Theory of Internal Interference

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जैसा की हमने व्यक्ति के भौतिक विकास के लिए बाहरी हस्तक्षेप की अवधारणा (Theory of Individual Interference) देखी थी। उसमे हमने पाया था की आदमी के भौतिक विकास को अगर संधारणीय बनाना है तो हमे उसके मानसिक विकास (Internal Development ) पर भी ध्यान देना होगा। इसके लिए हमे उसके व्यक्तित्व विकास (Persoanality Development के क्षेत्र में कार्य करना होगा। इसके आधार पर हम उसे ज्यादा मजबूत कर सकते है अपने बलबूते पर ही खुद को खड़ा करने के लिए। व्यक्तित्व का विकास बेहद ही जरूरी हो जाता है। जिसमे शामिल किए जाने वाले बिन्दुओ का हम यहां पर अध्ययन करेंगे।

व्यक्तित्व विकास के लिए व्यक्ति के आंतरिक पटल में हस्तक्षेप करना होगा। हम जानते है यह कार्य परिवार, समाज और विद्यालय के माध्यम से किया जाता है। जो व्यक्ति की समाजीकरण प्रकिया का हिस्सा रहता है। बाद में किताबो,साथियो के माध्यम से भी यह निर्धारित होता है। लेकिन जो लोग इन सभी चीजों के त्रुटिपूर्ण स्वरूपों के सम्पर्क में रहे है, उनके व्यक्तित्व के विकास में भी त्रुटि होगी। वही भोले और सीधे समाज के द्वारा सीधे सादे व्यक्तित्व का विकास होगा। इसके विपरीत जिस समाज में हमेशा बिज़नेस की बाते होती है , वहां के बच्चो में भी यह बिज़नेस भावना व्यक्तित्व का हिस्सा बन जायेगी। इस तरह व्यक्तित्व हमारे मनोवृत्ति को दिशा देता है। जिसके आधार पर हमारे आचरण में अपनी स्थिति सुधारने के लिए किए जाने वाले प्रयासों की तीव्रता शामिल होती है।

व्यक्तित्व विकास में निम्न चीजे शामिल हो सकती है - नैतिक मूल्य आदि। अब इनका हम पृथक-पृथक अध्ययन करते है।

खंड I  नैतिक विकास  

नैतिक विकास आदमी के विकास से सीधा जुड़ा हुआ है। हम देखते है कि गरीब आदमी में नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पण ज्यादा होता है। वही जैसे-जैसे यह स्तर बढ़ता जाता है ,नैतिकता का स्तर भी कम होता जाता है। इसके लिए हमे इस नैतिक अंतराल की खाई पर सेतु निर्मित करना होगा। इसके लिए हमे यह देखना होगा कि लोगो के विकास को नैतिक मूल्यों ने किस प्रकार प्रभावित किया है। वे किस प्रकार उसके विकास में बाधा बन रहे है। फिर उन्हें किस तरीके से अपडेट किया जाए। साथ ही इस कर्म में वे कही अनैतिक नहीं बन जाए। इसका भी ध्यान रखना है।

वर्तमान की नैतिकता का मूल्यांकन
वर्तमान में हमारा नैतिकता का दायरा बहुत भोला है। जिसमे छोटी-छोटी खामियों को भी अनैतिक मान लिया जाता है। यह लोगो के एम्पोवेर्मेंट में रुकावट के रूप में उभर कर सामने आती है। लोगो को सक्रिय नागरिक बनने से रोकती है। इसका कारण यह है कि हमारे पूर्वज भी हमारे सामने भोली नैतिकता को मानदंड बनाकर चले गए।

