होता हैं, अब कहा जा रहा हैं कि यह हवा में भी प्रसारित हो सकता हैं। ऐसा कह सकते हैं कि डर का कोई प्रायोजक उपस्थित हैं, जो मार्केट की डिमांड के अनुसार इसके संस्करण को अपडेट करता रहता हैं। साथ ही कोरोना का यह प्रायोजित डर जलवायु परिवर्तन से आगे निकल गया हैं। लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में कम से कम आठ बार भूकम्प आया था, लेकिन खौप कोरोना का ही ज्यादा था।   
  • समाधानों के लिए प्रयास में कोरोना आगे हैं : जिस प्रकार विभिन्न व्यवसाय समूह वैश्विक राजनीति की सहायता से जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हरित उपकरणों का बाजार खड़ा करने में लगे हुए हैं। उसी प्रकार कोरोना संकट में भी विभिन्न प्रतिभागी निवारक एवं उपचार समाधानों का बाजार खड़ा करने में लगे हुए हैं। रिओ समिट के बाद पुरे विश्व को परिचर्चा की सभा में एकजुट करने के लिए जलवायु परिवर्तन ही सर्वोच्च मुद्दा था, इसने पिछले दशकों के व्यापार वार्ता, परमाणु निशस्त्रीकरण जैसे मुद्दों को पीछे छोड़ दिया था। परन्तु इस समय कोरोना संकट ने इस मुद्दे को नेपथ्य में डाल दिया हैं। इस समय पर सभी देश या तो वैक्सीन को लेकर वार्तारत है या फिर बदहाल स्थिति की बहाली के लिए चर्चाओं में संलग्न हैं।
  • अन्य मुद्दें : जिस तरह जलवायु परिवर्तन ने वैश्विक राजनीति में विकसित बनाम विकासशील देश, समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्व, न्यूनीकरण एवं अनुकूलन जैसे मुद्दें मुख्यधारा में रहते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी ब्लेम गेम, विकासशील देशों की सहायता जैसे मुद्दें मुख्यधारा में हैं।  

कोविड-19 का डर : पूर्व में और अब 

जैसे-जैसे कोरोना की जीवन यात्रा आगे बढ़ी हैं, डर उत्पन्न करने की एक व्यवस्था भी इसके साथ आगे बढ़ी हैं। 

  1. शुरू में इटली और चीन की ख़बरों, मूवीज के दृश्यों को सोशल मीडिया पर साझा करके लोगो को इतना डराया कि उन्हें एक सख्त लॉक डाउन में रहने के लिए मजबूर और प्रताड़ित किया गया। जिसके साथ लोगो की आजीविका चौपट हो गई और उन्हें सैंकड़ों किलोमीटर दूर अपने घरों की और पैदल सफ़र करना पड़ा। जिसकी विभिषका अपने आप में ही एक अध्याय (कोविड-19 लॉकडाउन और मजदूरों का पलायन)हैं।      
  2. आरंभिक दौर में कोरोना के बारे में अपुष्ट, एकतरफा दावे करके मौजूदा स्वास्थ्य अवसंरचना को भी सीमित और संशयित रखा गया। शुरू में लोगो का ईलाज नही करके उन्हें आइसोलेशन वार्ड में बंद कर दिया, जिन्हें समय पर खाना तक नही दिया। इनमे से परेशान होकर कई लोगों ने आत्महत्या कर ली। शायद इस स्तर पर सोच यह थी कि भले ही ये तो मर जाए, लेकिन बाकि लोग इनके संपर्क में नही आये।
  3. आरंभिक दौर ऐसा था, जिसमे लोगों में इस हद तक डर था कि अगर कोई गाँव का आदमी बाहर से आया है तो उससे संपर्क नही रखा गया। अगर किसी आदमी को बुखार है तो मेडिकल वाला दवाई देने से मना कर देता था। एक तरीके से एक आधुनिक अस्पृश्यता की स्थिति देखने को मिल रही थी। मतलब लोग संक्रमण के डर की वजह से अतिरिक्त सतर्क (Extra -Alert) थे।
  4. जब संक्रमित व्यक्ति के संपर्क से भी कई लोगो को नही हुआ तो लोगो को डराने के लिए इसके हवा में प्रसारित होने की बात कही गई। लोग फिर भी नही डरे तो कहा गया कि अभी एक दक्षिण पूर्वी देश में कोरोना के ऐसे उपभेद (strain) मिले हैं, जो अभी तक ज्ञात संक्रमण के मामलों से बहुत अधिक खतरनाक हैं।
  5. अब तो पडौस में हो जाता हैं तो भी कोई तवज्जों नही देता। क्योंकि ठीक होने वाले के अनुसार यह एक प्रकार का बुखार ही हैं। जिसमे आपकी इम्युनिटी ठीक है तो डरने की कोई जरुरत भी नही हैं। इसका आलम यह हुआ कि लोग खुद सामने आकर अपने पॉजिटिव होने का स्टेटस अपडेट कर रहे हैं कि उनको कोरोना था तो उनसे मिलने वाले अपना टेस्ट कराये, जबकि पहले इसके साथ बहुत बड़ा स्टिग्मा जुदा हुआ था। अब लोग कोरोना पॉजिटिव आने के बाद भी धरने और प्रदर्शनों का हिस्सा बन रहे हैं। कोरोना पॉजिटिव आकर किसी परिजन के मरने के बाद भी लोग खुद से उनका अंतिम संस्कार कर रहे हैं। जबकि पहले मृतक को पैक करके देने के कारण कई शवों की आपस में अदला-बदली हो गई। कई शव कॉविड प्रोटोकॉल का पालन करने के कारण लंबे समय तक अस्पतालों में पड़े रहे। कईयों के साथ अस्पतालों में छल-कपट हुआ, जब अच्छे-खासे लोगो को कॉविड से मृतक बता दिया गया।

