नेहरू को छोड़कर मोदीजी द्वारा अनिच्छा से मनमोहन को अपनाना

मोदीजी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कई ऐसे निर्णय लिए और कई ऐसे कदम उठाए जो अपने आप मे ऐतिहासिक महत्व रखते है। इतने सारे ऐतिहासिक महत्व के विषयों को घटता देखकर ऐसा लगता है जैसे कि स्वतंत्रता के बाद का भारतीय इतिहास इस तरह जाना जाएगा- मोदी काल से पूर्व और मोदी काल के बाद। ऐसे में इतिहासकारो के लिए एक बात को तलाशने की जरूरत होगी और वो यह है कि क्या उनके प्रयासों के बाद निरन्तरता ही जारी रही अथवा परिवर्तन महसूस किया गया।

अगर मोदीजी के प्रशासनिक, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सुधारो में केंद्रीय थीम को पकड़ा जाए तो वह है- आर्थिक विकास। आर्थिक विकास के लिए इन्होंने नवउदारवादी मार्ग को अपनाया। जिस की शुरुआत भारत मे 1991 के निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण के माध्यम से हो चुकी थी। जिसमे सरकार को अपनी भूमिका को सेवा प्रदाता से विनिमय प्रदाता के तौर पर बदलने के बारे में कहा गया था। मोदीजी ने इसके तहत सरकार के हस्तक्षेप को कम करने के लिए 'न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन' की अवधारणा अपनाई। प्रक्रियात्मक और संरचनात्मक सुधारो के माध्यम से देश मे व्यापार और निवेश करने को आसान बनाने पर ध्यान दिया गया। इसके लिए जरूरी कानूनों में बदलाव किए गए, नए नियम बनाये गए, अवसंरचना का निर्माण किया गया और अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे बदलाव किए जो निवेशकों के अनुकूल हो। सरकार द्वारा राजस्व घाटे को न्यूनतम रखने के लिए लोक कल्याणकारी कार्यो में होने वाले व्ययों में कटौती की बात कही गई, FRBM एक्ट पारित किया गया। कुल मिलाकर विदेशी निवेश को आकर्षित करने के हर सम्भव प्रयास किए गए।

इतिहास के साथ तुलना :
इतिहास के झरोखे से देखा जाए तो नेहरू ने जो समाजवादी रुझान की व्यवस्था स्थापित की थी, उसे 1991 के आर्थिक संकट में ही अप्रासंगिक समझ लिया गया और उसी का नतीजा था 1991 कि आर्थिक सुधार। इन आर्थिक सुधारों के मॉडल को नवउदारवाद कहा जाता है जिसमे शामिल है-खुला व्यापार, खुली पूंजी, निजी क्षेत्रों पर निर्भरता, वैश्विक आर्थिक तालमेल आदि। नव उदारवादी मॉडल में कदम तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के प्रयासों से रखे जा चुके थे और काफी सुधार हो चुके थे। हालांकि समावेशी विकास को भी बराबर महत्व देकर चल रही पंचवर्षीय योजनाओं के कारण आर्थिक एजेंडे पर समाजवादी हैंगओवर छाया रहा।

जब नरेंद्र मोदीजी प्रधानमंत्री बने तो इन्होंने समाजवादी दृष्टिकोण को तिलांजलि दे दी और जनमत के दबाव में गिने-चुने लोकलुभावन कार्य उसकी जगह पर किए। उपलब्ध संसाधनों का तार्किक वितरण करने वाले और सभी के विकास को तय करने वाले योजना आयोग को समाप्त कर दिया गया। विनिवेश पर जोर दिया।  एक तरीके से अब निजी क्षेत्र के लिए नीतियां अब लगभग पूरी तरीके से उदारीकृत कर दी गई।

एक तरह से नेहरू की विरासत को खत्म कर दिया गया। लेकिन इस प्रयास में वे मनमोहन की विरासत को आगे बढ़ाने लग गए। वे नवउदारवाद के नए ध्वजवाहक बनकर सामने आए, जैसे कि मनमोहन के समर्पित शिष्य हो। हालांकि मनमोहन ने नवउदारवादी नीतियों की शुरूआत अवश्य की थी लेकिन फिर भी वे समाजवादी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नही हो पाए, उनके द्वारा शुरू किए गए मनरेगा, खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रम इसके सबूत है। लेकिन मोदीजी नवउदारवाद पर बिना हिचकिचाहट के आगे बढ़ गए।

मोदीजी का आर्थिक कार्यक्रम:
नवउदारवाद के माध्यम से  समावेशी विकास की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह कई लोगो द्वारा लगाया जा चुका है। क्योंकि भारत को तो संवृद्धि युक्त विकास की बजाय समावेशी विकास की आवश्यकता है। ऐसे में यह अध्ययन का विषय हो जाता है कि प्रधानमंत्री मोदीजी ने बाजारी शक्तियों के प्रति इतना समर्पण क्यों दिखाया?

जिस समय रोजगार विहीन संवृद्धि की सभी जगह आलोचना हो रही हो, उसी समय मे आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम उल्टा संवृद्धि पर ही जोर दे देते है। उनका मानना है कि ज्यादा संवृद्धि से ही रोजगार उत्पन्न होंगे। यह एकदम से गुमराह करने वाला दावा प्रतीत होता है। क्या कक्षा में एक-दो छात्रों के अंक बढ़ाने के प्रयासों से सारे छात्रों का परिणाम अच्छा आ सकता है। लेकिन वे इसका जवाब भी  बिज़नेस माइंडसेट से देते है कि एक-दो छात्रों के उच्च प्राप्तांक देखकर नए एडमिशन तो आ ही सकते है। जिस तरह वे छात्रों के बजाय स्कूल के फायदे की सोच रहे है उसी प्रकार सरकार भी लोगो की आर्थिक दशा के बजाय बजटीय आंकड़ो पर वाहवाही लूटने की सोच रही है। यही  नीति मोदी सरकार द्वारा भी अपनाई जा रही है। जो क्षेत्र आगे बढ़ रहा है उसे उतनी ही क्षमता से आगे बढ़ने दो, एक तरह से डार्विन का सिद्धांत यहां लागू कर दिया गया है। व्यवसायों को बढ़-चढ़कर प्रोत्साहित किया जा रहा है वही कृषि, असंगठित क्षेत्रो के लिए केवल औपचारिक निर्वातहीनता उत्पन्न की जा रही है। अगर लोगो की क्षमता निर्माण पर ध्यान भी दिया जा रहा है तो वो भी बाजार के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर। जैसे कि- लोगो के पास क्रय शक्ति हो इसलिए सार्वभौमिक बुनियादी आय की परिकल्पना।

