कोरोना संकट से निपटने के लिए पुलिस राज्य पर भरोसा कितना पर्याप्त हैं?

कभी किसी ने सोचा भी नही होगा कि मानव सभ्यता अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इस तरह असहाय नजर आएगी। अब तक केवल परमाणु हमले, खगोलीय पिंड की टक्कर और जलवायु परिवर्तन के खतरों को ही सभ्यता के विनाशकारी कारक के तौर पर देखा जा रहा था। परंतु कोरोना वायरस से उपजे संकट ने दर्शा दिया हैं कि मानव सभ्यता के सामने चुनौतियां अनिश्चित हैं, इसलिए जरुरी नही की उनके विरुद्ध प्रतिक्रिया के लिए  समाधान भी पहले से ही तैयार मिले। उनके लिए उसी समय पर तत्कालीन उपायों की जरुरत पड़ सकती हैं। कई बार सटीक उपाय मिल जाते हैं या वैकल्पिक उपायों से काम चल जाता हैं, जैसे कि-जयपुर में एक कोरोना रोगी को एड्स की दवा से ठीक कर दिया गया। लेकिन सरकारों के पास समस्या से निपटने का एक लोकप्रिय तरीका और भी हैं, और वो हैं पुलिस राज्य।

जब भारत को महसूस हो गया कि कोरोना ने दरवाजे पर शानदार तरीके से दस्तक दे दी हैं। एयरपोर्ट्स पर सतर्कता के माध्यम से, जिस तरह भारत ने इबोला और जिका जैसे वायरसों पर नियंत्रण किया था, वो रणनीति अब यहाँ पर्याप्त नही हैं। अब अंदर की तरफ सक्रीय प्रयास करने की जरुरत हैं। तब भारत ने राष्ट्रव्यापी जनता कर्फ्यू का ट्रायल किया। उसके बाद, कोरोना के संक्रमण को आगे प्रसारित होने से रोकने के लिए 25 मार्च से 21दिन के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई। इसी के साथ सभी आवागमन के साधनों को बंद कर दिया गया। उत्पादन में लगी सभी इकाइयां बंद हो गई। ऐसे समय में विशेषकर प्रवासी लोगोमे बेचैनी बढ़ गई। लोग अपने घरों को जाने के लिए उतावले नजर आए। लोगों की आवाजाही को देखते हुए, तब इसको उचित क्रियान्वयन के लिए कर्फ्यू में परिवर्तित किया गया।

इसी के साथ ही ऐसा लगने लगा कि वेलफेयर स्टेट ने हार मान ली हैं और उसकी असमर्थताओं को दूर करने के लिए राज्य ने पुलिस राज्य को अपना लिया हैं। लोगो की भयंकर पिटाई के विडियो देखकर लगने लगा कि अब तो सिर्फ पुलिस स्टेट ही कोरोना से निपटने में राज्य की मदद कर पाएगा। यही से अब हम विभिन्न पहलुओं पर विश्लेषण करेंगे :

1. कल्याणकारी राज्य की विफलता एवं पुलिस राज्य पर भरोसा

कोरोना संकट से निपटने में कल्याणकारी राज्य की विफलता से बचना आसान नही हैं, क्योंकि इस तरह के संकट से निपटने के लिए राज्यों की तैयारियों में कई प्रकार की खामियां थी, जैसे कि :
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने COVID-19 को वैश्विक महामारी घोषित किया था और सभी राज्यों को इसकी भयावहता के बारे में आगाह किया था। लेकिन सभी राज्यों ने इसकी उपेक्षा की, किसी ने भी इसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता नही समझी।
  • सरकार ने इसको क्षेत्रीय संकट मानने को तवज्जो दी और इस भरोसे में रहे कि जिस तरह जिका, इबोला जैसे संकटों से हम बच गये थे, उसी प्रकार इसको भी संभाल लेंगे।
  • स्वास्थ्य आपातकालीन परिस्थितयों को लेकर पर्याप्त तैयारीयों का अभाव हैं। एपिडेमिक एक्ट मोजूद हैं, लेकिन उन्हें जनसंख्या वृद्धि और सघन आवास, यातायात के तीव्र एवं भीड़ भाड़ युक्त साधन आदि के सन्दर्भ में अद्यतन नही किया गया हैं।
  • संकट से निपटने के लिए मानक परिचालन प्रक्रिया (SOP) का अभाव हैं।
  • स्वास्थ्य अवसंरचना अपर्याप्त और अदक्ष हैं। संसाधनों का गंभीर अभाव हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं का वितरण भी विषमतापूर्ण हैं।
  • स्वास्थ्य को आवंटित होने वाले बजट का हिस्सा जीडीपी का अति अल्प हैं।     
हालांकि ऐसा कहा जा सकता हैं कि वेलफेयर स्टेट विफल नहीं हुआ हैं बल्कि उसे कुछ चुनौतियां मिली हैं। और चुनौतियां किसी भी व्यवस्था के समक्ष आ सकती हैं, इसलिए यह नही कहा जा सकता कि वेलफेयर स्टेट विफल हो गया हैं और वह पुलिस स्टेट की शरण में चला गया हैं। हकीकत में पुलिस स्टेट वेलफेयर स्टेट की ही मदद का कार्य कर रहा हैं। अभी भी समस्या से निपटने के लिए असली भरोसा वेलफेयर स्टेट पर ही हैं, अभी भी मेडिकल सुविधाओं को ही प्राथमिकता देकर समस्या से निपटने के प्रयास किए जा रहे हैं। पुलिस स्टेट की भूमिका तो इतनी हैं कि वेलफेयर स्टेट के प्रयासों मे बाधा नही आए और उसे समस्या से निकलने के लिए ज्यादा संघर्ष नही करना पड़े।

इस बात से सहमत हुआ जा सकता हैं कि राज्य का अंतिम भरोसा अभी भी कल्याणकारी राज्य के माध्यम से संकट समाधान पर ही हैं। लेकिन सवाल वहां से उठना आरंभ हुआ, जब पुलिस की भूमिका नागरिकों के प्रति असंवेदनशील हो गई तो लोगो ने यह पूछना आरंभ कर दिया कि क्या अब संकट से बाहर पुलिस स्टेट की मदद से ही आ पाएंगे, कोरोना अब केवल लाठीचार्ज और कर्फ्यू की मदद से ही रुक पाएगा।

2. नागरिकों के साथ पुलिस का असंवेदनशील व्यवहार किस उद्देश्य की प्राप्त कर रहा हैं?