इन सब उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता हैं कि आरंभिक दिनों में कोरोना को लेकर कितना अन्याय हुआ हैं। देश ने वाकई पिछले चार-पांच महीने बहुत कष्ट झेला हैं।

क्या कोरोना की तुलना जलवायु संकट से की जा सकती हैं?

जलवायु संकट की चिंताएं भी वास्तविक हैं, लेकिन जो समाधान किए जा रहे हैं, वे व्यावसायिक हैं। सभी व्यवसायी वैकल्पिक हरित समाधानों को विकसित करने का दावा करके हाशिए पर पड़े लोगो के परम्परागत आजीविका निर्वाह को समाप्त करना चाहते हैं। इनके द्वारा किए गये उपाय लक्ष्यहीन हैं, जो असली चुनौतियों को संबोधित नही करते हैं। इन उपायों के लिए जनता को भरी कीमत चुकानी पड़ रही हैं, जिसे हम ओजोन संरक्षण से जुड़े वियना समझौते से समझ सकते हैं। जिसके लक्ष्यों को तथाकथित तौर पर प्राप्त कर लिया गया हैं। लेकिन आम लोगो की जिन्दगी में इससे कोई फर्क नही पड़ा, जबकि उन्हें चीजे प्राप्त करने से रौकने के लिए कीमतों में वृद्धि की गई। साथ ही यह राजनीति में विकासशील देशों के प्रति ऐतिहासिक न्याय किए बिना उन पर दायित्व थोपना चाहते हैं। कोरोना संकट में भी यही स्थिति हैं, जिम्मेदार पक्ष की न तो पहचान की गई हैं और न ही उसके दायित्व निर्धारित किए गये हैं। अगर ऐसा नही किया गया तो यह इस प्रकार के अग्रिम दुस्साहसों को प्रोत्साहित करेगा।

दूसरी बात डर की बात भी दोनों में प्रायोजित हैं, जो वैश्विक संगठनों द्वारा इर्धारित किया जाता हैं। इसका नुकसान यह रहा हैं कि यह मूल और अति आवश्यक मुद्दों से ध्यान को विमुख कर दे रहा हैं। यही कारण हैं कि निर्धनता उन्मूलन, पोषण एवं भूख जैसे मुद्दें वैश्विक राजनीति से गायब हो गये हैं या फिर गिलोटिन की भेट चढ़ने वाले उप-खंडों में बदल गये हैं।