अब हमारे पास सभी प्रश्नों का उत्तर देने के लिए पर्याप्त सूचना उपलब्ध हो गई है।
  1. पहला प्रश्न तो शीर्षक से ही उत्पन्न होता है। नेहरू  को दरकिनार कर दिया वही मनमोहन सिंह को अपना लिया गया, जिसे की ऊपर दिखा चुके है। लेकिन भारतीय राजनीति में जनमत की परवाह के कारण लोककल्याण के कार्यो से पृथक होने में अक्षमता की वजह से नवउदारवादी नीतियां पूरी तरीके से कभी भी लागू नही की जा सकती। इस आधार पर इतिहास के विद्यार्थी यह कह सकते है कि मोदीजी न तो नेहरू को दरकिनार कर पाए और न ही मनमोहन को अपना पाए। लेकिन अब हम कह सकते है कि सच्चाई दोनो दावों के बीच मे ही है।
  2. शीर्षक से ही दूसरी बात है मनमोहन सिंह के विचारों को न चाहते हुए भी अपनाने की मजबूरी होना। हम समझ सकते है कि कांग्रेस मुक्त भारत की बात कहने वाले व्यक्ति के लिए कांग्रेस के ही नेता की नीतियों को अपनाना कितना मुश्किल रहा होगा, यही कारण है कि वे गैर-अनुमानित फैसले (नोटबन्दी) लेकर यह दर्शाने की कोशिश करते है कि उनका आर्थिक कार्यक्रम पहले से अलग है।
  3. मोदी काल की अवधारणा की बात हमे अतिश्योक्ति लग सकती है। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए इसे मानना कोई बड़ी बात नही है, उनका बस चले तो वे 26 मई 2014 से मोदी संवत शुरू करवा दे। खुद मोदीजी की भी मनोवृत्ति इसी तरह काम करती है, वे पहले की सरकारों द्वारा किए गए कामो को मान्यता ही नही देते है, वे सभी कार्यक्रमों को फिर से नई शुरुआत देकर नए युग की शुरुआत दिखाना चाहते है।
  4. एक प्रश्न यह उठा था कि मोदीजी नवउदारवादी नीतियों के चक्कर मे समावेशी विकास की उपेक्षा तो नही कर रहे है?  तो इसमें कोई शक नही है कि उनकी नीतियों से ऑक्सफेम की चिंताओं की पुष्टि होती है, वे आर्थिक विषमता को निर्मित करती है। सीधे शब्दों में ही देख लेते है न कि चुनिंदा व्यवसायीयो को बढ़ावा देने से बाकी लोगो को फायदा कैसे होगा। ऑटोमेशन और नवउदारवाद से उत्पन्न रोजगार कटौती का समाधान करने में मोदीजी बुरी तरीके से विफल रहे है। देश के संसाधनों का आवंटन करने वाले योजना आयोग को समाप्त करके मोदीजी ने समावेशी विकास के पैर पर कुल्हाड़ी मारी है।
आर्थिक नीतियों में संकीर्णता के कारण :
हमने देखा कि मोदीजी के आर्थिक सुधारों का झुकाव बड़े व्यवसायीयो के प्रति ज्यादा है बजाय किसानों, ग्रामीणों या असंगठित क्षेत्रों के। इसके निम्न कारण हो सकते है -
  1. व्यवसायिक क्षेत्रो के प्रति झुकाव मौजूदा समय की वैश्विक सच्चाई है, यह कोई भारत मे किसी सरकार की कोई विशेष नीति नही है। फ़र्क़ इतना है कि मोदीजी व्यक्तिगत रूप से इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने में रुचि ले रहे है।
  2. झुकाव का दूसरा कारण राजनीतिक है। कई कॉरपोरेट घरानों ने प्रधानमंत्री बनने में सहायता की थी। अब वे उनके अनुकूल नीतियां बनाकर उनका आभार व्यक्त करना चाहते है।
  3. निम्न तबके को वे विपक्षी दलों के वोट बैंक के रूप में देखते है। इसलिए हो सकता है कि उनकी आर्थिक उन्नति को बाधित कर राजनीतिक महत्वकांशाओ को निर्मूल करना चाह रहे हो।
हालांकि ये सब अटकलें है। आर्थिक कार्यक्रमो में संसदीय चर्चाओ का भी प्रभाव रहता है, जो निश्चित तौर पर किसी भी वर्ग के प्रति पक्षपात नही करती। फिर भी कार्यपालिका के हाथ मे एजेंडे को दिशा देने की पर्याप्त शक्तियां रह जाती है।

आगे क्या होगा :
मैंने पहले बताया था कि नवउदारवादी नीति से खुद को पृथक दिखाने के लिए मोदीजी गैर-अनुमानित फैसले (नोटबन्दी) लेते है। जबकि सरकारी नीतियों में इतनी पारदर्शिता होनी चाहिए कि लोग उनका अनुमान लगा सके। लेकिन यह उनका काम करने का बाबूभाई स्टाइल है। इसके बावजूद भी कम से कम आगामी नीतियों के ऊपरी फ्रेमवर्क को ट्रेस तो किया ही जा सकता है।
  1. निजी क्षेत्र काफी संगठित और महत्वकांक्षी हो चुका है। वह अब चुनावो के एजेंडो को निर्धारित करता है। कई राष्ट्रीय दल कॉरपोरेट सेक्टर से भारी चंदा प्राप्त करते है। ऐसे में निजी क्षेत्र किसी प्रकार की लगाम को बर्दाश्त नही करेगा। इसलिए अब भूल जाओ की जो प्राकृतिक संसाधन या राष्ट्रीय सम्पतिया निजी क्षेत्र के पास चली गई है वे वापस राष्ट्रीयकृत की जाएगी। अब तो इसी चीज की निगरानी की जाए कि निजी क्षेत्र को अंधाधुंध संसाधनों का आवंटन नही हो, वरना समावेशी विकास  और ज्यादा मुश्किल होगा क्योंकि लोगो के लिए तो संसाधन उनकी संख्या की मात्रा में उपलब्ध ही नही रह पाएंगे। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा घरेलू छोटी कम्पनियों को पचाने की संभावना काफी तीव्र है। आगामी समय मे नीति निर्माताओं के सामने यह बड़ी चुनौती होगी।
  2. आर्थिक समीक्षा 2016 में कहा गया कि लोककल्याण के कार्यो में अत्याधिक भागीदारी से सरकार ने बोझ बढ़ा लिया है, अब निजी क्षेत्र को सेवा प्रदाता के तौर पर स्वीकार करके एग्जिट नीति पर विचार किया जाना चाहिए। लेकिन लोगो की क्षमता निर्माण को बाजार के भरोसे छोड़ने पर सरकार को भी शंका हुई है और उसने समयबद्ध एग्जिट नीति को अब अपनाया है। मतलब सरकार कार्यक्रमो से हाथ एकदम नही बल्कि एक निर्धारित अवधि के बाद खींचेगी। इसी सिलसिले में FRBM एक्ट के लक्ष्यों के अनुसरण को बंद करने का विचार बनाया गया है।
  3. सरकारे यह मानने लगी है कि देश के जनसांख्यकी लाभांश को भुनाने के लिए आर्थिक इकोसिस्टम का निर्माण किया जाए। इसलिए आगामी दिनों में आर्थिक गतिविधियों के लिए गवर्नेन्स सम्बंधित सुधार गति पकड़ेंगे।
निष्कर्ष :
जैसा की हम देख चुके है कि मोदीजी की नीतियों में भी निरंतरता ही मौजूद है, अगर परिवर्तन कही आया है तो वह है नीतियों को लागू करने में। विकास प्रक्रम में नीतिगत अपंगता और क्रियान्वयन अपंगता को मोदीजी ने सीधे सम्बोधित किया है। इससे पहले मनमोहन सिंह के कार्यक्रमो शायद यह दुविधा थी कि नव उदारवाद का दामन स्थाई रूप से थामा जाए या फिर आर्थिक स्थिति नियंत्रण में आते ही इससे पल्ला छुड़ा लिया जाए। मोदीजी ने इस दुविधा को खत्म कर दिया, वे मानने लगे कि भारत को उभरती अर्थव्यवस्था  वैश्विक नेतृत्व तभी दिलवाएगी जब नव उदारवाद पर पूरी तरीके से आगे बढ़ेंगे। तभी तो वे पश्चिम और खाड़ी देशों के प्रति अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहो का त्याग करके निवेश सम्बंधो को मजबूत करने में लगे है।

