बजरी खनन पर न्यायिक रोक : कारण एवं समाधान

बजरी निर्माण कार्यों में उपयोग होने वाला प्रमुख खनिज हैं। इस समय पर तेजी से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था में निर्माण कार्य पर्याप्त मात्रा में हो रहे है। निर्माण कार्यों के अनुपात में ही बजरी की भी मांग बढ़ रही हैं। राजस्थान के बनास, मोरेल एवं अन्य नदियों जैसे कई बजरी प्राप्त करने के प्रमुख स्त्रोत हैं। राजस्थान के ये बजरी के स्त्रोत न केवल राजस्थान की बल्कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली की बजरी की आवश्यकताओं को काफी हद तक पूर्ण कर सकते हैं। लेकिन राजस्थान में बजरी खनन पर रोक लगी हुई हैं। चूंकि निर्माण कार्य तो बंद हो नहीं सकते, इसलिए इनकी मांग को पूर्ण करने के लिए अवैध तरीके से बजरी का खनन एवं परिवहन किया जा रहा हैं। इस अवैध तरीके से बजरी की आपूर्ति ने एक माफिया-अफसर-राजनेताओं के कुख्यात गठजोड़ को जन्म दिया हैं। इससे रोक का कोई फायदा नहीं निकल रहा हैं। एक तरीके से सरकार की नाक के नीचे से अवैध खनन, भंडारण एवं परिवहन हो रहा हैं। 

राजस्थान में बनास सहित अन्य नदियों में बजरी खनन 16 नवंबर 2018 से सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशानुसार बंद हैं। कुछ जगहों पर पहले से ही बंद हैं, जैसे- नागौर, बीकानेर। इस आलेख में हम उन कारणों की पड़ताल करेंगे, जिनके कारण ऐसी परिस्थितियां निर्मित हुई हैं।

पृष्ठभूमि

दरअसल केंद्र सरकार ने खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत बजरी जैसे कुछ खनिजों को लघु खनिज (Minor Mineral) घोषित किया हैं, जिनके लिए शक्तियों को राज्य सरकार को हस्तांतरित किया गया हैं। इन शक्तियों का प्रयोग करते हुए राजस्थान सरकार बजरी खनन के लिए खानों का आवंटन करती हैं। चूंकि खनन के परिवेश पर प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव होते हैं, इसलिए खनन शरू करने से पहले पर्यावरण विभाग से अनुमति की भी आवश्यकता होती हैं। पर्यावरणीय अनुपालन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण का भी गठन किया हैं। चूंकि बजरी खनन नदी के पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित करता हैं, इसलिए पर्यावरणीय कारणों से इसके खनन को विनियमित किया जाता हैं। अथार्त किसी खान विशेष की पृष्ठभूमि, खनन के बाद वापस बजरी आने की संभावना एवं समयावधि, संपार्श्विक परिवेश पर प्रभाव आदि पहलुओं को ध्यान में रखते हुए खनन की अनुमति दी जाती हैं। राजस्थान में खानों का आवंटन करने के बाद इस प्रक्रिया के पालन में चुक हुई और न्यायालय द्वारा रोक लगा दी गई। चलिए इस संदर्भ में हुए घटनाक्रमों को समझते हैं।

1. दुर्गा शक्ति नागपाल वाद, 2013 और बिना EC बजरी खनन पर रोक

दुर्गा शक्ति नागपाल उत्तर प्रदेश कैडर में एक आईएएस अधिकारी थी, जिन्हें अगस्त 2013 में गौतम बुध नगर एसडीएम के पद पर रहते हुए बजरी माफिया पर कार्रवाई के कारण शासन द्वारा निलंबित कर दिया गया था। एनजीटी ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए 5 अगस्त 2013 को एनजीटी बार एसोसिएशन की याचिका पर संपूर्ण देश में बिना पर्यावरणीय मंजूरी के बजरी खनन पर रोक लगा दी। NGT ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत कार्यवाही करते हुए इस आदेश को जारी किया तथा जिले के पुलिस अधिकारियों को इसका अनुपालन सुनिश्चित कारने के लिए अधिकृत किया। NGT का मानना हैं कि बजरी खनन संबंधित क्षेत्र की पारिस्थितिकी को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता हैं। [1]

इस निर्णय में NGT ने दीपक कुमार बनाम हरियाणा सरकार वाद में उच्चतम न्यायालय के निर्णय (फरवरी,2012 ) की भी पुष्टि की, जिसमे पांच एकड़ से कम भाग में खनन करने के लिए भी सक्षम अधिकारीयों से पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त करने की बात कही गई थी। इस आदेश के साथ ही पर्यावरणीय अनुमति के बिना बजरी खनन बंद हो गया।

मन में एक संदेह यह रहता हैं कि जब 2012 में ही उच्चतम न्यायालय ने बजरी के खनन पर रोक लगा दी थी, तो 2013 में NGT को फिर से प्रतिबन्ध लगाने की जरुरत क्यों पड़ी। इसका उत्तर यह हैं कि बजरी राज्य द्वारा नियंत्रित खनिज हैं, इसलिए NGT के निर्णय में इसका सभी खनिजो, राज्यों एवं नदियों तक विस्तार किया गया।

जयसिंहपुरा गाँव का अतिक्रमण विरोधी प्रदर्शन

धरना प्रदर्शन को लोकतंत्र में अपनी मांग मनवाने का सबसे सशक्त एवं शांतिपूर्ण माध्यम माना जाता हैं। हालांकि सरकार द्वारा ऐसे प्रदर्शनों को ज्यादा महत्त्व देने के परम्परा कमजोर पड़ी हैं। जैसे कि दिल्ली में किसान अपनी मांगों के लिए 25 नवंबर से प्रदर्शन कर रहे हैं,लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं आया हैं। फिर भी धरना प्रदर्शन ही वह हथियार हैं, जो अकर्मण्य एवं उदासीन शासन व्यवस्था को गहराई तक प्रभावित करता हैं। ऐसी ही एक घटना एक दिन मैंने सवाई माधोपुर के अखबार में पढ़ी। जो इस प्रकार थी कि खण्डार तहसील क्षेत्र के जयसिंहपुरा गांव (ग्राम पंचायत गोठड़ा) के लोग 11 दिन से धरने पर बैठे हुए हैं। इनकी मांग थी कि चरागाह भूमि पर हो रहे अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की जाए। यह धरना 4 जनवरी से शुरू हुआ था और 12 दिन तक जारी रहा था। शुरू में तो प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की, लेकिन जब धरना लंबा चलता हुआ दिखाई दिया तो प्रशासन द्वारा समस्या समाधान के लिए विधिवत प्रक्रिया शुरू की गई। लेकिन यह अपने आप में ही एक अनूठा उदाहरण था, जिसमे अतिक्रमण जैसी समस्या के लिए लोग स्वंय आगे आ रहे थे। सरकारी भूमि पर अतिक्रमण एक समस्या हैं, और किसी ने इसके खिलाफ एकजुट होकर पहल करने का साहस जुटाया हैं। यह सब सोचने पर मजबूर करने वाला था। 

