गुर्जर आरक्षण आंदोलन : ट्विस्ट एंड टर्न्स की कहानी

malarana dungar gurjar aarakshan aandolan
गुर्जर आंदोलन सँघर्ष
(पीलूपुरा से पीलू किनारे तक) :

लोकसभा चुनावों से कुछ दिनों पहले गुर्जरों ने अपने अधिकार की मांग को लेकर 9 दिनों तक रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया। यह जाम मलारना डूंगर क्षेत्र में लगाया गया था। जहाँ से गुजर रही बनास नदी के चारों ओर कुछ गृर्जर बाहुल्य गांव स्थित है। इन क्षेत्रों में पीलू के पेड़ बहुतायत में पाए जाते है। 2008 में गुर्जरों ने जिस जगह पर जाम लगाया था उसका नाम पीलूपुरा था। अब इन दो जामो में पीलू शब्द गृर्जर इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान लेगा।

जब पीलूपुरा में जाम लगाया गया था तब लोगो ने गुर्जरों के भोलेपन पर बनने वाले चुटकलों में एक ओर इजाफा कर लिया था। लोग कहने लगे कि आरक्षण कोई पटरी के नीचे थोड़ी रखा है जो पटरी उखड़ते हो। लेकिन अब मलारना में मिली सफलता के बाद खुद बैंसला ने गर्व से कहा है कि पटरी पर आरक्षण मांगा था और वो पटरी पर ही मिला। हालांकि  इस आंदोलन की कहानी कई तरह के ट्विस्ट और टर्न से भरी हुई थी -

पृष्ठभूमि :
(अनुसूचित जनजाति की मांग को त्यागना और उम्मीद का भाजपा से कांग्रेस की और खिसकना )
इस आंदोलन की शुरुआत अनुसूचित जनजाति में शामिल होने को लेकर हुई थी।  मीना समाज ने इसे अतिक्रमण के तौर पर देखा। जिससे दोनों समाज एक दूसरे के आमने सामने आ गए थे और दोनो के बीच मे जमीनी सँघर्ष हुआ। जिन गांवों से लोग आंदोलन के लिए बाहर गए थे, उन गांवो में दूसरे समाज के लोगो ने पहुचकर महिलाओ के सम्मान को क्षति पहुचाई। इस मामले में दोनो ही समाज दूध के धुले नही है। इन व्यथा कथाओं को पीड़ित लोग ही जानते है। दोनो समाजो के बीच नफरत हिन्दू मुस्लिम जैसी होती गई। उसके तुरंत बाद हुए चुनावो में राजनीतिक दलों ने कई जगहों पर मीना बनाम गृर्जर के बीच मुकाबले करवाये। जिससे यह नफरत आगे तक बढ़ती। लेकिन चुनावो में बैंसला की नमोनारायण मीना से हार हो गई। और उन्होंने भांप लिया कि भाजपा दो समाजो के धुर्वीकरण में गृर्जर समाज के अंदर अपना वोट बैंक बनाना चाहती है। तो उनका रुझान कांग्रेस की तरफ बढ़ता चला गया।

मीना प्रतिरोध की वजह से उन्होंने ST की मांग छोड़कर अलग से 5 प्रतिशत आरक्षण की मांग शुरू कर दी। अब अगली राजनीति इस बिंदु के इर्दगिर्द घूमने लगी। जैसी ही सरकारो ने आरक्षण दिया , वह 50 प्रतिशत की सीमा को तोड़ने की वजह से हाइकोर्ट में जाकर अटक गया। तब उन्हें 1 प्रतिशत आरक्षण ही दिया। जब गुर्जरों की मांग पूरी करना अव्यवहारिक लगने लगा तो भाजपा ने गुर्जरों के बजाय मीनाओ से नजदीकी बनाना शुरू किया। यहां तक कि उनके कांग्रेस परस्त लोगो को भी टिकट दे दिए।

वही दूसरी तरफ 2014 के चुनावों के बाद सचिन पायलट ने कांग्रेस का नेतृत्व सम्भाला। तो भाजपा से आरक्षण की बात पर खपा चल रहे नेता अपने समाज के नेता पर ही भरोसा करने लगे। गुर्जर समाज ने पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के तो पायलट ने गुर्जरो को आरक्षण दिलाने के सपने दिखाए। कांग्रेस ने इस वाडे को अपने घोषणा पत्र का हिस्सा बना लिया तो गुर्जरो ने उस पर भरोसा किया और कांग्रेस के पक्ष में  अंधाधुंध वोट दिए। नतीजतन 2018 में कांग्रेस की सरकार भी बन गई।

एक बात और उसी समय केंद्र सरकार ने आर्थिक पिछडो को दस प्रतिशत आरक्षण के लिए संविधान संसोधन करके गुर्जरो को पांच प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ़ कर दिया था। इस बार कोई कारण नही बनता था कि गुर्जरों की मांग को खारिज कर दिया जाता। क्योंकि बिना आंदोलन किए ही जनरल को दस प्रतिशत आरक्षण दे दिया गया था। जबकि गुर्जरों ने एक लंबा सँघर्ष किया था। उनके 73 लोग शहीद भी हुए थे।

अब बात आती है कांग्रेस के वादे को पूरा करने की। जब गुर्जरो को पता है कि खुद उनके समाज का नेता सरकार में शीर्ष पर बैठा है तो फिर उस पर भरोसा करते, अभी सरकार बने 2 महिने ही तो हुए हैं। इतनी क्या जल्दी थी कि ज्यादा इंतजार ही नहीं किया। वही कांग्रेस ने इसे घोषणापत्र में शामिल कर रखा था और मंशा भी साफ़ थी , फिर एक समयबध्द आश्वाशन क्या नहीं दिया।

आंदोलन को जानबूझकर होने दिया गया। ऐसा लग रहा था जानो यह कांग्रेस की साजिश हो। जो यह सोचती है कि इतनी बड़ी चीज अगर शांति से ही दे दी तो किसी को क्या पता चलेगा, लोकसभा चुनाव आ रहे है इसलिए थोड़ा बहुत हो हल्ला तो होना चाहिए। वही बैंसला भी यही मान रहे थे कि अगर शांति से ही मिल गया तो जो पिछला लम्बा संघर्ष किया है, वह अर्थहीन हो जाएगा। इसलिए ऐसा लगना चाहिए कि हमे दिया गया नहीं है बल्कि हमने लिया है। इसी जिद में 7 फरवरी को गुर्जरो ने मलारना डूंगर में रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया।


प्रशासन की भूमिका :
आंदोलन कारियो के साथ जरूरत से ज्यादा उदारता बरती गई। अगर प्रशासन चाहता तो देश को 9 दिनों के ट्रैन बंदी से मुक्ति दिला सकता था। एक तो पहले दिन ही ट्रेन रोकने जाने वाले लोगो की संख्या एक बारात में जाने वाले लोगो से ज्यादा नही थी। उल्टा प्रशासन ने एक दिन पहले शांतिपूर्ण सभा करने की बात तक अपनी हिदायत सीमित रखी थी। उसके बाद जयपुर ट्रैक भी जाम होने दिया। राज्य सरकार को तो जैसे कोई परवाह ही नही थी। वही केंद्र भी लोकसभा चुनावों को देखते हुए चुप रहा।

प्रशासन बेहद ढिलाई से पेश आ रहा था। उसने रोकने के लिए, हटाने के लिए कोई गम्भीरता नही दिखाई। यह जांच का विषय होना चाहिए कि क्या ऐसा ऊपर के निर्देशों के कारण था। लोगो की परेशानी पर मानवाधिकार आयोग की कठोर चिट्ठी का सम्प्रेषण भी प्रशासन ने बहुत ही उदारतापूर्ण किया।

इस जाम के दौरान लोग यकायक फंस गए, जिन्हें अपने गंतव्यों तक पहुचने के लिए परेशानी उठानी पड़ी। कई छात्रों की परीक्षाए छूट गई। कई लोगो को जरूरी काम के लिए परिवहन वालो की मनमर्जी का शिकार होना पड़ा। रेलवे को लगभग 2 करोड़ रुपए तो आरक्षित टिकटो के ही वापस करने पड़े। राजस्व हानि हुई वो अलग है।