राष्ट्रीय-राज्य की अक्षमता

कोरोना संकट में राष्ट्रीय-राज्य की अक्षमता उजागर हुई कि वह आगामी अप्रत्याशित संकटों के प्रति अनुक्रिया करने के लिए तैयार नही हैं। चाहे वह कोरोना हो या फिर कोई प्राकृतिक आपदा हो।

लॉक डाउन के बारे में सरकार को आरंभ में पता ही नही था कि इसके लिए किस कानून का सहारा लिया जाए। इसलिए देश भर में इसका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए CrPC की धारा 144 का प्रयोग किया गया। लॉक डाउन 2.0 में जाकर NDMA ने आपदा प्रबंधन अधिनियम से शक्तियों को ग्रहण किया। 

लेकिन धारा 144 के अखिल भारतीय प्रयोग ने पुरे देश का एक साथ आपराधिक-करण कर दिया गया। लोगो को घरों से निकालकर भी पीटा गया, धार्मिक स्थलों और कही जरुरी जगह से आते अकेलें आदमियों को भी पीटा गया। इसका क्षेत्राधिकार विस्तृत था। यह आपातकाल से भी बदतर था, जिसमे अनुच्छेद 359 के तहत प्राप्त अनुच्छेद 20 और 21 का समर्थन भी प्राप्त नही था। प्रधानमंत्री ने कहा कि जनता इसे अपने आप पर लगाया हुआ आपातकाल माने। यह एक राष्ट्रीय-राज्य की विफलता थी कि वो अपनी आवाम को अपनी क्षमताओं पर भरोसा दिलाने में नाकामयाब रहा। अधिकतर राष्ट्रीय-राज्यों ने अपनी अक्षमताओं के लिए लोगो को दंडित किया। इस दौरान कईयों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए और कईयों के वाहन जब्त हुए, जिनके लिए वे आज भी (22 सितंबर 2020) पुलिस थानों और अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। 

इस सख्त लॉक डाउन के बाजवूद भी लोगों ने पलायन किया। उनके लंबे सफ़र, साथ में बच्चे और बूढ़े, रास्ते में दुर्घटना, बसों को अनुमति देने में राजनीति आदि मुद्दों की कारण उत्पन्न मानवीय संकट की चर्चा सोशल मीडिया में जमकर हुई। जिसके कारण सरकार पर दबाव पड़ा और वह लॉकडाउन को सरल बनाने के लिए मजबूर हुई। साथ ही अर्थव्यवस्था की बहाली के लिए घोषित आत्मनिर्भर भारत पैकेज के नाम के पीछे काफी हद तक प्रवासी मजदूरों को गृह राज्य में ही रोजगार देने की अवधारणा थी, हालाँकि आत्म निर्भर पैकेज का विश्लेषण एक अलग अध्याय में समझाया जाएगा।

कोविड-19 केन्द्रित आगामी राजनीति

ये बात तो सही हैं कि आगामी समय में कोविड-19 केन्द्रित राजनीति ही मुख्यधारा में रहेगी क्योंकि इस समय पर सभी देश वैक्सीन का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। सभी देश वैक्सीन को प्राप्त करने, वितरण करने और सुरक्षित रखने जैसे कार्यों में संलग्न हैं। जो व्यवसायी जलवायु परिवर्तन के लिए समाधान विकसित करने हेतु कार्यरत थे, वे अब वैक्सीन से जुड़े कार्यों में संलग्न हो गये हैं। वैक्सीन आने पर कंपनियों द्वारा मोटी कमाई किए जाने की आशंका बताई जा रही हैं, हो सकता हैं तब सामान्य बुखारों को कोरोना बताने के चलन में वृद्धि हो।

निष्कर्ष

जलवायु परिवर्तन और कोरोना दोनों संकट वास्तविक हैं और दोनों के ही प्रति समान रूप से सतर्कता बरतने की आवश्यकता हैं। लेकिन केवल व्यावसयिक हितों के कारण ही डर को प्रायोजित नही करना चाहिए क्योंकि इससे लोगो के मध्य भारी अराजकता उत्पन्न होती हैं, जो उनकी जान और आजीविका के लिए विध्वन्श्कारी होती हैं। दोनों के लिए ही समाधानों और नवाचारों का समर्थन करने की आवश्यकता हैं।