जैसा कि The Economist नामक पत्रिका ने भी मोदीजी को नव-प्रवर्तक के बजाय महान प्रशासक माना है। मुझे भी लगता है कि इतिहास भी मोदीजी को इसी रूप में जगह देगा। वे शेरशाह सूरी ज्यादा नजर आएंगे बजाय खिलजी या अकबर।

रोजगारो का प्रायोजित अभाव


हम सब मानते है कि वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से प्रगति कर रही है लेकिन यह प्रगति रोजगार के प्रश्न का उचित समाधान नही कर पा रही है। जब भी कोई भर्ती की सूचना आती है तो उसके लिए पहुचने वाले लाखों आवेदन और फिर आसमान छूती कटऑफ को देखकर लगता है कि रोजगार कितने कम रह गए है और उन्हें पाने की अभिलाषा रखने वालो की संख्या कितनी ज्यादा हो गई है। ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि भर्तियां एक तो नियमित रूप से नही आती दूसरी बात यह है कि उनकी संख्या मांग को देखते हुए बहुत ही कम होती है। इन सबको देखकर ऐसा लगता है कि रोजगारो का संकट उत्पन्न हो गया है।


ऐसे में कहा जा रहा है कि वर्तमान स्थिति में भी रोजगारो की कोई कमी नही है, मौजूदा अभाव एक तरीके से कृत्रिम तौर पर निर्मित किया गया है। सरकारी विभागों में कर्मचारियों के लाखों पद खाली पड़े हुए है, मानव संसाधन के अभाव से हर विभाग को जूझना पड़ रहा है। लेकिन समस्या यह है कि सत्ताधारी वर्ग उन्हें भरने के लिए अनिच्छुक है। मौजूदा अभाव एक तरीके से प्रयोजित है जिसे विभिन्न वर्गों द्वारा प्रायोजित किया जा रहा है।

रोजगारो के अभाव को प्रायोजित करने वाले कारक

1. अंतराष्ट्रीय संस्थान
अंतरराष्ट्रीय संस्थान विभिन्न देशों की नीतियों को प्रभावित कर रहे है। इन संस्थानों में विकसित देशों का बोलबाला है और ये विकासशील देशों में अपने निवेशों को सुरक्षित करने के लिए कई तरह के इंडैक्स जारी करते है और उनमें रैंकिंग सुधारने के नाम पर लोगो का भला करने वाली नीतियों को खत्म करने की वकालत करते है।
ये मानते है कि जो देश नोकरियो में वेतन-भत्तों में ज्यादा व्यव करेगा तो उसका राजस्व घाटा भी  ज्यादा होगा। ऐसे देश से अपने निवेशों की सुरक्षित वापसी मुश्किल होगी, इसीलिए ये सरकारो को प्रभावित करते रहते है।

2. सार्वजनिक क्षेत्र
हर एक सरकारी विभाग मानव संसाधनों के अभाव से ग्रसित है, इस कारण वहां के हर कार्य अटके पड़े हुए है। वे ऊपरी स्तर पर कर्मचारियों की आवश्यकता को भी जाहिर करते है, लेकिन होने वाली नियुक्तियां उनकी मांग से इतनी कम होती है कि नवनियुक्तो के आने से भी विभागीय कामकाज में कोई बदलाव नही आता है। उम्मीद के तौर पर तकनीकी उन्नयन का आश्वासन है कि कम लोग ही तकनीकी की बदौलत सभी कामकाजों को संभाल सकेंगे।

इतनी भयावह स्थिति होने के बाद भी सरकार भर्ती के प्रति अनिच्छुक बनी हुई है क्योंकि वो कर्मचारियों के वेतन-भत्तों का बोझ नही बढ़ाना चाहती है। सरकार को बस राजस्व घाटे का स्कोर कम दिखाकर वाहवाही लूटनी है। अपने कामकाज को निजी क्षेत्र में स्थानांतरित करना तो प्राथमिक बना ही हुआ है , साथ मे तकनीकी की बदौलत जीतने कर्मचारियों को कम किया जा सके, उतना करने की कोशिश जारी है। मौजूदा मानव संसाधन का ही कैसे अधिकतम उपयोग किया जाए, सरकार इस मिजाज में रहती है। अब बोलो इस तरह के रवैये से रोजगार सरकारी विभागों में कैसे निकलेंगे, उल्टा आने वाले समय मे कम और होंगे। अधिकतम कार्यो को संविदा और अस्थायी नियुक्तियो से किया जाएगा।