आंदोलन की प्रकृति :
इसके बाद भी गुर्जर कहते है कि यह आंदोलन अहिंसक था। क्या अहिंसा का पैमाना केवल खून का बहना ही है, लोगो की योजनाओं और गतिविधियों को खत्म कर देना अहिंसा नही है। अहिंसा का आवरण ओढ़ने के लिए बैंसला आंदोलन स्थल पर गांधीजी की किताब पढ़ रहे थे। लेकिन इस तरह के पाखंड वाले आंदोलन को गांधी जी की ढाल नही मिल सकती।
इसके बावजूद भी गुर्जरों ने अपने किए पर औपचारिकता भर के लिए गम्भीर खेद नही व्यक्त किया। गृर्जरो का रवैया राजस्थानियत से बिल्कुल उलट था। सरकार की तरफ से वार्ता के लिए आने वाले अफसरों से बहुत ही अभिमान पूर्ण तरीके से बात की। जिसे नीरज के पवन जैसे अफसर ने अनदेखा कर अपने कर्तव्य पर ध्यान दिया।
वार्ता प्रक्रियाओ को जान बूझकर गुर्जरों ने लंबा खींचा। वार्ता के दौरान आवागमन के बाधित होने से लोगो को होने वाली परेशानियों से बेफिक्र होकर बात कर रहे थे।

वही आंदोलन स्थल का माहौल किसी मेले से कम नही था। रात में रुकने के लिए टैंट, रजाई गद्दों की व्यवस्था थी। गुर्जर भी भाई चारे के नाम पर आसपास के गांवो से लोग दूध और आटे-सब्जियों की व्यवस्था कर दे रहे थे। इन सब के लिए पैसा किधर से आ रहा था, ये सब सन्देह के विषय है। रोजना की शाम सुबह बढ़िया मिठाई या अन्य लजीज व्यंजनों की रसोई रहती थी। दिन में महिला पुरुषो के रसिया और डांस के कार्यक्रम होते थे। पुरानी कथाओं के चटकारे भी उड़ते थे। दुसरो को परेशान कर मनोरंजन में लिप्त आंदोलन का यह तरीका निराला था। शायद ही कोई लेखक इसका बचाव करे।

पीलूपुरा के सबक :
2008 में इनके द्वारा की गई परेशानियों को देखते हुए हाइकोर्ट ने दिशानिर्देश दिए थे। जिनकी अवमानना पर सुनवाई चल रही है। इसके अलावा नए मुकदमो का क्या होगा, यह भी देखना है क्या सरकार उन्हें वापस ले लेगी।


इससे सबक लेते हुए बैंसला ने आंदोलनकारियों को शपथ दिलाई कि वे हिंसा का सहारा नही लेंगे। और तो और बच्चों को परेशान नही करेंगे।

गुर्जर नेतृत्व की भूमिका :
आंदोलन में गुर्जरों की आंतरिक राजनीति की भी झलक मिलती है। बैंसला ने पहले आंदोलन को ढाल बनाकर राजनीति में असफल पारी खेली थी। कई गुर्जर नेता इसमे उसी का प्रसार देख रहे थे। बैंसला खुद को मसीहा के तौर पर दिखाना चाहता था, जिसमे वो कामयाब रहा है। इसमे मदद मिली सचिन पायलट से। अब इन दो के अलावा बाकी किसी का योगदान होगा तो वो नेपथ्य में चला जायेगा।

इसके असर कुछ इस तरह होंगे-
राजस्थान की राजनीती में गुर्जरो का कद बढ़ेगा। जो समाज अब तक हाशिए पर चल रहा था वो अब मुख्यधारा में आ जाएगा। दिल्ली और अन्य क्षेत्रो के गुर्जर भी अपने राजनितिक कॅरिअर  के लिए राजस्थान की और रुख करेंगे।  हो सकता है गुर्जरो के उत्पात से तंग आकर दूसरे समाज भी प्रत्युत्तर में संगठित होने लगे। 

निष्कर्ष :
शायद अब आरक्षण की वजह से शिक्षा और रोजगारो का स्तर बढ़ेगा और वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को भली भांति समझेंगे। और एक जिम्मेदार नागरिक बनेंगे।
जिस आरक्षण के लिए इन्होंने इतना सँघर्ष किया है। अब इन्हें उसके अवसरों की तरफ टूट पड़ना चाहिए ताकि गांवो के गरीब गुर्जरों के सामाजिक आर्थिक जीवन मे बदलाव आए।
आगे पता नही क्या होगा। लेकिन सरकार ने सकारात्मक संकेत दिए है। परंतु गुर्जरों ने पटरी चालू करके सही काम किया क्योंकि इसे अभी वही से दिल्ली भी पहुँचाना है। इन सबके बीच कई तरह की राजनीतियो की गुंजाइश है, हो सकता है गुर्जरों का सँघर्ष अभी बकाया हो। मतलब twist and turns के मौके अभी भी है।

Survival Against The Fittest

survival against the fittest
डार्विन ने प्रकृति को ध्यान में रखते हुए सक्षमों की उत्तरजीवता का सिद्धांत दिया था। औधोगिक क्रांति के दौर में हर्बर्ट स्पेंसर ने इसे मानव समाजो पर भी लागू कर दिया। तो समाजवादी लोगो ने इसकी आलोचना की और अक्षमों को भी अस्तित्त्व के योग्य माना है। समय का पहिया घूमता रहा और केन्सवाद ने पूंजीवाद को मानवीय चेहरा दिलाकर फिर से मान्यता दिलाई। अब नव-उदारवाद का जमाना है जिसमे राज्य निजी क्षेत्रो को आज़ादी दे रहा है और अक्षमों को पाल भी रहा है। लेकिन इस जमाने में क्या ये दोनों साथ-साथ सफर तय कर पाएंगे। या फिर अक्षमों को अस्तित्व के लिए विशेष प्रयास करने होंगे। इस विषय को विभिन्न उदाहरणों की सहायता से समझने की कोशिश करते है। 

क्या अब भी कोई समाजवाद की तरह प्रासंगिक विचारधारा होगी जो यह कहेगी कि अक्षमों को भी अस्तित्त्व का गरिमापूर्ण हक़ है। क्या इस दौर में भी मार्क्स, लेनिन, माओ, कास्त्रो जैसे लोग होंगे। 

Issue of  Survival Against Fittest

पहला प्रश्न तो यह है कि क्या सक्षमों के विरुध्द उत्तरजीविता वास्तविक मुद्दा है या फिर अपवादों को सामान्यकरण किए जाने की कोशिश है। इसके अलावा सक्ष्मो के साथ उत्तरजीविता भी तो सिद्धांत हो सकता है जो की समाज में पाया जाता हो और उसकी संख्या भी ज्यादा हो। 

कुछ उदाहरण लेते है -
  1. आजकल बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनिया देशो में खड़े होने वाले छोटे छोटे स्टार्टअप्स और छोटे प्लेयर्स का अधिग्रहण करती जा रही है। छोटी कम्पनिया बड़ी कम्पनियो के द्वारा दिए जाने वाले ऑफर्स के सामने उपभोक्ता के लिए वहनीय नहीं है। अत वे खुद का विलय करने को ही उचित समझती है। इन बड़ी कम्पनियो से टक्कर के लिए दूसरी कम्पनिया भी विलय करके बड़ी कम्पनिया बना रही है। इसके बाद कुछ ही प्लेयर मार्किट में रह जाएंगे या फिर एकाधिकार स्थापित हो जाएगा। उसके बाद उपभोक्ता के पास विकल्प कम हो जाएंगे और उसे महंगी दर पर भी सामान खरीदना पड़ेगा। यहां से लाभों का एकतरफा हस्तांतरण बड़ी कंपनियों की तरफ होगा। तब ये साम्राज्यों का रूप ग्रहण कर चुकी होगी और राजनितिक व्यवस्था को भी प्रभावित कर रही होगी। 
  2. सिविल सेवाओं की तैयारी कराने के लिए जो बड़े संस्थान है उनके पास बहुत सारा पैसा इकठ्ठा हो गया है। जिसकी बदौलत ये सभी क्षेत्रो में निवेश कर रहे है। जिसके कारण विकेद्रीकृत प्लेयर्स को टक्कर  मिल रही है। ये अपने लाभों को अधिकतम करने के लिए सभी क्षेत्रो में कूदना चाह रहे है। इससे नए प्लेयर्स का इस क्षेत्र में प्रवेश करने के बारे में सोचना भी असंभव है। 
  3. क्या हिंदी दूसरी बोलियों को खत्म कर रही है।
यहां से हम देख सकते है कि निजी क्षेत्र आपस की गलाकाट स्पर्द्धा में ही लगा हुआ है। वे कैसे अपने लाभों को अधिकतम करे। इसके लिए कैसे प्राकृतिक संसाधनों तक किफायती पहुंच हो,कैसे सेवा मानको में रियायत हो। इन सबके लिए मूक समर्थन देने वाली सरकारों की स्थापना हो। इन सब चीजों में निजी क्षेत्र लगा हुआ है। ऐसे में उनको सामाजिक न्याय के मुद्दे याद दिलाना बहुत ही गलत चीज है।