हम इस आलेख में इस धरने में हुए घटनाक्रमों के माध्यम से अतिक्रमण की समस्या से जुडी जटिलताओं को समझाने की कोशिश करेंगे। साथ ही अतिक्रमण के लिए उत्तरदायी कारणों, उत्तरदायी व्यक्तियों की भूमिका एवं समाधानों पर भी विचार करेंगे।

मौजूदा घटनाक्रम : 

दरअसल, 4 जनवरी 2021 को सुबह करीब 8 बजे जयसिंहपुरा के दर्जनों ग्रामीण तहसील कार्यालय खंडार पर ज्ञापन देने पहुंचे थे। यहां ग्रामीणों द्वारा खंडार तहसीलदार को ज्ञापन सौंपकर गांव की चरागाह, सिवायचक व आबादी भूमि से अतिक्रमण हटाने की मांग की गई। जिस पर प्रशासन द्वारा उन्हें कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। इससे एक दिन पूर्व भी इस मामले में उनके द्वारा प्रशासन को ज्ञापन दिया गया था। और आज भी कार्रवाई के लिए प्रशासन की कोई गंभीरता नजर नहीं आ रही थी। ऐसे में देर शाम तक भी सुनवाई नहीं होने पर ग्रामीण भड़क गए और तहसील कार्यालय में ही करीब 30 लोग धरने पर बैठ गए। इनका कहना था कि जब तक संपूर्ण सरकारी जमीन से अतिक्रमण नहीं हटाया जाता है, तब तक वे धरनास्थल से किसी भी सूरत में नहीं उठेंगे।

अब बात यह हैं कि यह समस्या तो कई जगह देखने को मिल जाती हैं फिर इनकी समस्या में क्या गंभीरता थी, जो इन्होने इतना बड़ा कदम उठाया।

1. आइये इस मामले की पृष्ठभूमि को समझते हैं 

इस मामले को हम शुरू से ही समझते हैं।

  • सरकारी भूमि पर अतिक्रमण : ग्रामीणों ने बताया हैं कि वे पिछले 15 सालों से लगभग 150 बीघा चरागाह, शिवायचक व आबादी भमि पर अतिक्रमण से परेशान हैं। सरकारी खाली भूमि की अनुपलब्धता के कारण उन्हें मवेशी चराने में परेशानी का सामना करना पड़ता हैं। जबकि अतिक्रमियों द्वारा उस पर खेती की जा रही हैं या घर बना लिए गये हैं।
  • भूमाफियाओं द्वारा सरकारी भूमि पर ही प्लाट काट कर बेचना : यह गांव खंडार तहसील मुख्यालय से थोड़ी ही दुरी पर हैं। इसलिए शहरी क्षेत्र के आसपास रहने को इच्छुक लोगो को भूमाफियाओं द्वारा इन जमीनों पर प्लाट काट कर बेच दिए गये।
  • ग्राम पंचायत द्वारा पट्टे जारी कर देना : जयसिंहपुरा गाँव, गोठड़ा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता हैं। ऐसे में अतिक्रमियों को गोठड़ा ग्राम पंचायत से आसानी से अवैध पट्टे भी प्राप्त हो गये। जब जयसिंहपुरा के पुरे ग्रामीण इन अतिक्रमियों के विरुद्ध हैं तो उन्हें किस की शह प्राप्त हो रही हैं, तो इसका जवाब यहाँ से प्राप्त किया जा सकता हैं। हो सकता हैं, इसमें दोनों गांवों की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता का आयाम भी शामिल हो।  
  • शिकायत : जब इन लोगो को फर्जी पट्टे भी प्राप्त हो गये तो जयसिंहपुरा के लोगो ने प्रशासन से शिकायत की। 
  • संपूर्ण भूमि का सीमांकन : प्रशासन द्वारा वर्ष 2011 में संपूर्ण भूमि का सीमांकन करवाया गया। 
  • फर्जी तरमीम का खुलासा :  वर्ष 2011 में राजस्व विभाग के तत्कालीन अधिकारियों द्वारा गांव की संपूर्ण चरागाह व सिवायचक भूमि का सीमाज्ञान करवाकर रिपोर्ट तैयार की गई थी। जिसमें कई खातेदारों का मौके पर कब्जा काश्त ही नहीं पाया गया था। जबकि राजस्व विभाग के तत्कालीन अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा बिना कब्जा काश्त भूमियों पर ही कई फर्जी तरमीम भी की गई थी। इन सबका सीमाज्ञान के दौरान खुलासा हो गया था।
  • न्यायालय द्वारा फर्जी तरमीम खारिज : राजस्व न्यायालय द्वारा इनमे से कई फर्जी तरमीम को खारिज कर दिया गया।
  • राजस्व विभाग द्वारा बेदखली की कार्यवाही नहीं करना : राजस्व न्यायालय द्वारा फर्जी तरमीम खारिज होने के बावजूद राजस्व विभाग के अधिकारियों की नाकामी के चलते मौके पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है।
  • भूमाफियाओं के हौसले बुलंद/प्रोत्साहन : कोई कार्यवाही नहीं होने से भूमाफियाओं को प्रोत्साहन मिला और उन्होंने फिर से निरस्त तरमीम वाली भूमि पर ही प्लाट काटकर बेच दिए। ग्रामीणों का यह भी मानना हैं कि अतिक्रमण राजस्व कर्मियों की भूमाफियाओं के साथ मिलीभगत के कारण हुआ है।
  • शिकायत पर कार्यवाही नही होना : इनके विरुद्ध जयसिंहपूरा गाँव के लोगों ने बार-बार प्रशासन को अपनी शिकायत प्रस्तुत की। अब तक करीब एक दर्जन से अधिक बार प्रशासन को ज्ञापनों के माध्यम से शिकायत कर चुके है, लेकिन प्रशासन द्वारा हर बार अतिक्रमण हटाने का आश्वासन देकर उनके साथ धोखा किया जाता रहा है। प्रशासन द्वारा कार्यवाही के लिए कभी भी कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई। ऐसे में पूरे गांव में प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश व्याप्त है।

