ग्रामीण पहचान से बचती हुई पीढ़ी

ज्यादातर लोगों में अपनी चीजो को लेकर अभिमान होता है और वे बात-बात में अपना संबंध वहाँ से जोड़ने का प्रयास करते है। इसके विपरीत कुछ लोगो मे अपने स्थान को लेकर हीनभावना होती है और वे अपने को उस स्थान से दूर रखने का प्रयास करते है। जैसे कि विदेशों में पाकिस्तानी अपने देश का नाम नही बताते, उन्हें लगता है कि असलियत बताने पर सामने वाला आतंकियों से जोड़कर देखेगा। वहीँ भारतीय विदेशो में गर्व से कहते है और सामने वाला उनसे पूछता है कि क्या आप डॉक्टर या इंजीनियर है।

सकरात्मकता को तो हर कोई भुना लेता है, लेकिन जब नकारात्मक चीजो के साथ पहचान जुड़ी हो तो बताने वाला झिझकता रहता है। उनमे आत्मविश्वास की कमी देखी जाती है। उन्हें एक बारगी तो ऐसा भी लगता है कि हमारी गलती यह है कि हम यहां पैदा हुए है। कुछ लोग उनमे ऐसे भी होते है जो अपनी हैसियत को अपने स्थान और वहाँ के लोगो की हैसियत से बढ़कर मानते है। ये सकारात्मक और नकारात्मक पहचान दोनो जगहों पर प्रेक्षित किये जा सकते है। कहने का आशय है कि कुछ लोगो मे विशिष्टता की भावना इस कद्र भर जाती है कि बाहर चाहे वे कुछ भी हो लेकिन अपने स्थान के लोगो के समक्ष किसी प्रकार का सामान्यकरण बर्दाश्त नही है। अपनी हैसियत को उस स्थान और वहाँ के लोगो से जोड़कर अपनी प्रोफाइल में किसी प्रकार का हल्कापन नही लाना चाहते है।

ऐसे लोगो की संख्या गांवो में काफी देखने को मिलती है। यहां नव उच्च-शिक्षित, नव पेशेवर वर्गो में यह मानसिकता जल्दी घर कर जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे नवीन अर्जित प्रतिष्ठा से हासिल विशिष्टता को लेकर सहज नही हो पाते है। इस सिलसिले में वे 'विशिष्टता की महिमा' से प्रेरित व्यवहार को अमल में लाने की कोशिश करते है। वे आभिजात्य संस्कृति से प्रेरित रहन-सहन, बोलचाल, शौक आदि का अनुसरण करने का प्रयास करते है। उनकी गतिविधियों को अगर संसाधनों की उपलब्धता का समर्थन मिल जाता है तो उनका व्यवहार बदल जाता है और जिन्हें संसाधनों का समर्थन नही मिलता, वे सामान्य ही बने रह जाते है।

नवीन प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले समूह में नवीन नोकरी लगने वाले, उच्च शिक्षा की विशिष्ट प्रकृति वाले, कौशल या प्रतिभा आधारित उपलब्धियों वाले व्यक्ति हो सकते है। गांवो में ऐसे लोग आने से बचते है, सामुदायिक कार्यक्रमो से दूर रहते है, ग्रामीण संस्कृति और रीति-रिवाजो में खामिया तलाशकर उसे पिछड़ेपन से जोड़ते है, ग्रामीण स्वछंदता की तुलना अनैतिकता से करते है, बोली और पहनावे में क्रत्रिम अंतराल रखने का प्रयास करते है। लेकिन दूसरी तरफ अगर देशी चीजे बाहर प्रसिद्ध हो जाती है तो ये उसे भुनाने से बाज नही आते है।