लोगों ने पहले कोरोना को लेकर जोक्स और मिम्स बनाये और लॉक डाउन की घोषणा के बाद पुलिस के हाथों हुई पिटाई के। राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू में पुलिस का व्यवहार किस प्रकार असंवेदनशील हो सकता हैं, इसको दर्शाने वाले हजारों विडियो सोशल मीडिया पर अपलोड हुए।
  1. लॉक डाउन के कारण आर्थिक गतिविधियाँ बंद हो जाने से कई प्रवासी लोग बड़े-बड़े शहरों में फंस गये, वहां से वापस निकलने के लिए उनके द्वारा अपने मूल स्थानों की तरफ लंबी और पैदल या साइकिल पर यात्रा की गई। पुलिस ने ऐसे लोगों को दोड़ाया, लेटकर, रेंगकर, पलटी मारकर चलने के लिए मजबूर किया।
  2. जरुरी सामानों को लेकर बाहर निकलने वाले लोगों पर अत्यधिक लाठीचार्ज किया गया। घर में रहने का संदेश देने के लिए एक या दो लाठी काफी थी, लेकिन एक ही जने को दस से पन्द्रह तक लाठी मारी गई। कोलकाता में एक जने की मृत्यु पुलिस के लाठीचार्ज से हुई।
  3. पुलिस द्वारा लाठी मारने के लिए सभी सीमाओं को तोडा गया। गाँव में एकेले-दोक्ले मिले लोगो को पकड़ा गया। यहाँ तक कि एक जने को घर से निकालकर तक पिटा गया। घरों और बाड़ों में छापा मारा गया।
  4. पुलिस के अतिचारों के खिलाफ हुई प्रतिक्रियाओं को पुलिस ने अपने अहम् से जोड़कर देखा और फिर अत्यधिक बल का प्रयोग करके उनको सबक सिखाने के लिए अत्यधिक जुल्म किए।
  5. पुरुष सिपाहियों द्वारा महिलाओं और बच्चों पर लाठीचार्ज किया गया। एक बारह साल के लड़के को दस-बारह लाठी मारी गई।
  6. लोगो को आजीविका के साधनों को नष्ट कर दिया गया। दिल्ली में एक सिपाही ने सब्जी की रेहड़ियों को पलट दिया।
इस तरह के अंसख्य विडियो हैं, जो आपको इन्टरनेट पर मिल जाएंगे। सवाल उठता हैं कि पुलिस आखिर किस उद्देश्य की प्राप्ति कर रही हैं। क्या उसे अपने इस लाठी चलाने के अधिकार के लिए अपने कर्तव्य पता हैं। लाठी खाने के बाद उस युवक का क्या हुआ, क्या वह मर गया या जिन्दा हैं, क्या उसके हाथ-पैर टूट गये, इस बारे में पता हैं उनको?  अगर लाठी मारने के बाद उस युवक द्वारा की गई प्रतिक्रिया से आपको क्षति पहुंचती हैं तो आप शहीद-शहीद चिल्लाना शुरू कर देते हो। दुनियाभर की सहानुभूति बंटोरने लग जाते हो। क्या आपके मन में इसी तरह की सहानुभूति पीटने वाले लोगो के प्रति भी हैं। जो राज्य की विफलता की मार खा रहे हैं। एक असंवेदनशील पेशे के लिए कितनी सहानुभूति बंटोरोगे। साथ ही यह भी हैं कि हम मुश्किल वक्त में भी तुम्हारे लिए खड़े होते हैं। इस तरह के बिना वेशभूषा के बहुत सारे पेशे हैं, जो लोगो के लिए बलिदान देते हैं और उसका ढिंढोरा नहीं पिटते। सभी पेशे दूसरों के लिए ही होते हैं। इससे उस सवाल पर प्रशं उठता हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में इतना असंतुलन क्यों हैं।

3. राज्य एवं नागरिकों के मध्य निम्नीकृत संबन्ध : मौजूदा या पूर्व-प्रचलित ? 

कुछ लोगो का मानना हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में पुलिस राज्य की तिलांजलि कभी दी ही नही गई हैं, कल्याणकारी राज्य को अपनाया तो गया हैं लेकिन उसे पुलिस राज्य को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से नही अपनाया गया हैं, उसके लिए राज्य की अपनी मजबूरियां हैं। पुलिस राज्य हमेशा की तरह बना रहा हैं। एक राज्य को हमेशा अपने नागरिकों की चुनौतियां का खतरा रहता हैं। पुलिस राज्य की संप्रभुत्ता को स्थापित करने में राज्य की आंतरिक स्तर पर मदद करती हैं, वह लोगो को उनकी अधीनता का अहसास समय-समय पर करवाती रहती हैं।

दरअसल सभी राज्यों ने अपनी प्रजा की भलाई के लिए कल्याणकारी मॉडल को अपना लिया हैं। इससे लोगों की भूमिका राज्य पर आश्रित की हो गई हैं। आश्रित लोगो को चीजे उपलब्ध करवाने में उच्च निकाय के पास हमेशा अपनी संप्रभुत्ता रहती हैं। लोगो की बगावत की संभावना हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं। अगर फिर भी गुंजाईश रहती हैं तो पुलिस के माध्यम से अपनी सुरक्षा करने में सफल रहता हैं। वैसे भी लोकतंत्र ने चुनौती की मंजिल राज्य से परिवर्तित करके राजनीतिक दलों को कर दिया हैं।

हम कह सकते हैं कि कल्याणकारी राज्य का मतलब राज्य द्वारा न तो पुलिस में कटौती से हैं और न ही उसके विस्तार को रोकने से हैं। हमारी आदत हो गई हैं कि हम दो विपरीत या प्रतिद्वंदी चीजों में से किसी स्थान विशेष पर एक की ही उपस्थिति को देखते हैं। दोनों भी साथ-साथ और एक दुसरे के पूरक के रूप में हो सकती हैं।       

इस प्रकार हम देखते हैं कि नागरिकों और राज्य के मध्य संबंधों में यह निम्नीकरण मोजुदा नही हैं, यह पूर्व में प्रचलित ही हैं। हालांकि उसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट नही होती हैं। मानव अधिकारों जैसी सीमाएं उन पर आरोपित रहती हैं।

 4. क्या यह निम्नीकरण मूल अधिकारों से संबंधित सुरक्षा उपायों का खोखलापन दर्शाता हैं? 

सड़क पर चल रहे आदमी के क्या मूल अधिकार हैं। अगर वह किसी साधन पर हैं तो पुलिस उसे किसी न किसी जुर्म में फंसा ही सकती हैं या फिर किसी भी जुर्म के शक में जितनी मर्जी हो उतने डंडे मार ही सकती हैं। डंडे मारने के लिए किसी जुर्म का होना जरुरी थोड़े ही हैं। आदमी कानून व्यवस्था को बनाए रखने में बाधक बन रहा था या फिर सहयोग नही कर रहा था, इस तरह की शब्दावली के माध्यम से पुलिस अपने गंभीर कृत्य को धक् ही देती हैं। डंडे मारना तो बहुत छोटी बात हैं, लोगो की पुलिस कस्टडी में हत्या तक हो जाती हैं। उन पर कोई प्रगति नही होती, जिनमे दोषियों को सजा मिल सके। इसलिए विशेषकर डंडे मारने के बारे में मूल अधिकारों की सीमाएं तो स्पष्ट हैं।

लेकिन कई बार हम देखते हैं कि पुलिस कार्यवाही में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती हैं या पुलिस द्वारा मानवीय गरिमा के विपरित कार्य किए जाते हैं और उनकी व्यापक आलोचना होती हैं या फिर पुलिस को ही छवि खराब होने का अंदेशा रहता हैं तो उन पर कार्यवाही होती हैं। इसलिए बात यह हैं कि आपको खुद सजग बनना होगा और मार खाने की बजाय सवाल करना होगा। वरना सुरक्षा उपायों के साथ-साथ आपका भी खोखलापन सामने आ जाएगा। 

5. अपने अधिकारों की बहाली या उत्थान के लिए, क्या  लोग आगे प्रयास करेंगे ?

जिस तरह लॉक डाउन में लोगो ने गांधीवादी तरीके से लाठी खाई हैं, उससे तो नही लगता कि लोग आगे भी इस तरह की असंवेदनशीलता के प्रति आवाज उठाएंगे। यह कोई प्रथम मौका नही हैं, ऐसी घटनाए क्षेत्रीय स्तरों पर होती रहती हैं और इस पर कोई प्रतिक्रिया नही आती हैं। दूसरी तरफ पुलिस के साथ-साथ लोगो की भी संवेदना मरती जा रही हैं, जो मार खाते लोगो के वीडियोज बना रहे हैं और उन पर जोक्स बना रहे हैं। इसलिए लोग भी खुश हैं कि हम तो बच गये, वो फंस गया, इसी में ख़ुशी हैं। इसलिए इन संबंधों में परिवर्तन के लिए प्रयास की बात असंभव सी हैं।

निष्कर्ष        

पुलिस में संवेदनशीलता के गुणों के विकास पर विशेष कार्य करने की जरुरत हैं। जरुरतमंद लोगो की मांग को पुलिस कर्मी खुद समझे, इस तरह के मूल्यों को विकसित करने की आवश्यकता हैं। इसी संकट में कुछ ऐसे पुलिस कर्मियों के भी विडियो सामने आये, जिन्होंने लोगों की मदद की और उन्हें सयंमित होकर प्यार से समझाया। लेकिन यह अपवाद न होकर सामान्य विशेषता होनी चाहिए। लॉकडाउन के आरंभिक चरण में ही पुलिस कर्मियों द्वारा अनियंत्रित पीटना दर्शाता हैं कि उनके पेशेवर मूल्यों में गंभीर खामियां हैं। यह कहने के लिए कि आपको घर से बाहर नही निकलना हैं, क्या पुलिस द्वारा तब तक पीटना चाहिए, जब तक वह आदमी उनकी पहुँच में हो। इस तरह की पिटाई तो बार-बार उल्लंघन की दशा में ही कुछ हद तक न्यायोचित ठहराई जा सकती हैं। इसलिए पुलिस में शामिल करने वाले लोगो में विवेक को भी समान रूप से महत्त्व दिए जाने की आवश्यकता हैं। इसी तरह की पुलिस व्यवस्था कल्याणकारी राज्य का अंग मानी जा सकती हैं।