मतलब जो सक्षम है वो और अधिक सक्षम होता जा रहा है। वही औसत लोगो को इनसे कड़ी प्रतिस्पर्द्धा  मिल रही है। बाकी अक्षम लोगो की बात यहां पर अप्रासंगिक हो जाती है। 

Public Affairs in Corpoarte 

ऐसा भी नहीं है कि कॉर्पोरेट को लोगो की बिल्कुल भी परवाह नहीं है। हम जानते है कि अगर लोगो के पास खरीदने की क्षमता ही नई होगी तो कॉर्पोरेट का अस्तित्व कैसे रहेगा। इसलिए लोगो के पास आय की उच्च मात्रा हो यह तो वे चाहते है। लेकिन इसके लिए किसकी क्या जिम्मेदारी होगी इसको लेकर ही तो संशय की स्थिति है।
  1. कॉर्पोरेट का यह भी मानना है कि यह जिम्मेदारी वे क्यों ले। यह तो राज्य का काम है। इसलिए राज्य को ही इसका पालन करना चाहिए।  
  2. कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी को अब वैधानिक अनिवार्यता बना दिया गया है। इसके लिए सभी निकायों को कुछ योगदान करना होता है। कई कॉर्पोरेट इसका उल्लंधन भी कर रहे है, जिससे दुसरो को भी यही लगता है की वे भी क्यों करे।  
  3. इसके अलावा एक और आयाम भी मौजूद है। जो जनसंख्या वृद्धि के आधार पर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। दरअसल भारत में आर्थिक विषमता के असंख्य स्तर मौजूद है। कोर्पोर्टे को लगता है कि जितनी उसकी उत्पादन क्षमता है उतने स्तर के पास क्रय शक्ति है। इसलिए बाकी लोग उपभोक्ता भी नहीं है। इसलिए उन पर खर्च क्यों किया जाए या फिर उनके हितो के लिए क्यों सोचा जाए। 
इस प्रकार कॉर्पोरेट की मनोवृत्ति  में हम असंवेदनशीलता की झलक देख सकते है। हालांकि यह उम्मीद ही बेमानी है। 

Survival With fittest

हम देख चुके है कि कॉर्पोरेट का लालच निम्नतरो की उत्तरजीविता में बाधक है। अगर कॉर्पोरेट पर अंकुश नहीं लगाया गया तो यह व्यवस्था अनवरत चलती रहेगी। अब इसके लिए निम्न प्रयास किए जा सकते है जिसके आधार पर हम श्रेष्ठो के साथ उत्तरजीविता के सिद्धांत की परिकल्पना कर सकते है। 
  1. हमे टैक्स हैवन की अवधारणा का विरोध करना होगा। कर अपवंचना से सख्ती से निपटना होगा। कर अनुपालन की संस्कृति विकसित करनी होगी। 
  2. कॉर्पोरेट रेस को रोकने के लिए हमे अधिक कर लगाना पड़ेगा। ताकि हम बिलेनियर की अवधारणा को हतोत्साहित करना होगा। 
  3. कॉर्पोरेट घराने की व्यवस्था भी न केवल अर्थव्यवस्था के लिए खरतनाक है बल्कि राजनितिक और सामाजिक तौर पर भी इसके कई नकारात्मक प्रभाव होंगे।
  4. प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में भी उचित नीति के निर्माण की जरुरत है। ताकि उसका दोहन किसी एक इकाई के हित में नहीं हो। 
  5. कॉर्पोरेट जगत के मूल्यों में बदलाव भी जरुरी है। मुनाफा रेस का कोई गंतव्य होना चाहिए। बिना गंतव्य के यह सफर सामाजिक और आर्थिक अन्याय का कारण बनेगा। 
शेर और बकरी के एक घाट पर पानी पीने की कहानी के समान यह अवधारणा है। जिसमे एक के दांतो की तीक्ष्णता को थोड़ा कम करना पड़ेगा वही दूसरे की खाल को मजबूत बनाना होगा। इस प्रकार एक तरफ कॉर्पोरेट पर अंकुश लगाना होगा , वही दूसरी तरफ निम्नतरो के लिए सुरक्षोपाय बढ़ाने होंगे।

खंड II

Force Survival - Life With fittest

हम यह मानकर चलते है कि सभी की उत्तरजीविता के लिए बाह्य समर्थन की जरूरत होती है। अगर हम जैसे-तैसे करके लोगो को बचा भी लेते है तो क्या होगा। क्या वे उस स्तर पर बने रहेंगे ? क्या उस स्तर पर भी प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न नहीं होगी। क्या फिर हम आगे के अस्तित्व के लिए फिर से हस्तक्षेप करेंगे। ये चक्र फिर तो चलता ही रहेगा, जब तक कि हम Theory of Internal Development  के अनुसार आगे नहीं बढ़ जाते।

अगर ऐसा है तो क्यों न हम, रेस की बजाय खुद के हस्तक्षेप को रोके। हमारे भूमिका को हम निष्पक्ष अंपायर की बनाये। हम जानते है कि सभी लोग समान रूप से कर्मठ, मेहनती तो नहीं होते। ऐसे में उन्हें कमजोर व्यक्तित्व के लोगो के लिए रोकना कहां तक सही हो सकता है। जो आलसी है वो तो फिर से नीचे आ जाएगा और जो मेहनती है वो फिर से ऊपर जाएगा। ऐसे में विभाजन तो प्राकृतिक पहलु है, इसलिए इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा।

हाँ, हमे इतना जरूर ध्यान रखना है कि ये विभाजन अनैतिक या अनुचित साधनो के माध्यम से अर्जित नहीं किया जाए। आगे यह विभाजन दुसरो के अवसरों को ही खत्म नहीं कर दे। साथ ही समाज का आर्थिक विभाजन सांस्कृतिक विभाजन में नजर नहीं आये। लेकिन यह तो साथ में जुड़े होते है, इससे इंकार कैसे किया जा सकता है। जब ऊपरी वर्ग का आदमी नीचे के वर्ग को हिकारत, घृणा से देखता है। जब यह बात निम्न वर्ग के बुद्धिजीवी लोगो को खटकती है तो उनमे चेतना जाग्रत होती है। यहां से फिर उच्च वर्ग को चुनौती की जमीं तैयार होती है।

अब जो कॉर्पोरेट आपसी लाभ के लिए लड़ रहे थे, निम्नस्थ वर्ग के खिलाफ एकजुट हो जाते है। वे सरकार को प्रभावित करने में अधिक मजबूत स्थिति में होते है। वे निम्न तबके के आंदोलनों को कॉर्पोरेट मीडिया, बुद्दिजीवियो और नेताओ के गठबंधन के माध्यम से कुचल देते है। सबसे बड़ी बात तो यह है की इस चेतना का दमन करने के लिए लोगो को जाति, धर्म, भाषा के आधार पर बाँट देते है।

निम्नस्थ की प्रतिक्रिया को फिर प्रशासनिक आश्वासनों के नीचे दबा दिया जाता है। क्योकि समाधान तो इसी व्यवस्था के तहत होने होते है। कई बार निम्नस्थो की चेतना का दोहन करके कोई चुनावी नेता और निर्मित हो जाता है। उच्चस्थ और निम्नस्थो के बीच आपसी प्रतिक्रिया की अब लगभग यह संस्कृति बन गई है। अब एक ही उपाय बचता है कि आप भी पढाई,प्रतिभा,नौकरी के बल पर अपनी हैसियत को ऊंची करो। और इस विभेदकारी व्यवहार वाली व्यवस्था के पीड़ित होने से बच जाओ।