इस चीज का असर यह हो रहा है कि ग्रामीण संस्कृति की गतिविधियों युवाओं के मध्य अपना दायरा खोती जा रही है। गांवो में भी शहरों के समान सामुदायिक मूल्यों का ह्रास बढ़ता जा रहा है। इसका नकारात्मक असर गांवो की संस्था को ही नही प्रभावित कर रहा बल्कि खुद वे लोग भी अवसाद और असुरक्षा की भावना से ग्रस्त है।
जरूरी है कि शिक्षा के माध्यम से लोगो मे अपनी चीजो के प्रति आत्मविश्वास उत्पन्न किया जाये ताकि वे अपनी वेशभूषा, बोलचाल और खानपान के प्रति शर्म की बजाय गर्व महसूस करे। शिक्षा के माध्यम से ही आयातित रहन-सहन के दिखावटीपन को स्पष्ट किया जाये और युवाओ को परिपक्व व्यवहार के प्रति तैयार किया जाए।

Fulfillment of 'New Woman' in India is a Myth

नए युग की महिला की अवधारणा आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता पर आधारित है। ये परम्परागत रूप से चली आ रही त्याग और बलिदान की भूमिका को स्वीकार नही करती है तथा कानूनी और यौन समानता में विश्वास करती है। इनका मानना है कि विवाह करने के कारण ऐसी समानता नही रह पाती इसलिए एकल रहने में भी यकीन करती है। 'ओल्ड वुमन' की तुलना में ये कामुकता के बारे में अधिक खुले विचार रखती है, अच्छी तरह से शिक्षित है, नॉकरी भी करती है, एथलेटिक्स और अन्य शारीरिक गतिविधियों में भी जोरदार है, परम्परागत वस्त्रो की जगह आरामदायक कपड़ो (कभी-कभी पुरुष पोशाक) पसंद करती है। इस तरह 'न्यू वुमन' एक बैचलर गर्ल से ज्यादा है जो परंपरागत नियंत्रण का प्रतिरोध करती है और दुनिया मे पूर्ण भूमिका निभाना चाहती है।

अगर 'न्यू वुमन' की अवधारणा का भारतीय परिदृश्य में मूल्यांकन करे तो हम पाते है कि भारत मे संविधान में ही उन्हें समानता के अवसर प्रदान कर दिए। आगे समय-समय पर विभिन्न कानूनों के माध्यम से उनके खिलाफ भेदभाव, हिंसा और उत्पीड़न को रोकने के उपाय किये गए। न केवल सार्वजनिक स्थानों को महिलाओं के अनुकूल बनाने के लिए प्रयास किये गए बल्कि घरेलू स्तर पर भी महिलाओ के लिए गरिमामय जीवन जीने को सुनिश्चित किया गया। सामाजिक स्तर पर भी महिलाओं को आगे लाने के लिए प्रेरित किया गया।

सरकारी द्वारा प्रदान किये गए अवसरों से महिलाओं को लाभ मिला और उन्होंने शिक्षा प्राप्त करके विभिन्न कार्यक्षेत्रों में अग्रणी भूमिका प्राप्त की। कई प्रवेश परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं में लड़कियों ने शीर्ष स्थान ग्रहण करके पुरुषो को पीछे छोड़ दिया है, उन्होंने अपनी काबिलियत से दिखा दिया है कि वे पुरुषों से कम नही है, सेनाओ तक मे भागीदारी इसका सबूत है। सार्वजनिक जीवन मे योगदान करने में महिला आगे आती जा रही है, वही अपनी आत्मनिर्भर प्रकृति के कारण पारिवारिक फैसलो में भी भूमिका निभाने लगी है। महिलाओं का कैरियर शिक्षा आधारित ही नही है, वे खेलो, फिल्मो, राजनीति आदि में भी बेहतर प्रदर्शन कर रही है। नए अवसरों का प्रयोग करके वे आत्मनिर्भर हुई है जिससे अपने पुरूष सम्बन्धियो पर निर्भरता कम हुई है, इस कारण वे हर मामले में उनके प्रति जवाबदेह नही रह गयी है जिनमे सेक्सुअल च्वॉइस भी शामिल है। यही वजह है कि लिव-इन-रिलेशनशिप और देरी से शादियों का प्रचलन बढ़ा है।