दूसरी बात इस संकट से निपटने में पुलिस स्टेट की भूमिका कुछ भी नही हो सकती, लोगों को घरों में खदेड़ने के अलावा। इसलिए कल्याणकारी राज्य को ही अपनी खामियों पर विचार करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से दूर करना चाहिए ।

विरोधाभासी हितों की जकड़न में रणथंभौर

Ranthambore tiger, territorial conflict among tigers
बाघों के प्राकृतिक परिवेश में विचरण करते देखने की चाह लेकर आने वाले वाले देशी-विदेशी पर्यटकों ने रणथंभौर को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट जगह दी हैं। रणथंभौर को बाघ आरक्षित क्षेत्र घोषित करके उनके संरक्षण को विधायी रूप से सुनिश्चित किया गया हैं। पर्यटन से जुडी गतिविधियाँ यहाँ पर तेजी से फलफूल रही हैं। लेकिन इन्ही के समानांतर रणथंभौर में इस समय कई प्रकार के द्वन्द मौजूद है। जो स्थानीय लोगो को दैनिक रूप से प्रतिकूल रूप से प्रभावित  कर रहे है। इस आलेख में  हम उन द्वंदों की पहचान कर रहे हैं, हालाँकि स्थानीय लोगो को इन द्वंदों के बारे में जागरूक करना भी समान रूप से चुनौतीपूर्ण है। इन द्वंदों का संतुलित विश्लेषण करने के लिए आवश्यक हैं कि द्वंद में मौजूद कमजोर पक्ष अपने उपेक्षित होते हितो की पहचान करे। ऐसी स्थिति में ही संबंधित प्राधिकारियों को उनके हितो के लिए उपाय करने हेतु तैयार किया जा सकता हैं। रणथंभौर में विरोधाभासी हितो की इस पहेली में कई हितधारक हैं, जिनमे सरकार, पर्यटन उद्योग, पर्यावरणवादीयों के साथ-साथ स्थानीय समुदाय प्रमुख हैं। इनमे सबसे कमजोर हितधारक स्थानीय समुदाय हैं, जिनके हितो की पहचान, जागरूकता और संरक्षण की आवश्यकता हैं। इस आलेख में स्थानीय समुदाय को विशिष्ट रूप से ध्यान में रखते हुए द्वंदों की पड़ताल की गई हैं। 

एक ऐसी स्थिति याद आ रही हैं जिसमें लोगो के मन में असंतोष तो हैं कि जो भी हो रहा हैं, वो उनके हितो के अनुकूल नही हैं। लेकिन उन्हें पता नही हैं कि उनके हित क्या हैं और क्या वे किसी प्रकार का कोई नैतिक या न्यायिक आधार रखते भी हैं या नही। कोई न तो उनके हितो की वकालात करता और न ही कोई उनके प्रति सहानुभूति दर्शाता हैं, इससे ऐसा भी लगता हैं कि हो सकता हैं वो ही गलत हो। इस प्रकार यह अज्ञानतापूर्ण अपराधबोध ही उन्हें सुभेद्य स्थिति में ले जाने के लिए उत्तरदायी हैं। यह एक तरीके से औपनिवेशिक स्थिति के समकक्ष हैं, उसकी आहट हैं।     

जिस तरह दादाभाई नौरोजी ने औपनिवेशिक व्यवस्था के आर्थिक प्रभावों की पहचान की और उनके खिलाफ आवाज उठाई। भले ही उसका अंग्रेजों पर तत्काल कोई असर नही हुआ हो,परन्तु वे द्वंद को उजागर करने में कामयाब हुए थे। इसलिए हमे भी दादाभाई नैरोजी के समान अपनी बात को कहने से नहीं चूकना चाहिए, इस भरोसे में नहीं रहे कि कोई सुनने वाला तो है ही नहीं, हम बोलकर क्या करेंगे। हो सकता है लोग एक शुरुआत का इंतजार कर रहे हो।

मौजूदा द्वन्द निम्न प्रकार के है -
1.  वन्य जीव -मानव संघर्ष
2.  बाघ-बाघ संघर्ष
3.  स्थानीय लोग -वन प्रशासन टकराव
4 . लोग आपसी टकराव
5.  व्यावसायिक समूहो के संघर्ष

चलो अब हम इन संघर्षो का विस्तृत खाका खींचने की कोशिश करते है -

1. TIGER- TIGER CONFLICT

रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान लम्बे समय से बाघों का प्राकृतिक आवास रहा है। प्रोजेक्ट टाइगर के द्वारा मिले संरक्षण के माध्यम से न केवल अपना अस्तित्व बनाये रखा है, बल्कि बाघों के जनसंख्या आधिक्य से जुडी समस्याए उत्पन्न भी हुई है। जंगल में बाघों के इलाको में टकराव के कारण आपसी संघर्ष हुए है। जंगल पर इनकी बढ़ती हुई संख्या के दबाव से इन्होने वन क्षेत्र के बाहर भी मूवमेंट शो किया है।

2. TIGER- LOCAL PEOPLE CONFLICT

आबादी क्षेत्रो में बाघों के प्रवेश ने लोगो में आक्रोश को उतपन्न किया है। इन बाघों ने आबादी क्षेत्रो में जाकर मवेशियों और यहां तक की मानव तक का शिकार किया है। इनके खौप के कारण लोग रात में फसलों की सिंचाई और रखवाली तक को नहीं जाते है। जिसके कारण उनकी फसल को रात्रि में आवारा पशुओ का जोखिम रहता है। रात्रि में विधुत का फीडर होने की वजह से उसे खली छोड़ना पड़ता है। इस वजह से आक्रोश के लपेटे में विद्युत विभाग भी आ जाता है।
बाघों की वजह से जंगल में लोगो की गतिविधियों को पहले ही प्रतिबंधित किया जा चूका है। इसकी वजह से वे दैनिक उपयोग के वनोत्पाद को प्राप्त नहीं कर सकते है। उनके पशुओ को चराने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। गाँवो में चरागाहों पर अतिक्रमण की स्थिति उत्पन्न होने से अब किसानो के लिए पशुओ को रखना मुश्किल हो गया है। इस प्रकार इसने आजीविका को भी बुरी तरिके से प्रभावित किया है।

3.  GOVT- PEOPLE CONFLICT

एक तरफ लोगो का प्रवेश हतोत्सहित कर दिया गया है , वही दूसरी तरफ पर्यटन गतिविधियों का संचालन लोगो के मन में संशय उत्पन्न करता है कि उन्हें उनके संसाधनों से वंचित किया जा रहा है। क्योकि कई गाँवो को इसके सीमा क्षेत्र से विस्थापित कर दिया गया है, जिनका पुनर्वास ने न केवल विस्थापित लोगो बल्कि अन्य लोगो के मन में भी आक्रोश उत्पन्न किया। क्योकि उन्हें नई  जगहों पर बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा।  अब जो गांव बफर एरिया में स्थित है उन पर भी कई तरह के अंकुश थोपे जाते है। जिसके कारण उनमे भी गुस्सा है। इन अंकुशों पर प्रतिक्रिया का उदाहरण उलियाना गांव में सामने आ चूका है। पडोसी गांव के लोगो ने दिवार को समय समय पर तोड़कर बताया है कि वे सरकार के वनो से पृथक करने के फैसले से खुश नहीं है।

4 PEOPLE-PEOPLE CONFLICT

 सरकारी अंकुशों के बावजूद अपनी गतिविधियों को जारी रखने के लिए लोगो ने अवैध तरीको को अख्तियार किया है। जिसकी वजह से स्वयं लोगो को ही परेशानी का सामना करना पड़ा है। जैसे कि - पहाड़ो से पत्थर लाने पर रोक के कारण अवैध खनन करने वाली सरपट दौड़ती ट्रेक्टर-ट्रॉलियों ने कई लोगो को कुचला है ,जिससे खुद ग्राम वाले ही इनका विरोध कर रहे है। दूसरा उदाहरण यह है कि वनो व चरागाहों तक पहुंच के आभाव में पशुपालको के जानवर खेतो में पहुंच जाते है, जिससे ग्रामीणों के बीच आपसी तनाव उत्पन्न हो जाता है। इस  प्रकार से चीजे आपसी तनाव को बढ़ावा दे रही है।