इसलिए अब समाधान के तोर पर लॉन्चिंग ही विकल्प उभरकर आता है। Launching of Individuals को हम पहले ही शक की दृष्टि  से देख चुके है। ऐसे में लॉन्चिंग के लिए दूसरे उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। मतलब लांच होने की इच्छा की तीव्रता भी हर किसी में समान नहीं होती। इसलिए जिनकी इच्छा तीव्र है वे कही न कही से अपना प्लेटफार्म तलाश लेंगे। अगर हम थोड़ा सा उनका यहां पर सहयोग करे और उन्हें प्लेटफार्म की तलाश में मदद करे। तो फिर संघर्षो को किसी दूसरे लाभदायक जगह पर प्रयुक्त किया जा सकता है। 

1. Launching Will

लॉन्चिंग की चाहत की तीव्रता लोगो में भिन्न- भिन्न होती है। कोई हर कीमत पर लांच होना चाहता है, तो कोई थोड़े बहुत त्याग के साथ। कुछ लोग बिलकुल भी त्याग नहीं करना चाहते, वे अपनी निम्नस्थ हालत में भी सुकून तलाश लेते है। इलसिए निम्नस्थ स्तर वाले लोगो को ये विभाजनकारी समाज वाली व्यवस्था ज्यादा नहीं कचोटती है। वे बुरा बर्ताव भी अपनी किस्मत मानकर झेल लेते है। कई बार ये निम्नतरो के उच्च्तरो पर चुटकले सुनकर खुश रहते है। 

यह इच्छा उन लोगो में ज्यादा होती है जिनमे स्वाभिमान, आत्म सम्मान जैसे गुणों का समावेश किसी माध्यम से प्रवेश करता है। अब वे अपने इन मूल्यों की प्राप्ति के लिए संघर्ष करके आगे बढ़ना चाहते है। लोगो को गरिमामय जीवन का महत्व समझा कर आगे बढ़ने की चेतना जाग्रत करना यहां पर जरूरी हो जाता है। 

2. Bridging the Will Gap

एक तरफ कॉर्पोरेट की इच्छा आगे बढ़ने की है वही निम्नतरो की केवल अस्तित्व बनाये रखने की है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इच्छाओ के इस अंतराल को हम कैसे देखे - सकारात्मक या नकारत्मक। सीधी सी बात है सकारात्मक रूप में ही देखेंगे। 

3. Options of Minimum Launching 

हम सभी जानते है कि निर्धनता जाल किसी परिवार की लॉन्चिंग में बाधा है। इसलिए हमे उन चीजों की उपलब्धता सभी के लिए बढ़ा देनी चाहिए जो निर्धनता जाल को तोड़ने के लिए जरूरी होती है। अब सरकार इनकी उपलब्धता, गुणवत्ता बढ़ा रही है।

4. People Without Launching

कई बार आदमी लॉन्चिंग के प्रयास करने के बाद भी कक्षा में परिवर्तन करने में विफल रहता है। ऐसे में हताशा, निराशा जैसे विकार उसे घर कर जाते है। वह अपनी बाकी जीवन भी आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए अभावो से जूझता रहता है। इस वजह से उसकी सक्रिय नागरिकता में भी कमी आती है। जिसकी वजह से रुग्ण राजनीती का भी चक्र कायम रहता है।

5. Lessions for Launching At All

बिल गेट्स का मानना है कि आप गरीबी में जन्म लेते है ये आपकी गलती नहीं है, लेकिन अगर आप गरीबी में मर जाते है तो आप निश्चित तौर पर अपराधी है। इसलिए हमे अपनी परिस्थिति को बदलने का प्रयास हर हाल में करना चाहिए। साधन की पवित्रता से समझौता अगर निचली कक्षा से आगे बढ़ने के लिए किया जाए तो उसमे ज्यादा बुराई नहीं है। चूँकि निचले स्तर पर अनैतिक कदम के दुष्परिणाम नगण्य होंगे। जिन्हे सकारात्मक परिणाम के कारण आसानी से स्वीकार कर लिया जाएगा।    

इस प्रकार हमने निम्नतरो की दयनीय हालत को सुधारने के मार्ग का अवलोकन किया और इस मार्ग में मौजूद रुकावटों को हटाने के लिए उठाये जाने वाले कदमो पर भी विचार किया।

खंड III

Absent of Mission Against Distortions

जब उन्नीसवीं सदी में औधोगिक क्रांति के बाद समाज में असमानता फैली और उसकी वजह से जो विसंगतिया उत्पन्न हुई, उनका विभिन्न विचारको ने पुरजोर विरोध किया। जिनमे मार्क्स के विचारो से आगे बढ़ा समजवादी आंदोलन प्रमुख था। वर्तमान में औधोगिक क्रांति का चतुर्थ चरण चल रहा है लेकिन अब कोई भी इसके द्वारा निर्मित विसंगतियों का विरोध कर रहा है। इतना तो स्पष्ट हो गया है कि आज की विसंगतियों को पुराना समाजवादी आंदोलन सम्बोधित नहीं करता है। अब सवाल उठता है कि  क्या इस दौर में मार्क्स, लेनिन, माओ, कास्त्रो जैसे लोग नहीं रहे।

बहुत हद तक कहा जा सकता है कि बाजारवाद ने जिस हद तक व्यक्तिवाद को आगे बढ़ाया है कि अब कोई भी आदमी समाज के बारे में सोचने और करने के लिए खुद के हितो को दांव पर नहीं लगा सकता। अब आदमी में पहले के समान धैर्य भी नहीं रहा, जो दीर्घकालीन संघर्ष की सोचे। इसके अलावा कॉर्पोरेट यह स्थापित करता है कि समाज के लिए सोचना और करना भी एक बिज़नेस है। इस  वजह से भी लोग सामाजिक सरोकारों से कट रहे है। कुछ लोग सामाजिक सरोकारों को केवल चुनावी राजनीती की विषयवस्तु मानता है। ऐसे में अब निम्नतरो के हितो के संरक्षण के लिए दबाव समूहों का अभाव महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है।

अत: ऐसे लोगो को आगे बढ़ाना चाहिए जो समाजिक विसंगतियों के विरोध को मिशन के तौर पर लेकर उन्हें न्यून करने के लिए सरकार के साथ संवाद कर सके।
खंड IV

Trends of Survival Efforts

शुरुआती पूंजीवाद ने अक्षमों के खिलाफ नकारात्मक रुख अपनाया, जिसकी बदौलत लोगो में वर्गीय चेतना का संचार जल्दी से हो गया। आगे जब केन्सवाद आ गया तो राज्यों ने पब्लिक आक्रोश के सामने खुद को बचा लिया। लेकिन अब नवउदारवाद के चरण में राज्य पर जनकल्याणकारी कार्यक्रमों से हटने का भारी दबाव है। लेकिन निजी क्षेत्र की भूमिका भी प्रोत्साहन योग्य नहीं है। इसलिए अब नागरिको को सरकार के अटेंशन से वंचित रहना पड़ेगा। लेकिन प्रशासन के पास लोगो तक पहुंचने की क्षमता में इजाफा हुआ है। इसलिए निम्नतरो के हितो को आगे बढ़ाने वाले संस्थानों को आगे करने की जरूरत है।

कई जगह पर कॉर्पोरेट भी कल्याण के कार्यक्रम चला रहा है इसलिए अब उसे सीधे आरोपी नहीं ठहरा  सकते। इस वजह से मामले में जटिलता बढ़ गई है।

Conclusion :

सक्षमों के खिलाफ उत्तरजीविता के लिए हमने यहां पर प्रयासों की आवश्यकता महसूस की। जिस प्रकार शेर और बकरी के विभाजन प्राकृतिक है, जिसमे एक का सृजन ही दूसरे के किसी न किसी निर्भरता को ध्यान में रखकर किया गया है। उसी प्रकार सक्षम और अक्षमों की उपस्थिति भी दुनिया के संचालन के लिए निर्मित की गई व्यवस्था के हिस्से है। इसलिए हम इस विभाजन को समाप्त नहीं कर सकते। हमारी आपत्ति सिर्फ इस विभाजन के असंतुलन को लेकर हो सकती है।  