इस प्रकार इस समस्या की दीर्घकालिक प्रकृति के कारण इस आन्दोलन की पृष्ठभूमि निर्मित हुई।

जलवायु परिवर्तन के वैश्विक एजेंडे में कोरोना संकट जनित व्यवधान

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ शुरू हुई उपनिवेशों की आजादी ने वैश्विक राजनीति के मंच को नव-स्वतंत्र, विकासशील देशों के लिए भी खोल दिया। द्विध्रुवी विश्व की राजनीति खत्म होने के बाद पश्चिमी देश मुद्दाविहीन होते चले गये तो इन्ह्ने जोर-शोर से जलवायु परिवर्तन का अजेंडा चलाया। जिसके संकट को इन्होने अतिशयोक्तिपूर्ण तरीके से व्यक्त करना शुरू कर दिया था।

वर्ष 1991 में एक तो नव-उदारवाद की शुरुआत हुई, वही अगले साल वर्ष 1992 में पृथ्वी सम्मेलन ने पर्यावरणीय राजनीति की शुरुआत की। तब से वैश्विक राजनीति इन्ही के इर्दगिर्द घूम रही हैं। क्योटो और पेरिस जैसे समझौतों ने लगभग सभी देशों को इस राजनीति का हितधारक बना दिया। लेकिन वर्ष 2020 में आकर कोरोना संकट ने पुरे वैश्विक परिदृश्य को बदल करके रख दिया। इसने बिलकुल ही अलग प्रकार की वैश्विक व्यवस्था को जन्म दिया, जिसमे सभी पीड़ित देश किसी एक जिम्मेदार की खोज करने में विफल हैं। सभी देश दीर्घकालीन अनिश्चित संकट का सामना करने के बजाय वर्तमान में मौजूद निश्चित संकट का समाधान खोजने के लिए प्रयासरत हैं। लेकिन दोनों ही मामलों में भय और उपाय जैसी सामान्य विशेषताएँ दृष्टिगोचर की जा सकती हैं। 

इस समय पर देखा जाए तो हम कह सकते हैं कि कोरोना संकट ने जलवायु परिवर्तन को पछाड़ दिया हैं। इस कथन को कहने के लिए हमारे पास कई तर्क मौजूद हैं -

  • दीर्घकालीन संकट के ऊपर वर्तमान संकट को प्राथमिकता : इस समय पर जलवायु परिवर्तन से ज्यादा शोर कोरोना संकट का हैं। यदि, जलवायु परिवर्तन की कीमत पर भी कोई उपाय इस समस्या से छुटकारा दिला सकता हैं तो दुनिया उसे अपनाना पसंद करेगी। इससे पता चलता हैं कि कम से कम इस समय पर तो जलवायु परिवर्तन का मुद्दा द्वितीयक हैं।
  • कोरोना संकट में जलवायु परिवर्तन का संकट कम हुआ हैं : जलवायु परिवर्तन का एजेंडा इस समय इसलिए भी प्राथमिकता में नही हैं क्योंकि इस महामारी की रोकथाम के लिए लगाए गये लॉकडाउन के कारण प्रदूषण के स्तर में अभूतपूर्व कमी देखने को मिली। ध्रुवों पर ओजोन छिद्र के भी भरने की बात सामने आ रही हैं।  कुछ लोग दूर पहाड़ों को देखने का दावा कर रहे हैं तो कुछ नदियों के जल को  स्वच्छ होने का। यह बात सही भी हैं कि इस दौरान जीवाश्म ईंधन के प्रयोग में कमी से उत्सर्जन में गिरावट आई। यहाँ एक तरह से कोरोना संकट जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उपाय का कार्य कर रहा हैं।
  • प्रायोजित डर में बढ़त : जिस प्रकार वैश्विक एजेंडा जलवायु परिवर्तन की विकटता के प्रति आगाह करने के लिए कई प्रकार की रिपोर्ट और सूचकांक जारी कर रहा था। कोरोना में भी समय के साथ विभिन्न रिपोर्ट इसकी भयावहता के बारे में उत्तरोत्तर वृद्धि की बात कह रही हैं। शुरू में कहा गया कि यह संक्रमित व्यक्ति से स्त्रावित द्रव के संपर्क में आने से होता हैं, अब कहा जा रहा हैं कि यह हवा में भी प्रसारित हो सकता हैं। ऐसा कह सकते हैं कि डर का कोई प्रायोजक उपस्थित हैं, जो मार्केट की डिमांड के अनुसार इसके संस्करण को अपडेट करता रहता हैं। साथ ही कोरोना का यह प्रायोजित डर जलवायु परिवर्तन से आगे निकल गया हैं। लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में कम से कम आठ बार भूकम्प आया था, लेकिन खौप कोरोना का ही ज्यादा था।   
  • समाधानों के लिए प्रयास में कोरोना आगे हैं : जिस प्रकार विभिन्न व्यवसाय समूह वैश्विक राजनीति की सहायता से जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हरित उपकरणों का बाजार खड़ा करने में लगे हुए हैं। उसी प्रकार कोरोना संकट में भी विभिन्न प्रतिभागी निवारक एवं उपचार समाधानों का बाजार खड़ा करने में लगे हुए हैं। रिओ समिट के बाद पुरे विश्व को परिचर्चा की सभा में एकजुट करने के लिए जलवायु परिवर्तन ही सर्वोच्च मुद्दा था, इसने पिछले दशकों के व्यापार वार्ता, परमाणु निशस्त्रीकरण जैसे मुद्दों को पीछे छोड़ दिया था। परन्तु इस समय कोरोना संकट ने इस मुद्दे को नेपथ्य में डाल दिया हैं। इस समय पर सभी देश या तो वैक्सीन को लेकर वार्तारत है या फिर बदहाल स्थिति की बहाली के लिए चर्चाओं में संलग्न हैं।
  • अन्य मुद्दें : जिस तरह जलवायु परिवर्तन ने वैश्विक राजनीति में विकसित बनाम विकासशील देश, समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्व, न्यूनीकरण एवं अनुकूलन जैसे मुद्दें मुख्यधारा में रहते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी ब्लेम गेम, विकासशील देशों की सहायता जैसे मुद्दें मुख्यधारा में हैं।  

