ताजमहल के साथ वार्तालाप


"मैं ताज हूं ,
वक्त के गाल पर थमा हुआ आंसू हूं,

मैं शब्दहीन ध्वनि और ध्वनिहीन शब्द का अंजाम हूं,
मैं दिलो की धड़कन का आकार हूं,
मैं एक ध्वनि का रूपांतरित दृश्य हूं,
मैं इंसानी हौंसलो और इरादों का परचम हूं,

मैं ताज हूं,
संगमरमर पर लिखी हुई कविता हूं,
मैं मनुष्य के अंतहीन सफर का एक पड़ाव हूं

वियना यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और लेखिका इबा कोच से ताजमहल ने इस तरह बातचीत की। इस वार्तालाप के वाक्यो को दोबारा गौर से पढ़े तो कही पर भी ताजमहल बड़बोला नही लगता। वह इन सब बातों पर खरा उतरता है। यहां पर लेखिका ने एक पंक्ति रविन्द्र नाथ टेंगोरे से चुरा ली है जिन्होंने ताजमहल को 'काल के गाल पर थमा हुआ आंसू' बताया था।

इबा कोच ही नही यहां आने वाले सभी सैलानियों से ताजमहल कुछ न कुछ बाते जरूर करता है। किसी से वह प्रदूषण के कारण व्हाइट मार्बल के बदलते रंग पर बात करता है, तो किसी से यहां के पर्यटन व्यवसाय में लगे लोगो की गुस्ताखीयो को नजरअंदाज करने की कहता है, किसी को वह प्रेम और सद्भाव के पन्ने पढ़ाता है। वहीं जो चंचल मन वाले लोग है उन्हें कहता है कि तुम फोटोज लेकर ही अपनी मुलाक़ात को यादगार बना लो, क्योंकि इस परिसर की हर एक जगह सेल्फी/फोटोग्राफी पॉइंट है।

मेरी भी ताजमहल के साथ इतिहास और संस्कृति से जुड़े विषयो पर लंबी बातचीत हुई। जिसका सार नीचे दे रहा हूँ -
  1. ताजमहल के निर्माण से कई मिथक जुड़े हुए है। कहा जाता है कि इसके ऊपर किए जा रहे खर्चे और ऊर्जा के व्यव से मुगल परिवार के दूसरे सदस्य खुश नही थे। जहांआरा जिन्होंने शाहजहां की अंतिम समय मे देखभाल की थी उन्होंने तो प्रतिक्रिया स्वरूप कह भी दिया था कि मेरी कब्र पर तो केवल घासफूस लगा देना। लेकिन ताजमहल के निर्माण में लगे मजदूरों की संख्या, निर्माण राशि की विशालता, बर्षो की मेहनत आदि सभी चीजो को आखिरी कृति न्यायोचित ठहरा देती है।

    ताजमहल फुरसत और बिना जल्दबाजी का नतीजा है। कही पर भी इसमे सममिति को भंग नही किया गया है। वैसे तो फुरसत में बनाई गई चीज मुहावरे का प्रयोग आशिक़ लोग लड़कियों के नैन-नक्श की सुंदरता के लिए करते है। लेकिन एक आशिक़ की इस कृति पर भी यह बात सटीक बैठती है। प्यार करने वाले लोगो ने तो शाहजहां पर यह भी आरोप लगाया है कि उसने मोहब्बत को दौलत से जोड़ दिया, जिस पर प्रतिक्रिया देते हुए साहिर लुधियानवी ने लिखा है कि -"इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले करहम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाकमेरे महबूब, कहीं और मिला कर मुझसे ! "

  2. दुनिया मे कोई भी रिकॉर्ड या उपलब्धि ज्यादा दिन नही टिकती, कुछ ही दिनों में उससे ज्यादा प्रतिभाशाली लोग उसे पार कर जाते है। लेकिन आज तक कोई भी ताजमहल की उत्कृष्टता को सफलतापूर्वक चुनोती नही दे पाया। कई लोगो ने इसे मात देने की कोशिश की लेकिन सब नाकाम रहे। इस सिलसिले में औरंगजेब  ने बीबी का मकबरा बनाया, वही अंग्रेज़ो ने भी कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल बनाया, दोनो ही भोंडी नकल साबित हुए। इस मामले में खुद मुगल भी इतने सतर्क थे कि बनाने वाले कारीगरों के हाथ कटवा दिए गए। ऐसे में स्वतंत्र रूप से चुनोती देने वाली आकृति तो दूर की चीज हो जाती है। अतः बिना शक के कह सकते है कि दुनिया ताजमहल की अवधारणा (Concept of Tajmahal) की सर्वोच्चता को ही पार नही कर पाई है।

  3. ताजमहल की अवधारणा एक ऐसे मकबरे के रूप में की गई थी जो विशाल और भव्य हो। आज तो इस परिसर को सैलानियों से ही फुर्सत नही मिल पाती। लेकिन पहले के दिनों में इतनी बड़ी इमारत और बगीचे का सन्नाटा बाकी के लोगो को बताता होगा कि यहां एक महान आत्मा आराम कर रही है जिसे डिस्टर्ब नही किया जाए। दरअसल बाग-बगीचों में मकबरे बनाने की प्रथा इस्लाम मे विकसित हुई, जिसमे मुगलो ने चार बाग शैली की शुरुआत की।

  4. हमारे इतिहासकारो की नजर में भी यह तत्कालीन मुगल साम्राज्य की अर्थव्यवस्था में आई दरार को ढकने का प्रयास था, ताकि लोगो को ध्यान जर्जर होते साम्राज्य पर नही जा पाए और वे बगावत नही करे। लेकिन यह राज्य की असुरक्षाओं को कम नही कर सका।

  5. लाल किले के लिए लाल पत्थर और ताजमहल के लिए सफेद मार्बल दोनो की आपूर्ति राजस्थान से की गई थी। ऐसे विशालकाय स्थापत्य किसी साम्रज्य की महिमा को फैलाते थे और तत्कालीन राजपूती शासक मुगल साम्राज्य के इस कार्य में उल्लेखनीय योगदान दे रहे थे। बदले में मुगलो ने भी राजपूती शासको को खुश करने के लिए हिन्दुओ के साथ समन्वित व्यवहार किया। बिना राजपूती शासको के सहयोग के इसका निर्माण असम्भव था। अतः यह गंगी जुमनी तहजीब का उत्पाद है।

  6. ताजमहल आगरा से हिंदुस्तान पर राज करने वाले बादशाह का निर्माण कार्य है। इसके बाद उनकी राजधानी दिल्ली हो गई, जैसे ही राजधानी दिल्ली गई, वहां जाते ही कठमुल्लों के द्वारा कट्टरपंथ को हावी कर दिया गया और समन्वित संस्कृति का दारा शिकोह की तरह कत्ल कर दिया गया। अतः दिल्ली की इमारतों में इस्लाम हावी हो गया। हो सकता है इतने दिन रहने के बाद उसके पर ज्यादा निकल आये हो। इसलिए दिल्ली में मुस्लिमों ने हमेशा खुद को राज करने वालो की तरह ही पेश किया, यहाँ तक कि आज भी बुखारी और शाही इमाम राजनीतिक दलों को धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट बांटकर इसका दस्तूर पूरा करते हो। मतलब हिन्दू-मुस्लिम में बांटने की राजनीति तो दिल्ली के डीएनए में है । आगे अंग्रेजों के टाइम पर फुट डालो राज करो कि नीति भी कोलकाता से दिल्ली राजधानी स्थान्तरित करने पर ही गति पकड़ी थी। वर्तमान में लोकतंत्र के युग मे भी यह जारी है।
    देख लो, दोनो ही शहर यमुना के किनारे है लेकिन दोनों जगह के पानी में शासन के तरीकों को लेकर मूलभूत अंतर है। एक बात और यह है कि भले ही आगे यमुना गंगा में जाकर मिल जाती हो, लेकिन इतिहास में तो यमुना ही गंगा पर हावी रही है। महाभारत काल मे भी हस्तिनापुर का उदाहरण मिल जाएगा।