लेकिन 'न्यू वुमन' की अवधारणा का भारत मे क्रियान्वयन आसान नही है। जब भारत महिला सशक्तिकरण और लैंगिक न्याय के मामलों में ही संघर्ष कर रहा हो ऐसे में अधिकारों की लड़ाई को एक कदम और आगे बढ़ा देना निश्चित तौर पर अधिक चुनोती धारण करता है। जो कि इस प्रकार है----

1. पहली चुनोती तो यह है कि महिला सशक्तिकरण के फायदे शहरी औरतों को ही मिल रहे है या फिर गांवो में आर्थिक सक्षम घरो की महिलाये ही आगे बढ़ रही है। अन्य महिलाओं को बुनियादी सुविधाएं ही नही मिल पाती है जिनमे शिक्षा और चिकित्सा शामिल है। इस तरह अवसरों के अभाव में गांवो के लिए 'नई महिला' की अवधारणा मिथक भर ही है।

2. भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक प्रकृति है जिसमे नारी को बचपन मे पिता के, यौवन में पति के और बुढ़ापे में पुत्रो के आश्रय में देखा गया। इस व्यवस्था को भावनात्मक तौर पर इतना मजबूत बनाया गया कि खुद औरतो ने भी इससे बाहर निकलने की इच्छाशक्ति नही दर्शायी। इससे समानता की जगह अधीनस्थता का तत्व आ जाने से स्वतन्त्रता का हनन हुआ। ऐसे में नारी की भूमिका बच्चे, रसोई, साज-सज्जा और परम्पराओ के पालन तक ही सिमट कर रह गयी। इस तरह औरत की भूमिका को घर तक सीमित कर दिया गया।
वर्तमान में नए अवसरों की पहुच में आने से पितृसत्तात्मकता का शिकंजा कमजोर हुआ तो 'न्यू वुमन' का आधा अधूरा स्वरुप सामने आया। क्योंकि ऐसे परिवारों में कई असुरक्षाये मौजूद थी जैसे कि- लड़की को ज्यादा पढा दिया तो ज्यादा दहेज देना पड़ेगा, लड़की को ज्यादा पढ़ाया तो हाथ से निकल जायेगी, लड़की को पढ़ा भी लिया तो ठीक है लेकिन नॉकरी नही करने देंगे आदि। इस प्रकार पित्रसत्ता के कारण 'न्यू वुमन' के स्वप्न का पूरा होना अधूरा बना हुआ है।

3.  'न्यू वुमन' के किरदार की छवि का समाज मे नकारात्मक होना भी इसके समर्थन में कटौती करता है। ये महिलाएं कमाई से जुडी हुई है जो परिवार की आय में योगदान करती है, एवज में पारिवारिक फैसलो में भागीदारी चाहती है। यह बात पुरुषों की प्रधानता वाले परिवारों को रास नही आती है। वे मानते है कि कमाई करने के बावजूद भी महिला को अपनी परम्परागत भूमिका को नही भूलना चाहिए। इस तरह के रवैये से पति -पत्नी के बीच तनाव बढ़ रहे है जिसका परिणाम हिंसा, तलाक, दहेज उत्पीड़न, परिवारों का टूटना, एकल माता और पिताओ का बढ़ना आदि के रूप में सामने आ रहा है। इस प्रकार 'न्यू वुमन' का यह अवतार नए प्रकार के शोषण और भेदभावो का शिकार हो गया है। मतलब हको की लड़ाई एक कदम आगे बढ़ने के बजाय एक कदम पीछे खिसक गयी है।