हमे गांधी की बजाय तिलक की नैतिकता की जरूरत थी। जिसमे अपने हक़ के लिए कोई परीक्षा नही देनी पड़ती थी। जबकि गाँधीजी आग्रह पर आधारित थी। आग्रह को ठुकराना कभी भी अनैतिक नही रहा। आज के प्रशासन ने यह तक कर दिया कि आपको आग्रह करने के लिए भी अनुमति की आवश्यकता होगी। अतः गाँधीजी की नैतिकता युग के हिसाब से सही नही थी। आज के युग मे गाँधीजी अप्रभावी है। मतलब जनता के लिए गाँधीजी का संघर्ष व्यर्थ चला गया। सारे सँघर्ष को नेताओ ने भुना लिया।
Question : गांधीजी आज के समय में अप्रभावी है। वह उस समय भी अप्रासंगिक ही थे। फिर किन कारणों ने गाँधी की सफलता सुनिश्चित की। विश्लेषण करो।  
हम इतना जानते है कि गांधी जी की नैतिकता दीर्घकाल में लाभ देती है। आम आदमी रोटी, कपड़े और मकान को दीर्घकाल के लिए नहीं छोड़ सकता है। यह नैतिकता केवल राज्य या फिर संगठनों के लिए फायदेमंद हो सकती है। लोग आजीविका का भी संचार नही कर पा रहे। इतने ज्यादा भोले भी नही होना चाहिए। अब इन्हें कैसे सजग करे। यह मुद्दा है।

नैतिकता में बदलाव का रोडमैप 
हमारी मौजूदा नैतिकता बहुत ही ज्यादा भोलेपन पर आधारित है। इसमें लोगो को छोटी -छोटी चीजों के  प्रति भी रोक दिया जाता है। इसे हमे अधिकार आधारित तो कम से कम बनाना ही चाहिए।
  1. भारतीय मूल्य व्यवस्था या संस्कृति में कुछ खामिया है, जो कि अपने परिवार, मित्रो और रिश्तेदारों को ज्यादा महत्व देती है। उनके लिए हम योग्यता, प्रतिभा, निष्पक्षता और व्यापक भलाई की हत्या करने को भी तैयार रहते है। यही वजह है कि कुछ उद्धमि आते ही सफलता प्राप्त करने लग जाते है।
  2. हमारी नैतिकता समाज द्वारा निर्धारित होती है। अगर हमने समाज के बंधन तोड़ दिए तो इस नैतिकता से भी मुक्त हो जाएंगे। इसके बाद चतुर लोगो की नैतकता को अंगीकार कर लेंगे। हो सकता है जिसके बाद सामाजिक -आर्थिक स्थिति में सुधार हो जाए। 
यह नैतिकता में बदलाव का प्रयास नहीं है बल्कि नैतिकता के परिष्करण की कोशिश है। जो कि समय के अनुसार बदलती रहती है। इसलिए इसको वर्तमान में भी अद्यतन करना कोई गलत बात नहीं है। 

खंड II  व्यक्तित्व विकास  

नैतिक मूल्यों के दायरे का निर्धारण करने के बाद हमे विभिन्न क्षेत्रो का विश्लेषण करना चाहिए। किस क्षेत्र में कोनसा कार्य उत्पादक साबित हो सकता है।इसके अलावा इसमें यह चीज भी प्रदान करने की आवश्यकता होगी कि किस तरह से वे खुद को इस गला काट स्पर्द्धा  वाली दुनिया में टिकाये रख सकेंगे।

इसके लिए कुछ क्षेत्रो के बारे में संकेत किया जा सकता है -
  1. लोगो में पुलिस से डील करने का आत्मविश्वास नहीं है। जैसे ही सामना होता है तो लोग उससे लड़ने पे उतारू हो जाते है। वे उसे ट्रबल मेकर समझते है। हमे लोगो को कानूनों के बारे में स्कूल स्तर पर बताकर अनुपालन संस्कृति की शुरुआत करनी चाहिए।
  2. लोगो को सरकारी योजनाओ के लाभ लेने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। इसलिए उनमे अधिकार आधारित मूल्यों को बिठाया जाना चाहिए। 
  3. सरकार से डील करने में ही नहीं लोगो को निजी क्षेत्र के लोगो, किसी व्यक्तिगत आदमी से डील करने के लिए भी एम्पावरमेंट करने की जरूरत है। इसलिए निजी जिंदगी हेतु भी कौशल इसमें शामिल है।  
इन सभी चीजों को स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। जिनमे अध्ययन के अलावा संबंधित विभाग के अधिकारियो को भेजकर व्यवहारिक प्रयोग दिखाना भी चाहिए। तब जाकर ये चीजे बच्चो के मूल्यों का हिस्सा बनकर उनके आचरण में उजागर होगी। 