  7. मुगलो द्वारा राजधानी को आगरा से दिल्ली ले जाना उनके हित मे बिल्कुल भी नही रहा। आगरा भारतीय उपमहाद्वीप के लगभग केंद्र में था। दिल्ली जाते ही उनकी राज्य पर पकड़ कमजोर हो गई और अवध, बंगाल और हैदराबाद जैसे प्रान्त सम्भाल रहे उनके वजीर आज़ाद हो गए। एक तरीके से उनकी सोने की मुर्गी उड़कर चली गई। उनके दूर जाने से बगल में ही शक्तिशाली मराठा उभर आये, राजपूत राज्य आज़ाद हो गए, जाट और सिक्ख राज्यो का उदय हुआ। इतने सारे राज्यों के चले जाने के बाद मुगल केंद्रीय सत्ता को समय पर न तो राजस्व मिलता था और न ही सैनिक सहायता। इसकी बदौलत उसकी जीर्ण होती दशा को विरोधियों ने भी अवसर के तौर पर देखा। अफगानों ने आक्रमण कर दिया और मुगल बादशाह को मराठो को उनसे निपटने के लिए कहना पड़ा। अंग्रेज़ इन सबको नजदीक से देख रहे थे और उन्होंने भी मौका मिलते ही बक्सर में अपने हाथ सेंक लिए जहां से भारत की गुलामी का मार्ग प्रशस्त हुआ। कहने का मतलब है कि आगरा से बाहर गई राजधानी के प्रभावों को मुगल सल्तनत पचा नही पाई। शायद आगरा के  हवा पानी की बात ही अलग थी। अगर राजधानी यही रहती तो गुलामी का इतिहास अलग रहा होता।

  8. ताजमहल आगरा में स्थायित्व प्राप्त कर रहे साम्राज्य की परिपक्व होती स्थापत्य कला का उदाहरण है। जिसने यह उपलब्धि चरणबद्ध प्रयोगों के माध्यम से प्राप्त की थी। मैं यह कहना चाह रहा हु कि अगर मुगल बादशाह आगरा में ही टीके रहते तो अगले निर्माण कार्यो में ओर अधिक उत्कृष्टता उजागर हो सकती थी। उन्होंने दिल्ली में तो जाते ही आगरा शैली को लगभग छोड़ दिया।
इस तरह हमारे बीच बातचीत में हमने भूतकाल की बातों को आगे के इतिहास से जोड़कर देखा। ताजमहल सच मे ही काफी इतिहास छुपाए बैठे है, जिन पर अध्ययन किया जाता रहा है।

निष्कर्ष :

आगरा को प्रधानमंत्री मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान का मजाक उड़ाते रेलवे ट्रैक के आधार पर ही जज नही किया जाना चाहिए,  स्टेशन के पास की पुरानी बस्तियों की भीड़भाड़ से थोड़ा सा आगे चलकर देखे तो यह भी बाकी शहरों की तरह ही है। जहां पर खुली हुई कॉलोनी है, साफ सुथरे और चौड़े रोड है, मिलनसार और हँसमुख लोग है। अब आगरा को देश के 100 स्मार्ट सिटीज में जगह भी मिल पाई है। इससे  बनने वाले स्मार्ट सोलुशन लोगो को आकर्षित करेंगे ।आखिरकार यह शहर भारत के गौरवशाली इतिहास का साक्षी जो रहा है।

प्रतिबद्धताओं से परे बदलते अंतरराष्ट्रीय संबंध


MASTRAM MEENA

बात उन दिनों की है जब दुनिया विश्व युध्द की त्रासदी को झेल रही थी। लगभग छः साल चले इस युध्द में करोड़ो की संख्या में जान माल की क्षति हुई। जाते-जाते परमाणु बम का विध्वंस भी दुनिया ने देखा। आधी शताब्दी के इन दो युद्धों की भयानकता को देखकर अल्बर्ट आइंस्टीन  को कहना पड़ा था कि "मुझे यह नहीं मालूम कि तीसरा विश्व युद्ध कैसे लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्व युद्ध अवश्य ही डंडों और पत्थरों से लड़ा जाएगा"।

दरअसल तकनीकी प्रगति ने परम्परागत लड़ाइयों के स्वरूप को बदल कर रख दिया था। इसने सभी देशों को अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित कर दिया। सभी देश अब ऐसे विध्वंशो से बचने के उपायों पर आगे बढ़ने लगे। कुछ देशों ने रक्षा बजट बढ़ा दिया, रक्षा क्षेत्र में अनुसन्धान होने लगा, हथियार निर्मित और आयात किए जाने लगे। रक्षा सन्धिया होने लगी।

युध्द के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू हो गई, उसमे भी बहुत ज्यादा संसाधन प्रयुक्त हुए। जिसके लिए अमेरिका जैसे देशों से विकास में सहयोग हेतु साझेदारी की जरूरत महसूस हुई। उसी समय पर आज़ाद हो रहे उपनिवेशों को भी रक्षा और विकास के लिए बाह्य सहायता की जरूरत थी। ऐसे में कई जगहो पर सामुहिक संगठन निर्मित हुए, राजनीतिक एकीकरण पर ध्यान दिया गया। फिर उसी समय शुरू हुए शीत युद्ध मे विश्व दो खेमो में बंट गया, प्रत्येक खेमा सामरिक स्थिति वाले अधिकतम देशो को अपने पक्ष में करने के लिए उपरोक्त सुविधा उपलब्ध कराने लगा, बदले में उन्हें भी कुछ बाते माननी पड़ी होगी। मतलब एक देश दूसरे देश के साथ विभिन्न प्रतिबद्धता से बंधने लगा था और शीत युध्द की शुरुआत ने इन प्रतिबध्दताओ को आवश्यकता बना दिया।

लेकिन हम जानते है कि द्वितीय विश्वयुद्ध हो या शीत युद्ध कोई भी अकेले ताकत का प्रदर्शन तो होता है नही। वह आर्थिक हितों में टकराहट का नतीजा ज्यादा होता है। आर्थिक पहलू कभी भी ज्यादा दबकर नही रह सकता। शीत युध्द में दो खेमो के टकराने की संभावना वैश्विक राजनीति को भले ही प्रभावित करती रही, लेकिन उसमे आर्थिक पक्षो की जो उपेक्षा चल रही थी,  उसका 1991 की घटनाओं से उभार हुआ।

फिर सभी देश अपने हितों के अनुसार आगे बढ़ने लगे। साम्यवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्थाओ ने खुद को खोलना उचित समझा। सभी विकासशील देशों ने निवेश की आवश्यकता महसूस की, भले ही वह शत्रु देश से ही क्यों न मिले। विकसित देशों को भी पूंजी को श्रम व बाजार वाले देशों में निवेश करने से भारी मुनाफा मिलने वाला था। विश्व बैंक और आईएमएफ जैसे अंतराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों को इसके लिए माहौल बनाने की जिम्मेदारी दी गई। वैसे तो यह एक तरीके का उपनिवेशवाद ही है जहां पहले उपनिवेश का आर्थिक दोहन केवल एक देश द्वारा ही किया जाता था, लेकिन इस व्यवस्था में तो सभी देश वहां पहुंच सकते है।

हालांकि यहाँ दूसरा पक्ष भी है- भारत और चीन जैसे देशों की प्रगति ।  भारत और चीन ने पहले निवेश आमंत्रित किया और आर्थिक विकास में उच्च स्तर पर पहुच गए। यहाँ के मानव संसाधन भी पश्चिमी देशों के जनसांख्यकी अभाव को दूर करने पहुंच गए थे। लेकिन इसी बीच पश्चिमी देशों को लगने लगा कि वैश्वीकरण की व्यवस्था तो उनके खिलाफ चली गई। इसस स्थानीय लोगो के रोजगार खत्म हो गए, प्रवासी और शरणार्थियों का जमावड़ा हो गया, व्यापार में घाटा जाने लगा है। इसी समय आतंकवाद ने भी पश्चिम के देशो को निशाना बनाया। वही जलवायु समझौते भी उसके ऊपर दायित्व लादते हुए प्रतीत हुए।  सूचना प्रौद्योगिकी की वजह से ऐसी बाते नमक मिर्ची लगा कर स्थानीय लोगो को बताई गई, मतलब फेक न्यूज़ कल्चर की शुरुआत हुई। ऐसे में कई पश्चिमी देशों में दक्षिणपंथी दलों और नेताओं की लोकप्रियता बढ़ी, जिन्होंने पोस्ट ट्रुथ वादों की बदौलत सत्ता भी प्राप्त की। इस तरह के माहौल ने घरेलू राजनीति को अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धो से जोड़ दिया। इसमे एकाधिकार वाले नेताओं के उदय के बीज निहित थे। जिन्होंने आते ही संरक्षणवादी कदम उठाने शुरू कर दिए और वैश्वीकरण की आत्मा को पाताल में पहुचा दिया। जलवायु प्रतिबध्दताओ को नकार दिया, वीजा प्रतिबंध शुरू किए गए। भूतकाल में इन दलों को सहयोग करने वाले या इनके लिए सुविधाजनक देशो के साथ सम्बन्धो की शुरुआत की गई, वही दूसरे दलों के द्वारा किए गए अंतराष्ट्रीय व्यवहारों की उपेक्षा की गई। पुरानी प्रतिबद्धताओ को तोड़ना ही इन नेताओं का शगल बन गया,  हार्डकोर मनोरंजन की आदि हो रही स्थानीय जनता को भी यह मनोरंजन के समान लगा।