कोविड-19 का डर : पूर्व में और अब 

जैसे-जैसे कोरोना की जीवन यात्रा आगे बढ़ी हैं, डर उत्पन्न करने की एक व्यवस्था भी इसके साथ आगे बढ़ी हैं। 

  1. शुरू में इटली और चीन की ख़बरों, मूवीज के दृश्यों को सोशल मीडिया पर साझा करके लोगो को इतना डराया कि उन्हें एक सख्त लॉक डाउन में रहने के लिए मजबूर और प्रताड़ित किया गया। जिसके साथ लोगो की आजीविका चौपट हो गई और उन्हें सैंकड़ों किलोमीटर दूर अपने घरों की और पैदल सफ़र करना पड़ा। जिसकी विभिषका अपने आप में ही एक अध्याय (कोविड-19 लॉकडाउन और मजदूरों का पलायन)हैं।      
  2. आरंभिक दौर में कोरोना के बारे में अपुष्ट, एकतरफा दावे करके मौजूदा स्वास्थ्य अवसंरचना को भी सीमित और संशयित रखा गया। शुरू में लोगो का ईलाज नही करके उन्हें आइसोलेशन वार्ड में बंद कर दिया, जिन्हें समय पर खाना तक नही दिया। इनमे से परेशान होकर कई लोगों ने आत्महत्या कर ली। शायद इस स्तर पर सोच यह थी कि भले ही ये तो मर जाए, लेकिन बाकि लोग इनके संपर्क में नही आये।
  3. आरंभिक दौर ऐसा था, जिसमे लोगों में इस हद तक डर था कि अगर कोई गाँव का आदमी बाहर से आया है तो उससे संपर्क नही रखा गया। अगर किसी आदमी को बुखार है तो मेडिकल वाला दवाई देने से मना कर देता था। एक तरीके से एक आधुनिक अस्पृश्यता की स्थिति देखने को मिल रही थी। मतलब लोग संक्रमण के डर की वजह से अतिरिक्त सतर्क (Extra -Alert) थे।
  4. जब संक्रमित व्यक्ति के संपर्क से भी कई लोगो को नही हुआ तो लोगो को डराने के लिए इसके हवा में प्रसारित होने की बात कही गई। लोग फिर भी नही डरे तो कहा गया कि अभी एक दक्षिण पूर्वी देश में कोरोना के ऐसे उपभेद (strain) मिले हैं, जो अभी तक ज्ञात संक्रमण के मामलों से बहुत अधिक खतरनाक हैं।
  5. अब तो पडौस में हो जाता हैं तो भी कोई तवज्जों नही देता। क्योंकि ठीक होने वाले के अनुसार यह एक प्रकार का बुखार ही हैं। जिसमे आपकी इम्युनिटी ठीक है तो डरने की कोई जरुरत भी नही हैं। इसका आलम यह हुआ कि लोग खुद सामने आकर अपने पॉजिटिव होने का स्टेटस अपडेट कर रहे हैं कि उनको कोरोना था तो उनसे मिलने वाले अपना टेस्ट कराये, जबकि पहले इसके साथ बहुत बड़ा स्टिग्मा जुदा हुआ था। अब लोग कोरोना पॉजिटिव आने के बाद भी धरने और प्रदर्शनों का हिस्सा बन रहे हैं। कोरोना पॉजिटिव आकर किसी परिजन के मरने के बाद भी लोग खुद से उनका अंतिम संस्कार कर रहे हैं। जबकि पहले मृतक को पैक करके देने के कारण कई शवों की आपस में अदला-बदली हो गई। कई शव कॉविड प्रोटोकॉल का पालन करने के कारण लंबे समय तक अस्पतालों में पड़े रहे। कईयों के साथ अस्पतालों में छल-कपट हुआ, जब अच्छे-खासे लोगो को कॉविड से मृतक बता दिया गया।

इन सब उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता हैं कि आरंभिक दिनों में कोरोना को लेकर कितना अन्याय हुआ हैं। देश ने वाकई पिछले चार-पांच महीने बहुत कष्ट झेला हैं।

क्या कोरोना की तुलना जलवायु संकट से की जा सकती हैं?

जलवायु संकट की चिंताएं भी वास्तविक हैं, लेकिन जो समाधान किए जा रहे हैं, वे व्यावसायिक हैं। सभी व्यवसायी वैकल्पिक हरित समाधानों को विकसित करने का दावा करके हाशिए पर पड़े लोगो के परम्परागत आजीविका निर्वाह को समाप्त करना चाहते हैं। इनके द्वारा किए गये उपाय लक्ष्यहीन हैं, जो असली चुनौतियों को संबोधित नही करते हैं। इन उपायों के लिए जनता को भरी कीमत चुकानी पड़ रही हैं, जिसे हम ओजोन संरक्षण से जुड़े वियना समझौते से समझ सकते हैं। जिसके लक्ष्यों को तथाकथित तौर पर प्राप्त कर लिया गया हैं। लेकिन आम लोगो की जिन्दगी में इससे कोई फर्क नही पड़ा, जबकि उन्हें चीजे प्राप्त करने से रौकने के लिए कीमतों में वृद्धि की गई। साथ ही यह राजनीति में विकासशील देशों के प्रति ऐतिहासिक न्याय किए बिना उन पर दायित्व थोपना चाहते हैं। कोरोना संकट में भी यही स्थिति हैं, जिम्मेदार पक्ष की न तो पहचान की गई हैं और न ही उसके दायित्व निर्धारित किए गये हैं। अगर ऐसा नही किया गया तो यह इस प्रकार के अग्रिम दुस्साहसों को प्रोत्साहित करेगा।

दूसरी बात डर की बात भी दोनों में प्रायोजित हैं, जो वैश्विक संगठनों द्वारा इर्धारित किया जाता हैं। इसका नुकसान यह रहा हैं कि यह मूल और अति आवश्यक मुद्दों से ध्यान को विमुख कर दे रहा हैं। यही कारण हैं कि निर्धनता उन्मूलन, पोषण एवं भूख जैसे मुद्दें वैश्विक राजनीति से गायब हो गये हैं या फिर गिलोटिन की भेट चढ़ने वाले उप-खंडों में बदल गये हैं।

राष्ट्रीय-राज्य की अक्षमता

कोरोना संकट में राष्ट्रीय-राज्य की अक्षमता उजागर हुई कि वह आगामी अप्रत्याशित संकटों के प्रति अनुक्रिया करने के लिए तैयार नही हैं। चाहे वह कोरोना हो या फिर कोई प्राकृतिक आपदा हो।