खंड III  Theory Analysis  

अब हम वापस से आदमी के विकास में इस सिद्धांत के योगदान के मूल्यांकन पर आ जाते है। 
व्यक्ति का आंतरिक विकास उसके भौतिक विकास को टिकाऊ बनाता है। जिसकी बदौलत वह उसे संधारणीय बनाये रख सकता है। विकास पर ध्यान देते वक्त यह भी बहुत ही अनिवार्य पहलु है।  

लेकिन नकारात्मक पहलू की बात की जाए तो वो यह हो सकता है कि लोगो का एक सीमा से नीचे के कामो के प्रति मोहभंग हो सकता है। या फिर लोगो में कामो के चयन के प्रति विशिष्टता विकसित हो सकती है। तब हमे जरूरी लेकिन निम्न दर्जे के कामो को स्वयं करना होगा ,यह इस चीज का फायदा हो सकता है कि इससे दलित संकल्पना की समाप्ति हो जाए। इसके बाद अन्य निम्न स्तरीय कार्यो में भी लोगो की भागीदारी हेय दृष्टि से नहीं देखी जायेगी और उनके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाएगा। 

इस प्रकार इस सिद्धांत के फायदे और नुकसान की सीमा अधिव्याप्त है। जहां हम नुकसान खोजने जाते है वही पर हमे कुछ फायदा मिल जाता है। 

निष्कर्ष :
व्यक्ति के आंतरिक विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति के बाद हम मुख्यधारा का आदमी प्राप्त कर सकते है। हालांकि यह मुख्यधारा की अवधारणा भी परतीय(Layered)है लेकिन कम से कम यहां से उसकी शुरुआत भी होती है तो भी घाटे का सौदा नहीं है। उसके बाद यह वर्ग उपभोगवादी वर्ग में शामिल हो जाएगा। जिससे यह मार्केट के अनुसार खुद को ढलने में सक्षम होगा। अत: ऐसा करके हम लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना में आर्थिक न्याय की पहली सीढ़ी को प्राप्त कर लेंगे। बाकी प्रकार के न्याय लगातार हलने वाले प्रक्रम होते है, जिनके प्रति अनुकूलन यही से विकसित होगा। इसके बाद अगर कोई छल-कपट करके भी आगे बढ़ेगा तो अनैतिक नहीं समझा जाएगा, यही माना जाएगा कि उसने समान समझ के लोगो के मध्य उच्च कोटि की चालाकी की प्रदर्शन किया। 

After the Launching of Individuals

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जैसा कि हम सोचते है कि अगर आदमियों को निम्न कक्षा से उच्च कक्षा में एक बार लांच कर दिया तो उसके बाद वह लाचार स्थिति से निकल जाएगा। वह अगली कक्षा में अधिक बेहतर स्थिति का आनंद  उठा सकेगा। उसके बाद वह इस चक्र से निकल जाएगा। लेकिन दूसरी आशंका सामने आ जाती है कि वह अगर अपनी कक्षा में और इजाफा करना चाहे तो क्या उसकी मदद की जानी चाहिए या नहीं। अगर इस तरह मदद करेंगे तो कक्षाओं का स्तरण तो आगे भी समान प्रकार से जारी रहेगा और राज्य कहां तक मदद करेगा। कोई सीमा भी तो होगी। क्या भौतिक चीजों की उपलब्धता बढ़ाकर किया गया कक्षा में इजाफा टिकाऊ होगा या फिर भौतिक चीजों की प्राप्ति ही आदमी का मकसद होता है।  ये सब प्रश्न विचार करने के योग्य है। जिन पर आगे हम विचार करते है।