मतलब अब यह स्थापित हो चुका है कि पुरानी प्रतिबध्दता उनके कामकाज को सीमित करती है । जिससे बचने के लिए वे 1991 से 2010 तक तो दोगलेपन के सहारे चलते रहे। लेकिन अब वैश्वीकरण के दौर में सभी देश अपने लोगो की खुशहाली के लिए स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ना चाहते है। यही वजह है कि वैश्विक व्यवस्था को मार्ग प्रदान करने वाली प्रतिबध्दताए अब खत्म की जा रही है और ज्यादातर देशो द्वारा इसे बेवफाई से जोड़कर भी नही देखा जाता है।
Question for upsc aspirants : why old commitment in international relations consider as a troublemaker in today's diplomacy ? what factor led to broken these commitments ? 
अब पर्याप्त उदाहरणो द्वारा इस विषय को अधिक स्पष्ट किया जा रहा है।

डर,असुरक्षाये और हितों के संवर्धन के कारण उपजी विभिन्न प्रतिबध्दताए निम्न है :

  1.  द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपजी अधिकतर प्रतिबध्दता ओ का कारण तो शीत युद्ध था। जिसकी पृष्टभूमि रूस में साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना से ही निर्मित हो गई थी। द्वितीय विश्व युध्द खत्म होते ही यूरोप और सयुंक्त राज्य अमेरिका दोनो ही रूस के प्रति संशयग्रस्त थे। यूरोप के देशों को लग रहा था कि रूस ने जिस तरह पूर्वी यूरोप के देशों में साम्यवादी सरकार बनवाकर अपना प्रभाव जमाया है, उसी तरह यह बाकी यूरोप पर भी कब्जा कर लेगा। वही अमेरिका को लग रहा था कि अगर साम्यवादी सरकारो वाले देशों की संख्या बढ़ गई तो पूंजीवाद की प्रगति प्रभावित होगी। इसलिए यहाँ से यूरोपीय देश अमेरिका के साथ रक्षा प्रतिबद्धताओ में बंध गए, जो नाटो (NATO) के रूप में सामने आया।
  2. यूरोप के देशों को खुद को भी लग गया था कि अब औधोगिक क्रांति के कारण दूसरे देश भी उभर रहे है। ऐसे में आपस मे ऐसे ही लड़ते रहे तो वैश्विक राजनीति में यूरोप हाशिए पर चला जायेगा। ऐसे में अगर सब एक हो जाये तो अंतरराष्ट्रीय संगठनों में दूसरे देशों से बातचीत करने में हमारा पक्ष मजबूत रहेगा। इससे शांति भी रहेगी तो पुनर्निर्माण में भी मदद मिलेगी। वही वैश्विक मंच पर उभर रहे अमेरिका जैसे देशो को संतुलित करने में मदद मिलेगी। यूरोपीय यूनियन, इसी तरह की सोच का नतीजा था।
  3. शीत युद्ध के साए में रूस की साम्यवादी व्यवस्था का खोप दिखाकर अमेरिका ने तीसरी दुनिया के देशों को भी रक्षा सन्धियो और गुटों में शामिल कर दिया। उसने मध्य पूर्व के देशों के लिए सेंट्रो, दक्षिण पूर्व के लिए डोमिनो इफ़ेक्ट जैसे विचार करके अपना प्रभाव छोड़ा। कई देशो को आर्थिक और तकनीकी मदद देकर अहसान की प्रतिबद्धता के दायरे में लाया गया। यही काम रूस ने भी किया।
  4. औपनिवेशिक ताकतों ने उपनिवेशों के आर्थिक शोषण और जल्दबाजी के निकास से उत्पन्न विसंगतियों के प्रति स्थानीय लोगो के आक्रोश से बचने के लिए इन देशों को आर्थिक मदद देना शुरू किया। वैसे इन देशों को पकड़कर रखना इसलिए भी जरूरी था कि ये बड़े बाजार के रूप में देखे जा रहे थे।
  5.  तीसरी दुनिया के देशों ने भी अपने हितों की पैरवी के लिए आपस मे कई प्रतिबद्धता की, जैसे कि-गुट निरपेक्षता। फिर इन्होंने एक स्वर में अपनी बात रखकर विकसित देशो को अपने ऊपर हावी नही होने दिया।
  6. तीसरी दुनिया के देश भी कम नही थे। इन्होंने भी LDCs पर कई प्रतिबध्दता थोप दी। जैसे कि -भारत द्वारा नेपाल और भूटान के साथ सामरिक समझौते।
  7. जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए प्रयास शुरू हुए। सभी देश उत्सर्जन कटौती की बात पर सहमत हुए। विकसित देशों ने विकासशील देशों में अनुकूलन और अल्पीकरण के लिए वित्त और तकनीकी मदद की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
ये आपसी प्रतिबद्धताए वैश्विक सम्बन्धो को लगभग तीन-चार दशक तक मार्ग प्रदान करती रही। लेकिन आगे निम्न घटनाक्रमो ने आपसी सम्बंधो में परिवर्तनों को दिशा प्रदान की :
  1. जब 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। उस समय पूंजीवाद का परिष्कृत रूप नव-उदारवाद बाकी के सभी देशों को भी प्रभावित करने लगा , क्योकि लगभग चार दशक के शीत युद्ध मे पूंजीवाद विजेता बनकर निकला था और उसके जश्न को टीवी , अखबार द्वारा देखा जा सकता था। साम्यवाद के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव से निकले देशो को लगने लगा कि वे विकास प्रक्रम में कही पीछे रह गए है। ऐसे में परम्परागत व्यवहारों को भुलाकर जहां से जो भी मिले उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। 
  2. भारत जैसी मिश्रित अर्थव्यवस्था भी पूंजीवाद को अब ज्यादा अछूत मानकर नही चल सकती थी। इन देशों को ऋण, अनुदान के लिए पश्चिमी प्रभुत्व वाले वित्तीय संस्थानों के पास जाना पड़ा। जिन्होंने बदले में अर्थव्यवस्था को खोलने की शर्त रखी। फिर विकासशील देशों को निवेश के लिए खोल दिया गया। इन देशों के बाजार, श्रम आदि को भुनाने के लिए विकसित देश आपस मे प्रतिस्पर्धा करने लगे।
  3. भारत, चीन समेत ब्रिक्स देशों के उदय ने पश्चिमी देशों के कान खड़े कर दिए,अब वे इन्हें गम्भीरता से ले रहे है। अब अधिकतर अध्ययन इन्हें बड़ी अर्थव्यवस्थाओ के तौर पर दर्शाने लगे। इससे पश्चिम देशो के समक्ष खुद को फिर से साबित करने की चुनोती आ खड़ी हुई। चीन ने तो सामरिक क्षेत्र में भी प्रगति करके बाकी देशों को चिंतित कर दिया।
  4. विकसित देशों ने जो बीज बोए थे वो अब उन्हें कड़वे लगने शुरू हो गए। अफगानिस्तान में रूस को निकालने के लिए बनाए गए मुजाहिदीन अब आतंक के दूत बन गए।
  5. घरेलू राजनीति में आये बदलावों ने भी दूसरे देशों के साथ सम्बन्धो को फिर से प्राथमिकता देना शुरू किया। 
बस यही से पुरानी प्रतिबध्दताओ से उत्पन्न रिश्तों में बदलाव आ गया। यह बदलाव चरणबध्द रूप से था। जिसे कई दूसरे कारक भी प्रभावित कर रहे थे।