Tracing MODI-fied India

जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे तब यह प्रोपेगेंडा चलाया गया था कि उनके पास गुजरात में प्रशासन चलाने का लम्बा  अनुभव केंद्र में भी काम आएगा। लेकिन अब स्पष्ट हो गया है कि ज्यादा अनुभव वाला आदमी भी सही नहीं रहता क्योकि उसके अंदर सिस्टम को नजरअंदाज करने की क्षमता आ जाती है। सरकार ने इस समय देश के सभी उच्च शीर्ष संस्थानों की हालत खराब कर रखी है। सभी संस्थाओ पर केंद्र सरकार का भारी दबाव है। मोदी सरकार उन्हें अपने निर्देशो के अनुसार चलाना चाह रही है।

इस आलेख में हम दो भागो में आगे बढ़ते है। पहले भाग में हम उच्च अफसरों के साथ सरकार कैसा व्यवहार कर रही है, के बारे में होगा। वही दूसरे भाग में संस्थानों की हालत कैसे ख़राब कर रखी है, के बारे में विचार करेंगे। 

दादागिरी करने वाले लोगो की एक लोकप्रिय कहावत है कि या तो आप हमारे साथ है या फिर हमारे खिलाफ, बीच में रहकर सत्यनिष्टा दिखाने की कोई गुंजाईश नहीं है। यहां पर भी इसी रणनीति का अनुसरण किया जा रहा है। जो अफसर सरकार के एजेंडे को बिना प्रश्न किए जैसे-तैसे आगे बढ़ा रहे है, वे सर्वाइव कर रहे है। बाकी लोगो को प्रताड़ित या उपेक्षित किया जा रहा है।   
  1. इस सरकार को शुरू में देश के बेहतरीन लोगो का साथ मिला था, जो अपने अपने फील्ड में ख्यातिप्राप्त थे। लेकिन इस सरकार के एजेंडे को भांपकर सभी लोग भाग खड़े हुए। आर्थिक क्षेत्र में सबसे ज्यादा ब्रेन ड्रेन मोदी के काल मे हुआ। रघुराम राजन चले गए, अरविंद सुब्रह्मण्यम, अरविंद पनगड़िया चले गए। अर्थशास्त्रियों में केवल विवेक देवराय इनके साथ है।
  2. अच्छे अच्छे अफसरों को इन्होंने लांछन लगाकर बर्खास्त कर दिया। जब भी किसी अफसर को हटाया गया। भाजपा के आईटी सेल ने उन्हें बदनाम करके रख दिया। विदेश सचिव निरुपमा और रघुराम राजन के उदाहरण सामने है।
  3. कई अफसरों को मोदी जी ने व्यक्तिगत प्रतिशोध का निशाना बनाया , जिसमे संजीव भट्ट शामिल है जिसने गुजरात दंगो पर मोदी को आरोपी ठहराने वाले अवधारणाएँ सामने रखी थी।
  4. जिन लोगो ने आने पर निकालने की कोशिश की, उनको कोपभाजन सहना पड़ा। इनमे पुराने रेलमंत्री गोडा और हरड़ मंत्री स्मृति ईरानी का नाम शामिल है। 
  5. अफसरों की बलि भी अपने संकीर्ण हितों को पूरा करने के लिए दी गई। देवयानी खोबरागड़े को अमेरिका से रिश्ते सुधारने के लिए उपेक्षित किया गया। अब बैंकिंग लॉबी के दबाव में उर्जित पटेल भी बलि का बकरा बन सकते है।
  6. उनकी जगह पर जो लोग लाये गए। उनके कद छोटे रखे गए ताकि उन्हें अपने व्यक्तित्व का मातहत बनाया जा सके। राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचन भी इसी रणनीति का हिस्सा है। उर्जित पटेल ने नोटबन्दी के समय समर्पण कर दिया था। ओपी रावत ने राजस्थान के चुनावों की घोषणा में देरी की ताकि मोदी की सभा पूरी हो सके।
  7. कई पदाधिकारी यो ने मोदी को फायदे वाले काम किए। उन्हें दूसरे उच्च पद देकर सम्मानित किया। जिनमे 2G scam की अवधारणा बुनने वाले विनोद रॉय को बैंक बोर्ड ब्यूरो का चेयरमैन बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाकर भेजना भी इसी तरह की दुर्गंध के संकेत देता है।
  8. केंद्र में गुजरात कैडर और आरएसएस की विचारधारा के व्यक्तियों का जमावड़ा कर दिया गया। उन्हें श्रेष्ठ पद दिए गए। हसमुख अधिया उनमे प्रमुख नाम है।
  9. कुछ अफसरों के प्रति मोदी का विशेष स्नेह रहा। इनमे पहला नाम तो अजित डोवाल का है। जिसका कद एक मंत्री से भी ऊपर है। राजीव महर्षि भी वित्त सचिव, गृह सचिव रहे। उन्हें सेवा विस्तार मिला और उसके बाद कैग जैसे महत्वपूर्ण पद पर बिठा दिया गया।
मतलब मोदी सरकार में पद पाने के लिए मोदी भक्त होना प्राथमिक और अनिवार्य योग्यता है। इस योग्यता को धारण करने के बाद आप साहेब की असीम कृपा का लाभ प्राप्त करोगे।


संस्थाओ की विकलांग स्थिति
इस समय सारी संस्थाए विकलांग व्यक्ति के समान कर दी गई है। किसी संस्था के पास बजट नही है, तो किसी के पास स्टाफ नही है।

नियुक्तियों को अटकाना :
जब किसी संस्था में स्टाफ ही नही होगा तो वे कैसे काम करेगी। ये सब ऐसे संस्थान है जो सरकार को जवाबदेह बनाते है। 
  1. भ्रष्टाचार की जांच के लिए लोकपाल नियुक्त करने का कानून बने लगभग चार साल हो गए है। लेकिन अभी भी उसकी नियुक्ति नही हुई है। दरअसल लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को भी रखा गया है, अब PM के खिलाफ वह टिप्पणी करेगा तो मोदी की छवि का विश्लेषण करने का जनता को मौका मिलेगा। मोदी ने इसका अवसर ही जनता को नही दिया। बात को कानून में संशोधन पर फंसा दिया (explain in comment)
  2. जिन संस्थाओ में अध्यक्ष के अलावा कुछ सदस्य होते है। उनमें आधे सदस्यों की नियुक्ति ही नही की जाती। कुछ सदस्य उसमे विपरीत विचारधारा के नियुक्त कर दे रहे है ताकि वे आपस मे ही उलझे रहे। RBI में अभी ऐसे सदस्य घुसा दिए गए है।
  3. न्यायालयो में नियुक्तियो के आग्रह को ठुकराना भी इनका काम रहा है। CJI टीएस ठाकुर ने इनके सामने जजो की नियुक्ति को नही अटकाने का आग्रह करते हुए आंसू छलकाए थे, जिसका इन पर कोई असर नही हुआ। अल्फोंस की नियुक्ति को दोबारा भेजने पर स्वीकृति दी थी क्योंकि उसने उत्तराखंड में इनके विपरीत निर्णय दिया था।
  4. अयोग्य व्यक्तियों को नियुक्त किया जा रहा है। FTII पुणे में गजेंद्र चौहान को नियुक्त कर दिया। लम्बे विरोध के बाद अनुपम खेर को नियुक्त किया गया, जिसने भी इस्तीफा दे दिया।

कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप :
कई संस्थानों की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप किया। फ़िल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड को सेंसर बोर्ड बना दिया। पहलाज निहलानी ने इस मामले में बड़ी कुख्याती पाई। रिज़र्व बैंक में हस्तक्षेप किया जा रहा है। रघुराम राजन के स्वतंत्र व्यक्तित्व और विचारों के कारण ये उससे डरते रहे। लेकिन उर्जित पटेल को अंधेरे में रखकर नोटबन्दी कर दी। अब तो उसने भी ज्यादा हस्तक्षेप करने पर इस्तीफे की धमकी दी है।

संस्थाओ में टकराव :
सीबीआई और आईबी जैसी संस्थाओ में टकराव की स्थिति पैदा करने में मोदी जी को पुरानी महारत हासिल है। अभी सीबीआई डायरेक्टरो के बीच मामले में इसे देखा जा सकता है। कामकाज में भी दबाव बनाकर असंवेधानिक कार्य किए जा रहे है या फिर कानूनी लूपहोल का फायदा उठाया जा रहा है।

कानूनी दुर्बलता के प्रयास :
कई संस्थानों की शक्ति तो बाकायदा कानून लाकर कम कर दी गई। इस मामले में रिज़र्व बैंक सरकार को सर्वाधिक खटका जिससे बहुत सारी शक्तिया वापस ली गई। सुचना आयोग का भी यही हाल है। 