5. CONFLICT FROM BUSINESS

वही लोगो को एक तरफ तो घरो के लिए पत्थरो आदि की जरूरत पड़ती है, वही दूसरी तरफ सरकार इस पर प्रतिबंध लगाकर इस मसले को उलझा देती है। वही कुछ व्यवसायियों को वनो में गतिविधियों का संचालन की अनुमति देती है। जिससे यह साबित होता है कि नियम कायदे केवल गरीबो के लिए है। पैसे वाले के लिए कोई नियम कानून नहीं है।

6. CONFLICT BY ENVIRONMENT

रणथम्भौर के पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर इस क्षेत्र में कोई बड़ी औधोगिक इकाई यहाँ पर लग नहीं पाई है। इसकी वजह से क्षेत्र में काफी ज्यादा बेरोजगारी पाई जाती है। पर्यटन की वजह से भी पर्याप्त रोजगार उत्पन्न नहीं हुए है।

7. OTHER ISSUES

इसके अलावा रणथम्भौर एक ऐतिहासिक स्थल रहा है ,जिसका महत्व वर्तमान में गौण हो गया है। उसके ऐतिहासिक महत्व के आधार पर इसकी प्रासंगिकता पर विचार करना चाहिए , न की सवाई माधोपुर की स्थापना की छाया में उसे दबाना चाहिए।

खंड II
कभी भी ऐसा नहीं होना चाहिए कि भौगोलिक विशेषताएं स्थानीय लोगो को फायदा नहीं पहुचाये, उल्टा उन्हें परेशानी में डाले और फायदे बाहर के लोगो को मिले। लोगो में अपने स्थान को लेकर स्वाभिमान की भावना उत्पन्न करने के प्रयास किए जाने चाहिए। रणथम्भोर से जुड़े इसी प्रकार के मुद्दों को हम इस रिपोर्ट में कवर करने की कोशिश करेंगे, ताकि हम उन से जुड़े समाधानों की तलाश कर सके। लोगो में यह भाव रहना चाहिए कि प्राकृतिक संस्धानों पर उनके परम्परागत अधिकार कायम है। रणथम्भौर में लोगो की समस्याओं के समाधान की असीम क्षमता है, जिसे प्रयुक्त  करने की आवश्यकता है। रणथम्भौर लोगो के जीवन में सकारत्मक भूमिका निभाएगा। इस भावना के साथ हम इस मुद्दे पर आगे बढ़ते है।

अब बात करते है समाधानों की। तो इसके लिए सभी हितधारकों की  चिंताओं का समाधान जरुरी है। जिसे पृथक-पृथक रूप से सम्बोधित किया जा सकता है -
  1. ग्रामीण फोरम
     
    वन क्षेत्र के पडोसी गांव  के लोगो की एक फोरम बनाई जानी चाहिए , जिसे स्थानीय वन चौकी से जोड़ा जाए। जिसमे वन विभाग ग्रामीणों की अपेक्षाओं का ध्यान रखे। वही ग्रामीण वन कानूनों के प्रवर्तन में सहयोग करे। इससे दोनों पक्षों के बीच सुचना अंतराल उत्पन्न नहीं होगा और किसी प्रकार के अविश्वास  उत्पन्न नहीं होगी। वही मांगो और अपेक्षाओं पर तात्कालिक कार्रवाही सम्भव होगी। 
  2. वन्य जीवो का दूसरे जगहों पर स्थानांतरण किया जाए।  वन क्षेत्रो में दूसरे जीवो की संख्या बधाई जाए। पर्यटन  के द्वारा वन क्षेत्र को इतना अशांत नहीं बनाया जाए कि बाघ जंगल से निकलकर आबादी भूमि में पहुंच जाए। 
इस प्रकार हम रणथम्भौर से जुडी प्रतिकुलताओ को  अवसरों में बदल सकते है।

खंड III
रणथम्भौर में पर्यटन से जुड़े अवसरों को संवर्धित करने की आवश्यकता है। यहां  शूटिंग की भी अपार संभावनाए है।

निष्कर्ष :
Those who forget geography can never defeat it  वाली बात यहां पर सही साबित हो जाती है। इसलिए हमे भूगोल को काबू में करने की जरुरत है।

रणथंभौर में बाघ: आशीर्वाद या अभिशाप

बाघ और मनुष्यों के बीच बढ़ते संघर्षो को स्वीकार करने में भारी असंतुलन मौजूद है। बाघ के समान, मनुष्य की प्रतिकूलताओं पर नीति निर्माताओ, पर्यावरणविद् और स्थानीय वन प्रशासन का उचित ध्यान नहीं जाता है। बाघ संरक्षित क्षेत्र की घोषणा के बाद, स्थानीय लोगों ने जो खोया है, उसकी चर्चा कभी नहीं की जाती है। तुरंत ही वनों पर उनकी निर्भरता समाप्त हो गई, आजीविका प्रभावित हुई और अब बाहरी क्षेत्र में भी बाघों के हमले बढ़ रहे हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि स्थानीय लोगों की आवाज गायब है। सभी की नजरे बाघ पर है कि कैसे यह विभिन्न हितधारकों को अधिकतम लाभ प्रदान कर सकता हैं। अन्य सभी प्रकार की आवाजें हाशिए पर हैं।

बाघों के कारण सवाई माधोपुर को वैश्विक पटल पर टाइगर सिटी के रूप में पहचान मिली है। प्राकृतिक आवास में बाघों को विचरण करते देखने के लिए आकर्षित होकर आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान किया है। इस हिसाब से बाघों की यहां पर उपस्थिति को  क्षेत्रवासियों के लिए एक प्राकृतिक आशीर्वाद की तरह माना गया है।

लेकिन वे पहलु अब यहां पर महत्व हासिल करते जा रहे है, जो दर्शाते है कि बाघों की यह उपस्थिति क्षेत्र के लोगो के लिए आशीर्वाद से कही बढ़कर अभिशाप है। क्योकि स्थानीय लोगो के लिए इनसे फायदे का ऐसा कोई शक्तिशाली विचार नहीं है, जिसके आधार पर ये गर्व कर सके। वन क्षेत्र के बाहर आबादी वाले क्षेत्रो में बाघों की आवाजाही ने स्थानीय लोगों को अपने घरों और खेतों में भय के माहौल में काम करने के लिए मजबूर कर दिया है। जिसने न केवल गाय, बकरी और भेड़ जैसे पशुओ का शिकार किया हैं, बल्कि मानव पर भी जानलेवा हमले किए हैं। पिछले आठ साल में पन्द्रह से अधिक लोगो का शिकार इस क्षेत्र में किया है। जो चौकाने वाला आंकड़ा है। हाल ही में एक दस साल के लड़के पर हमला किया गया हैं।

यहाँ पर हम, एक ऐसी तस्वीर देख रहे हैं जिसमे एक तरफ पर्यटन व्यवसाय में सलग्न लोग, वन अधिकारी और राजनेताओ के हित तथा बाघ के हितो की पैरवी करने वाले पर्यावरणविद् हैं। इन सबकी नजरो में बाघ महत्वपूर्ण हैं। लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष स्थानीय लोगो के हितो का हैं, जो आलोचना की हद तक उपेक्षित हैं। हम इस आलेख में इन्ही दो पक्षों के बीच के असंतुलन पर विमर्श करेंगे।

आशीर्वाद के रूप में बाघ
बाघों को प्राकृतिक आवास में विचरण करते देखना रणथंभोर में एक वास्तविक अनुभव है। इस विशेषता ने यहां कई मशहूर हस्तियों को आकर्षित किया है, उदाहरण के लिए सयुंक्त राज्य अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, भारत और विदेशी सरकार के कई पूर्व और सेवारत गणमान्य व्यक्ति, राजनेता, खिलाड़ी, अभिनेता और कई प्रकृति से प्यार करने वाले लोग। बाघ आधारित पर्यटन के कारण सवाई माधोपुर में होटल और हस्तशिल्प जैसी आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि हुई हैं। 