4. 'न्यू वुमन' के किरदार द्वारा जिस प्रकार की स्वतंत्रता की बात की जाती है उसे भी समाज मे स्वीकृति नही है। ये महिलाएं कामुकता और देह पर अधिक खुले विचार रखती है, जबकि भारतीय परंपरा तो लाज, कौमार्य औऱ पतिव्रता नारी के आदर्श पर टिकी हुई है। ऐसे मूल्यों के साथ महिलाओं को ज्यादा उन्मुक्त होने की अनुमति कैसे दी जा सकती है, इसी वजह से लिपस्टिक अंडर माई बुर्का जैसी फिल्मों पर आपत्ति की गई। दीपिका पादुकोण की माई च्वाइस और अमिताभ बच्चन अभिनीत पिंक में महिलाओं के खुद के शरीर पर अधिकार का समर्थन किया गया। वे शरीर का कुछ भी दिखाए, किसी के साथ सम्बन्ध बनाये या ना बनाये, यह उनका निजी मामला है। लेकिन माना जाता है कि सामाजिक व्यवस्था में ऐसी गतिविधिया अश्लीलता को जन्म देती है, इसलिए उन पर नैतिकता थोपी जाती है। इस नैतिकता के द्वारा भी न्यू वुमन की फंतासियों की पूर्ण होने से रोका गया है। और जिन महिलाओं ने नैतिकता की परवाह किये बगैर इन स्वतंत्रताओ को पूरा करना चाहा उन्हें समाज मे सम्मान खोना पड़ा।

इस प्रकार हम देखते है कि न्यू वुमन की अवधारणा का कुछ पक्ष तो भारतीय परिद्रश्य में समर्थित है और कुछ पक्षो को अनैतिक तौर पर देखा जाता है, जिनको की पूर्ण करने लक्ष्य नही माना जाता और जो पक्ष स्वीकृत भी है उनको प्राप्त करने के लिए सभी महिलाओं को अवसर प्राप्त नही हो पा रहे है। इन्हें हम उदाहरण से समझ सकते है जैसे कि समानता के तत्व को स्वीकार करते हुए पारंपरिक भूमिकाओं में होने वाले भेदभावों को रोका गया है, हिंसाओं को प्रतिबंधित किया है, आत्मनिर्भर होने के लिए कार्यक्षेत्र को अनुकूल बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ स्वतंत्रता के अधिकार को पर्याप्त मात्रा में स्वीकार नही किया गया है, इसके प्रति आशंका है कि इससे पारिवारिक और सामाजिक संस्थाओं की नींव उखड़ जाएगी। इनके अलावा स्वीकृति प्राप्त क्षेत्रो में भी सभी महिलाओं को समान अवसर प्रदान करने की चुनोती है, गांवो में लड़कियों की गुणात्मक शिक्षा और रोजगारो तक पहुँच सुनिश्चित करना जरूरी है।

अतः हम कह सकते है कि भारत मे 'न्यू वुमन' की पूर्णता भले ही कुछ कारणों से मिथक नजर आता हो लेकिन इसके कई आयामो को हम सामाजिक स्वीकृति को भी ध्यान में रखते हुए यकायक की बजाय क्रमिक रूप से प्राप्त कर रहे है। जिससे 'न्यू वुमन' का भारतीय संस्करण विकसित होगा जिसमें पाश्चात्य मॉडल के विपरीत सम्मान का तत्व भी होगा।

Crisis faced in india-moral or economic

21वी सदी की शुरुआत से ही कहा गया कि यह भारत की सदी होगी। भारत जैसे विकासशील देश इस दौरान अपने प्राकृतिक, आर्थिक और मानव संसाधनों की बदौलत वैश्विक मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका में पहुचेंगे। यह बात लगभग दो दशकों के बाद अब सच्चाई में प्रतीत होती दिख रही है। वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व मे सर्वाधिक तेजी से वृद्धि कर रही अर्थव्यवस्थाओ में शामिल है। क्रय क्षमता के आधार पर इसका आकार तीसरे नम्बर का हो गया है। न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था बल्कि भारतीय नागरिक भी वैश्विक मंचो पर छाए हुए हैं और राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रो में शीर्ष भूमिका अदा कर रहे है। इनके अलावा भारत अपने नैतिक मानको के आधार पर भी विश्व के पथ प्रदर्शक के रूप में उभरा है। जलवायु परिवर्तन जैसे संकटो के प्रति भारत ने संयम आधारित उपाय सुझाकर अपनी नैतिक समृद्धि का परिचय दिया है। वर्तमान में तारीफ बटोरती भारतीय अर्थव्यवस्था और सदियों से प्रशंसित नैतिक मूल्यों की उपस्थिति के बावजूद भारत की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था चुनोतियों से मुक्त नही है।