आगे क्या :
कुल मिलाकर बात यह है कि अफसरों और संस्थाओ को दबाव में रखकर काम करवाया जा रहा है। ये सब काम सिर्फ पूंजीपतियों के फायदे के लिए किया जा रहा है। जबकि संस्थान वंचित वर्ग के हितों की रक्षा के लिए खड़े होते है। ऐसे में गरीबो के हितों की कीमत पर बिजनेसमैन को खड़ा करने में मोदी सरकार तन मन धन से लगी हुई है।
जनमत को भी इसकी निंदा करनी चाहिए। अफसरों को अपनी सत्यनिष्ठा पर अडिग रहना चाहिए। तब जाकर हो सकता है हम संस्थानों को उन उद्देश्यो पर कार्यरत देख सके, जिनके लिए उन्हें स्थापित किया गया था।

Conclusion :
जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी तो india is indira, indira is india का नारा दिया गया। मतलब जो इंदिरा ने कर दिया वही सही है, कही से विरोधी स्वर निकलने की गुंजाईश ही नहीं थी। अब मोदी जी भी उसी रवैये पर चल रहे है जो मानते है कि अब india MODIfied हो चुका है, जिसमे मोदी जी ने जो कह दिया वो ही सही होगा। हालांकि हम सब जानते है कि अहंकार किसी को भी नही पचता। हमारे अंदर दूसरे संस्थानों और व्यक्तियों की उपस्थिति को लेकर सम्मान होना चाहिए।

Theory of Internal Interference

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जैसा की हमने व्यक्ति के भौतिक विकास के लिए बाहरी हस्तक्षेप की अवधारणा (Theory of Individual Interference) देखी थी। उसमे हमने पाया था की आदमी के भौतिक विकास को अगर संधारणीय बनाना है तो हमे उसके मानसिक विकास (Internal Development ) पर भी ध्यान देना होगा। इसके लिए हमे उसके व्यक्तित्व विकास (Persoanality Development के क्षेत्र में कार्य करना होगा। इसके आधार पर हम उसे ज्यादा मजबूत कर सकते है अपने बलबूते पर ही खुद को खड़ा करने के लिए। व्यक्तित्व का विकास बेहद ही जरूरी हो जाता है। जिसमे शामिल किए जाने वाले बिन्दुओ का हम यहां पर अध्ययन करेंगे।

व्यक्तित्व विकास के लिए व्यक्ति के आंतरिक पटल में हस्तक्षेप करना होगा। हम जानते है यह कार्य परिवार, समाज और विद्यालय के माध्यम से किया जाता है। जो व्यक्ति की समाजीकरण प्रकिया का हिस्सा रहता है। बाद में किताबो,साथियो के माध्यम से भी यह निर्धारित होता है। लेकिन जो लोग इन सभी चीजों के त्रुटिपूर्ण स्वरूपों के सम्पर्क में रहे है, उनके व्यक्तित्व के विकास में भी त्रुटि होगी। वही भोले और सीधे समाज के द्वारा सीधे सादे व्यक्तित्व का विकास होगा। इसके विपरीत जिस समाज में हमेशा बिज़नेस की बाते होती है , वहां के बच्चो में भी यह बिज़नेस भावना व्यक्तित्व का हिस्सा बन जायेगी। इस तरह व्यक्तित्व हमारे मनोवृत्ति को दिशा देता है। जिसके आधार पर हमारे आचरण में अपनी स्थिति सुधारने के लिए किए जाने वाले प्रयासों की तीव्रता शामिल होती है।

व्यक्तित्व विकास में निम्न चीजे शामिल हो सकती है - नैतिक मूल्य आदि। अब इनका हम पृथक-पृथक अध्ययन करते है।

खंड I  नैतिक विकास  

नैतिक विकास आदमी के विकास से सीधा जुड़ा हुआ है। हम देखते है कि गरीब आदमी में नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पण ज्यादा होता है। वही जैसे-जैसे यह स्तर बढ़ता जाता है ,नैतिकता का स्तर भी कम होता जाता है। इसके लिए हमे इस नैतिक अंतराल की खाई पर सेतु निर्मित करना होगा। इसके लिए हमे यह देखना होगा कि लोगो के विकास को नैतिक मूल्यों ने किस प्रकार प्रभावित किया है। वे किस प्रकार उसके विकास में बाधा बन रहे है। फिर उन्हें किस तरीके से अपडेट किया जाए। साथ ही इस कर्म में वे कही अनैतिक नहीं बन जाए। इसका भी ध्यान रखना है।

वर्तमान की नैतिकता का मूल्यांकन
वर्तमान में हमारा नैतिकता का दायरा बहुत भोला है। जिसमे छोटी-छोटी खामियों को भी अनैतिक मान लिया जाता है। यह लोगो के एम्पोवेर्मेंट में रुकावट के रूप में उभर कर सामने आती है। लोगो को सक्रिय नागरिक बनने से रोकती है। इसका कारण यह है कि हमारे पूर्वज भी हमारे सामने भोली नैतिकता को मानदंड बनाकर चले गए।

हमे गांधी की बजाय तिलक की नैतिकता की जरूरत थी। जिसमे अपने हक़ के लिए कोई परीक्षा नही देनी पड़ती थी। जबकि गाँधीजी आग्रह पर आधारित थी। आग्रह को ठुकराना कभी भी अनैतिक नही रहा। आज के प्रशासन ने यह तक कर दिया कि आपको आग्रह करने के लिए भी अनुमति की आवश्यकता होगी। अतः गाँधीजी की नैतिकता युग के हिसाब से सही नही थी। आज के युग मे गाँधीजी अप्रभावी है। मतलब जनता के लिए गाँधीजी का संघर्ष व्यर्थ चला गया। सारे सँघर्ष को नेताओ ने भुना लिया।
Question : गांधीजी आज के समय में अप्रभावी है। वह उस समय भी अप्रासंगिक ही थे। फिर किन कारणों ने गाँधी की सफलता सुनिश्चित की। विश्लेषण करो।  
हम इतना जानते है कि गांधी जी की नैतिकता दीर्घकाल में लाभ देती है। आम आदमी रोटी, कपड़े और मकान को दीर्घकाल के लिए नहीं छोड़ सकता है। यह नैतिकता केवल राज्य या फिर संगठनों के लिए फायदेमंद हो सकती है। लोग आजीविका का भी संचार नही कर पा रहे। इतने ज्यादा भोले भी नही होना चाहिए। अब इन्हें कैसे सजग करे। यह मुद्दा है।

नैतिकता में बदलाव का रोडमैप 
हमारी मौजूदा नैतिकता बहुत ही ज्यादा भोलेपन पर आधारित है। इसमें लोगो को छोटी -छोटी चीजों के  प्रति भी रोक दिया जाता है। इसे हमे अधिकार आधारित तो कम से कम बनाना ही चाहिए।
  1. भारतीय मूल्य व्यवस्था या संस्कृति में कुछ खामिया है, जो कि अपने परिवार, मित्रो और रिश्तेदारों को ज्यादा महत्व देती है। उनके लिए हम योग्यता, प्रतिभा, निष्पक्षता और व्यापक भलाई की हत्या करने को भी तैयार रहते है। यही वजह है कि कुछ उद्धमि आते ही सफलता प्राप्त करने लग जाते है।
  2. हमारी नैतिकता समाज द्वारा निर्धारित होती है। अगर हमने समाज के बंधन तोड़ दिए तो इस नैतिकता से भी मुक्त हो जाएंगे। इसके बाद चतुर लोगो की नैतकता को अंगीकार कर लेंगे। हो सकता है जिसके बाद सामाजिक -आर्थिक स्थिति में सुधार हो जाए। 
यह नैतिकता में बदलाव का प्रयास नहीं है बल्कि नैतिकता के परिष्करण की कोशिश है। जो कि समय के अनुसार बदलती रहती है। इसलिए इसको वर्तमान में भी अद्यतन करना कोई गलत बात नहीं है। 

खंड II  व्यक्तित्व विकास  

नैतिक मूल्यों के दायरे का निर्धारण करने के बाद हमे विभिन्न क्षेत्रो का विश्लेषण करना चाहिए। किस क्षेत्र में कोनसा कार्य उत्पादक साबित हो सकता है।इसके अलावा इसमें यह चीज भी प्रदान करने की आवश्यकता होगी कि किस तरह से वे खुद को इस गला काट स्पर्द्धा  वाली दुनिया में टिकाये रख सकेंगे।