पर्यटकों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। इसलिए कई निवेशक यहां रुचि ले रहे हैं। ओबेरॉय जैसे व्यावसायिक घरानों ने यहाँ पर निवेश किया हुआ हैं। कई अफसरों, राजनेताओ और व्यवसायियों के लिए यह निवेश का एक आकर्षक गन्तव्य बन गया हैं। यही वजह हैं कि सवाई माधोपुर के शहरी क्षेत्र से दूर गाँवो तक होटलों का निर्माण कार्य चल रहा हैं, पर्यटकों, चालको और मार्गदर्शको के लिए सुविधा केंद्र बन रहे हैं। इस प्रकार आतिथ्य क्षेत्र की विभिन्न प्रोफाइल में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं, उदाहरण के लिए होटल, शिल्प, गाइड और ड्राइवर। 

गलत की शुरुआत यहाँ से होती है
रणथम्भोर में बाघों के हिंसक होने के लिए निम्न कारण देखे जा सकते हैं -
  1. वन में बाघों की संख्या का अधिक होना और इलाको का आपसी टकराव
  2. पर्यटन के दबाव
  3. नीतिगत खामियां
  4. मानवीय गतिविधियों की वन क्षेत्र में उपस्थिति 
अभिशाप के रूप में बाघ
आबादी भूमि में बाघों के प्रवेश की आवृत्ति में इजाफा हुआ है। जिसका कारण वन में बाघों की संख्या का अधिक होना और इलाको का आपसी टकराव है। जिन्हे तत्काल दूसरे क्षेत्रो में भेजने की जरूरत है। या फिर विस्तारित कॉरिडोर का निर्माण की जरूरत है।इसके साथ ही पर्यटन के दबाव को कम करने की भी जरुरत हैं। निम्न बिंदु स्पष्ट करेंगे कि टाइगर ने किस तरीके से लोगो के जीवन को नकारत्मक रूप से प्रभावित किया है -
  1. हिंसक हमले : बाघों ने आबादी भूमि में अक्सर अपनी आवाजाही बनाये रखी है। जिसका शिकार गाय, बकरी और भेड़ जैसे पशुओ के साथ-साथ मानव तक हुए है। पिछले सात साल में तेरह लोगो का शिकार इस क्षेत्र में किया है। जो चौकाने वाला आंकड़ा है।
  2. आजीविका संकट : बाघों के कारण लोगो की जंगल तक पहुंच को प्रतिबंधित कर दिया गया है। जिससे उनकी पशुपालन और वनोत्पाद संग्रहण पर निर्भर आजीविका रुक गई। क्योकि उनके विकल्पों के लिए सरकार द्वारा कोई व्यवस्था नहीं की गई। साथ ही बाघों के खौप के कारण लोग रात में फसलों की सिंचाई और रखवाली तक को नहीं जाते है। जिसके कारण उनकी फसल को रात्रि में आवारा पशुओ का जोखिम रहता है। 
  3. वन क्षेत्र में पहुंच से वंचित होना : वन क्षेत्र में पशुओ को चराने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। वही गाँवो में चरागाहों पर अतिक्रमण की स्थिति उत्पन्न होने से अब किसानो के लिए पशुओ को रखना मुश्किल हो गया है। इस प्रकार इसने आजीविका को भी बुरी तरीके से प्रभावित किया है।
  4. समीपवर्ती गांवो पर प्रतिबंध : गांव बफर एरिया में स्थित है उन पर भी कई तरह के अंकुश थोपे जाते है। जिसके कारण उनमे भी गुस्सा है। इन अंकुशों पर प्रतिक्रिया का उदाहरण उलियाना गांव में सामने आ चूका है। पडोसी गांव के लोगो ने दिवार को समय समय पर तोड़कर बताया है कि वे सरकार के वनो से पृथक करने के फैसले से खुश नहीं है।
  5. विस्थापन : कई गाँवो को इसके सीमा क्षेत्र से विस्थापित कर दिया गया है, जिनका पुनर्वास ने न केवल विस्थापित लोगो बल्कि अन्य लोगो के मन में भी आक्रोश उत्पन्न किया। क्योकि उन्हें नई  जगहों पर बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा। हाल ही में एक जगह पर विस्थापित किए गये लोग अपनी मूल जगह पर धार्मिक काम के सिलसिले में आये थे और उन्होंने वापस जाने से मना कर दिया था। 
  6. पक्षपातपूर्ण नीतियां : एक तरफ लोगो का प्रवेश हतोत्सहित कर दिया गया है, वही दूसरी तरफ पर्यटन गतिविधियों का संचालन लोगो के मन में संशय उत्पन्न करता है कि उन्हें उनके संसाधनों से वंचित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त कुछ व्यवसायियों को वनो में गतिविधियों के संचालन की अनुमति दी हुई है। जिससे यह साबित होता है कि नियम कायदे केवल गरीबो को रोकने और अमीरों की सुविधा के लिए है। पैसे वाले के लिए कोई नियम कानून नहीं है।
  7. उद्योगों की स्थापना में बाधक : रणथम्भौर के पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर इस क्षेत्र में कोई बड़ी औधोगिक इकाई यहाँ पर लग नहीं पाई है। इसकी वजह से क्षेत्र में काफी ज्यादा बेरोजगारी पाई जाती है। पर्यटन की वजह से भी पर्याप्त रोजगार उत्पन्न नहीं हुए है।
  8. इत्यादि। 
क्या किए जाने की जरुरत हैं 
हमे स्थानीय लोगो और पर्यटन व्यवसाय या वन संरक्षण से जुड़े लोगो के हितो को आपस में प्रतिद्वंदी के तौर पर नही देखना चाहिए। हमे इनके बीच में संतुलन स्थापित करना होगा। स्थानीय लोगो के हितो की उपेक्षा करने से वन प्रशासन और पर्यटन व्यवसायीयों के खिलाफ भावनाओ का उदय होगा, जिसके व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक निहितार्थ होंगे। उसी प्रकार पर्यटन क्षेत्र की उपेक्षा करने से एक उभरते क्षेत्र के सामर्थ्य से वंचित रह जायेंगे। उसी प्रकार बाघ के हितो को भी प्राथमिकता देने की आवश्यकता हैं। यहां पर निम्न उपाय किए जा सकते हैं -
  1. बाघों के हमले में घायल और मरने वाले लोगो के लिए एक निश्चित मुआवजा नीति होनी चाहिए। इसे अधिकारियो के विवेक और सौदेबाजी क्षमता के भरोसे मामला-दर-मामला निर्धारित नही करना चाहिए। घायलों के उपचार के लिए व्यवस्था होनी चाहिए। किसी भी हमले की स्थिति में एक जिम्मेदार अधिकारी को पीड़ित के पास जाकर अग्रिम कार्यवाही का आश्वासन देना चाहिए।
  2. बाघ की वन क्षेत्र के बाहर और भीतर सघन निगरानी की जानी चाहिए। वन क्षेत्र से बाहर निकलते ही संबंधित क्षेत्र के निवासियों को वास्तविक समय सूचना प्रदान करनी चाहिए ताकि वे सुरक्षित स्थानों पर पहुँच सके। साथ ही वन विभाग के कर्मियों को वापस वन में भेजने पर कार्य करना चाहिए।
  3. राष्ट्रीय उद्यान के जिन क्षेत्रो से बाघ की निकासी होती हैं, उन क्षेत्रो में चारदीवारी की मरम्मत की जाए। साथ ही चारदीवारी के निर्माण में खराब गुणवत्ता के सामानों का प्रयोग करने वाले ठेकेदारों पर कार्यवाही की जाए।
  4. हिंसक हुए बाघ को एनक्लोजर में रखा जाना चाहिए या फिर उसके लिए अधिक क्षेत्र की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसी घटनाओ को पुनः अंजाम देने वाले बाघों पर ठोस उपाय किए जाने चाहिए।  
  5. फसलो के दिनों में बाघ को छुपने में आसानी रहती हैं, इसलिए इस दौरान निगरानी में सख्ती बरतनी चाहिए। साथ ही बड़े-बड़े बगीचों के पौधो में भी उसके छुपे होने की संभावना हो सकती हैं। इसलिए किसानो और वन विभाग के बीच उसके मूवमेंट को लेकर सूचनाओ के आदान-प्रदान की संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए। चेतावनी प्रणाली की तरह सुचनाए वितरित करनी चाहिए।
  6. बाघ के मूवमेंट को लेकर ग्रामीणों द्वारा दी गई सूचनाओ को वन विभाग द्वारा नकार दिया जाता हैं, ऐसे में वन कर्मियों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता हैं।
  7. वन क्षेत्र में से पर्यटन के दबाव को कम करने की आवश्यकता हैं ताकि बाघ अपने मूल क्षेत्र में हस्तक्षेप मुक्त महसूस कर सके। एक समय सीमा का पालन किया जाना चाहिए। बाघ को परेशान करने वाले जिप्सी चालको और पर्यटकों पर कार्यवाही करने की आवश्यकता हैं।
  8. पर्यटन क्षेत्र और विचरण क्षेत्र को लग करने की आवश्यकता हैं। इसके लिए टाइगर सफारी पार्क की स्थापना  की योजना को यथासीघ्र जमीनी आधार दिया जा सके।
  9. बाघ आधारित नीतियों के निर्माण में स्थानीय लोगो को भी शामिल किए जाने की जरुरत हैं। इसमें केवल व्यवसायिक समूहों से जुड़े बाघ-प्रेमियों का ही दबदबा नही होना चाहिए ।
  10. इत्यादि। 