भारत की मौजूदा स्थिति का मूल्यांकन करे तो पाते है कि भारत की आर्थिक प्रगति आलोचनाओ से मुक्त नही है। उसमें कई ऐसी विसंगति है जो गंभीर प्रश्न खड़े करती है, ये खामिया या तो आर्थिक संकट को दर्शा रही है या फिर बड़े संकट की तरफ बढ़ रही है। सबसे पहली बात तो यही है कि क्या तेजी से वृद्धि कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था सभी भारतीयों की प्रगति को दर्शा रही है। विभिन्न प्रकार के आकड़ो के आधार पर हम सिद्ध कर सकते है कि भारत की तथाकथित प्रगति कुछ चुनिंदा क्षेत्रों, इकाईयो और लोगों की ही प्रगति है।भारतीय जनसंख्या का एक चौथाई भाग तो सरकारी आकड़ो के अनुसार ही दैनिक तौर पर रोजी रोटी के लिए संघर्ष करता है। लोगो मे आर्थिक विषमता का स्तर काफी उच्च हो गया है।ऑक्सफेम की रिपोर्ट दर्शाती है कि 1% से भी कम लोगों ने देश के 90% से भी संसाधनों पर कब्जा कर रखा है। जनसांख्यकी लाभांश का दावा करने वाला देश रोजगार विहीन संवृद्धि (Growth) का आरोप झेल रहा है, और युवाओ की बड़ी संख्या संसाधन के बजाय बोझ में तब्दील होती जा रही है। एक प्रकार से देश समावेशी विकास का संकट देख रहा है। एक तरफ IMF और विश्व बैंक जैसी संस्थाओ की व्यवसाय के मामले में प्रसंशा बटोर रहा है वही दूसरी तरफ भुखमरी, बेरोजगारी, कुपोषण, सामाजिक कल्याण के मामलों में वैश्विक संस्थाओ की ही फटखार खा रहा है। अर्थव्यवस्था की इस दुविधा को हम नैतिक मानको में आ रही गिरावट के संदर्भ में समझ सकते है।

भारतीय संस्कृति को नैतिक मूल्यों की दृष्टि से काफी समृद्ध माना गया है। यह सर्वे भवन्तु सुखिनः और वसुधैव कुटुम्बकम जैसे समावेशी विचारो में भरोसा करती है। यह सभी को अपने समाज , परिवार और देश के प्रति दायित्व समझाती है। इन नैतिक मानको पर टिके रहने वालों को सम्मान दिया गया और विचलित होने वालों का तिरस्कार किया गया। यही कारण था कि लोगो ने नैतिक मूल्यों से प्रेरित अपने मान सम्मान के लिए बलिदान और त्याग किये। अगर इन नैतिक मूल्यों का वर्तमान में मूल्यांकन करे तो पाते है कि ये कही पीछे छूट गए है, इनको अब पिछड़ी सोच से जोड़कर देखा जाता है। वर्तमान में घोटाले करने वालो को कोई लज्जा महसूस नही होती अपितु उन्हें अपनी चालाकी पर गर्व होता है। समाज भी उन्हें तिरस्कार की दृष्टि से नही देखता है। रिश्वत देकर काम निकलवाने को लोगों ने सुगमता की कीमत से जोड़ दिया है। जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही जनता के बजाय वित्त और विजय पोषकों के प्रति हो गयी है। इन उदाहरणो से अंदाज़ा लगाया  जा सकता है कि भारतीय नैतिक मूल्यों से दूर भाग रहे है और एक तरह से नैतिक संकट की स्थिति बन रही हैं।