लॉक डाउन के बारे में सरकार को आरंभ में पता ही नही था कि इसके लिए किस कानून का सहारा लिया जाए। इसलिए देश भर में इसका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए CrPC की धारा 144 का प्रयोग किया गया। लॉक डाउन 2.0 में जाकर NDMA ने आपदा प्रबंधन अधिनियम से शक्तियों को ग्रहण किया। 

लेकिन धारा 144 के अखिल भारतीय प्रयोग ने पुरे देश का एक साथ आपराधिक-करण कर दिया गया। लोगो को घरों से निकालकर भी पीटा गया, धार्मिक स्थलों और कही जरुरी जगह से आते अकेलें आदमियों को भी पीटा गया। इसका क्षेत्राधिकार विस्तृत था। यह आपातकाल से भी बदतर था, जिसमे अनुच्छेद 359 के तहत प्राप्त अनुच्छेद 20 और 21 का समर्थन भी प्राप्त नही था। प्रधानमंत्री ने कहा कि जनता इसे अपने आप पर लगाया हुआ आपातकाल माने। यह एक राष्ट्रीय-राज्य की विफलता थी कि वो अपनी आवाम को अपनी क्षमताओं पर भरोसा दिलाने में नाकामयाब रहा। अधिकतर राष्ट्रीय-राज्यों ने अपनी अक्षमताओं के लिए लोगो को दंडित किया। इस दौरान कईयों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए और कईयों के वाहन जब्त हुए, जिनके लिए वे आज भी (22 सितंबर 2020) पुलिस थानों और अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। 

इस सख्त लॉक डाउन के बाजवूद भी लोगों ने पलायन किया। उनके लंबे सफ़र, साथ में बच्चे और बूढ़े, रास्ते में दुर्घटना, बसों को अनुमति देने में राजनीति आदि मुद्दों की कारण उत्पन्न मानवीय संकट की चर्चा सोशल मीडिया में जमकर हुई। जिसके कारण सरकार पर दबाव पड़ा और वह लॉकडाउन को सरल बनाने के लिए मजबूर हुई। साथ ही अर्थव्यवस्था की बहाली के लिए घोषित आत्मनिर्भर भारत पैकेज के नाम के पीछे काफी हद तक प्रवासी मजदूरों को गृह राज्य में ही रोजगार देने की अवधारणा थी, हालाँकि आत्म निर्भर पैकेज का विश्लेषण एक अलग अध्याय में समझाया जाएगा।

कोविड-19 केन्द्रित आगामी राजनीति

ये बात तो सही हैं कि आगामी समय में कोविड-19 केन्द्रित राजनीति ही मुख्यधारा में रहेगी क्योंकि इस समय पर सभी देश वैक्सीन का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। सभी देश वैक्सीन को प्राप्त करने, वितरण करने और सुरक्षित रखने जैसे कार्यों में संलग्न हैं। जो व्यवसायी जलवायु परिवर्तन के लिए समाधान विकसित करने हेतु कार्यरत थे, वे अब वैक्सीन से जुड़े कार्यों में संलग्न हो गये हैं। वैक्सीन आने पर कंपनियों द्वारा मोटी कमाई किए जाने की आशंका बताई जा रही हैं, हो सकता हैं तब सामान्य बुखारों को कोरोना बताने के चलन में वृद्धि हो।

निष्कर्ष

जलवायु परिवर्तन और कोरोना दोनों संकट वास्तविक हैं और दोनों के ही प्रति समान रूप से सतर्कता बरतने की आवश्यकता हैं। लेकिन केवल व्यावसयिक हितों के कारण ही डर को प्रायोजित नही करना चाहिए क्योंकि इससे लोगो के मध्य भारी अराजकता उत्पन्न होती हैं, जो उनकी जान और आजीविका के लिए विध्वन्श्कारी होती हैं। दोनों के लिए ही समाधानों और नवाचारों का समर्थन करने की आवश्यकता हैं। 

नेपोलियन बोनापार्ट का जीवन परिचय

नेपोलियन बोनापार्ट फ्रांस का महान बादशाह था। एक आम आदमी से बादशाह की गद्दी तक का नेपोलियन की ज़िंदगी का सफ़र जितना दिलचस्प रहा था, उरूज से उनके पतन तक की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है। कद-काठी में छोटे नेपोलियन ने अपनी बहादुरी से दुनिया के एक बड़े हिस्से पर अपना राज क़ायम किया था। ब्रिटेन के महान योद्धा ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन ने कहा था कि जंग के मैदान में नेपोलियन, 40 हज़ार योद्धाओं के बराबर है। नेपोलियन के सैनिक उससे मोहब्बत करते थे, तो दुश्मन उससे ख़ौफ़ खाते थे। आज की तारीख़ में भी बहुत कम ऐसे लोग हैं जो नेपोलियन की ऊंचाई तक तक पहुंचे।

नेपोलियन का जन्म कोर्सिका द्वीप के अजाचियो में 15 अगस्त 1769 को हुआ था।  फ्रांस ने कोर्सिका द्वीप को नेपोलियन के पैदा होने से एक साल पहले ही जेनोआ से जीता था। जब फ्रांस की सेना ने कोर्सिका पर हमला किया था, तो स्थानीय लोग फ्रांस के विरोध में खड़े हुए थे। हालांकि बाद में उन्होंने फ्रांस की सत्ता मान ली थी। नेपोलियन के मां-बाप बहुत अमीर नहीं थे। वो सामंती परिवार से नहीं थे, हालांकि वो इसका दावा बहुत करते थे। नौ साल की उम्र में नेपोलियन पढ़ाई के लिए फ्रांस चले आए। वो ख़ुद को बाहरी महसूस करते थे। फ्रांस के रीति-रिवाज से नावाक़िफ़ नेपोलियन की शुरुआती पढ़ाई ऑटुन में हुई। इसके बाद वो पांच साल तक ब्रिएन में रहे। पढ़ाई का आख़िरी साल उन्होंने पेरिस की मिलिट्री एकेडमी में गुज़ारे।  नेपोलियन को सितंबर 1785 में ग्रेजुएट की डिग्री मिली।  58 लोगों की क्लास में वो 45वें नंबर पर रहे थे। जब नेपोलियन पेरिस में थे तभी उसके पिता की मौत हो गई। परिवार पैसे की तंगी झेल रहा था।