निष्कर्ष
अंत में हम यही कहेंगे कि जंगल में विचरण करता बाघ निश्चित तौर पर एक वरदान की तरह है। परन्तु जैसे ही यह जंगल से बाहर निकलता है तो लोगो की दिनचर्या का बाधित करने के साथ-साथ दहशत उत्पन्न करने की वजह से यह अभिशाप बन जाता है। ऐसे में हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यह जंगल में ही बना रहे। इसके लिए सुझाए गये उपायों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।

UPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2019 निबंध प्रश्न पत्र

सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2019, निबंध प्रश्न-पत्र का इस आलेख में सटीक दृष्टिकोण बताया जा रहा हैं। किसी निबंध के मॉडल उत्तर में किन-किन पक्षों को शामिल किया जाना चाहिए तथा सम्बन्धित विषय पर क्या संतुलित दृष्टिकोण होना चाहिए, इन सबको आप इस आलेख में देख सकते हैं। इसी तरह की हमारी पहल को गत वर्ष भी काफी सराहा गया था।
खंड I
  1. विवेक सत्य को खोज निकालता है।  (Wisdom finds truth)
  2. मूल्य वे नही जो मानवता है, बल्कि वे है जैसा मानवता को होना चाहिए।  (Values are not what humanity is, but what humanity ought to be)
  3. व्यक्ति के लिए जो सर्वश्रेष्ट है, वह आवशयक नही की समाज के लिए भी हो। (Best for an individual is not necessarily best for the society)
  4. स्वीकारोक्ति का साहस एवं सुधार करने की निष्ठा सफलता के दो मंत्र है। (Courage to accept and dedication to improve are two keys to success)
खंड II
  1. दक्षिण एशियाई समाज सत्ता के आस-पास नही, बल्कि अपनी अनेक संस्कृतियों और विभिन्न पहचानो के ताने बाने से बने है। (South Asian Societies are woven not around the state, but around their plural cultures and plural identities)
  2. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा की उपेक्षा भारत के पिछड़ेपन का कारण हैं। (Neglect of primary healthcare and education in India are reasons for its backwardness)
  3. पक्षपातपूर्ण मीडिया भारत के लोकतंत्र के समक्ष एक वास्तविक खतरा है। (Biased media is a real threat to Indian Democracy)
  4. कृत्रिम बुद्धि का उत्थान:भविष्य में बेरोजगारी का खतरा अथवा पुनर्कौशल और उच्च-कौशल के माध्यम से बेहतर रोजगार के सृजन का अवसर। (Rise of Artificial Intelligence: the threat of jobless future or better job opportunities through reskilling and upskilling)


Right Approach of Every Essay
Available Here !!
Download



खंड I के निबंधों से संबंधित सही दृष्टिकोण

1.1.विवेक सत्य को खोज निकालता है।
(Wisdom finds truth)

Available soon


1.2.मूल्य वे नही जो मानवता है, बल्कि वे है जैसा मानवता को होना चाहिए।
(Values are not what humanity is, but what humanity ought to be)
एक मापदंड के रूप में मूल्यों ने किसी समाज, देश या संगठन के लक्ष्यों और उद्देश्यो की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समाज के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक मूल्यों को हमेशा सराहा गया है।मानव समाज के हितों की प्राप्ति के लिए भी मूल्यों का निर्धारण किया गया है। जिन्हें मानवीय मूल्य कहा जा सकता है। सभी लोगो को इन मूल्यों को अंगीकृत करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। एक तरह से मानव समाज के ऐसा होने की उम्मीद की जाती है।
  • लेकिन मूल्यों का यह मापदंड मानवीय उद्देश्यो में पूर्णतः सफल नही रहा है क्योंकि : कई मूल्य हिंसक, द्वेषतापूर्ण, पक्षपातीय और समयातीत है। भौतिकतावादी दौड़ के कारण मूल्यों का क्षरण हो रहा है। मूल्यों की प्राप्ति हमेशा से आदर्श रही है और माना जाता रहा है कि लोगो की सामाजिक आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं है कि वे आदर्शो को व्यवहार में अपना सके।मानवीय हितों पर आधारित मूल्यों ने प्रकृति की अनदेखी की है।
  • इसलिए मूल्यों ने तो मानवता को समुचित राह दिखाई। लेकिन मानवता ने  मूल्यों को हमेशा कमतर आंका। इसका परिणाम यह रहा कि अनैतिकता को समाज मे मान्यता मिलने लगी। उदारहण के लिए भ्रष्टाचार करने वालो को लोगो द्वारा गलत नही मानना। अगरिमामय और शोषणकारी गतिविधियों को नियति मान लिया गया और विरोध करने वालो को   बगावती या विद्रोही माना गया। एक तरह से मूल्यों का नवीनीकरण जटिल हो गया।
  • ऐसे में जरूरी है कि मूल्यों की शाश्वतता को बनाये रखा जाए, उसे मानवीय हितों के अनुकूल सुविधा अनुसार परिभाषित नही किया जाए। उसके पालन को समाज और सरकारो द्वारा बढ़ावा दिया जाए। अगरिमापूर्ण चीजो को समाप्त किया जाए और सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाए।
निष्कर्ष :
मूल्य सार्वभौमिक होते है, वे सुविधा के अनुसार प्रभावित नही होते। मूल्यों को संकीर्ण आधार पर निर्धारित नही किया जाना चाहिए। इसलिए यहां भी मानवता को मूल्यों से बढ़कर नही मानना चाहिए, बल्कि मानवता भले ही मूल्यों को निर्धारित करती हो परन्तु वह भी मूल्यों के अधीन ही है।


1.3.व्यक्ति के लिए जो सर्वश्रेष्ट है, वह आवशयक नही की समाज के लिए भी हो।
(Best for an individual is not necessarily best for the society)

Available soon


1.4.  स्वीकारोक्ति का साहस एवं सुधार करने की निष्ठा सफलता के दो मंत्र है।  
(Courage to accept and dedication to improve are two keys to success)
जीवन में हर मुकाम पर खुद को बनाये रखने और आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ता हैं। संघर्ष के परिणाम कई बार अनपेक्षित भी प्राप्त होते हैं। ऐसे में कई लोग परिणाम को स्वीकार करके अपनी राह बदल लेते हैं और कमतर परिणामो से संतुष्ट हो जाते हैं। कुछ लोग परिस्थितियों या व्यवस्था को दोष देने लग जाते हैं। लेकिन सफलता के प्रति जुनूनी लोग अपनी गलतियों को स्वीकार करने में हिचकिचाते नही हैं। वे उनमे सुधार करके फिर से कोशिश करते हैं। इस तरह वे प्रयास करते हुए सफलता को प्राप्त कर जाते हैं।
  • स्वीकारोक्ति की आवश्यकता : 
  • स्वीकार नही करने के नुकसान :
  • गलतियों से सबक और सुधार के बाद सफल होने वालो के उदाहरण 
  • सफलता के लिए क्यों जरुरी हैं  
  • उदहारण :
  • वर्तमान सन्दर्भ : 
निष्कर्ष :




अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बहुआयामी निहितार्थ


भारत ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करते हुए राज्य का पुनर्गठन किया है।अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम के दो अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेश होंगे, जिसमे से जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी, वही लद्दाख में विधानसभा नही होगी।दोनों राज्यों के लिए उप-राज्यपाल के पद का प्रावधान होगा। इसके साथ ही सात दशक पुराना कश्मीर का मसला एक बार फिर पूरी चर्चा के केंद्र में आ गया है।एक तरफ भारत में इसे ऐतिहासिक निर्णय मानते हुए ख़ुशी मनाई जा रही हैं, वही पाकिस्तान इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में लगा हुआ हैं। कश्मीर घाटी में इसे हटाने को लेकर असंतोष देखा जा रहा हैं।इस प्रकार इस मुद्दे के बहुआयामीय निहितार्थ हैं।जिन पर हम पृथक-पृथक विमर्श करेंगे ।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :
आजादी के बाद पाकिस्तान ने इसकी स्वतंत्र स्थिति को नकारते हुए कबाइली भेष में अपनी सेना को युद्ध के लिए भेज दिया। तब महाराजा हरिसिंह द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के साथ ही जम्मू-कश्मीर का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के प्रावधानों के तहत कानूनी तौर पर विलय हो गया था। पाकिस्तान द्वारा इस मसले पर युद्द थोपने के कारण  स्थिति को नाजुक होने से बचाने के लिए जवाहर लाल नेहरु इस मुद्दे को सुरक्षा परिषद् में ले गये। सुरक्षा परिषद ने इस पर जनमत संग्रह कराने और विवादित क्षेत्र से सेना हटाने का आश्वासन देते हुए कुछ शर्ते रखी थी।जिन पर पाकिस्तान ने कभी अमल नहीं किया, उसने पाक अधिकृत कश्मीर का विसैन्यीकरण करना तो दूर उस क्षेत्र की जनसांख्यिकी परिवर्तन करने के प्रयास किए। पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी के लोगो में भी उग्रवादी भावनाओ को भड़काने के लिए कार्य किया।

1990 के दशक में कश्मीर घाटी से से पंडितो का निर्वासन करने के बाद जनसांख्यिकी में पर्याप्त परिवर्तन हो गये।इसके साथ ही सयुंक्त राष्ट्र का जनमतसंग्रह का प्रस्ताव अप्रासंगिक हो गया।हालाँकि सयुंक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप की गुंजाईश 1972 के शिमला समझौते के साथ ही नेपथ्य में चली गई, जिसमे दोनों देश सभी मुद्दों को आपसी बातचीत से सुलझाने के लिए सहमत हुए थे।पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित सीमापार आतंकवाद की घटनाओ ने बातचीत की कोशिशो को नाकाम कर दिया।जम्म-कश्मीर में राजनीतिक अस्थिरता भी स्थानीय लोगो में भारत-विरोधी भावनाये भड़काने में सहायक रही। जम्मू कश्मीर का राजनीतिक नेतृत्व जनता का विश्वास जितने में नाकाम रहा।इस तरह के परिदृश्य में पाकिस्तान द्वारा सीमापार घुसपैठ के प्रयासों को बढ़ावा देना, सुरक्षा बलों पर हमला करना, शहीदों के शवो को देखकर भारतीय राष्ट्रवाद का उग्र होना जैसी घटनाये नियमित तौर पर होने लगी।ऐसी स्थितिओ में यह अपरिहार्य हो गया था कि भारत सरकार स्थितियों को सुधारने के लिए धारा 370 को निरस्त करने जैसा क्रांतिकारी कदम उठाये ।

इस प्रकार अनुच्छेद 370 को निरस्त करते ही जम्मू-कश्मीर राज्य की संवैधानिक स्थिति भारत के बाकी राज्यों के समान हो गई।इसके साथ ही यह एक ऐतिहासिक कदम हो गया, जिसने भारत के एकीकरण की प्रक्रिया को पूर्ण कर दिया।वही ऐसा भी माना जा रहा हैं कि जवाहर लाल नेहरु के द्वारा भारतीय सेना ने कबाइलियो को नही खदेड़कर तथा मामले को सुरक्षा परिषद् में ले जाकर जो भूल की गई थी, उसे इस फैंसले के बाद सुधार लिया गया हैं।हालांकि उसे किसी व्यक्ति की भूल बताने की बाते अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन इतना तो तय हैं कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के दूरगामी सकारात्मक प्रभाव सामने आयेंगे ।


राजनीतिक निहितार्थ :
अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निरस्त होने से जम्म-कश्मीर को मिले विशेष प्रावधान खत्म हो गये हैं।अब बाकी राज्यों की तरह वहाँ पर भी भारतीय कानून लागू होंगे।कुछ ऐतिहासिक कानूनी बदलाव वहाँ देखने को मिलेंगे जो कि इस प्रकार हैं -
  • संसद की ओर से बनाए गए हर क़ानून अब वहां प्रदेश की विधानसभा की मंज़ूरी के बिना लागू होंगे ।
  • सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर भी अमल लागू हो जाएगा ।
  • जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल छह से घटकर पांच साल का हो जाएगा.
  • संसद या केंद्र सरकार तय करेगी कि इसके बाद आईपीसी की धाराएं प्रदेश में लागू होंगी या स्थानीय रनबीर पीनल कोड (RPC)। साथ ही इस पर भी फ़ैसला लिया जाएगा कि पहले से लागू स्थानीय पंचायत क़ानून जारी रहेंगे या उन्हें बदल दिया जाएगा ।
  • अब तक क़ानून व्यवस्था मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी होती थी, लेकिन अब वह सीधे केंद्र सरकार के अधीन होगी और केन्द्रीय गृह मंत्री प्रदेश में अपने प्रतिनिधि उपराज्यपाल के ज़रिये क़ानून-व्यवस्था को संभालेंगे ।
  • अब तक सिर्फ़ 'स्थायी नागरिक' का दर्जा प्राप्त कश्मीरी ही वहां ज़मीन ख़रीद सकते थे, नौकरी प्राप्त कर सकते थे, लेकिन 370 हटने के बाद बाकी लोगो की भी इन तक पहुँच हो जायेगी ।
  • प्रदेश के अलग झंडे की अहमियत नहीं रहेगी ।
  • महिलाओं पर लागू स्थानीय पर्सनल क़ानून बेअसर हो जाएंगे ।
इस प्रकार जम्मू-कश्मीर में व्यापक राजनीतिक परिवर्तन दिखाई देंगे।लेकिन जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के साथ ही भारतीय राजनीती पर भी इसके गहन निहितार्थ सामने आयेंगे। उदाहरण के लिए -
  1. अब तक किसी क्षेत्र में मौजूद असंतोष का समाधान करने के लिए उस क्षेत्र को संवैधानिक रियायते प्रदान की जाती रही हैं , उदाहरण के लिए बोडोलैंड, गोरखालैंड और लद्दाख के लिए स्वायत पहाड़ी परिषदों का प्रावधान करना, पुंडुचेरी को केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा देना या मेघालय को केंद्र शासित प्रदेश से राज्य का दर्जा देना।लेकिन पहली बार किसी क्षेत्र के असंतोष को शांत करने के लिए राज्य का दर्जा घटाकर केंद्र शासित प्रदेश का कर दिया गया हैं।
  2. अनुच्छेद 370 के समान ही कुछ विशेष प्रावधान 371 के तहत किये गये हैं।अब उन राज्यों में भी आशंका बढ़ रही हैं कि उनकी विशिष्ट संस्कृतियों को संरक्षित करने वाले कानूनों को केंद्र सरकार एकतरफा खत्म कर सकती हैं।
  3. विधानसभा युक्त केन्द्रशासित प्रदेशो में चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर टकराव देखने को मिलता हैं।ऐसे में कश्मीर में भी इन मुद्दों के कारण राजनीतिक स्थितियों के अधिक जटिल होने की संभावना हैं ।
  4. लद्दाख के लिए अलग से केंद्र शासित प्रदेश बनाकर भले ही लम्बे समय से चली आ रही मांग को पूरा कर दिया गया हो लेकिन विधानसभा का नहीं होना स्थानीय जनता के लोकतान्त्रिक अधिकारों की अवहेलना करेगा, साथ ही मुस्लिम बाहुल्य कारगिल जिले को लद्दाख में शामिल करने से कारगिल के लोगो में असंतोष उत्पन्न होगा।
  5. कश्मीरी पंडितो को वापस घाटी में बसाने में मदद मिलेगी।वर्षो से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे समुदाय को न्याय प्रदान करने में मदद मिलेगी।
राजनयिक निहितार्थ :
ऐतिहासिक और संवैधानिक साक्ष्य पर्याप्त रूप से साबित करते हैं कि जम्मू कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग हैं, लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीर को हमेशा विवादित मुद्दे के तौर पर पेश किया हैं।पाकिस्तान ने इसे बहुपक्षीय मंचो पर उठाने के प्रयास किए हैं।  अपने हितो के कारण कई देशो की पाकिस्तान के साथ सहानुभूति वाली नीति भी रही हैं।वर्तमान में भारत एक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था हैं, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा बाजार हैं।अधिकतर विकसित देश इसीलिए भारत को आकर्षक निवेश गन्तव्य के तौर पर देख रहे हैं।शायद यही कारण हैं कि भारत को अनुच्छेद 370 निरस्तीकरण के कारण किसी बाहरी देश की बयानबाजी का सामना नही करना पड़ा।