3. निजी क्षेत्र
निजी क्षेत्र का एकमात्र मकसद मुनाफे पर रहता है। मुनाफे के लिए जरूरी है कि लागत को कम से कम किया जाए। लागत में कटौती जब सम्भव है जब कम लोग ही अधिक कामो को संभाल सके। इसलिए निजी क्षेत्र क्रत्रिम बुध्दिमता पर आधारित स्वचालन का प्रयोग बढ़ाने का पक्षधर है, जिसके कारण नोकरियो में भारी मात्रा में कमी होगी। इसके साथ ही काम करने वालो के सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी दायित्वों को कम करने के लिए श्रम कानूनों को ढीला करवाने के लिए सरकार को भरोसे में लिया जा रहा है, इससे भी लोगो मे अपने रोजगार के प्रति असुरक्षा बढ़ेगी।

कॉरपोरेट सेक्टर ने तो अपने रोजगार के दायित्वों से बचने के लिए बीच मे यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि हम तो रोजगार देने  को इच्छुक है लेकिन भारतीय युवाओं के पास ही रोजगार देने लायक क्षमता नही है। यहां मन मे एक सवाल उठता है कि अगर भारतीयों के पास क्षमता नही है तो फिर उन्ही भारतीयों को नियुक्त करने के लिए H1B वीजा की लड़ाई आप लड़ रहे है? सीधी सी बात है रोजगार की योग्यता का अभाव एक बहाना है। ऐसे कई बहाने इनके द्वारा बनाये जा रहे है। अगर ये कुछ प्रयास भी कर रहे है तो वो सिर्फ औपचारिकता भर है, जैसे कि अप्रेंटशिप के कोर्स करवा दिए, कौशल विकास के शिविर लगा दिए।

दोष देते समय निजी क्षेत्र के हालातों को भी समझ लेना चाहिए। दरअसल वर्तमान बड़ी कम्पनी ओर बड़ी होती जा रही है वे छोटी कम्पनियों को अधिग्रहण, कीमत युध्द, नीतिगत संरक्षण के माध्यम से बाहर कर दे रही है। इससे छोटी इकाइयों के अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो गया है। इस वजह से कम्पनिया अपने भविष्य को कम कार्मिको की बदौलत दिशा देना चाहती है। जैसे कि आईटी सेक्टर में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कम्पनियों ने इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो जैसी कम्पनियों के लाभांश को चुनोती दी है। वालमार्ट ने हाल ही में फ्लिपकार्ट को खरीद लिया है, अलीबाबा भी बड़ी भागीदारी निभा रही है। इसका मतलब है कि संसाधन सम्पन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियों देशी इकाईयो को प्रभावित कर रही है, इसका असर रोजगारो पर भी पड़ रहा है। बड़ी कम्पनियों के पास कामकाज के संचालन के लिए बेहतर तकनीकी और प्रबंधन होता है जिससे कम लोगो का नियोजन सम्भव हो पाता है।

4. नीति-निर्माताओं की भूमिका
रोजगारो के अभाव को प्रायोजित करने में नीति-निर्माताओं की भी बड़ी भूमिका होती है-

  • नीति-निर्माता रोजगार सृजन के लिए कोई मजबूत इच्छाशक्ति नही रखते है। अगर आर्थिक समीक्षा की माने तो वे रोजगार के नाम पर लोगो को केवल जूते-कपड़े बनाने का प्रशिक्षण देना चाहते है। सरकार अनोपचारिक क्षेत्र को ही कागजो के जाल में फंसाकर रोजगार का अहसास दिलाना चाहती है। पकोड़े बनाने को रोजगार कहना कोई जुमला नही था बल्कि वो सरकारी प्रयासों का एक उदाहरण था।
  • नीति-निर्माता राजनीतिक दलों से आते है जोकि अपने वित्तपोषण के लिए कॉरपोरेट सेक्टर पर निर्भर रहते है। अतः उन्हें नाखुश करने के चक्कर मे भी सरकार कोई ठोस व्यवस्था नही कर पा रही है।
  • आरक्षण विरोधी लोग भी सरकारी भर्तीयो के अभाव को प्रायोजित कर रहे है। इनका मकसद है कि भर्तियों को अटकाया जाए और बाद में अधिक नोकरियो को निजी क्षेत्र में बदला जाए। अधिकतम सरकारी काम को संविदा पर करवाया जाए। इसी सिलसिले में बेकलॉग चल रहे लाखो पदों को हाल ही में खत्म कर दिया गया।
इस प्रकार हम देख रहे है कि बाहरी तत्व, सरकार, निजी क्षेत्र और विभिन्न हितों से परिचालित नीति-निर्माता रोजगारो के इस प्रयोजित अभाव के लिए जिम्मेदार है।

समस्या की भयावहता
सबसे बड़ी बात यह है कि यह समस्या नजर आती है। जहाँ देखो काम मांगने वालों, परीक्षा देने वालो, साक्षात्कार देने वालो की भारी भीड़ नजर आती है। इतनी संख्या में छात्र कॉलेजो से बाहर आ रहे है कि नोकरियो की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान मशरूम की तरह फलफूल रहे है, उनकी फीस और कमरों के किराए गरीब छात्रों की जेब काट रहे है। पानी, खाना, अखबार, सामान जैसी कई दूसरी सहायक सुविधा देने वाले लोग छात्रों की मजबूरी का शोषण करने में लगे हुए है। इसके बाद भी आसमान छूती कटऑफ की तरफ सरकार की एक दृष्टि भी नही जाती। लेकिन विडम्बना है कि इनसे आम आदमी जूझ रहा है, नीति निर्माता नही। वे तो खुद और खुद की पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करने में लगे हुए है। और लोगो को आरक्षण, जाति, भाषा और धर्म के नाम पर बांटकर खुश नजर आते है। इसके साथ ही अनियमितताओं से ग्रसित चयन आयोग है जो छात्रों के धैर्य की कठिन परीक्षा ले रहे है। इन सब को भगवान से डरना चाहिए कि एक तरफ तो मानव संसाधनों का अभाव झेल रहे कार्यालय है वही दूसरी तरफ कानून से बंधे और आंसू बहाते अभ्यर्थी है।

अब चलते है समाधान की तरफ
जैसा कि हम जानते है कि भारत अभी जनसांख्यकी लाभांश के दौर से गुजर रहा है, जिसमे 70% लोग 35 साल से कम उम्र के है। मतलब रोजगारो की तलाश करने वाले है या बेहतरीन विकल्पों की तलाश में लगे हुए लोग है।