प्रतिबद्धताओ में बदलाव के उदाहरण :
  1. अमेरिका को लगने लगा कि यूरोप के देश उसे एंकर के तौर पर उपयोग कर रहे है। यह सोचकर उनके साथ से मुक्त व्यापार के समझौते से बाहर हो गया। ट्रम्प ने नाटो के प्रति भी संशय व्यक्त किया है। साथ ही अब उसने विकासशील देशों को पार्टनर के तौर पर तवज्जो देनी शुरू की, जैसे कि -भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि को।
  2. यूरोप के देशों को लगने लगा कि अमेरिका के चक्कर मे हमने रूस से दुश्मनी बढ़ा ली, जिसके कारण उसके विशाल प्राकृतिक संसाधनों के फायदे से वंचित हो गए। अब ये रूस की तरफ नरम हो रहे है। रही बात सुरक्षा की तो इन्हें लग रहा है कि अब पहले जैसे युध्द नही होंगे। वही रूस भी उनके दर्जे की ही शक्ति है।
  3. विकासशील देशों को उपलब्ध कराई जा रही अहसान लादने वाली आर्थिक मदद भी अब बंद की जा रही है। क्योंकि पाकिस्तान उसे पाकर आतंकवाद को पोषित कर रहा है। वही ब्रिटेन ने कहा था कि हम अब अनुदान बंद करेंगे क्योकि भारत कुछ ज्यादा ही विकसित हो गया है।
  4.  विभिन्न मंचो और संगठनों की एकता भी भंग हुई है, जैसे कि ब्रिटेन eu से निकल गया, गुट निरपेक्ष फीकी पड़ रही है, सार्क जैसे संगठन लगभग मृत अवस्था मे है। केवल आसियान ही सफल माना जा रहा है।
  5. अमेरिका जलवायु परिवर्तन के पेरिस समझौते से बाहर निकल गया है। उसका मानना है कि विकासशील देशों के द्वारा चलाया गया एक्सटॉर्शन रैकेट है।
  6. चीन को संतुलित करने के लिए अमेरिका अंधेरे में हाथ पैर मार रहा है। देखते है कोई लात निशाने पर पड़ती है या नही। वह इसके लिए एशिया के देशो को ही ढाल बना रहा है। जिनमे भारत को चीनी बिरोध का पोस्टर बॉय बनाने की फिराक में है।
  7. मुस्लिम देश का परम्परागत तेल ग्राहक- अमेरिका चला गया है, अब वो खुद आत्मनिर्भर हो गया है। साथ ही उसने इन्हें दहशत फैलाने का जिम्मेदार मानकर हड़काना भी शुरू कर दिया है। अब ये देश नए ग्राहक तलाश रहे है। इसके लिए रूस, भारत , चीन जैसे देशों से सम्बंध सुधारने में लगे हुए है।
  8. कभी वैश्वीकरण की पैरवी करने वाले पश्चिमी देश अब संरक्षणवाद पर फोकस कर रहे है। खुद के देशो में बढ़ी हुई बेरोजगारी को इसका कारण बता रहे है।  शरणार्थियों के संकट ने भी उन्हें चौकस बनाया है क्यों कई बार वे चरमपंथ से जोडकर देखे गए है। अब बाहरी लोगों से रक्षा के नाम पर एकाधिकारवादी सरकारे सत्ता में आ रही है।
  9. भारत और रूस की मित्रता कमजोर पड़ी है। रूस पाकिस्तान के साथ सामरिक सम्बन्धो पर आगे बढ़ रहा है। वही भारत की अमेरिका से सामरिक नज़दीकी बढ़ी है।
  10. इजरायल के साथ सम्बन्धो में खुलापन आया है। फिलिस्तीन को अकेला छोड़कर अरब देश आगे बढ़ रहे है। इनका मित्र अमेरिका अब चला गया, अब ये भी बाजार की तलाश में इस्लामिक पहचान से आगे बढ़ रहे है।
  11. कोरियाई प्रायद्वीप स्वीकृति के लिए प्रयासरत है। ईरान भी कोई ज्यादा खुश नही है।
  12. अफगानिस्तान में अमेरिका खुद को खलनायक बताने से बचने के उपाय तलाश रहा है।

महत्वपूर्ण रुझान
  • जो  भी हो अब सभी देश आर्थिक राष्ट्रवाद को तवज्जो देने में लगे हुए है। यह बड़ा ही मजेदार है न, कि एक तरफ तो विदेशी कम्पनियों को आमंत्रित कर रहे है दूसरी तरफ़ खुद के हितों की रक्षा के लिए  सभी नियमो से परे भी जा रहे है।
  • प्रतिबध्दताओ से पार जाने के क्रम में अप्रत्याशित चीजे घटित होती जा रही है। जो पहले घनिष्ठ मित्र हुआ करता था अब उसके साथ कोई गर्मजोशी नही है। वही जो पहले दुश्मन थे उनसे घनिष्टता तलाशी जा रही है। जैसे कि भारत और रूस के सम्बन्धो में पहले जैसी गर्मी नही है, वही रूस के पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधार रहे है।
  • दो धुर विरोधियों के साथ सम्बन्ध भी स्थापित है, पहले जैसी रोकटोक नही है। जैसे कि भारत के इजरायल और फिलिस्तीन के साथ सम्बन्ध , भारत का अमेरिका से lemoa करके रूस से परमाणु ऊर्जा समझौता करना आदि। एक तरीके से अब डिप्लोमेसी सन्तुलन की कठिन परीक्षा दे रही है। पहले यह काम आर्मी करती थी।
  • सीधी सी बात है प्रतिबध्दता नियम बनाती है। जो गतिविधियों को सीमित करते है वही किसी एक पक्ष को लाभान्वित करते है। इस रैंकिंग कल्चर के समय मे कौन देश चाहता है कि वह खुद को नुकसान करके दूसरे को फायदा पहुचाये। लोकतंत्र में ये रैंकिंग कल्चर देशो को आत्मकेंद्रित बना रही है। वही घरेलू राजनीति वैश्विक घटनाओ से जुड़ती जा रही है। इसलिए इस तरह के गतिशील रिश्ते जनता को भा भी रहे है।
आगे क्या होगा
पहले "शत्रु का मित्र भी शत्रु " ही समझा जाता था। लेकिन अब सभी देशों को विकास करना है इसलिए शत्रुता का दायरा संकीर्ण हो गया है। अब ये देश तक भी सीमित नही रही बल्कि यह केवल मुद्दों पर आधारित हो गई है। होना भी यही चाहिए।

लेकिन बिना प्रतिबद्धता के माहौल अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है। कोई भी देश किसी के साथ कभी भी बेवफाई कर सकता है। सभी देशों को इस बारे में अपनी तैयारी करके रखनी चाहिए।


नेहरू को छोड़कर मोदीजी द्वारा अनिच्छा से मनमोहन को अपनाना

मोदीजी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कई ऐसे निर्णय लिए और कई ऐसे कदम उठाए जो अपने आप मे ऐतिहासिक महत्व रखते है। इतने सारे ऐतिहासिक महत्व के विषयों को घटता देखकर ऐसा लगता है जैसे कि स्वतंत्रता के बाद का भारतीय इतिहास इस तरह जाना जाएगा- मोदी काल से पूर्व और मोदी काल के बाद। ऐसे में इतिहासकारो के लिए एक बात को तलाशने की जरूरत होगी और वो यह है कि क्या उनके प्रयासों के बाद निरन्तरता ही जारी रही अथवा परिवर्तन महसूस किया गया।

अगर मोदीजी के प्रशासनिक, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सुधारो में केंद्रीय थीम को पकड़ा जाए तो वह है- आर्थिक विकास। आर्थिक विकास के लिए इन्होंने नवउदारवादी मार्ग को अपनाया। जिस की शुरुआत भारत मे 1991 के निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण के माध्यम से हो चुकी थी। जिसमे सरकार को अपनी भूमिका को सेवा प्रदाता से विनिमय प्रदाता के तौर पर बदलने के बारे में कहा गया था। मोदीजी ने इसके तहत सरकार के हस्तक्षेप को कम करने के लिए 'न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन' की अवधारणा अपनाई। प्रक्रियात्मक और संरचनात्मक सुधारो के माध्यम से देश मे व्यापार और निवेश करने को आसान बनाने पर ध्यान दिया गया। इसके लिए जरूरी कानूनों में बदलाव किए गए, नए नियम बनाये गए, अवसंरचना का निर्माण किया गया और अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे बदलाव किए जो निवेशकों के अनुकूल हो। सरकार द्वारा राजस्व घाटे को न्यूनतम रखने के लिए लोक कल्याणकारी कार्यो में होने वाले व्ययों में कटौती की बात कही गई, FRBM एक्ट पारित किया गया। कुल मिलाकर विदेशी निवेश को आकर्षित करने के हर सम्भव प्रयास किए गए।