जम्मू-कश्मीर को लेकर बहुआयामी राजनयिक निहितार्थ निम्न प्रकार हैं -
  1. पाकिस्तान के लिए कश्मीर का मुद्दा बेहद अहम् हैं।वह मुस्लिम जनसँख्या होने के कारण इसे अपना स्वभाविक भाग मानता हैं।पाकिस्तान की घरेलु राजनीति कश्मीर मुद्दे से काफी गहराई तक जुडी हुई हैं।इसलिए वह इस मुद्दे को लेकर तनाव बढ़ाने के प्रयास करने में लगा हुआ हैं और आपसी व्यापारिक संबंधो को स्थगित कर दिया हैं। वही इस मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण करने के प्रयास  में लगा हुआ हैं।उसने अन्तराष्ट्रीय न्यायालय में भी इस मुद्दे को ले जाने की घोषणा की हैं।
  2. भारत का जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अक्साई चीन को लेकर विवाद हैं, लेकिन भारत ने इसे आंतरिक मामला बताया हैं, जो कि राजव्यवस्था से सम्बन्धित हैं और किसी भी प्रकार से सीमाओं में परिवर्तन नहीं करता हैं।इसलिए चीन ने आपसी विवाद को लेकर तो कोई टिप्पणी नहीं की हैं।लेकिन पाकिस्तान में अपने निवेश की रक्षा के लिए पाकिस्तान के हित में कुछ बयान दिए हैं और सुरक्षा परिषद् में इसे उठाने की कोशिश की हैं। 
  3. अमेरिका इस समय अफगानिस्तान से बाहर निकलने के लिए तालिबान से समझौता करने में लगा हैं ।इस कार्य में पाकिस्तान का सहयोग उसके लिए उपयोगी हो सकता हैं।इस वजह से पाकिस्तान को राजी करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दोनों देशो के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश की हैं ।
  4. अगर दुसरे देशो की भूमिका को देखे तो वे बयानबाजी तक सीमित रहे हैं। केवल तुर्की ने पाकिस्तान के पक्ष में बयान दिए हैं।बाकी देशो ने सक्रीय या मूक रूप से भारत के पक्ष में अपना रुख रखा हैं ।
  5. दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को छोड़कर बाकि सभी देशो ने इसे भारत का आंतरिक मामला बताया हैं।श्रीलंका ने बोद्ध बाहुल्य लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने का स्वागत किया हैं ।
  6. सयुंक्त राष्ट संघ की भूमिका - 1972 के शिमला समझौते के बाद सयुंक्त राष्ट की भूमिका इस मामले पर अप्रासंगिक होती चली गई।इसलिए सयुंक्त राष्ट्र का इस विषय पर विमर्श क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को ध्यान में रखकर ही हो सकता हैं। खासकर पाकिस्तान द्वारा सीमापार युद्धविराम के उल्लंघन की घटनाओ की स्थिति में ।
राजनयिक समीकरणों की भविष्य की राह को लेकर अभी कयास नही लगाये जा सकते।लेकिन भारत के अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था और सशक्त राजनयिक पहुँचो की बदौलत इस मामले में फायदे में रहने की संभावना हैं।अब भारत ने अपनी परमाणु हथियारों को ‘पहले उपयोग नही करने’ की नीति में भी संशोधन करने के संकेत दिए हैं तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर अब बात करने को एजेंडा बनाने की घोषणा की हैं।इन सबसे लगता हैं कि भारत ने पाकिस्तान के साथ आक्रामक व्यवहार को अपनाने को तवज्जो दी हैं।दरअसल पाकिस्तान का व्यवहार इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं।उसने भारत द्वारा किए गये पिछले शांति प्रयासों को प्रभावहीन कर दिया था।ऐसे में उसे शांति का व्यवहार करने हेतु प्रेरित करने के लिए वैश्विक मंचो पर अलग-थलग करने की जरुरत हैं ।

जम्मू कश्मीर को मुख्यधारा में शामिल करना : 
अनुच्छेद 370 को निरस्त करके राज्य का पुनर्गठन कर दिया गया हैं।लेकिन कश्मीर के लोगो को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए प्रयास करने की जरुरत हैं। ऐसे में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का “इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत ” का विचार एक मार्गदर्शन सूत्र हो सकता हैं। जम्मू-कश्मीर के लोगों को भरोसा दिलाना होगा कि कि केन्द्र सरकार उनके दुख-दर्द में उनके साथ है।राज्य की सभी की समस्याओं को सुना जाएगा और मिलजुल कर हल किया जाएगा।लोगो को विश्वास दिलाना होगा कि दिल्ली का दरवाजा और दिल हमेशा राज्य की जनता के लिए खुला हैं।इस प्रकार के उदार माहौल के द्वारा ही कश्मीर क्षेत्र के लोगो के मन से उग्रवादी विचारो को दूर किया जा सकता हैं।इसके लिए युवाओ को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए निवेश को बढ़ावा देना होगा।खेलकूद और रंगमंच जैसी गतिविधियों में युवाओ की भागीदारी बढ़ानी होगी ।
अभी हालात समान्य होने में थोडा समय लगेगा।लेकिन अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद लोगो में विशिष्टता के भाव का अंत होगा, जिससे अलगाववादी विचारो को पनपने से रोका जा सकेगा।फिलहाल कानून व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कार्य करना होगा।पाकिस्तान भी इस समय प्रतिशोधवश आतंकी घटनाओ को अंजाम दे सकता हैं।इसलिए नियंत्रण रेखा और अन्य भागो में सुरक्षा व्यवस्था चौकस रखने की जरुरत होगी ।

केंद्र सरकार ने खुद यह आश्वासन दिया हैं कि एक दिन जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होंगे और उसे फिर से राज्य का दर्जा दिया जाएगा।इसलिए संक्रमण काल के लिए केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा एक अहम् कड़ी साबित होगा।इस दौरान कानून व्यवस्था भी बेहतर रखी जा सकती हैं और कल्याणकारी योजनाओ का भ्रष्टाचार मुक्त क्रियान्वयन करके राज्य के लोगो को भरोसा भी दिलाया जा सकता हैं ।

निष्कर्ष :
संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर को मिल रहे विशेष दर्जे को हटाने से क्षेत्र में आतंकवाद का खात्मा होने की उम्मीद हैं।अब ऐसे कदम उठाने की जरुरत हैं कि वह विकास के मार्ग पर अग्रसर हो।इस मामलें में सर्वसम्मति से फैंसले लिए जाने चाहिए । जिससे सहकारी संघवाद को भी बढ़ावा मिलेगा और कश्मीर के युवाओं तथा निवासियों को भी यह आश्वाशन प्राप्त होगा कि कश्मीर देश की आर्थिक प्रगति का हिस्सा है और भारत का अभिन्न अंग है ।