  1. यह वह समय है जब भारत मे रोजगार के सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनो में काफी अवसर है। लेकिन जनसांख्यकी लाभांश ही वह कारण है जिसकी वजह से गला काट प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। जब हम इस लाभांश को पार कर जाएंगे तब यह हालात नही रहेंगे। यह वह समय है जब लोग स्नातक पूरी करके निकल रहे है, और सरकारी नॉकरी सभी की प्राथमिकता होती है। सरकार को चाहिए कि रिक्तियों को बढ़ाये और आगे चलकर भले ही नियुक्तियों को जनसंख्या के आधार पर विनियमित कर दे।
  2. ऐसा समय है जब इन रिक्तियों को भरने की जरूरत है, लेकिन सरकार को लगता है कि इसके कारण राजस्व घाटा बढेगा। लेकिन वैतनिक लोग बिज़नेस वर्ग से ज्यादा कर अदा करंगे ओर खर्चा करेंगे तो 30% से 40% तक धन तो वापस सरकार या अर्थव्यवस्था में ही चला जायेगा। यह एक तरह से विन-विन सिचुएशन होगी।
  3. एक भर्ती आंदोलन शुरू किया जाए जिसमे सभी विभागों में सभी रिक्तियों की पहचान की जाए और उन्हें भरा जाए। एक पदोन्नति नीति के माध्यम से मेहनती और ईमानदार लोगो को कुछ निश्चित समय के बाद अनिवार्य पदोन्नति दी जाए। एक छंटनी अभियान चलाकर कामचोर कार्मिको को बाहर किया जाए।
  4. सरकार युवाओ को क्यों उद्वमी बनाने पे तुली हुई है। यहा दबावपूर्ण उड्डमशीलता कैसे करेगी, आप लोगो को कह रहे हो कि रोजगार पाने वाले नही देने वाले बनो। लेकिन एक गरीब आदमी का बच्चा स्नातक होते ही स्थायित्व की तलाश में नॉकरी पकड़ेगा या फिर अस्थायी केरियरयुक्त बिज़नेस करेगा। सीधी सी बात है बिज़नेस वाला कार्यक्रम उच्च वर्गो को सम्बोधित करता है, जिनको की दैनिक दिनचर्या के लिए रोजगार की तलाश नही करनी पड़ती, बल्कि अतिरिक्त धन को निवेश करने की तलाश होती है। अतः बिज़नेस वाले पक्ष को सरकार रोजगार समाधान के तौर पर पेश करने से बचे।
  5. कई विभागों में यह कहकर भी नियुक्ति नही निकाली जा रही कि उनका तकनीकी उन्नयन किया जाएगा जैसे कि रेलवे। अगर रोजगारो में कटौती की कीमत पर यह सब करना होता तो यह पिछली सरकारों के लिए भी आसान था। लेकिन सामाजिक सुरक्षा और न्याय की भावना को उद्धम से पृथक करके देखने का प्रयास उन लोगो ने नही किया।


निष्कर्ष
राजस्व घाटे के स्कोर को कम करके हम कुछ भी बड़ा नही कर रहे है। निजी क्षेत्र को सहूलियत देकर हम अमीर-गरीब की खाई को दिनोदिन ओर बड़ा रहे है। कक्षा में एक छात्र मेरिट में आ जाये और बाकी के छात्र असफल हो जाये तो क्या ऐसी कक्षा के परिणाम को बेहतर कहा जायेगा? नही। समावेशी विकास का सफर रोजगारो के माध्यम से ही तय होगा, इसलिए सरकार, नीति-निर्माताओं को लोकतांत्रिक दायित्वों का प्रति सोच लेना चाहिए और इस अभाव को जल्दी से जल्दी खत्म करना चाहिए। जब रोजगार नही दे सकते तो ग्रोथ रेट के स्कोर ओर व्यापार में आसानी की रैंकिंग कोई ऐसे मुकाम नही है, जिन पर सीना चौड़ा किया जाए।

How Ages Care Each Other


Recently I stayed three days at Divisional Railway Hospital, vadodara for my medical examination to the ASM post. The report of check up takes time so During this I got much time to earn lot of observation about the care of different ages by their patronage age apart from hospital. The scary pattern I observed was about the care of elderly.

The following category are considering inside this article:
1. Care of Elderly by youngsters
2. Care of young by Elders 
3. Mutual Care of Elders

अधिकतर बुजुर्ग चलने, सुनने के सहायक उपकरणों से जूझ रहे थे। उनके साथ मे कोई भी वयस्क सदस्य नही था, ज्यादातर छोटे बच्चों के भरोसे थे।



कुछ उदाहरणो का मै यहाँ पर जिक्र करना चाहूंगा ताकि मुद्दे को स्पष्ट किया जा सके-

1. वैसे तो अस्पताल कर्मचारी बहुत ही हार्दिक व्यवहारशील थे, लेकिन दो-तीन बार मे उनके निर्देशो को ग्रहण नही करने पर बुजुर्गों के साथ काफी रूखेपन से पेश आ रहे थे। एक आदमी जोकि आंखों की समस्या के लिए आया था उसे श्रवण सम्बंधित समस्या भी थी, तो जाहिर है वह उनके निर्देशो की गलत वाख्या ग्रहण कर गया होगा। उसे मेरे सामने धक्के मारकर ओर बहरेपन पर ताना मारकर बाहर कर दिया। यह दृश्य बहुत ही व्यतीत करने वाला था।

-कहने का मतलब है कि बुढ़ापे में एक से ज्यादा समस्या एक साथ रहती है, एक का इलाज करवाओ तो दूसरी भी साथ मे तैयार रहती है। साथ ही ये समस्याए आदमी को घर और बाहर के धक्के खाने के लिए मजबूर कर देती है।

2. While our test were running in PME Hall, we were waiting outside for our turn. OPD was in front of us so most of the patients also moving from there.
एक औरत अपनी सास को पीछे छोड़कर आगे-आगे चली जा रही थी। जबकि उसकी सास बहुत ही तकलीफ से चल रही थी, वह अपने एक हाथ मे अपने पेशाब की थैली को संभाले हुए थी और दूसरे से चलने की बैशाखी को। इस समय जरूरी था कि वह उसको चलने में सहायता के लिए उसके साथ चलती। लेकिन वह एक बूढ़ी औरत के साथ चलकर अपने स्टेटस को डाउन नही करना चाहती थी।
- सीधी सी बात है भाई बुढ़ापे में आदमी साफ-सुथरा तो रहेगा नही, दिखने में भी पहले वाली बात नही होगी, हो सकता है उन्हें पेशाब की नली भी लग जाये। ऐसे में कोई भी युवा अपने को उनके साथ दिखाकर अपनी काल्पनिक छवि को खराब नही करना चाहता। ऐसी मानसिकता यहाँ काम करती है।