नेपोलियन की उम्र उस वक़्त सिर्फ़ 16 बरस थी। वो परिवार के सबसे बड़े लड़के भी नहीं थे। फिर भी उन्होंने परिवार की ज़िम्मेदारी उठा ली। फ्रांस की सेना में नेपोलियन को तोपखाना रेजिमेंट में सेकेंड लेफ्टिनेंट की रैंक मिली थी। वो उस दौरान सेना की रणनीति और लड़ाई से जुड़ी क़िताबें ख़ूब पढ़ते थे।

फ्रांस में लोकतांत्रिक क्रांति


फ्रांस में रहने के दौरान उन्हें कोर्सिका की बहुत याद आती थी। अपनी क़िताब लेटर्स सुर ला कोर्स में नेपोलियन ने आज़ाद कोर्सिका की कल्पना उकेरी थी, जो फ्रांस के क़ब्ज़े से मुक्त था। डिग्री मिलने के साल यानी 1786 में ही वो कोर्सिका लौट आए और अगले दो साल तक वापस सेना की नौकरी पर नहीं गए।

1789 में फ्रांस में लोकतांत्रिक क्रांति हो गई। जनता ने बस्तील जेल पर हमला करके क़ैदियों को आज़ाद करा लिया।  फ्रांस में एक नए युग की शुरुआत हो चुकी थी।  फ्रांस की नई संसद ने कोर्सिका के नेता पास्कल पाओली को वापस जाने की इजाज़त दे दी। नेपोलियन भी एक बार फिर कोर्सिका लौट गए।

नेपोलियन का स्वागत


शुरू में तो कोर्सिका में नेपोलियन का स्वागत हुआ। लेकिन जब उनके छोटे भाई लुसिएन ने पाओली को ब्रिटिश एजेंट कहकर विरोध शुरू किया तो कोर्सिका के लोग बोनापार्ट परिवार के ख़िलाफ़ हो गए। नेपोलियन और उनका परिवार इसके बाद फ्रांस में आकर रहने लगे। फ्रांस के प्रति वफ़ादारी दिखाने के लिए नेपोलियन को ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

फ्रांस की सरकार का विरोध कर रहे सैनिकों ने टूलों शहर को अंग्रेज़ों के हवाले कर दिया था। दक्षिणी फ्रांस स्थित टूलों, भूमध्यसागर में बड़ा सैनिक अड्डा था। फ्रांस के लिए टूलों को दोबारा जीतना ज़रूरी थी। अगर फ्रांस का उस पर क़ब्ज़ा नहीं होता, तो फ्रांस में हुई क्रांति पर बड़ा धब्बा लग जाता।

24 की उम्र में ब्रिगेडियर जनरल


टूलों को जीतने की ज़िम्मेदारी नेपोलियन को दी गई। आख़िर में ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पड़ा। इस जीत के बाद नेपोलियन को महज़ 24 बरस की उम्र में ब्रिगेडियर जनरल बना दिया गया। युद्ध में नेपोलियन की कामयाबियों के क़िस्से मशहूर होने लगे। सेना के कमिश्नर ने नेपोलियन की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते हुए चिट्ठी लिखी।

उस वक़्त फ्रांस की सत्ता मैक्सीमिलियन रॉब्सपियर के क़ब्ज़े में थी। देश उनके ज़ुल्मो-सितम से बेहाल था। हज़ारों लोगों को उसने गुलेटिन या सूली पर चढ़ा दिया था। 1794 की शुरुआत में आल्प्स पर्वत इलाक़े मे तोपखाने का इंचार्ज बनाया गया। रॉब्सपियर की ताक़त कम होने से नेपोलियन के तेज़ी से चमकते करियर पर ब्रेक लगा।

सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत


लेकिन ये कुछ वक़्त के लिए ही था। जब शाही परिवार के भक्तों ने लोकतांत्रिक सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत की, तो सरकार को बचाने की ज़िम्मेदारी नेपोलियन पर आई। पांच अक्टूबर 1795 को शाही परिवार के समर्थकों ने पेरिस के नेशनल कन्वेंशन को घेर लिया।

नेपोलियन ने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ क़रीब बीस हज़ार लोगों की सेना का सामना किया। उसने अपनी बहादुरी से विरोधियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। नेपोलियन ने नए गणतंत्र को तो बचाया ही, अपनी तरक़्क़ी का रास्ता भी खोल लिया। नेपोलियन ने मार्च 1796 में जोसेफ़ीन नाम की महिला से शादी की।

जोसेफ़ीन और नेपोलियन


जोसेफ़ीन के पति को रॉब्सपियर ने सूली पर चढ़ा दिया था। वो किसी दौर में फ्रांस के सबसे ताक़तवर शख़्स रहे पॉल बारा की रखैल रह चुकी थीं। जोसेफ़ीन, नेपोलियन से कई साल बड़ी थी। नेपोलियन उन्हें टूटकर प्यार करते थे। लेकिन जोसेफ़ीन के लिए ये शादी महज़ मौक़ा परस्ती थी।

पॉल के छोड़ देने के बाद उन्होंने सिर्फ़ सहारे के लिए नेपोलियन का हाथ थामा था। शादी के दो दिन बाद नेपोलियन इटली रवाना हो गए थे। उन्हें इटली में सेना का कमांडर बनाया गया था। जब उन्होंने मुआयना किया तो सेना को बेहद कमज़ोर हालत में पाया। इसके बावजूद उसने कई जंगों में जीत हासिल की।

नेपोलियन की शोहरत


आख़िर में वो उत्तरी इटली के बेताज बादशाह बन गए थे। अब उन्हें राज करना आ गया था। वो समझने लगे थे कि कैसे लोगों से काम कराया जाए। कैसे संविधान बनाया जाए। एक साल के भीतर नेपोलियन की शोहरत नई ऊंचाई छूने लगी थी। इटली में नेपोलियन के अच्छे दिन बीते। उस वक़्त सिर्फ़ ब्रिटेन ही था जो फ्रांस के विरोध में था।

साल 1798 में नेपोलियन ने मिस्र पर हमला बोल दिया। वो भारत और ब्रिटेन के बीच का रास्ता रोक कर ब्रिटेन को घुटने टेकने पर मजबूर करना चाहते थे। साथ ही वो पूर्वी दुनिया में फ्रांस के साम्राज्य का विस्तार भी करना चाहते थे। लेकिन नेपोलियन का ये सपना साकार नही हुआ।