कक्षा के स्थानांतरण से जुडी Theory of Individual Interference में निम्न बाते उभर कर सामने आती है -

1. कक्षा के स्थानांतरण में बाहरी समर्थन की आवश्यकता के पात्र कोन होंगे ? 
इस प्रश्न का सीधा सा जवाब है कि निम्न वर्ग को ही केवल सरकारी हस्तक्षेप का लाभ मिलना चाहिए। जिसके माध्यम से ये निम्न-मध्यम वर्ग में प्रवेश कर सके। या फिर मध्यम वर्ग में पहुंचने का सामर्थ्य प्राप्त कर सके। लेकिन यहां पर एक प्रश्न खड़ा होता है कि निम्न वर्ग हस्तक्षेप के माध्यम से ऊपरी वर्ग में पहुंचते वक्त निम्न-मध्यम वर्ग को पीछे छोड़ देता है तो उसको कैसे न्योचित ठहराया जाएगा। निम्न वर्ग को निम्न -मध्यम वर्ग में पहुंचाने के लिए क्या मानदंड उसकी योग्यता के निर्धारण में प्रयुक्त किए जाएंगे। दूसरी तरफ यह वर्ग हस्तक्षेप के माध्यम से उस वर्ग के समकक्ष पहुंच जाएगा जो उस समय tax का भुगतान कर रहा होगा। इसके बाद वह इस वर्ग को भी चुनौती देगा, जो क्या इसे स्वीकार्य होगा। इस प्रकार सिद्धांत तो आकर्षक लगता है। लेकिन इसकी डिज़ाइन जटिल होगी और कई तरह की प्रशासनिक जटिलताओं को शामिल करके मौजूदा हस्तक्षेपों के समकक्ष ही पहुंच जायेगी। और आखिर में पूरा सिद्धांत अप्रभावी साबित होगा। 

2. मध्यम वर्ग की भी अपनी मांगो का होना 
वही निम्न वर्ग को प्रगति करते हुए देखने वाला मध्यम वर्ग उस समय क्या चुप थोड़ी रहेगा। वह भी अपने लिए उच्चतर कक्षा में पहुंचने के लिए हस्तक्षेपों की मांग करेगा। इससे आगे उच्च वर्ग भी इसी तरह की मांग समान समय पर करेंगे। वोटबैंक की राजनीती किसी भी वर्ग को नाराज रहने का मौका नहीं देना चाहेगी। वह इन सबको लॉन्चिंग के लिए ड्राइव प्रदान करेगी। जिसकी वजह से संसाधन किसी एक वर्ग के लिए संकीर्ण हो जाएंगे। जिससे उद्देश्य की प्राप्ति समय लेगी। वही ऊपरी वर्गो की भी समान समय पर उच्च स्तर में जाने की मांग असमानता को और अधिक बढ़ा देगी। इससे उद्देश्य प्राप्ति अप्रभावी होना तय है। अगर एक उद्देश्य को प्राप्त करेंगे, उस समय पर जाकर अभावो की दूसरी खाई मौजूद मिलेगी और पुराणी प्रगति इस समय पर आकर अप्रभावी लगना तय है।

3. सरकारी हस्तक्षेप के लिए बुनियादी मापदंड 
यहां से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि कक्षाओं की उपस्थिति एक कटु सत्य है। हम कभी भी एक देश एक कक्षा के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकते। ऐसे में निम्न कक्षाओं के लिए ऊपर की कक्षा में जाने का सपना हमेशा मन में बना रहेगा। वह अपनी इसी आकांशा के साथ जीवन व्यतीत कर देगा। लेकिन हमने देखा कि जो जिंदगी निम्न वाले के लिए आदर्श है वह मध्यम वाले के लिए नीरस है और वह आगे उच्च की जिंदगी को आदर्श मानेगा। ऐसे में संतुष्टि का प्रश्न सामने आ जाता है कि ऐसी क्या बुनियादी चीजे हो जिनके बाद आदमी के जीवन को सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं रहे। इसके लिए उसके उच्च वर्ग में पहुंचने के लिए आवश्यक कौशल को प्राप्त करने में लगने वाले संसाधनों को आधार बनाया जाना चाहिए। 