नैतिक मूल्यों में संकट का प्रभाव राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रो में गंभीर तौर पर देखा जा रहा है। नैतिक मूल्यों का संकट ही कई आर्थिक संकटो को जन्म दे रहा है। पूंजीवाद की तो अवधारणा ही भारतीय नैतिक मानको के पैमाने पर हमेशा से ही संदिग्ध रही है, यह सभी के समान विकास की बजाय कुछ ही लोगो के मुनाफा कमाने को जायज ठहराती है। इस वजह से संसाधनों के वितरण में विषमता उत्पन्न होती है। रिश्वत लेकर सरकारी कर्मचारियों द्वारा संसाधनों का त्रुटिपूर्ण आवंटन किया जा रहा है। अनैतिक मानदंडों के कारण वितरण की वजह से असली लाभार्थी तो वंचित ही बना हुआ है, इसी वजह से सरकार की कल्याणकारी योजनाए अप्रभावी बनी हुई है। हम जानते है कि नैतिकता को कानून और नियमो के आधार पर स्थापित किया जाता है।लेकिन कुछ लोगो के फायदों के लिए कायदे कानूनों को ही तोड़ा मरोड़ा जा रहा है। नव-उदारीकरण के चलते भारतीय नैतिक मानको को कड़ी चुनोती मिल रही हैं। अर्थव्यवस्था की प्रगति के नाम पर किसानों और श्रमिकों के सुरक्षा उपायों को ढीला किया जा रहा है। इस तरह नैतिक मूल्यों में आ रही गिरावट अर्थव्यवस्था को अमानवीय चेहरा प्रदान करके एक गंभीर समस्या उत्पन्न कर रही है।

लेकिन सम्पूर्ण दोष नैतिक मूल्यों में गिरावट पर थोपना भी सही नही है। भारत को गरीबी, अकाल, भुखमरी, बेरोजगारी, ऋणग्रस्तता जैसी समस्या तो आज़ादी के बाद विरासत में प्राप्त हुई है, न कि भारतीयों के नैतिक पतन के कारण उत्पन्न हुई है। उल्टा भारतीयों ने तो लोकतांत्रिक नीति निर्माण के माध्यम से इन समस्याओं की भयानकता को कम किया है। विरासत में मिली आर्थिक परेशानियों को दूर करने में भारतीय संसाधन प्रर्याप्त नही पड़ रहे थे। भारतीय संसाधनों के बल पर विकास करने में समय लग रहा था। इस चीज ने लोगों को भौतिक संसाधन जुटाने हेतु शॉर्टकट रास्ते अपनाने को प्रेरित किया और परिणामस्वरूप नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ।

इस प्रकार हम देख चुके है कि नैतिक संकट के कारण आर्थिक संकट को बल मिलता है वही आर्थिक संकट के कारण नैतिक संकट को बल मिलता है। इस प्रकार दोनो समस्याओ को पृथक -पृथक करके नही देख सकते, इनकी उपस्थिति को एक साथ ही देखा जाना चाहिए।

अगर भारत के संदर्भ में मौजूदा स्थिति पर गौर करे तो हम देखते है कि भारत में अर्थव्यवस्था को मानवीय चेहरा देने पर हमेशा जोर दिए जाने के कारण संकट जैसी स्थिति को हम टालते रहे है। उसी प्रकार नैतिक मूल्यों से अभी भी अधिकांश लोग जुड़े हुए है, इस कारण नैतिक संकट जैसी स्थिति कहना भी सही नही है।अगर भारत मे कुछ गड़बड़ है तो उसे संकट की बजाय समस्या ही कहना चाहिये। भारतीयों ने इन समस्याओं के आगे आत्मसमर्पण नही किया, इसलिए भी समस्याओ को संकट कहना सही नही है। भारतीय निरंतर प्रयासों से इन समस्याओं को दूर करने में लगे हुए है।