ताक़तवर सेना की ज़रूरत


होरासियो नेल्सन नाम के ब्रिटिश कमांडर ने नेपोलियन के 35 हज़ार सैनिकों को घेर लिया। वो घर भी वापस नहीं जा पा रहे थे। ब्रिटेन और रूस ने फ्रांस के ख़िलाफ़ गठजोड़ कर लिया था। फ्रांस में सरकार के नए अगुवा इमैनुअल सीस को महसूस हुआ कि सत्ता के लिए ताक़तवर सेना की ज़रूरत है।

इमैनुअल को ऐसे सेनापति की ज़रूरत महसूस हुई जो पेरिस में रहकर सरकार की हिफ़ाज़त करे। मौक़ा अच्छा देख नेपोलियन ने अपने सैनिको को मिस्र में छोड़ा और जा पहुंचे फ्रांस। जब नेपोलियन पेरिस पहुंचे तब तक फ्रेंच सेनाओं ने स्विट्ज़रलैंड और हॉलैंड में जीत हासिल कर के हालात अपने हक़ में कर लिए थे।

सत्ता के शिखर पर


लेकिन इमैनुअल और नेपोलियन ने उस वक़्त की सरकार का तख़्ता पलट करके सत्ता अपने हाथ में ले ली। अब नेपोलियन यूरोप के सबसे ताक़तवर देश के अगुवा बन चुके थे। सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद पूरे यूरोप में नेपोलियन का डंका बज रहा था। एक तरफ़ तो वो जंग के मैदान में कामयाबी के झंडे बुलंद कर रहा था।

तो, दूसरी तरफ़ उसने प्रशासनिक सुधार की ऐसी हवा चलाई जो आज तक मिसाल बनी हुई है। 1802 तक नेपोलियन ने यूरोप में शांति बहाल कर ली थी। ऑस्ट्रिया को इटली के मोर्चे पर शिकस्त दी जा चुकी थी। वहीं जर्मनी और ब्रिटेन ने फ्रांस की ताक़त देखकर समझौता करने में ही भलाई समझी।

फ्रांस के बादशाह का पद


जंग से फ़ुरसत पाने पर नेपोलियन ने क्रांति के बाद के फ्रांस की नींव रखी। उन्होंने लोगों को निजी आज़ादी का अधिकार दिया। लोगों को अपनी पसंद का धर्म मानने का अधिकार दिया। नेपोलियन ने ही क़ानून के सामने सब को बराबरी के अधिकार के सिद्धांत की बुनियाद रखी। इस दौरान उन्होंने फ्रांस में सबसे ताक़तवर सेना भी तैयार की।

इन कामयाबियों के चलते नेपोलियन को ज़िंदगी भर के लिए कॉन्सुल यानी सत्ता के बड़े अधिकारी की पदवी दी गई। लेकिन, यूरोप में लंबे वक़्त तक अमन क़ायम नहीं रह सका। फ्रांस की अंदरूनी खींचतान और दूसरे देशों से युद्ध के चलते हालात ऐसे बने कि नेपोलियन को फ्रांस के बादशाह का पद संभालना पड़ा।

सबसे बड़ी जंग


फ्रांस की सरकार के विरोधी दो लोगों ने नेपोलियन की हत्या की साज़िश रची। जब इसका पर्दाफ़ाश हुआ, तो नेपोलियन को लगा कि जब तक राजशाही नहीं होगी, तब तक फ्रांस में अमन क़ायम नहीं हो सकता। तब 1804 में उसने पोप की मौजूदगी में ख़ुद को बादशाह घोषित कर दिया।

फ्रांस का राजा बनने के एक साल बाद यानी 1805 में नेपोलियन ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग जीती। ये युद्ध आज के चेक रिपब्लिक में ऑस्टरलित्ज़ में हुआ था। नेपोलियन के मुक़ाबले ऑस्ट्रिया और रूस की सेनाएं थीं। नेपोलियन ने जाल बिछाकर दुश्मन के 26 हज़ार सैनिकों को मार डाला।

ट्रैफलगर की लड़ाई


इसके मुक़ाबले नेपोलियन के सिर्फ़ 9 हज़ार सैनिक मारे गए। ऑस्ट्रिया को हराकर नेपोलियन ने एक बार फिर यूरोप पर अपना सिक्का जमा लिया था। वो अपने दौर का सबसे महान सैन्य कमांडर बन चुका था। साथ ही उसने रूसी साम्राज्य की सेना को भी धूल चटा दी।

ट्रैफलगर की लड़ाई के बाद ब्रिटेन पर हमले की नेपोलियन की उम्मीदें टूटती जा रही थीं। इस वजह से ब्रिटेन के साथ शांति समझौते की उम्मीद भी। नेपोलियन ने एक बार फिर से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर करने की कोशिश की। उन्होंने ब्रिटेन के साथ हर तरह के कारोबार पर रोक लगाने की कोशिश की।

ब्रिटेन से व्यापार


ब्रिटेन से हर तरह का व्यापार रोक दिया गया। ब्रिटेन आने-जाने वाले हर जहाज़ को लूटने की पूरी छूट दे दी गई। नेपोलियन को उम्मीद थी कि दबाव में आने पर ब्रिटेन समझौते के लिए राज़ी हो जाएगा। मगर पुर्तगाल ने नेपोलियन का ब्रिटेन से कारोबार न करने का फ़रमान मानने से इनकार कर दिया।

नेपोलियन ने स्पेन और पुर्तगाल पर क़ब्ज़ा कर लिया। दोनों देशों में नेपोलियन के ख़िलाफ़ बग़ावत हो गई। ब्रिटेन ने आर्थर वेलेज़ली की अगुवाई में एक सैन्य टुकड़ी पुर्तगाल और स्पेन की मदद के लिए भेज दी। इससे ब्रिटेन को यूरोपीय महाद्वीप में पैर जमाने का मौक़ा मिल गया।

नेपोलियन की ताक़त


स्पेन और पुर्तगाल में नाकामी के बावजूद नेपोलियन की ताक़त में कमी नहीं आई थी। उनका साम्राज्य हॉलैंड, इटली और जर्मनी के एक बड़े हिस्से तक फैल चुका था। अब नेपोलियन को ज़रूरत थी अपने वारिस की। उसने 1810 में जोसेफ़ीन को तलाक़ दे दिया। इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रिया के राजा फ्रांसिस प्रथम की बेटी मेरी लुई से शादी कर ली।