4. संसाधनों का जमावड़ा करने की होड़ 
इसके अलावा यहां से यह चीज भी उठती है कि संसाधनों का जमावड़ा करने की होड़ कभी भी समाप्त नहीं हो सकती। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम लोगो की प्राथमिकता को अन्य क्षेत्रो की तरफ मोड़े। जैसे कि रचनात्मकता, खेलकूद और अन्य प्रतिभा का क्षेत्र। ताकि जिसके आधार पर आदमी अपने अहम् को संतुष्टि प्रदान करे, बजाय संसाधनों के जमावड़े के आधार पर। लेकिन हम देखते है कि प्रतिभा सम्पन्न लोगो ने भी एक नवीन कुलीन वर्ग को जन्म दिया है। जिससे यह होड़ फिर आगे बढ़ जाती है। ऐसे में हमारे सामने प्रश्न यही है कि इस होड़ को कैसे रोके। इसकी वजह से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव पड़ता जा रहा है।  पत्थर और रेत जंगलो और पहाड़ो से निककर घरो में आके जमा हो गई। इससे जंगल तबाह हो गए, स्थानीय समुदाय विस्तापित हो गए, ग्रीन हाउस गेसो का उतसर्जन बढ़ गया। इसलिए इसे भी साथ में रोककर आगे बढ़ना होगा। पर्यावरण क्षति की वजह से निम्न लोगो के विकास को तो रोक नहीं सकते ।

5. अल्टीमेट रियलिटी की तलाश 
अगर आदमी निचली कक्षाओं से ऊपर की कक्षाओं में पलायन कर गए। तो निचली कक्षा के कामो को कोन सम्पादित करेगा। लेकिन इसकी गारंटी तकनीकी ले रही है। फिर तो इस पलायन से आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन सच्चाई इन दोनों बातो के बीच में है। मतलब तकनीकी पूरी तरीके से आदमी की जगह नहीं ले सकती। इसलिए आदमी की निम्न कार्यो में भूमिका बची रहेगी। अगर ऐसा नहीं रहेगा, फिर तो मध्यम स्तर पर रोजगारो की मांग करने वालो की भीड़ और बढ़ जायेगी। इसलिए यहां से बुनियादी प्रश्न उठता है कि अल्टीमेट रियलिटी क्या है। आदमी का पैसेकमा कर उच्च वर्ग की जिंदगी जीना ही उद्देश्य नहीं हो सकता। वही निम्न वर्ग में रहकर अपनी सभी आवश्यकताओं और इच्छाओ को दबाना भी उद्देश्य नहीं हो सकता। इसलिए बुनियादी चीजों की प्राप्ति के बाद इस रंगमंच पर अभिनय करने की बात यहां से उभर कर सामने आती है।


खंड II
अब हमारे सामने प्रश्न यह है कि जब इतने सारे बुनियादी प्रश्नो का समर्थन इस सिद्धांत को नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में क्या इसे आगे बढ़ाना चाहिए या नहीं। इसके अलावा यह बात भी उठती है कि फिर किस तरह से इसका क्रियान्वन किया जाए कि ये प्रश्न खड़े नहीं हो।

1. सबसे पहले तो यह बात स्पष्ट हो जाती है की लांच करने का नियम सभी कक्षाओं पर लागू नहीं होता। यह केवल निम्न कक्षाओं के लिए ही उपुक्त है। जिसका मकसद उनके गरीबी के चक्र में रोकने के लिए जिम्मेदार कारको का खात्मा करना है।  जिस प्रकार अगर गरीबी की वजह से पढाई नहीं कर पाता तो उसे पढाई के लिए बेहतरीन सुविधा उपलब्ध करानी है। यह नहीं कि उसे बीस लाख रूपए देकर कार दिलवा दी। और बोल दिया कि जा अब तू हो गया मध्यम वर्ग का आदमी।