3. A girl who was with her grandfather, sit nearly our bench . The boys of our group putting some grass to her so to reply them she continuously blush like an complete idiot.Same time she was ignoring the old man's things, Even he took a bottle and pointed to water but she ignored it.
तब हमारे एक लड़के से रहा नही गया, वह पानी लेकर आया और उस लड़की को फटकार लगाई की "फिर किस लिए आई हो यहाँ पर, ये काम तो बाहर ही बहुत कर लेना।" उसके बाद सारे समय वह हमसे नजरें चुराती रही।
कहने का मतलब है बुढ़ापे में आदमी हर एक चीज को लेकर उपेक्षा झेलता है। चाहे बड़े हो या बच्चे, घर की बात हो या उसकी देखभाल की। आदमी को यह स्वीकार करने में बहुत समय लगता है कि कल के बच्चे आज उसका लिहाज ही नही कर रहे है। आदमी के हाथ से सत्ता निकलती है तो उसे पचाने में समय लगता है।बुजुर्गो के लिए यह बहुत तकलीफ भरा समय होता है।

But at the same time the other side of the picture also available completly opposite which i observed there .
एक लड़की स्कूटी से अपना पैर कुचलवा बैठी थी। उसके पिताजी उसे अपने पारिवारिक चुटकलों को सुनाकर यह अहसास दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि मानो कुछ हुआ ही नही हो। कहने का मतलब है कि बड़े लोग छोटे लोगो को यह अहसास भी नही होने देते की तुम गलत थे, वे बस देखभाल करते है। वही छोटे लोग बुजुर्गो को अहसास करवाते रहते है कि हम तुम पर अहसान कर रहे है, अन्यथा तो तुम बोझ ही हो।

I don't want to become a judge here who decide what is wrong with youngsters, i know, they have their own priorities. But I wants to put a effort of Administrative approach to mitigate the problem.

मुझे लगता है कि जब हमारे हाथ-पांव और दिमाग काम करता है तो उसे हम दुनिया भर के कामकाजों में लगा देते है। हम कभी सोचते भी नही है कि एक दुनिया हमे हमारे लिए भी बनाकर रखनी चाहिए जहां हम उम्र का आखिरी पड़ाव गरिमामय पूर्ण तरीके से गुजार सके, ओर अंत मे हम सम्मानजनक तरीके से दुनिया से विदा हो सके। ऐसी तैयारी हमे पहले से करके रखनी चाहिए।

यह कितना मुश्किल होता होगा न कि किसी आदमी ने जिंदगी पूरी खुद्दारी और स्वाभिमान के साथ गुजारी हो और बुढापे में किसी वजह से वह आश्रित हो जाये और उसे ताने सुनने पड़े, उपेक्षा झेलनी पड़ी, अपमानित होना पड़े। मुझे लगता है इनसे बचने की तैयारी हमे पहले से ही कर देनी चाहिए।

एक उदाहरण हम वैज्ञानिक सी वी रमन का लेते है वे जानते थे कि अपने शर्तो से समझौते करके वृद्धावस्था नही काट पाएंगे तो उन्होंने रिटायर होने से पहले ही रमन अकादमी बनवा ली ताकि बाकी की उम्र को वहां गुजारा जा सके। इसलिए हमे भी सामुदायिक तौर पर विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे संस्थानों की भारी मात्रा में स्थापना की जानी चाहिए जहां पर समान हित और रुचियों वाले बुजुर्ग लोग मिल जुल सके और युवा भी उनके माध्यम से उनके अनुभवों से लाभान्वित हो सके।

(#बुजुर्गो के जीवन को बेहतर करने के लिए आपसे भी सुझाव आमंत्रित है। इस लेख को कुछ सुझाव इकट्ठे होने पर मै फिर से सम्पादित करना चाहूंगा।)

अंत मे जाते-जाते मै एक और बात कहना चाहूंगा कि अपना जीवनसाथी ही बुढ़ापे में सबसे बड़ा देखभाली (caretaker) होता है, भले ही वह भी आपकी तरह ही असहाय क्यों न हो, बाकी तो औपचारिकता पूरी करते है। अनुभव से हासिल की गई बात है ये 

प्रशासक के तौर पर मोदीजी से क्या सीखे

वैसे तो एक प्रशासक राजनीतिक रूप से निष्पक्ष होता है और उसके पास अनुभव और ज्ञान ही इतना होता है कि वह पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सोच सकता है और वह इसी तरीके से कार्य करता भी है। उसके लिए सभी दल एक जैसे होते है और वह किसी भी दल या समूह के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ नही होता है। वही प्रधानमंत्री मोदीजी राजनीतिक कौशल में तो महारत रखते ही है  लेकिन प्रशासक के तौर पर अपने कामकाज को इस तरह से अंजाम दिया है कि वे भविष्य के अफसरों के लिए कुछ पदचिन्ह छोड़ जाते है।
उनके कार्य करने की शैली अनूठी है जिसे हम निम्न बिन्दुओ के माध्यम से समझ सकते है-



1. खुद की कमियों के बजाय खुद की क्षमताओं पर भरोसा

  • खुद की भाषा, संस्कृति पर गौरव की भावना होनी चाहिए, न कि शर्म और हो सके तो उन्हें दूसरे लोगो मे भी विस्तारित करना चाहिए। मोदीजी ने विदेशी मंचो पर भी हिंदी का धड़ल्ले से प्रयोग किया, भारतीय वेशभूषा को अपनाया, योग के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करवाया।
  • कभी भी नकारात्मक राजनीति को नही अपनाना चाहिए। जब 2014 के चुनाव हो रहे थे तो केजरीवाल ने यह फैलाया की देश तो बिकने वाला है, कुछ दिनों बाद आपको देश नही मिलेगा। ऐसा कहकर निराशा फैलाने की कोशिश की। मोदीजी ने उसी समय कहा कि देश विकास कर रहा है और बहुत जल्दी अच्छे दिन आने वाले है। लोगों को आशा पसन्द आयी।

2. सही समय का इंतजार करो, धैर्य रखो तब तक।

  • अगर आप कुछ बड़ा करना चाहते हो तो बीच मे हो-हल्ला मत करो, सही समय का इंतजार करो। वरना ईर्ष्या, द्वेष वाले लोग तुम्हे हतोत्साहित करेंगे और तुम उनसे निपटने में ही अपनी ऊर्जा गवां दोगे। यह भी हो सकता है फिर लोग आप जो करना चाहते  है वहाँ से पहले ही रोक दे।
  • टी.एन. शेषन ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त बनने पर सुधारो को सख्ती से लागू किया था। उससे पहले तो सभी नेता उसे सीधा-साधा अफसर ही मानते थे। और नेताओं को पता लग जाता कि यह इतना कड़क अफसर निकलेगा तो वे उसे कभी चुनाव आयुक्त नही बनाते।