इसके लिए कुछ क्षेत्रो के बारे में संकेत किया जा सकता है -
  1. लोगो में पुलिस से डील करने का आत्मविश्वास नहीं है। जैसे ही सामना होता है तो लोग उससे लड़ने पे उतारू हो जाते है। वे उसे ट्रबल मेकर समझते है। हमे लोगो को कानूनों के बारे में स्कूल स्तर पर बताकर अनुपालन संस्कृति की शुरुआत करनी चाहिए।
  2. लोगो को सरकारी योजनाओ के लाभ लेने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। इसलिए उनमे अधिकार आधारित मूल्यों को बिठाया जाना चाहिए। 
  3. सरकार से डील करने में ही नहीं लोगो को निजी क्षेत्र के लोगो, किसी व्यक्तिगत आदमी से डील करने के लिए भी एम्पावरमेंट करने की जरूरत है। इसलिए निजी जिंदगी हेतु भी कौशल इसमें शामिल है।  
इन सभी चीजों को स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। जिनमे अध्ययन के अलावा संबंधित विभाग के अधिकारियो को भेजकर व्यवहारिक प्रयोग दिखाना भी चाहिए। तब जाकर ये चीजे बच्चो के मूल्यों का हिस्सा बनकर उनके आचरण में उजागर होगी। 

खंड III  Theory Analysis  

अब हम वापस से आदमी के विकास में इस सिद्धांत के योगदान के मूल्यांकन पर आ जाते है। 
व्यक्ति का आंतरिक विकास उसके भौतिक विकास को टिकाऊ बनाता है। जिसकी बदौलत वह उसे संधारणीय बनाये रख सकता है। विकास पर ध्यान देते वक्त यह भी बहुत ही अनिवार्य पहलु है।  

लेकिन नकारात्मक पहलू की बात की जाए तो वो यह हो सकता है कि लोगो का एक सीमा से नीचे के कामो के प्रति मोहभंग हो सकता है। या फिर लोगो में कामो के चयन के प्रति विशिष्टता विकसित हो सकती है। तब हमे जरूरी लेकिन निम्न दर्जे के कामो को स्वयं करना होगा ,यह इस चीज का फायदा हो सकता है कि इससे दलित संकल्पना की समाप्ति हो जाए। इसके बाद अन्य निम्न स्तरीय कार्यो में भी लोगो की भागीदारी हेय दृष्टि से नहीं देखी जायेगी और उनके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाएगा। 

इस प्रकार इस सिद्धांत के फायदे और नुकसान की सीमा अधिव्याप्त है। जहां हम नुकसान खोजने जाते है वही पर हमे कुछ फायदा मिल जाता है। 

निष्कर्ष :
व्यक्ति के आंतरिक विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति के बाद हम मुख्यधारा का आदमी प्राप्त कर सकते है। हालांकि यह मुख्यधारा की अवधारणा भी परतीय(Layered)है लेकिन कम से कम यहां से उसकी शुरुआत भी होती है तो भी घाटे का सौदा नहीं है। उसके बाद यह वर्ग उपभोगवादी वर्ग में शामिल हो जाएगा। जिससे यह मार्केट के अनुसार खुद को ढलने में सक्षम होगा। अत: ऐसा करके हम लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना में आर्थिक न्याय की पहली सीढ़ी को प्राप्त कर लेंगे। बाकी प्रकार के न्याय लगातार हलने वाले प्रक्रम होते है, जिनके प्रति अनुकूलन यही से विकसित होगा। इसके बाद अगर कोई छल-कपट करके भी आगे बढ़ेगा तो अनैतिक नहीं समझा जाएगा, यही माना जाएगा कि उसने समान समझ के लोगो के मध्य उच्च कोटि की चालाकी की प्रदर्शन किया। 

After the Launching of Individuals

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जैसा कि हम सोचते है कि अगर आदमियों को निम्न कक्षा से उच्च कक्षा में एक बार लांच कर दिया तो उसके बाद वह लाचार स्थिति से निकल जाएगा। वह अगली कक्षा में अधिक बेहतर स्थिति का आनंद  उठा सकेगा। उसके बाद वह इस चक्र से निकल जाएगा। लेकिन दूसरी आशंका सामने आ जाती है कि वह अगर अपनी कक्षा में और इजाफा करना चाहे तो क्या उसकी मदद की जानी चाहिए या नहीं। अगर इस तरह मदद करेंगे तो कक्षाओं का स्तरण तो आगे भी समान प्रकार से जारी रहेगा और राज्य कहां तक मदद करेगा। कोई सीमा भी तो होगी। क्या भौतिक चीजों की उपलब्धता बढ़ाकर किया गया कक्षा में इजाफा टिकाऊ होगा या फिर भौतिक चीजों की प्राप्ति ही आदमी का मकसद होता है।  ये सब प्रश्न विचार करने के योग्य है। जिन पर आगे हम विचार करते है।

कक्षा के स्थानांतरण से जुडी Theory of Individual Interference में निम्न बाते उभर कर सामने आती है -

1. कक्षा के स्थानांतरण में बाहरी समर्थन की आवश्यकता के पात्र कोन होंगे ? 
इस प्रश्न का सीधा सा जवाब है कि निम्न वर्ग को ही केवल सरकारी हस्तक्षेप का लाभ मिलना चाहिए। जिसके माध्यम से ये निम्न-मध्यम वर्ग में प्रवेश कर सके। या फिर मध्यम वर्ग में पहुंचने का सामर्थ्य प्राप्त कर सके। लेकिन यहां पर एक प्रश्न खड़ा होता है कि निम्न वर्ग हस्तक्षेप के माध्यम से ऊपरी वर्ग में पहुंचते वक्त निम्न-मध्यम वर्ग को पीछे छोड़ देता है तो उसको कैसे न्योचित ठहराया जाएगा। निम्न वर्ग को निम्न -मध्यम वर्ग में पहुंचाने के लिए क्या मानदंड उसकी योग्यता के निर्धारण में प्रयुक्त किए जाएंगे। दूसरी तरफ यह वर्ग हस्तक्षेप के माध्यम से उस वर्ग के समकक्ष पहुंच जाएगा जो उस समय tax का भुगतान कर रहा होगा। इसके बाद वह इस वर्ग को भी चुनौती देगा, जो क्या इसे स्वीकार्य होगा। इस प्रकार सिद्धांत तो आकर्षक लगता है। लेकिन इसकी डिज़ाइन जटिल होगी और कई तरह की प्रशासनिक जटिलताओं को शामिल करके मौजूदा हस्तक्षेपों के समकक्ष ही पहुंच जायेगी। और आखिर में पूरा सिद्धांत अप्रभावी साबित होगा। 

2. मध्यम वर्ग की भी अपनी मांगो का होना 
वही निम्न वर्ग को प्रगति करते हुए देखने वाला मध्यम वर्ग उस समय क्या चुप थोड़ी रहेगा। वह भी अपने लिए उच्चतर कक्षा में पहुंचने के लिए हस्तक्षेपों की मांग करेगा। इससे आगे उच्च वर्ग भी इसी तरह की मांग समान समय पर करेंगे। वोटबैंक की राजनीती किसी भी वर्ग को नाराज रहने का मौका नहीं देना चाहेगी। वह इन सबको लॉन्चिंग के लिए ड्राइव प्रदान करेगी। जिसकी वजह से संसाधन किसी एक वर्ग के लिए संकीर्ण हो जाएंगे। जिससे उद्देश्य की प्राप्ति समय लेगी। वही ऊपरी वर्गो की भी समान समय पर उच्च स्तर में जाने की मांग असमानता को और अधिक बढ़ा देगी। इससे उद्देश्य प्राप्ति अप्रभावी होना तय है। अगर एक उद्देश्य को प्राप्त करेंगे, उस समय पर जाकर अभावो की दूसरी खाई मौजूद मिलेगी और पुराणी प्रगति इस समय पर आकर अप्रभावी लगना तय है।