2.  दूसरी तरफ समाज को समानता की तरफ धकेलने के प्रयास किए जाएंगे। इसके लिए कई क्षेत्रो में कार्य किया जाएगा। जो करो के माध्यम से प्राप्त हो सकता है। या फिर सरकारी समर्थनों के माध्यम से।
इसके अलावा संसाधनों की संकीर्णता को रोकने के लिए जनसंख्या नीति पर भी विचार किया जाएगा। साथ ही किसी एक ही आदमी को प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक प्रयोग से रोका जाएगा। एक व्यक्ति को साल में उत्पादित संसाधनों का कितनी सीमा तक उपयोग करना चाहिए। इस पर विचार किया जाएगा। देश को निरंकुश पूंजीवाद के जाल से निकाला जाएगा। इस वजह से कई चीजों की मनमर्जी की कीमतों से भी मुक्ति मिलेगी।

3. राजनीती आश्वासन दिलाने का काम कर सकती है कि वह सभी के उत्थान का कार्य कर रही है। लेकिन इस समय की विभाजनकारी राजनीती में अलग अलग समय पर शासन से उम्मीद लगा सकते है। एक वर्ग को आगे बढ़ना है तो दूसरे को पीछे छोड़ना पड़ेगा। इस प्रकार यह सिद्धांत पुन: प्रासंगिक हो जाता है कि एक ही समय पर सभी लोगो को खुश करना सम्भव नहीं है। वही इस तरह के प्रयास किसी सरकार द्वारा किए जाएंगे, ऐसे में जरुरी तो नहीं कि सभी राज्य इसी तरह के कार्यक्रम लागू करे। इसलिए स्थानीय सर्कार पर भरोसा भी रखना होगा और उसकी नीतियों को जनोन्मुखी बनाने के लिए दबाव भी रखना होगा। यह सब विरोध की राजनीती की बजाय थिंकटैंक की राजनीती के माध्यम से करना होगा।

4. अब प्रश्न यह हो जाता है कि यह कोई अद्वितीय सिद्धांत नहीं है। लेकिन इसमें निम्न वर्ग को ऊपर उठाने का पवित्र उद्देश्य शामिल है, जिसे कैसे प्राप्त किया जाए। इसके लिए मौजूदा कौशल विकास, उद्यम स्थापना के कार्यक्रमों के माध्यम से कैसे अधिकतम जरुरतमंदो को सम्बोधित किया जाए। इसके लिए मौजूदा कार्यक्रमों की प्रभाविता बढ़ाने के सरकारी प्रयासों की मदद करनी होगी।

5. इस कार्य के लिए अब हमे दूसरे क्षेत्रो की भी मदद लेनी होगी। तब जाकर यह उद्देश्य पूरा किया जा सकता है। बिज़नेस सेक्टर को ऐसे उत्पाद निर्मित करने चाहिए, जो इस वर्ग के लिए किफायती हो। जिनको उपभोग करने में निम्न वर्ग पर भर नहीं पड़े। वही ऐसे उत्पाद भी हो जो आसान और वहनीय तरिके से घर की बुनियादी चीजे बसाने में मदद करे।

निष्कर्ष :
प्रत्येक व्यक्ति के उत्थान में सक्रिय हस्तक्षेप का रास्ता जटिल है। लेकिन हम उन्हें दुसरो के द्वारा उत्पीड़ित होते नहीं देख सकते। उनके मानवाधिकारों को उच्च वर्ग के मनोरंजन का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता। इसलिए बुनियादी चीजे उपलब्ध कराने के अलावा उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए भी कार्य करना होगा। बिना व्यक्तित्व के क्या गारंटी है कि वे भेजे गए ऊपरी वर्ग में ठीके रहेंगे या फिर दमित या शोषित नहीं होंगे। इसलिए भौतिक विकास  के साथ-साथ आंतरिक विकास के लिए भी हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।