सीमांत किसानों का दर्द

सीमांत किसानों की संख्या भारत मे सर्वाधिक हो गयी है, जैसे जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी तो जमीने भी बढ़ती चली गयी। जोतो की संख्या इतनी बढ़ गयी कि उनका आकार आजीविका के स्तर तक सिमट कर रह गया। लोगो की परेशानी तब और बढ़ गयी जब ये जोते बिखरी हुई है। ऐसे में इनके लिए न तो मशीनरी की व्यवस्था कर सकते और न ही सिंचाई हेतु कोई बड़ा निवेश कर सकते हैं। इससे उत्पादन में वृद्धि के अवसर भी चले जाते है। इन किसानों को उत्पादन के तौर पर निवेश और लागत को हटाने के बाद केवल खाने के लिए अनाज ही शेष बचता है। अतिरिक्त उपज होने की सम्भावना नगण्य होती है। ऐसे में कृषि से इतर गतिविधियों के संचालन के लिए ऋण की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है।

वर्तमान में कृषि की लागत बढ़ती जा रही है। अब खेती में प्रयुक्त होने वाले खाद बीजो का भाव काफी बढ़ गया है, ट्रैक्टरों से जुताई महंगी हो गयी है, बैल आधारित जुताई को कब का छोड़ा जा चुका है, सिंचाई के लिए भी पानी की उपलब्धता काफी महंगी है, इसके अतिरिक्त अन्य कार्यो में भी काफी महंगा निवेश होता है। इन सबके लिए किसानों को ऋण-फसल चक्र से जुड़ना पड़ता है। वर्तमान में महँगाई, सामाजिक और पारिवारिक खर्चो के बोझ तथा मानसून ने ऋण-फसल चक्र को चुनोती देकर सीमांत किसानों को और अधिक परेशानी में डाल दिया है।

सीमांत किसानों की पहचान वैसे तो किसानों के रूप में है लेकिन इन्हें भूमि युक्त मजदूरों के समान माना जा सकता है। क्योंकि इनके जीवन मे आजीविका को लेकर असुरक्षा काफी ज्यादा होती है। ये अपनी छोटी से भूमि में कामकाजों को जल्दी से निपटा लेते है उसके बाद तो बड़े किसानों के यहाँ मजदूरी करने को लेकर तैयार रहते है। अपनी भूमि से खाद्यान्न प्राप्ति के अलावा आय न हो तो यह एक विकट संकट की स्थिति बन जाती है।

सीमांतपने के दर्द से मुक्त होने के लिए अलग रोजगार अपनाने की आवश्यकता है, इसके अलावा अपने बच्चों के कॅरिअर पर भी ध्यान देने की जरूरत हैं। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि सीमांत किसानों के लिए वैकल्पिक साधन भी बड़े निवेश की आवश्यकता रखते है और अंततः कठिन विकल्प प्रतीत होते है। ऐसे किसानों को ये आकर्षित नही कर पाते है।
इनकी बेहतरी के लिए आवश्यक है कि इनको मिलने वाले सरकारी फायदों को लक्षित किया जाए, कर्जो को असंस्थागत स्त्रोतों से हटाया जाए, सामाजिक आयोजनों के खर्चो को हतोत्साहित किया जाए।ऐसा करके ही ग्रामीण समाज को अधिक समावेशी स्वरूप दिया जा सकता है।

नव उदारवाद काल में गाँव

नव-उदारवाद के दौर में गाँवो ने सरकार को एक प्रकार की उलझन में शुरू से ही डाले रखा, एक तरफ तो सरकार तेजी से विकास के सपने संजोये मार्केट के साथ चलना चाहती थी वही दूसरी तरफ कल्याकारी राज्य के टैग को बचाना चाहती हैं। जहां मार्केट के साथ आगे बढ़ने से कई समस्याओ के समाधान की संभावना थी, वही गाँवो को इसके  तैयार करने की भी जरुरत थी। गाँवो को नव-उदारवादी मैराथन में दौड़ाने के लिए विशेष सुविधा दिए जाने की जरुरत भी थी। भारत में स्वतंत्रता के बाद इस चीज को समझते हुए बाजार को नियंत्रित कार्यक्षेत्र ही प्रदान किया गया था।