इतिहास के साथ तुलना :
इतिहास के झरोखे से देखा जाए तो नेहरू ने जो समाजवादी रुझान की व्यवस्था स्थापित की थी, उसे 1991 के आर्थिक संकट में ही अप्रासंगिक समझ लिया गया और उसी का नतीजा था 1991 कि आर्थिक सुधार। इन आर्थिक सुधारों के मॉडल को नवउदारवाद कहा जाता है जिसमे शामिल है-खुला व्यापार, खुली पूंजी, निजी क्षेत्रों पर निर्भरता, वैश्विक आर्थिक तालमेल आदि। नव उदारवादी मॉडल में कदम तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के प्रयासों से रखे जा चुके थे और काफी सुधार हो चुके थे। हालांकि समावेशी विकास को भी बराबर महत्व देकर चल रही पंचवर्षीय योजनाओं के कारण आर्थिक एजेंडे पर समाजवादी हैंगओवर छाया रहा।

जब नरेंद्र मोदीजी प्रधानमंत्री बने तो इन्होंने समाजवादी दृष्टिकोण को तिलांजलि दे दी और जनमत के दबाव में गिने-चुने लोकलुभावन कार्य उसकी जगह पर किए। उपलब्ध संसाधनों का तार्किक वितरण करने वाले और सभी के विकास को तय करने वाले योजना आयोग को समाप्त कर दिया गया। विनिवेश पर जोर दिया।  एक तरीके से अब निजी क्षेत्र के लिए नीतियां अब लगभग पूरी तरीके से उदारीकृत कर दी गई।

एक तरह से नेहरू की विरासत को खत्म कर दिया गया। लेकिन इस प्रयास में वे मनमोहन की विरासत को आगे बढ़ाने लग गए। वे नवउदारवाद के नए ध्वजवाहक बनकर सामने आए, जैसे कि मनमोहन के समर्पित शिष्य हो। हालांकि मनमोहन ने नवउदारवादी नीतियों की शुरूआत अवश्य की थी लेकिन फिर भी वे समाजवादी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नही हो पाए, उनके द्वारा शुरू किए गए मनरेगा, खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रम इसके सबूत है। लेकिन मोदीजी नवउदारवाद पर बिना हिचकिचाहट के आगे बढ़ गए।

मोदीजी का आर्थिक कार्यक्रम:
नवउदारवाद के माध्यम से  समावेशी विकास की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह कई लोगो द्वारा लगाया जा चुका है। क्योंकि भारत को तो संवृद्धि युक्त विकास की बजाय समावेशी विकास की आवश्यकता है। ऐसे में यह अध्ययन का विषय हो जाता है कि प्रधानमंत्री मोदीजी ने बाजारी शक्तियों के प्रति इतना समर्पण क्यों दिखाया?

जिस समय रोजगार विहीन संवृद्धि की सभी जगह आलोचना हो रही हो, उसी समय मे आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम उल्टा संवृद्धि पर ही जोर दे देते है। उनका मानना है कि ज्यादा संवृद्धि से ही रोजगार उत्पन्न होंगे। यह एकदम से गुमराह करने वाला दावा प्रतीत होता है। क्या कक्षा में एक-दो छात्रों के अंक बढ़ाने के प्रयासों से सारे छात्रों का परिणाम अच्छा आ सकता है। लेकिन वे इसका जवाब भी  बिज़नेस माइंडसेट से देते है कि एक-दो छात्रों के उच्च प्राप्तांक देखकर नए एडमिशन तो आ ही सकते है। जिस तरह वे छात्रों के बजाय स्कूल के फायदे की सोच रहे है उसी प्रकार सरकार भी लोगो की आर्थिक दशा के बजाय बजटीय आंकड़ो पर वाहवाही लूटने की सोच रही है। यही  नीति मोदी सरकार द्वारा भी अपनाई जा रही है। जो क्षेत्र आगे बढ़ रहा है उसे उतनी ही क्षमता से आगे बढ़ने दो, एक तरह से डार्विन का सिद्धांत यहां लागू कर दिया गया है। व्यवसायों को बढ़-चढ़कर प्रोत्साहित किया जा रहा है वही कृषि, असंगठित क्षेत्रो के लिए केवल औपचारिक निर्वातहीनता उत्पन्न की जा रही है। अगर लोगो की क्षमता निर्माण पर ध्यान भी दिया जा रहा है तो वो भी बाजार के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर। जैसे कि- लोगो के पास क्रय शक्ति हो इसलिए सार्वभौमिक बुनियादी आय की परिकल्पना।

अब हमारे पास सभी प्रश्नों का उत्तर देने के लिए पर्याप्त सूचना उपलब्ध हो गई है।
  1. पहला प्रश्न तो शीर्षक से ही उत्पन्न होता है। नेहरू  को दरकिनार कर दिया वही मनमोहन सिंह को अपना लिया गया, जिसे की ऊपर दिखा चुके है। लेकिन भारतीय राजनीति में जनमत की परवाह के कारण लोककल्याण के कार्यो से पृथक होने में अक्षमता की वजह से नवउदारवादी नीतियां पूरी तरीके से कभी भी लागू नही की जा सकती। इस आधार पर इतिहास के विद्यार्थी यह कह सकते है कि मोदीजी न तो नेहरू को दरकिनार कर पाए और न ही मनमोहन को अपना पाए। लेकिन अब हम कह सकते है कि सच्चाई दोनो दावों के बीच मे ही है।
  2. शीर्षक से ही दूसरी बात है मनमोहन सिंह के विचारों को न चाहते हुए भी अपनाने की मजबूरी होना। हम समझ सकते है कि कांग्रेस मुक्त भारत की बात कहने वाले व्यक्ति के लिए कांग्रेस के ही नेता की नीतियों को अपनाना कितना मुश्किल रहा होगा, यही कारण है कि वे गैर-अनुमानित फैसले (नोटबन्दी) लेकर यह दर्शाने की कोशिश करते है कि उनका आर्थिक कार्यक्रम पहले से अलग है।
  3. मोदी काल की अवधारणा की बात हमे अतिश्योक्ति लग सकती है। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए इसे मानना कोई बड़ी बात नही है, उनका बस चले तो वे 26 मई 2014 से मोदी संवत शुरू करवा दे। खुद मोदीजी की भी मनोवृत्ति इसी तरह काम करती है, वे पहले की सरकारों द्वारा किए गए कामो को मान्यता ही नही देते है, वे सभी कार्यक्रमों को फिर से नई शुरुआत देकर नए युग की शुरुआत दिखाना चाहते है।
  4. एक प्रश्न यह उठा था कि मोदीजी नवउदारवादी नीतियों के चक्कर मे समावेशी विकास की उपेक्षा तो नही कर रहे है?  तो इसमें कोई शक नही है कि उनकी नीतियों से ऑक्सफेम की चिंताओं की पुष्टि होती है, वे आर्थिक विषमता को निर्मित करती है। सीधे शब्दों में ही देख लेते है न कि चुनिंदा व्यवसायीयो को बढ़ावा देने से बाकी लोगो को फायदा कैसे होगा। ऑटोमेशन और नवउदारवाद से उत्पन्न रोजगार कटौती का समाधान करने में मोदीजी बुरी तरीके से विफल रहे है। देश के संसाधनों का आवंटन करने वाले योजना आयोग को समाप्त करके मोदीजी ने समावेशी विकास के पैर पर कुल्हाड़ी मारी है।
आर्थिक नीतियों में संकीर्णता के कारण :
हमने देखा कि मोदीजी के आर्थिक सुधारों का झुकाव बड़े व्यवसायीयो के प्रति ज्यादा है बजाय किसानों, ग्रामीणों या असंगठित क्षेत्रों के। इसके निम्न कारण हो सकते है -
  1. व्यवसायिक क्षेत्रो के प्रति झुकाव मौजूदा समय की वैश्विक सच्चाई है, यह कोई भारत मे किसी सरकार की कोई विशेष नीति नही है। फ़र्क़ इतना है कि मोदीजी व्यक्तिगत रूप से इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने में रुचि ले रहे है।
  2. झुकाव का दूसरा कारण राजनीतिक है। कई कॉरपोरेट घरानों ने प्रधानमंत्री बनने में सहायता की थी। अब वे उनके अनुकूल नीतियां बनाकर उनका आभार व्यक्त करना चाहते है।
  3. निम्न तबके को वे विपक्षी दलों के वोट बैंक के रूप में देखते है। इसलिए हो सकता है कि उनकी आर्थिक उन्नति को बाधित कर राजनीतिक महत्वकांशाओ को निर्मूल करना चाह रहे हो।
हालांकि ये सब अटकलें है। आर्थिक कार्यक्रमो में संसदीय चर्चाओ का भी प्रभाव रहता है, जो निश्चित तौर पर किसी भी वर्ग के प्रति पक्षपात नही करती। फिर भी कार्यपालिका के हाथ मे एजेंडे को दिशा देने की पर्याप्त शक्तियां रह जाती है।