जल्द ही नेपोलियन को बेटा हुआ। उनके बेटे का नाम भी उनके ही नाम पर रखा गया। नेपोलियन ने रोम के राजा की उपाधि भी ले रखी थी। साल 1812 में ब्रिटेन की आर्थिक नाकेबंदी को कामयाब बनाने के लिए फ्रांस ने रूस की सीमा पर छह लाख सैनिक जमा कर दिया। उसका मक़सद ब्रिटेन की आर्थिक नाकेबंदी के लिए रूस को राज़ी करना था।

रूस में नाकामी


इधर स्पेन में ब्रिटेन के कमांडर ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन ने नेपोलियन की सेना को शिकस्त दे दी। रूस के मोर्चे पर भी नेपोलियन को कुछ ख़ास कामयाबी नहीं मिल रही थी। कोई भी जंग जीतता नहीं दिख रहा था। 1812 में नेपोलियन ने मॉस्को पर क़ब्ज़ा कर लिया। लेकिन सर्दियां आ रही थीं। मजबूरी में नेपोलियन को पीछे हटना पड़ा।

जब तक वो अपने वतन लौट पाते उनकी सेना में महज दस हज़ार सैनिक ही युद्ध के लायक़ बच रहे थे। रूस में नाकामी और स्पेन में हार के बाद ऑस्ट्रिया और प्रशिया एक बार फिर से नेपोलियन को हराने की फिराक़ में थे। उनकी बादशाहत बिखर रही थी। 1814 के मार्च महीने में दुश्मनों ने राजधानी पेरिस को घेर लिया।

फ्रांस के हालात


नेपोलियन को गद्दी छोड़नी पड़ी। उन्हें एल्बा नाम के एक जज़ीरे पर क़ैद कर के रखा गया था। फ्रांस की गद्दी पर लुई 16वें को बैठाया गया। क़ैद से भी नेपोलियन की निगाह फ्रांस के हालात पर थी। 1815 में वो क़ैद से भाग निकले और पेरिस पहुंच गए। पेरिस पहुंचने के बाद नेपोलियन ने संविधान में तेज़ी से बदलाव किए।

इससे कई विरोधी नेपोलियन के पाले में आ गए। 1815 में मार्च महीने तक यूरोप के कई देशों ने मिलकर नेपोलियन के ख़िलाफ़ मोर्चा बना लिया था। जून में नेपोलियन ने बेल्जियम पर हमला कर दिया। लेकिन 18 जून को वाटरलू की लड़ाई में ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन ने उन्हें शिकस्त दे दी। इसके बाद वो फिर कभी क़ैद से नहीं छूट सके।

यूरोप का नक़्शा


ब्रिटेन ने नेपोलियन को क़ैद करके दक्षिणी अटलांटिक स्थित सेंट हेलेना नाम के द्वीप पर रखा। उन्हें न तो परिवार से मिलने दिया गया, न ही उनकी कोई ख़बर दी गई। अगले छह साल नेपोलियन ने तन्हाई में बिताए। वो खाते थे। ताश खेलते थे। लिखते थे। उन्होंने बोलकर अपना ज़िंदगीनामा भी लिखवाया।

1821 में पेट के कैंसर से नेपोलियन की मौत हो गई। मगर दुनिया को अलविदा कहने से पहले नेपोलियन ने यूरोप के नक़्शे पर कभी न मिटने वाली इबारत लिख डाली थी।

समाजवादी चिंतक मस्तराम कपूर का साहित्यिक योगदान

मस्तराम कपूर मशहूर समाजवादी लेखक और चिंतक थे। समाजवादी चिंतन से संबंधित उन्होंने 100 से अधिक किताबें लिखी हैं। राम मनोहर लोहिया की जीवनी पर उनके लिखे अंग्रेजी में दस और हिंदी में नौ खंड प्रकाशित हुए थे। इससे उन्हें काफी लोकप्रियता मिली थी।  समाजवादी नेता मधु लिमये के वह काफी करीबी थे। अपने जीवन के अंतिम दिनों तक वह गैर कांग्रेस और गैर बीजेपी युक्त तीसरी शक्ति के गठबंधन के लिए कोशिश करते रहे। मस्तराम कपूर का जन्म  22 दिसंबर1926 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में हुआ था। वे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यश भारती पुरस्कार से भी सम्मानित किए जा चुके हैं। अप्रैल 2013 में उनका 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं में अपना योगदान दिया हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं -

उपन्यास : 
विमथगामी, रास्ता बंद, कान चालू, नाक का डॉक्टर, एक सदी बाँझ तथा बिषय-पुरुष ।

कहानी-संग्रह : 
एक अदद औरत, ग्यारह पत्ते, ब्रीफकेस, हेनी और अन्य कहानियाँ (प्रेस में) ।

नाटक : 
पत्नी ऑन ट्रायल, सॉप आदमी नहीं होता ।

कविता : 
कूडेदान से साभार ।

निबंध : 
हम सब गुनहगार, समसामयिक प्रतिक्रियाएँ, पं० चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी', साहित्यकार का संकट, अस्तित्ववाद से गांधीवाद तक, राष्ट्रीय एकता का संकट और साम्प्रदायिक शक्तियां, मंडल रिपोर्ट : वर्णव्यवस्था से समाजवादी व्यवस्था की ओर, साम्यवादी विश्व का विघटन और समाजवाद का भविष्य ।

पैम्फलेट : 
हिन्दूवाद आत्महत्या की ओर, नर-नारी समता के मायने, साम्प्रदायिक दंगों का समाजशास्त्र, अंग्रेजी हटाओ' आंदोलन की प्रासंगिकता, भ्रष्टाचार : उपभोगवादी संस्कृति का ब्रह्मराक्षस, वर्तमान सभ्यता का संकट और गांधी-लोहिया ।

बाल-साहित्य : निर्भयता का वरदान, दंड का पुरस्कार, सहेली, बेजुबान साथी, मुँहमाँगा इनाम, पहला पडाव, बीजू की दादी, पारस की खोज (कहानी-संग्रह);
नीरू और हीरू, सपेरे की लड़की, भूतनाथ, सुनहरा मेमना (उपन्यास); एक थी चिड़िया (चित्रकथा) स्पर्धा, बच्चों के नाटक, बच्चों के एकांकी पाँच बाल-नाटक (नाटक) ।

अनुवाद : 
ग्यारह तुर्की कहानियां, आंध्र प्रदेश : लोक संस्कृति और साहित्य, डॉ० आंबिडकर : एक चिंतन, सरदार पटेल : व्यवस्थित राज्य के निर्माता, एशिया के बाल-नाटक, स्वामी और उसके दोस्त आदि ।