3. सरकारी हस्तक्षेप के लिए बुनियादी मापदंड 
यहां से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि कक्षाओं की उपस्थिति एक कटु सत्य है। हम कभी भी एक देश एक कक्षा के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकते। ऐसे में निम्न कक्षाओं के लिए ऊपर की कक्षा में जाने का सपना हमेशा मन में बना रहेगा। वह अपनी इसी आकांशा के साथ जीवन व्यतीत कर देगा। लेकिन हमने देखा कि जो जिंदगी निम्न वाले के लिए आदर्श है वह मध्यम वाले के लिए नीरस है और वह आगे उच्च की जिंदगी को आदर्श मानेगा। ऐसे में संतुष्टि का प्रश्न सामने आ जाता है कि ऐसी क्या बुनियादी चीजे हो जिनके बाद आदमी के जीवन को सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं रहे। इसके लिए उसके उच्च वर्ग में पहुंचने के लिए आवश्यक कौशल को प्राप्त करने में लगने वाले संसाधनों को आधार बनाया जाना चाहिए। 

4. संसाधनों का जमावड़ा करने की होड़ 
इसके अलावा यहां से यह चीज भी उठती है कि संसाधनों का जमावड़ा करने की होड़ कभी भी समाप्त नहीं हो सकती। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम लोगो की प्राथमिकता को अन्य क्षेत्रो की तरफ मोड़े। जैसे कि रचनात्मकता, खेलकूद और अन्य प्रतिभा का क्षेत्र। ताकि जिसके आधार पर आदमी अपने अहम् को संतुष्टि प्रदान करे, बजाय संसाधनों के जमावड़े के आधार पर। लेकिन हम देखते है कि प्रतिभा सम्पन्न लोगो ने भी एक नवीन कुलीन वर्ग को जन्म दिया है। जिससे यह होड़ फिर आगे बढ़ जाती है। ऐसे में हमारे सामने प्रश्न यही है कि इस होड़ को कैसे रोके। इसकी वजह से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव पड़ता जा रहा है।  पत्थर और रेत जंगलो और पहाड़ो से निककर घरो में आके जमा हो गई। इससे जंगल तबाह हो गए, स्थानीय समुदाय विस्तापित हो गए, ग्रीन हाउस गेसो का उतसर्जन बढ़ गया। इसलिए इसे भी साथ में रोककर आगे बढ़ना होगा। पर्यावरण क्षति की वजह से निम्न लोगो के विकास को तो रोक नहीं सकते ।

5. अल्टीमेट रियलिटी की तलाश 
अगर आदमी निचली कक्षाओं से ऊपर की कक्षाओं में पलायन कर गए। तो निचली कक्षा के कामो को कोन सम्पादित करेगा। लेकिन इसकी गारंटी तकनीकी ले रही है। फिर तो इस पलायन से आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन सच्चाई इन दोनों बातो के बीच में है। मतलब तकनीकी पूरी तरीके से आदमी की जगह नहीं ले सकती। इसलिए आदमी की निम्न कार्यो में भूमिका बची रहेगी। अगर ऐसा नहीं रहेगा, फिर तो मध्यम स्तर पर रोजगारो की मांग करने वालो की भीड़ और बढ़ जायेगी। इसलिए यहां से बुनियादी प्रश्न उठता है कि अल्टीमेट रियलिटी क्या है। आदमी का पैसेकमा कर उच्च वर्ग की जिंदगी जीना ही उद्देश्य नहीं हो सकता। वही निम्न वर्ग में रहकर अपनी सभी आवश्यकताओं और इच्छाओ को दबाना भी उद्देश्य नहीं हो सकता। इसलिए बुनियादी चीजों की प्राप्ति के बाद इस रंगमंच पर अभिनय करने की बात यहां से उभर कर सामने आती है।


खंड II
अब हमारे सामने प्रश्न यह है कि जब इतने सारे बुनियादी प्रश्नो का समर्थन इस सिद्धांत को नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में क्या इसे आगे बढ़ाना चाहिए या नहीं। इसके अलावा यह बात भी उठती है कि फिर किस तरह से इसका क्रियान्वन किया जाए कि ये प्रश्न खड़े नहीं हो।

1. सबसे पहले तो यह बात स्पष्ट हो जाती है की लांच करने का नियम सभी कक्षाओं पर लागू नहीं होता। यह केवल निम्न कक्षाओं के लिए ही उपुक्त है। जिसका मकसद उनके गरीबी के चक्र में रोकने के लिए जिम्मेदार कारको का खात्मा करना है।  जिस प्रकार अगर गरीबी की वजह से पढाई नहीं कर पाता तो उसे पढाई के लिए बेहतरीन सुविधा उपलब्ध करानी है। यह नहीं कि उसे बीस लाख रूपए देकर कार दिलवा दी। और बोल दिया कि जा अब तू हो गया मध्यम वर्ग का आदमी।

2.  दूसरी तरफ समाज को समानता की तरफ धकेलने के प्रयास किए जाएंगे। इसके लिए कई क्षेत्रो में कार्य किया जाएगा। जो करो के माध्यम से प्राप्त हो सकता है। या फिर सरकारी समर्थनों के माध्यम से।
इसके अलावा संसाधनों की संकीर्णता को रोकने के लिए जनसंख्या नीति पर भी विचार किया जाएगा। साथ ही किसी एक ही आदमी को प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक प्रयोग से रोका जाएगा। एक व्यक्ति को साल में उत्पादित संसाधनों का कितनी सीमा तक उपयोग करना चाहिए। इस पर विचार किया जाएगा। देश को निरंकुश पूंजीवाद के जाल से निकाला जाएगा। इस वजह से कई चीजों की मनमर्जी की कीमतों से भी मुक्ति मिलेगी।

3. राजनीती आश्वासन दिलाने का काम कर सकती है कि वह सभी के उत्थान का कार्य कर रही है। लेकिन इस समय की विभाजनकारी राजनीती में अलग अलग समय पर शासन से उम्मीद लगा सकते है। एक वर्ग को आगे बढ़ना है तो दूसरे को पीछे छोड़ना पड़ेगा। इस प्रकार यह सिद्धांत पुन: प्रासंगिक हो जाता है कि एक ही समय पर सभी लोगो को खुश करना सम्भव नहीं है। वही इस तरह के प्रयास किसी सरकार द्वारा किए जाएंगे, ऐसे में जरुरी तो नहीं कि सभी राज्य इसी तरह के कार्यक्रम लागू करे। इसलिए स्थानीय सर्कार पर भरोसा भी रखना होगा और उसकी नीतियों को जनोन्मुखी बनाने के लिए दबाव भी रखना होगा। यह सब विरोध की राजनीती की बजाय थिंकटैंक की राजनीती के माध्यम से करना होगा।

4. अब प्रश्न यह हो जाता है कि यह कोई अद्वितीय सिद्धांत नहीं है। लेकिन इसमें निम्न वर्ग को ऊपर उठाने का पवित्र उद्देश्य शामिल है, जिसे कैसे प्राप्त किया जाए। इसके लिए मौजूदा कौशल विकास, उद्यम स्थापना के कार्यक्रमों के माध्यम से कैसे अधिकतम जरुरतमंदो को सम्बोधित किया जाए। इसके लिए मौजूदा कार्यक्रमों की प्रभाविता बढ़ाने के सरकारी प्रयासों की मदद करनी होगी।

5. इस कार्य के लिए अब हमे दूसरे क्षेत्रो की भी मदद लेनी होगी। तब जाकर यह उद्देश्य पूरा किया जा सकता है। बिज़नेस सेक्टर को ऐसे उत्पाद निर्मित करने चाहिए, जो इस वर्ग के लिए किफायती हो। जिनको उपभोग करने में निम्न वर्ग पर भर नहीं पड़े। वही ऐसे उत्पाद भी हो जो आसान और वहनीय तरिके से घर की बुनियादी चीजे बसाने में मदद करे।

निष्कर्ष :
प्रत्येक व्यक्ति के उत्थान में सक्रिय हस्तक्षेप का रास्ता जटिल है। लेकिन हम उन्हें दुसरो के द्वारा उत्पीड़ित होते नहीं देख सकते। उनके मानवाधिकारों को उच्च वर्ग के मनोरंजन का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता। इसलिए बुनियादी चीजे उपलब्ध कराने के अलावा उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए भी कार्य करना होगा। बिना व्यक्तित्व के क्या गारंटी है कि वे भेजे गए ऊपरी वर्ग में ठीके रहेंगे या फिर दमित या शोषित नहीं होंगे। इसलिए भौतिक विकास  के साथ-साथ आंतरिक विकास के लिए भी हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।