3. अपनी खुद की प्राथमिकताओ के लिए काम करो, चाहे कोई नाराज हो या फिर विरोध करे।
-मोदीजी ने कई प्रोजेक्ट अपनी मर्जी से निर्धारित किए, विपक्षी दलों ने खूब आलोचना की, लेकिन उन पर कोई फर्क नही पड़ा। उन्होंने अधिकतर प्रोजेक्ट में गुजरात को फायदा पहुचाया। इसलिए अपने प्राधिकार का प्रयोग अपने लोगो को उठाने के लिए जरूर करो। वरना कल को लोग कहेंगे कि खुद तो अफसर बन गया लेकिन भाई तो गांव में ही घूम रहे है।

4. लोगो से जुड़ने की क्षमता।

  • लोगो से बात करने के अधिकतम प्रयास किये जाने चाहिए। ध्यान रहे केवल सकारात्मक वार्तालापों का ही हिस्सा बने, डिबेट में कभी नही उलझना चाहिए (bcoz debates exchange negative energy)। मन की बात इसी तरह का प्रयास है।
  • मोदीजी मे उच्च स्तर की भावनात्मक बुद्धिमत्ता है। उनमें किसी भी आदमी से बात करने की क्षमता है, वे बच्चों से बच्चों की तरह, युवाओ से युवाओ की तरह, अन्य लोगों से भी उनकी जगह पर खुद को मानकर बात करना।
  • विपक्षियों से भी सकारात्मक तरीके से बात करना, उनसे समर्थन और सुझाव मांगना, चाय पे आमंत्रित करना आदि।मतलब औपचारिक शिष्टाचार कायम रखना चाहिए, विरोध के बावजूद भी।

5. बुनियादी समस्याओ को पहचान करने की क्षमता है कि आखिरकार गड़बड़ क्या है और उसे सही कैसे किया जा सकता है।
यह क्षमता गवर्नेन्स में बहुत ही ज्यादा मायने रखती है, इनसे हम योजनाबध्द तरीके से आगे बढ़ सकते है, जैसे कि स्वच्छ भारत योजना, उदय और उज्जवल स्कीम आदि।
अगर यह क्षमता हमारे पास नही होगी तो पॉलिसी पैरालिसिस की समस्या उत्पन्न हो जाएगी।

6.योजनाओ को जमीन पर उतारने की प्रतिबध्दता है, भले ही लोगो को परेशानी हो सकती है, परन्तु यह तनिक समस्या आगे के समय और आगे की पीढ़ी के लिए सुविधा बन जाएगी, यह सोच होनी चाहिए।
- स्वच्छ भारत मिशन में लोगो को शौचालय बनवाने के लिए मजबूर किया गया, विरोध से बचने के लिए अनुदान की व्यवस्था की। लोगो के पास पानी तक कि व्यवस्था नही थी फिर भी बनवाने पड़े। नोटबन्दी में लोगो की परेशानी की कीमत पर प्रतिबद्धता दर्शाई गई।

7.मौजूद अव्यवस्थाओ को समाप्त करने या कम करने के लिए लोगो को भरोसे में लेने की क्षमता।

  • गैस सब्सिडी को खत्म करने के लिए लोगो को राजी किया कि बड़ा दिल दिखाओ और give up करो। इसी पैसे से गांवो में चूल्हे की धूणी से मुक्ति दिलाएंगे। अगर बिना give it up campaign के सब्सिडी खत्म की जाती तो पक्की बात है कि हो-हल्ला होता।
  • हालांकि भूमि अधिग्रहण बिल पर किसानों को भरोसे में नही ले सके तो उन्होंने हार मान लेने में भी कोई आनाकानी नही की।

8. किसी क्षेत्र पर फोकस करने के लिए, दूसरे क्षेत्रों को भी प्रयोग करो।
- मोदीजी का पूरा जोर इंडस्ट्रियल/मैनुफैक्चरिंग के विकास पर रहा तो हर विभाग के कामो को इंडस्ट्रियल-फ्रेंडली बना दिया।
यह सबसे बड़ी चीज है, अगर किसी को किसी विशेष क्षेत्र में कोई वादा पूरा करना हो तो उसे इसी तरीके से पूरा करना चाहिए। सारी कायनात को उसी मकसद की पूर्ति के लिए लगाना पड़ता है।

9. योजनाओ और कार्यक्रमो का प्रचार।
-मोदीजी आसान से आसान भाषा मे हर स्कीम के बारे में लोगो को किसी न किसी प्लेटफार्म के माध्यम से अवगत करा देते है। कह सकते है कि प्रधानमंत्री खुद अपनी योजनाओ के ब्रांड अम्बेसडर है।

10. तकनीकी के प्रयोग को सुशासन का जरिया बनाना चाहते है। प्रशासकों को नवीन उपायों के प्रति सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए।

मोदीजी की प्रशासक के तौर पर तारीफ की विदेशी अखबार भी कर चुके है। प्रशासनिक सुधारो के मामले में मोदीजी के प्रयास शेरशाह शूरी की याद दिला देते है, जो अपने  एक छोटे से कार्यकाल में दिल्ली सल्तनत के सारे प्रशासनिक विकासक्रमो को संगठित कर देता है। उसी प्रकार कांग्रेस के दौरान जो भी प्रशासनिक प्रगति हुई थी, मोदीजी भी उसी को संगठित और परिष्कृत कर रहे है। साथ ही उभरते भारत की जटिलताओं के लिए प्रशासनिक तैयारियों में लगे हुए है।

खेती में शारीरिक जोखिम

खेतीं के कामकाजों में गम्भीर शारीरिक जोखिम निहित रहती है। ये जोखिम कृषि कार्यों के दौरान लापरवाही बरतने, कृषि यंत्रों के संचालन में कौशल के अभाव या कई प्रकार की दुर्घटनाओं के कारण होती है। जिनके कारण लोग शारीरिक अंगो को या तो विकृत कर लेते हैं या जान से ही हाथ धो बैठते है। इसके अलावा मेहनत भी अकुशल तरीके से करने के कारण सेहत पर भी कुप्रभाव पड़ता है। ऐसा लगता है कि लोग इसे मजबूरी ज्यादा और एक पेशा कम समझते है।

गांवो में लोग खेतीबाड़ी के कामो में दिन-रात कठीन परिश्रम करते है और फिर उसके अनुरूप   पोषण नही प्राप्त करते है। इस तरह की जीवन शैली के लंबे समय तक चलने से उनके शारीरिक ढांचे में बदलाव आ जाता है। जो लोग मजदूरी करते है वे भारी भरकम सामान उठाने के कारण कमर से झुक जाते है। इस वजह से वे युवावस्था के उत्तरार्द्ध से ही वृध्दों के समान लगने लग जाते है। अकुशल तरीके से की जाने वाली मेहनत उनके शरीर को निचोड़ लेती है। इससे उनकी रोग प्रतिरोधकता पर भी असर पड़ता है जिसके कारण वे बुढ़ापे के दिन बीमारियों के साथ व्यतीत करते है।