आगे क्या होगा :
मैंने पहले बताया था कि नवउदारवादी नीति से खुद को पृथक दिखाने के लिए मोदीजी गैर-अनुमानित फैसले (नोटबन्दी) लेते है। जबकि सरकारी नीतियों में इतनी पारदर्शिता होनी चाहिए कि लोग उनका अनुमान लगा सके। लेकिन यह उनका काम करने का बाबूभाई स्टाइल है। इसके बावजूद भी कम से कम आगामी नीतियों के ऊपरी फ्रेमवर्क को ट्रेस तो किया ही जा सकता है।
  1. निजी क्षेत्र काफी संगठित और महत्वकांक्षी हो चुका है। वह अब चुनावो के एजेंडो को निर्धारित करता है। कई राष्ट्रीय दल कॉरपोरेट सेक्टर से भारी चंदा प्राप्त करते है। ऐसे में निजी क्षेत्र किसी प्रकार की लगाम को बर्दाश्त नही करेगा। इसलिए अब भूल जाओ की जो प्राकृतिक संसाधन या राष्ट्रीय सम्पतिया निजी क्षेत्र के पास चली गई है वे वापस राष्ट्रीयकृत की जाएगी। अब तो इसी चीज की निगरानी की जाए कि निजी क्षेत्र को अंधाधुंध संसाधनों का आवंटन नही हो, वरना समावेशी विकास  और ज्यादा मुश्किल होगा क्योंकि लोगो के लिए तो संसाधन उनकी संख्या की मात्रा में उपलब्ध ही नही रह पाएंगे। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा घरेलू छोटी कम्पनियों को पचाने की संभावना काफी तीव्र है। आगामी समय मे नीति निर्माताओं के सामने यह बड़ी चुनौती होगी।
  2. आर्थिक समीक्षा 2016 में कहा गया कि लोककल्याण के कार्यो में अत्याधिक भागीदारी से सरकार ने बोझ बढ़ा लिया है, अब निजी क्षेत्र को सेवा प्रदाता के तौर पर स्वीकार करके एग्जिट नीति पर विचार किया जाना चाहिए। लेकिन लोगो की क्षमता निर्माण को बाजार के भरोसे छोड़ने पर सरकार को भी शंका हुई है और उसने समयबद्ध एग्जिट नीति को अब अपनाया है। मतलब सरकार कार्यक्रमो से हाथ एकदम नही बल्कि एक निर्धारित अवधि के बाद खींचेगी। इसी सिलसिले में FRBM एक्ट के लक्ष्यों के अनुसरण को बंद करने का विचार बनाया गया है।
  3. सरकारे यह मानने लगी है कि देश के जनसांख्यकी लाभांश को भुनाने के लिए आर्थिक इकोसिस्टम का निर्माण किया जाए। इसलिए आगामी दिनों में आर्थिक गतिविधियों के लिए गवर्नेन्स सम्बंधित सुधार गति पकड़ेंगे।
निष्कर्ष :
जैसा की हम देख चुके है कि मोदीजी की नीतियों में भी निरंतरता ही मौजूद है, अगर परिवर्तन कही आया है तो वह है नीतियों को लागू करने में। विकास प्रक्रम में नीतिगत अपंगता और क्रियान्वयन अपंगता को मोदीजी ने सीधे सम्बोधित किया है। इससे पहले मनमोहन सिंह के कार्यक्रमो शायद यह दुविधा थी कि नव उदारवाद का दामन स्थाई रूप से थामा जाए या फिर आर्थिक स्थिति नियंत्रण में आते ही इससे पल्ला छुड़ा लिया जाए। मोदीजी ने इस दुविधा को खत्म कर दिया, वे मानने लगे कि भारत को उभरती अर्थव्यवस्था  वैश्विक नेतृत्व तभी दिलवाएगी जब नव उदारवाद पर पूरी तरीके से आगे बढ़ेंगे। तभी तो वे पश्चिम और खाड़ी देशों के प्रति अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहो का त्याग करके निवेश सम्बंधो को मजबूत करने में लगे है।

जैसा कि The Economist नामक पत्रिका ने भी मोदीजी को नव-प्रवर्तक के बजाय महान प्रशासक माना है। मुझे भी लगता है कि इतिहास भी मोदीजी को इसी रूप में जगह देगा। वे शेरशाह सूरी ज्यादा नजर आएंगे बजाय खिलजी या अकबर।

रोजगारो का प्रायोजित अभाव


हम सब मानते है कि वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से प्रगति कर रही है लेकिन यह प्रगति रोजगार के प्रश्न का उचित समाधान नही कर पा रही है। जब भी कोई भर्ती की सूचना आती है तो उसके लिए पहुचने वाले लाखों आवेदन और फिर आसमान छूती कटऑफ को देखकर लगता है कि रोजगार कितने कम रह गए है और उन्हें पाने की अभिलाषा रखने वालो की संख्या कितनी ज्यादा हो गई है। ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि भर्तियां एक तो नियमित रूप से नही आती दूसरी बात यह है कि उनकी संख्या मांग को देखते हुए बहुत ही कम होती है। इन सबको देखकर ऐसा लगता है कि रोजगारो का संकट उत्पन्न हो गया है।


ऐसे में कहा जा रहा है कि वर्तमान स्थिति में भी रोजगारो की कोई कमी नही है, मौजूदा अभाव एक तरीके से कृत्रिम तौर पर निर्मित किया गया है। सरकारी विभागों में कर्मचारियों के लाखों पद खाली पड़े हुए है, मानव संसाधन के अभाव से हर विभाग को जूझना पड़ रहा है। लेकिन समस्या यह है कि सत्ताधारी वर्ग उन्हें भरने के लिए अनिच्छुक है। मौजूदा अभाव एक तरीके से प्रयोजित है जिसे विभिन्न वर्गों द्वारा प्रायोजित किया जा रहा है।

रोजगारो के अभाव को प्रायोजित करने वाले कारक

1. अंतराष्ट्रीय संस्थान
अंतरराष्ट्रीय संस्थान विभिन्न देशों की नीतियों को प्रभावित कर रहे है। इन संस्थानों में विकसित देशों का बोलबाला है और ये विकासशील देशों में अपने निवेशों को सुरक्षित करने के लिए कई तरह के इंडैक्स जारी करते है और उनमें रैंकिंग सुधारने के नाम पर लोगो का भला करने वाली नीतियों को खत्म करने की वकालत करते है।
ये मानते है कि जो देश नोकरियो में वेतन-भत्तों में ज्यादा व्यव करेगा तो उसका राजस्व घाटा भी  ज्यादा होगा। ऐसे देश से अपने निवेशों की सुरक्षित वापसी मुश्किल होगी, इसीलिए ये सरकारो को प्रभावित करते रहते है।

2. सार्वजनिक क्षेत्र
हर एक सरकारी विभाग मानव संसाधनों के अभाव से ग्रसित है, इस कारण वहां के हर कार्य अटके पड़े हुए है। वे ऊपरी स्तर पर कर्मचारियों की आवश्यकता को भी जाहिर करते है, लेकिन होने वाली नियुक्तियां उनकी मांग से इतनी कम होती है कि नवनियुक्तो के आने से भी विभागीय कामकाज में कोई बदलाव नही आता है। उम्मीद के तौर पर तकनीकी उन्नयन का आश्वासन है कि कम लोग ही तकनीकी की बदौलत सभी कामकाजों को संभाल सकेंगे।

इतनी भयावह स्थिति होने के बाद भी सरकार भर्ती के प्रति अनिच्छुक बनी हुई है क्योंकि वो कर्मचारियों के वेतन-भत्तों का बोझ नही बढ़ाना चाहती है। सरकार को बस राजस्व घाटे का स्कोर कम दिखाकर वाहवाही लूटनी है। अपने कामकाज को निजी क्षेत्र में स्थानांतरित करना तो प्राथमिक बना ही हुआ है , साथ मे तकनीकी की बदौलत जीतने कर्मचारियों को कम किया जा सके, उतना करने की कोशिश जारी है। मौजूदा मानव संसाधन का ही कैसे अधिकतम उपयोग किया जाए, सरकार इस मिजाज में रहती है। अब बोलो इस तरह के रवैये से रोजगार सरकारी विभागों में कैसे निकलेंगे, उल्टा आने वाले समय मे कम और होंगे। अधिकतम कार्यो को संविदा और अस्थायी नियुक्तियो से किया जाएगा।