1991 के बाद भारत में आर्थिक सुधारो के साथ बाजार को आज़ादी देने के वो प्रयास होने लगे जिनकी विश्व जनमत की तरफ से भी मांग हो रही थी। इस पहल  को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा था जिनमे आईएमएफ, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और कई अन्य मंचो के द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा था। ये संस्थान वित्तीय और तकनिकी सहायताओ के बदले देशो की संप्रभुता से आगे बढ़कर कानूनी और संरचनात्मक सुधारो के लिए मजबूर कर रहे हैं। ऐसे सरकारी विनियमो को तोडा और मरोड़ा जा रहा हैं जो मुनाफे को नुकसान पहुंचाए। सार्वजनिक संसाधनों की अवधारणा अब ख़त्म हो चुकी हैं और सरकार उन पर से अपना नियंत्रण हटाकर उन्हें निजी क्षेत्रो में भेज रही हैं। सामाजिक सेवाओ में  भी अब मुनाफा नजर आने लगा हैं और सरकार वहां से अपनी भूमिका को सीमित करके उनमे निजी क्षेत्रो को प्रवेश दे रही हैं। ये सब चल रहा हैं व्यापार करने में सुविधा के लिए अपनी स्थिति सुधारने के नाम पर।


सामाजिक सेवाओ में सरकार जो सुविधा उपलब्ध करा रही थी वे अपनी अकुशलता के कारण तो पहले ही कारगर नहीं थी। अब सरकार उनसे पलायनवादी रुख अपना कर लोगो को मुनाफा आधारित निकायों के भरोसे छोड़ने की नीति अपना रही हैं। जहां पहले शिक्षा और स्वास्थय जैसी चीजे पहले सरकार उपलब्ध करा देती थी अब ये ही सुविधा निजी क्षेत्र के अधीन मिल रही हैं। यह बात सही भी बैठती हैं की इस से  सेवा प्रदायगी में गुणवत्ता और दक्षता आयी है। लेकिन इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि इन सुविधाओ तक पहुँच क्या सभी लोगो की हैं। खासकर यह समस्या ग्रामीणों को ज्यादा उठानी पड़ रही हैं क्योंकि उनमे से ही अधिकांश निम्न आय के कारण इन तक पहुँच नहीं रखते हैं। जब ये  सुविधा सरकार उपलब्ध  कराती हैं तो उन से  गरीब और वंचित लोगो  के लाभान्वित होने की उम्मीद ज्यादा रहती हैं। अब नव-उदारवादी नीति का अनुसरण   करके सरकार इन क्षेत्रो से वापस होती हैं तो शोषण करने वाली शक्तिया ही विकल्प के रूप में रह जायेगी।


सार्वजनिक संसाधनों की अवधारणा से जो नाता तोडा जा रहा हैं उसका सर्वाधिक असर गाँवो को ही उठाना पड़  रहा हैं क्योंकि वे अभी भी उन से लाभान्वित हो रहे हैं या फिर उनसे जुड़े हुए हैं। जो प्राकृतिक संसाधन पहले समुदाय के नियंत्रण में थे वे अब या तो निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहित किये जा चुके हैं या  फिर उनसे लोगो को वंचित किया जा चूका हैं।

नव उदारवाद से गाँवो के मुलभुत हितो पर चोट पहुंची हैं इसके साथ ही गाँवो में रहने वालो के हित भी बुरी तरीके से प्रभावित हो रहे हैं। समावेशी विकास की मुहीम भी इससे  बुरी तरीके से प्रभावित हो रही हैं इसी चीज ने पापुलिज्म जैसी चीजो को जन्म दिया।