हमारे इर्द-गिर्द के नवीन सामान्य रुझानों का अनुरेखण

किसी भी समाज, संगठन या देश में अधिकतर गतिविधिया तयशुदा नियमो के तहत होती है। लेकिन कुछ गतिविधिया अगर मानक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं होती तो उसे हम अपवाद मानकर छोड़ देते है। लेकिन जब इन अपवादों की आवृति बढ़ जाती है तो ये सामान्य सी चीजे बन जाती है।  फिर समय और परिस्थितियों की मांग होती है कि इन नई सामन्य चीजों को व्यवस्थित किया जाए। ताकि इनसे किसी प्रकार की अव्यवस्था नहीं फैले। वर्तमान में ऐसी बहुत सारी चीजे सभी क्षेत्रो में देखी जा रही है। सरकार की इन पर तीव्र निगाहे है ताकि लोगो को गतिशील विश्व के साथ सर्वोत्तम अभिशासन उपलब्ध कराया जा सके।  ये आम बाते राजनीति,अर्थव्यवस्था,समाज और संस्कृति सभी में पाई जाती है। तकनीकी विकास, जनसंख्या वृद्धि और वैश्वीकरण के विभिन्न प्रभावों के कारण ये नई सामन्य चीजे उत्पन्न हो रही है।

इस आलेख में हम इन नई सामान्य चीजों को क्षेत्रवार तलाशने की कोशिश करेंगे।

1. प्रशासन 
निचले स्तर पर रिश्वत दिया जाना सहूलियत के लिए सही समझा जाने लगा है। वही ऊपर के स्तर पर फेवर के बदले फेवर का चलना आम बात हो गई है।

2. राजनीति 
चुनावो को किसी भी तरीके से जीतना सामान्य उद्देश्य हो गया है, बाकी सिद्धांतो को संभालने के लिए धरना प्रबंधन सेल है। जमीनी कार्यकर्ताओ को साम-दाम -दंड - भेद की नीति पकड़ा दी गई है।

3. अर्थव्यवस्था 
अर्थव्यवस्था में क्रोनी कैपिटलिज्म का प्रचलन आम होता जा रहा है।

4. मीडिया 
मीडिया पत्रकारिता के उद्देश्य को छोड़कर बिज़नेस इकाई हो गए है। कई अख़बार और टीवी चैनल राजनितिक दलों के प्रवक्ता बन गए है।

5. समाज 
समाजो में व्यक्तिवाद को महत्व मिल गया है और परम्परागत संस्थाओ और उनके मूल्यों की अपेक्षा आम बात हो गई है।

6. संस्कृति 
संस्कृति में बाह्य तत्वों को बिज़नेस जगत द्वारा मान्यता दिलाने की कोशिश आम बात हो गई है।

7. डिप्लोमेसी 
सभी देशो के साथ रिश्तो को गहरे करना आम चलन में है। देश इसे शीर्ष स्तर से निम्न स्तर के संबध्दता में बदलना चाहते है।

8. शिक्षा और रोजगार 
पढ़ा लिखा लेकिन बेरोजगार आदमी आजकल के समाजो में आम बात हो गई। नौकरी के लिए कई तरह के फर्जीवाड़ा का प्रचलन और उसके लिए किया जाने वाला विरोध का बेअसर होना भी सामान्य सी बात है।

9. सिनेमा 
सिनेमा में दर्शको को कैसे भी करके खींचने के लिए प्रयोग हो रहे है। इसलिए पुराणी अवांछित चीजे अब सामान्य बाते हो गई है। जैसे दारु सिगरेट गाली ,अश्लीलता आदि।

10. पब्लिकेशन 
पब्लिकेशन में तुलनात्मक रूप से लिखने वाले तो बढ़े ही है। लेकिन लक्ष्यित दर्शको/ पाठको का आभाव सामान्य सी बाते है।

खंड II

किस दिशा में ले जा रहे है ये न्यू नॉर्मल्स 
अगर हम इन नई सामन्य चीजों के पैटर्न का अवलोकन करे तो पता चलता है कि अब दुनिया खुल रही है, लोग अपनी इच्छाओ को दबाकर नहीं रख रहे है, अपनी इच्छाओ की पूर्ति के प्रयास भी कर रहे है। यह सब व्यक्तिवाद को समर्थ देने वाले बाजार आधारित मूल्यों की बदौलत भी हो रहा है। लोगो की आदतों में गंभीरता का आभाव बाजार के लिए उर्वर भूमि तैयार करता है।