3. निजी क्षेत्र
निजी क्षेत्र का एकमात्र मकसद मुनाफे पर रहता है। मुनाफे के लिए जरूरी है कि लागत को कम से कम किया जाए। लागत में कटौती जब सम्भव है जब कम लोग ही अधिक कामो को संभाल सके। इसलिए निजी क्षेत्र क्रत्रिम बुध्दिमता पर आधारित स्वचालन का प्रयोग बढ़ाने का पक्षधर है, जिसके कारण नोकरियो में भारी मात्रा में कमी होगी। इसके साथ ही काम करने वालो के सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी दायित्वों को कम करने के लिए श्रम कानूनों को ढीला करवाने के लिए सरकार को भरोसे में लिया जा रहा है, इससे भी लोगो मे अपने रोजगार के प्रति असुरक्षा बढ़ेगी।

कॉरपोरेट सेक्टर ने तो अपने रोजगार के दायित्वों से बचने के लिए बीच मे यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि हम तो रोजगार देने  को इच्छुक है लेकिन भारतीय युवाओं के पास ही रोजगार देने लायक क्षमता नही है। यहां मन मे एक सवाल उठता है कि अगर भारतीयों के पास क्षमता नही है तो फिर उन्ही भारतीयों को नियुक्त करने के लिए H1B वीजा की लड़ाई आप लड़ रहे है? सीधी सी बात है रोजगार की योग्यता का अभाव एक बहाना है। ऐसे कई बहाने इनके द्वारा बनाये जा रहे है। अगर ये कुछ प्रयास भी कर रहे है तो वो सिर्फ औपचारिकता भर है, जैसे कि अप्रेंटशिप के कोर्स करवा दिए, कौशल विकास के शिविर लगा दिए।

दोष देते समय निजी क्षेत्र के हालातों को भी समझ लेना चाहिए। दरअसल वर्तमान बड़ी कम्पनी ओर बड़ी होती जा रही है वे छोटी कम्पनियों को अधिग्रहण, कीमत युध्द, नीतिगत संरक्षण के माध्यम से बाहर कर दे रही है। इससे छोटी इकाइयों के अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो गया है। इस वजह से कम्पनिया अपने भविष्य को कम कार्मिको की बदौलत दिशा देना चाहती है। जैसे कि आईटी सेक्टर में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कम्पनियों ने इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो जैसी कम्पनियों के लाभांश को चुनोती दी है। वालमार्ट ने हाल ही में फ्लिपकार्ट को खरीद लिया है, अलीबाबा भी बड़ी भागीदारी निभा रही है। इसका मतलब है कि संसाधन सम्पन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियों देशी इकाईयो को प्रभावित कर रही है, इसका असर रोजगारो पर भी पड़ रहा है। बड़ी कम्पनियों के पास कामकाज के संचालन के लिए बेहतर तकनीकी और प्रबंधन होता है जिससे कम लोगो का नियोजन सम्भव हो पाता है।

4. नीति-निर्माताओं की भूमिका
रोजगारो के अभाव को प्रायोजित करने में नीति-निर्माताओं की भी बड़ी भूमिका होती है-

  • नीति-निर्माता रोजगार सृजन के लिए कोई मजबूत इच्छाशक्ति नही रखते है। अगर आर्थिक समीक्षा की माने तो वे रोजगार के नाम पर लोगो को केवल जूते-कपड़े बनाने का प्रशिक्षण देना चाहते है। सरकार अनोपचारिक क्षेत्र को ही कागजो के जाल में फंसाकर रोजगार का अहसास दिलाना चाहती है। पकोड़े बनाने को रोजगार कहना कोई जुमला नही था बल्कि वो सरकारी प्रयासों का एक उदाहरण था।
  • नीति-निर्माता राजनीतिक दलों से आते है जोकि अपने वित्तपोषण के लिए कॉरपोरेट सेक्टर पर निर्भर रहते है। अतः उन्हें नाखुश करने के चक्कर मे भी सरकार कोई ठोस व्यवस्था नही कर पा रही है।
  • आरक्षण विरोधी लोग भी सरकारी भर्तीयो के अभाव को प्रायोजित कर रहे है। इनका मकसद है कि भर्तियों को अटकाया जाए और बाद में अधिक नोकरियो को निजी क्षेत्र में बदला जाए। अधिकतम सरकारी काम को संविदा पर करवाया जाए। इसी सिलसिले में बेकलॉग चल रहे लाखो पदों को हाल ही में खत्म कर दिया गया।
इस प्रकार हम देख रहे है कि बाहरी तत्व, सरकार, निजी क्षेत्र और विभिन्न हितों से परिचालित नीति-निर्माता रोजगारो के इस प्रयोजित अभाव के लिए जिम्मेदार है।

समस्या की भयावहता
सबसे बड़ी बात यह है कि यह समस्या नजर आती है। जहाँ देखो काम मांगने वालों, परीक्षा देने वालो, साक्षात्कार देने वालो की भारी भीड़ नजर आती है। इतनी संख्या में छात्र कॉलेजो से बाहर आ रहे है कि नोकरियो की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान मशरूम की तरह फलफूल रहे है, उनकी फीस और कमरों के किराए गरीब छात्रों की जेब काट रहे है। पानी, खाना, अखबार, सामान जैसी कई दूसरी सहायक सुविधा देने वाले लोग छात्रों की मजबूरी का शोषण करने में लगे हुए है। इसके बाद भी आसमान छूती कटऑफ की तरफ सरकार की एक दृष्टि भी नही जाती। लेकिन विडम्बना है कि इनसे आम आदमी जूझ रहा है, नीति निर्माता नही। वे तो खुद और खुद की पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करने में लगे हुए है। और लोगो को आरक्षण, जाति, भाषा और धर्म के नाम पर बांटकर खुश नजर आते है। इसके साथ ही अनियमितताओं से ग्रसित चयन आयोग है जो छात्रों के धैर्य की कठिन परीक्षा ले रहे है। इन सब को भगवान से डरना चाहिए कि एक तरफ तो मानव संसाधनों का अभाव झेल रहे कार्यालय है वही दूसरी तरफ कानून से बंधे और आंसू बहाते अभ्यर्थी है।

अब चलते है समाधान की तरफ
जैसा कि हम जानते है कि भारत अभी जनसांख्यकी लाभांश के दौर से गुजर रहा है, जिसमे 70% लोग 35 साल से कम उम्र के है। मतलब रोजगारो की तलाश करने वाले है या बेहतरीन विकल्पों की तलाश में लगे हुए लोग है।


  1. यह वह समय है जब भारत मे रोजगार के सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनो में काफी अवसर है। लेकिन जनसांख्यकी लाभांश ही वह कारण है जिसकी वजह से गला काट प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। जब हम इस लाभांश को पार कर जाएंगे तब यह हालात नही रहेंगे। यह वह समय है जब लोग स्नातक पूरी करके निकल रहे है, और सरकारी नॉकरी सभी की प्राथमिकता होती है। सरकार को चाहिए कि रिक्तियों को बढ़ाये और आगे चलकर भले ही नियुक्तियों को जनसंख्या के आधार पर विनियमित कर दे।
  2. ऐसा समय है जब इन रिक्तियों को भरने की जरूरत है, लेकिन सरकार को लगता है कि इसके कारण राजस्व घाटा बढेगा। लेकिन वैतनिक लोग बिज़नेस वर्ग से ज्यादा कर अदा करंगे ओर खर्चा करेंगे तो 30% से 40% तक धन तो वापस सरकार या अर्थव्यवस्था में ही चला जायेगा। यह एक तरह से विन-विन सिचुएशन होगी।
  3. एक भर्ती आंदोलन शुरू किया जाए जिसमे सभी विभागों में सभी रिक्तियों की पहचान की जाए और उन्हें भरा जाए। एक पदोन्नति नीति के माध्यम से मेहनती और ईमानदार लोगो को कुछ निश्चित समय के बाद अनिवार्य पदोन्नति दी जाए। एक छंटनी अभियान चलाकर कामचोर कार्मिको को बाहर किया जाए।
  4. सरकार युवाओ को क्यों उद्वमी बनाने पे तुली हुई है। यहा दबावपूर्ण उड्डमशीलता कैसे करेगी, आप लोगो को कह रहे हो कि रोजगार पाने वाले नही देने वाले बनो। लेकिन एक गरीब आदमी का बच्चा स्नातक होते ही स्थायित्व की तलाश में नॉकरी पकड़ेगा या फिर अस्थायी केरियरयुक्त बिज़नेस करेगा। सीधी सी बात है बिज़नेस वाला कार्यक्रम उच्च वर्गो को सम्बोधित करता है, जिनको की दैनिक दिनचर्या के लिए रोजगार की तलाश नही करनी पड़ती, बल्कि अतिरिक्त धन को निवेश करने की तलाश होती है। अतः बिज़नेस वाले पक्ष को सरकार रोजगार समाधान के तौर पर पेश करने से बचे।
  5. कई विभागों में यह कहकर भी नियुक्ति नही निकाली जा रही कि उनका तकनीकी उन्नयन किया जाएगा जैसे कि रेलवे। अगर रोजगारो में कटौती की कीमत पर यह सब करना होता तो यह पिछली सरकारों के लिए भी आसान था। लेकिन सामाजिक सुरक्षा और न्याय की भावना को उद्धम से पृथक करके देखने का प्रयास उन लोगो ने नही किया।