कृषि कार्यो के दौरान भी कई ऐसी घटनाएं होती है जो गम्भीर शारीरिक नुकसान पहुचाती है। जो कि इस प्रकार है-
  1. धूल और धुंए सम्बंधित कई कामकाज ऐसे होते है जो सांस व त्वचा की बीमारियों को जन्म देते है जैसे कि थ्रेशिंग कार्य। त्वचा सम्बंधित बीमारी अक़्सर बच्चों में ज्यादा देखने को मिलती है, इनमे फोड़े, खाज-खुजली, एलर्जी आदि शामिल है।
  2. गांवो में बरसात के पानी के निकास की सही व्यवस्था नही होती है, ऐसे में गंदे जल से बार-बार निकलने के कारण पैरो में खारवा नामक समस्या लोगो को होती है। पांवो के फटने की समस्या भी अधिकतर महिलाएं और पुरुषों में देखी जाती है। कई लोगो के तो हाथ की धारियां ही मिट गई है, जिसके कारण उन्हें बॉयोमेट्रिक प्रमाणीकरण में दिक्कत होती है ।
  3. कई जानलेवा चीजे भी खेतीं के कार्य मे निहित होती है। कई बार लोग फसल कटाई या चारा काटते समय अपने अंगो को क्षतिग्रस्त करवा बैठते है। मशीनों से कइयों की अंगुली कट जाती है तो कइयों के हाथ या पैर, कई बार तो थ्रेशिंग मशीनों से लोगो तक के मरने तक कि खबर सुनने में आती है।
  4. रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग के सही तरीको से अज्ञानता के कारण भी समस्या उत्पन होती है। लोग उन्हें सीधे हाथ मे ले लेते है और फिर हाथ सही से साफ नही करते है। उन्हें छिड़कते समय भी मुह को ढककर नही रखते है। जिसके कारण साँस लेने में समस्या होती है और कई प्रकार की त्वचा सम्बंधित एलर्जी उत्पन हो जाती है।
  5. फसली कामकाज के दौरान जहरीले कीड़ो का भी खतरा रहता है। सांप, बिच्छू जैसे जीव खेतो में घूमते रहते है। घास में ये दिखते तो है नही और जब गलती से हाथ-पैर लग जाता है तो ये काट लेते है। इनके उपचार के लिए भी स्थानीय स्तर पर कोई चिकित्सकीय व्यवस्था नही होती है। लोग झाड़फूंक के भरोसे रह जाते है।
  6. विधुत लाइनो की क्षतिग्रस्तता भी किसानों के लिए जानलेवा बन रही है। खंभो और तारो का सरकार द्वारा समय पर रखरखाव नही किया जाता है, जिससे वे कभी भी टूटकर खेतो में गिर जाते है। ऐसे में अंधेरे-उजाले खेतो में जाने वाले किसानों को करंट लग जाता है। उच्च वोल्टेज के उतरने पर भी विधुत उपकरणों की वजह से करंट आ जाता है।
  7. लोगो को शारीरिक नुकसान पहुंचाने में आपसी झगड़ो का भी योगदान रहता है। वे खेतो की मेड़बंदी, मेड़ो पर स्थित पोधो के स्वामित्व को लेकर, पशुओं के दुसरो के खेतों में जाने को लेकर आपस मे लड़ पड़ते है। इन बातों पर वे लाठी या धारदार हथियारों का प्रयोग करते है जिससे सामने वाले के या तो हाथपैर तोड़ दिये जाते है या काट दिये जाते है, कई बार तो जान भी चली जाती है।
उपाय
कृषि कार्य के दौरान होने वाली शारीरिक जोखिमों को कम करने के लिए वैसे तो सबसे बड़ा उपाय सावधानी बरतना है फिर भी निम्न उपाय किए जाने चाहिए--
  1. साँस व त्वचा सम्बंधित समस्याओं का कारण धूल और धुंए में कार्य है। इसलिए किसानों को ऐसी पध्दतियों से अवगत कराने की जरूरत है जो स्वच्छ तरीके से करे जा सकते हो। गंदे जल की निकसीं की व्यवस्था की जाए ताकि उसमे बार-बार घूमने की जरूरत नही पड़े।
  2. कृषि उपकरणों को चलाने का प्रशिक्षण दिया जाए , बिना जानकारी के अभाव में मशीनों से अपने हाथपैर कटवा लेते है। मशीनों की डिज़ाइन भी इस तरीके से की जाए कि वे लापरवाही और असावधानी की दशा में नुकसान दायक साबित नही हो।
  3. रासायनिक पदार्थो को प्रयोग करने के सही तरीको के बारे में किसानों को अवगत कराया जाए। हाथ मे दस्ताने लगाने और मुंह ढकने की सलाह दी जाए।
  4. जहरीले कीड़ो के काटते ही आदमी और उसके आसपास के लोग अपना आपा खो देते है। जल्दबाजी में वे कोई उचित कदम नही उठा पाते है। पहले तो उन्हें प्राथमिक चिकित्सा के बारे में अवगत कराया जाए और फिर स्थानीय चिकित्सालय में पहुचाया जाए। जहर-रोधी दवाएं गांवो के स्तर तक भी उपलब्ध होनी चाहिए।
  5. करंट लगने की दशा में भी प्राथमिक उपचार से लोगो को अवगत कराया जाए। इसके अलावा तारो की समय-समय पर देखरेख की जानी चाहिए। तारो की लाइनो को खेतों के बीच से होकर कम से कम निकाला जाए।
  6. लोगो को आपसी झगड़ो के समाधान में भी कम आक्रामक रहने की सलाह दी जाए। छोटी-मोटी लड़ाइयों में शरीर को नुकसान पहुंचाने को कभी भी सही नही कहा जा सकता।

निष्कर्ष
इस प्रकार खेतीं के कार्य को कम जोखिमयुक्त बनाया जा सकता है। ग्रामीणों को कौशल प्रशिक्षण और तकनीकी साहचर्यता से परिचित कराकर इन समस्याओं के समाधान ढूंढना चाहिए।
कोई भी ऐसी आजीविका सही नही मानी जा सकती जिसमे शारीरिक नुकसान शामिल हो। कृषि को भी एक आरामदायक पेशा बनाया जाना चाहिए जिसे तकनीकी उपकरणों और पध्दतियों के माध्यम से सुनिश्चित किया जाए।