निष्कर्ष
राजस्व घाटे के स्कोर को कम करके हम कुछ भी बड़ा नही कर रहे है। निजी क्षेत्र को सहूलियत देकर हम अमीर-गरीब की खाई को दिनोदिन ओर बड़ा रहे है। कक्षा में एक छात्र मेरिट में आ जाये और बाकी के छात्र असफल हो जाये तो क्या ऐसी कक्षा के परिणाम को बेहतर कहा जायेगा? नही। समावेशी विकास का सफर रोजगारो के माध्यम से ही तय होगा, इसलिए सरकार, नीति-निर्माताओं को लोकतांत्रिक दायित्वों का प्रति सोच लेना चाहिए और इस अभाव को जल्दी से जल्दी खत्म करना चाहिए। जब रोजगार नही दे सकते तो ग्रोथ रेट के स्कोर ओर व्यापार में आसानी की रैंकिंग कोई ऐसे मुकाम नही है, जिन पर सीना चौड़ा किया जाए।

How Ages Care Each Other


Recently I stayed three days at Divisional Railway Hospital, vadodara for my medical examination to the ASM post. The report of check up takes time so During this I got much time to earn lot of observation about the care of different ages by their patronage age apart from hospital. The scary pattern I observed was about the care of elderly.

The following category are considering inside this article:
1. Care of Elderly by youngsters
2. Care of young by Elders 
3. Mutual Care of Elders

अधिकतर बुजुर्ग चलने, सुनने के सहायक उपकरणों से जूझ रहे थे। उनके साथ मे कोई भी वयस्क सदस्य नही था, ज्यादातर छोटे बच्चों के भरोसे थे।



कुछ उदाहरणो का मै यहाँ पर जिक्र करना चाहूंगा ताकि मुद्दे को स्पष्ट किया जा सके-

1. वैसे तो अस्पताल कर्मचारी बहुत ही हार्दिक व्यवहारशील थे, लेकिन दो-तीन बार मे उनके निर्देशो को ग्रहण नही करने पर बुजुर्गों के साथ काफी रूखेपन से पेश आ रहे थे। एक आदमी जोकि आंखों की समस्या के लिए आया था उसे श्रवण सम्बंधित समस्या भी थी, तो जाहिर है वह उनके निर्देशो की गलत वाख्या ग्रहण कर गया होगा। उसे मेरे सामने धक्के मारकर ओर बहरेपन पर ताना मारकर बाहर कर दिया। यह दृश्य बहुत ही व्यतीत करने वाला था।

-कहने का मतलब है कि बुढ़ापे में एक से ज्यादा समस्या एक साथ रहती है, एक का इलाज करवाओ तो दूसरी भी साथ मे तैयार रहती है। साथ ही ये समस्याए आदमी को घर और बाहर के धक्के खाने के लिए मजबूर कर देती है।

2. While our test were running in PME Hall, we were waiting outside for our turn. OPD was in front of us so most of the patients also moving from there.
एक औरत अपनी सास को पीछे छोड़कर आगे-आगे चली जा रही थी। जबकि उसकी सास बहुत ही तकलीफ से चल रही थी, वह अपने एक हाथ मे अपने पेशाब की थैली को संभाले हुए थी और दूसरे से चलने की बैशाखी को। इस समय जरूरी था कि वह उसको चलने में सहायता के लिए उसके साथ चलती। लेकिन वह एक बूढ़ी औरत के साथ चलकर अपने स्टेटस को डाउन नही करना चाहती थी।
- सीधी सी बात है भाई बुढ़ापे में आदमी साफ-सुथरा तो रहेगा नही, दिखने में भी पहले वाली बात नही होगी, हो सकता है उन्हें पेशाब की नली भी लग जाये। ऐसे में कोई भी युवा अपने को उनके साथ दिखाकर अपनी काल्पनिक छवि को खराब नही करना चाहता। ऐसी मानसिकता यहाँ काम करती है।

3. A girl who was with her grandfather, sit nearly our bench . The boys of our group putting some grass to her so to reply them she continuously blush like an complete idiot.Same time she was ignoring the old man's things, Even he took a bottle and pointed to water but she ignored it.
तब हमारे एक लड़के से रहा नही गया, वह पानी लेकर आया और उस लड़की को फटकार लगाई की "फिर किस लिए आई हो यहाँ पर, ये काम तो बाहर ही बहुत कर लेना।" उसके बाद सारे समय वह हमसे नजरें चुराती रही।
कहने का मतलब है बुढ़ापे में आदमी हर एक चीज को लेकर उपेक्षा झेलता है। चाहे बड़े हो या बच्चे, घर की बात हो या उसकी देखभाल की। आदमी को यह स्वीकार करने में बहुत समय लगता है कि कल के बच्चे आज उसका लिहाज ही नही कर रहे है। आदमी के हाथ से सत्ता निकलती है तो उसे पचाने में समय लगता है।बुजुर्गो के लिए यह बहुत तकलीफ भरा समय होता है।

But at the same time the other side of the picture also available completly opposite which i observed there .
एक लड़की स्कूटी से अपना पैर कुचलवा बैठी थी। उसके पिताजी उसे अपने पारिवारिक चुटकलों को सुनाकर यह अहसास दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि मानो कुछ हुआ ही नही हो। कहने का मतलब है कि बड़े लोग छोटे लोगो को यह अहसास भी नही होने देते की तुम गलत थे, वे बस देखभाल करते है। वही छोटे लोग बुजुर्गो को अहसास करवाते रहते है कि हम तुम पर अहसान कर रहे है, अन्यथा तो तुम बोझ ही हो।

I don't want to become a judge here who decide what is wrong with youngsters, i know, they have their own priorities. But I wants to put a effort of Administrative approach to mitigate the problem.

मुझे लगता है कि जब हमारे हाथ-पांव और दिमाग काम करता है तो उसे हम दुनिया भर के कामकाजों में लगा देते है। हम कभी सोचते भी नही है कि एक दुनिया हमे हमारे लिए भी बनाकर रखनी चाहिए जहां हम उम्र का आखिरी पड़ाव गरिमामय पूर्ण तरीके से गुजार सके, ओर अंत मे हम सम्मानजनक तरीके से दुनिया से विदा हो सके। ऐसी तैयारी हमे पहले से करके रखनी चाहिए।

यह कितना मुश्किल होता होगा न कि किसी आदमी ने जिंदगी पूरी खुद्दारी और स्वाभिमान के साथ गुजारी हो और बुढापे में किसी वजह से वह आश्रित हो जाये और उसे ताने सुनने पड़े, उपेक्षा झेलनी पड़ी, अपमानित होना पड़े। मुझे लगता है इनसे बचने की तैयारी हमे पहले से ही कर देनी चाहिए।

एक उदाहरण हम वैज्ञानिक सी वी रमन का लेते है वे जानते थे कि अपने शर्तो से समझौते करके वृद्धावस्था नही काट पाएंगे तो उन्होंने रिटायर होने से पहले ही रमन अकादमी बनवा ली ताकि बाकी की उम्र को वहां गुजारा जा सके। इसलिए हमे भी सामुदायिक तौर पर विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे संस्थानों की भारी मात्रा में स्थापना की जानी चाहिए जहां पर समान हित और रुचियों वाले बुजुर्ग लोग मिल जुल सके और युवा भी उनके माध्यम से उनके अनुभवों से लाभान्वित हो सके।

(#बुजुर्गो के जीवन को बेहतर करने के लिए आपसे भी सुझाव आमंत्रित है। इस लेख को कुछ सुझाव इकट्ठे होने पर मै फिर से सम्पादित करना चाहूंगा।)

अंत मे जाते-जाते मै एक और बात कहना चाहूंगा कि अपना जीवनसाथी ही बुढ़ापे में सबसे बड़ा देखभाली (caretaker) होता है, भले ही वह भी आपकी तरह ही असहाय क्यों न हो, बाकी तो औपचारिकता पूरी करते है। अनुभव से हासिल की गई बात है ये 