आगे क्या करने की जरुरत है 
लोगो को या किसी को भी रोकने की जरुरत नहीं है। बल्कि हमे प्रशासन को चुस्त बनाना है ताकि कोई भी नुकसान इनकी गतिविधियों के माध्यम से नहीं हो। लोगो का इस तरह से अपने अरमानो को पूरा करना स्थापित संस्थाओ की सुरक्षा के हित में बहुत जरुरी है। हमे अपने नियमो और नैतिकताओ को इसे अनुरूप कर लेना चाहिए।

इस प्रचलन के प्रभाव 
अधिकतर प्रभाव सकारत्मक ही होंगे। व्यक्तिगत अधिकारों क बल पर आदमी अपना विकास बेहतर क्रियान्वित कर सकता है। अगर कोई नुकसान हो रहा है तो वो यह कि लोगो की उत्पादकता पहले की तुलना में कम होती जा रही है। लेकिन यह कोई मुद्दा नहीं है क्योकि आजकी पीढ़ी के पास लक्ष्य भी बढ़े नहीं है।

निष्कर्ष : 
इन नई सामान्य चीजों पर दृष्टि होना बहुत ही जरुरी है। ताकि इनकी दिशा को पकड़ के इनके प्रभावों को दोहित कर सके। वही इनकी नकारात्मकताओं को रोक सके। इसके लिए सभी संस्थाओ ने संस्थागत प्रयास शुरू कर दिए है जहां पर संक्रमण को लेकर अध्ययन किया जाता है और रणनीति बनाई  जाती है। लोगो को भी नई चीजों के साथ खुद को ढल लेना चाहिए।  

UPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2018 निबंध प्रश्न पत्र

सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2018, निबंध प्रश्न-पत्र का इस आलेख में सटीक दृष्टिकोण बताया जा रहा हैं। किसी निबंध के मॉडल उत्तर में किन-किन पक्षों को शामिल किया जाना चाहिए तथा सम्बन्धित विषय पर क्या संतुलित दृष्टिकोण होना चाहिए, इन सबको आप इस आलेख में देख सकते हैं। इसी तरह की हमारी पहल को गत वर्ष भी काफी सराहा गया था।
खंड I
  1. जलवायु परिवर्तन के प्रति सुनम्य भारत हेतु वैकल्पिक तकनीकियां (Alternative Technologies for a Climate Change resilient india)
  2. एक अच्छा जीवन प्रेम से प्रेरित तथा ज्ञान से संचालित होता है (A good life is one inspired by love and guided by knowledge)
  3. कही पर भी गरीबी हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है (Poverty anywhere is a threat to prosperity everywhere)
  4. भारत के सीमा विवादों का प्रबंधन - एक जटिल कार्य (Management of Indian border disputes - a complex task)
      खंड II
      1. रूढ़िगत नैतिकता आधुनिक जीवन का मार्गदर्शक नहीं हो सकती है। (Customary morality can not be a guide to modern life)
      2. अतीत मानवीय चेतना तथा मूल्यों का एक स्थायी आयाम है। (The past is a permanent dimension of human consciousness and values)
      3. जो समाज अपने सिधान्तो के ऊपर अपने विशेषाधिकारों को महत्व देता है, वह दोनों से हाथ धो बैठता है। (A people that values its privileges above its principles, loses both is defeated by both of them.)
      4. यथार्थ आदर्श के अनुरूप नहीं होता है , बल्कि उसकी पुष्टि करता है। (Reality Does not conform to the ideal, but confirms it.)

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          खंड I के निबंधों से संबंधित सही दृष्टिकोण

          1.1.जलवायु परिवर्तन के प्रति सुनम्य भारत हेतु वैकल्पिक तकनीकियां।
          (Alternative Technologies for a Climate Change resilient india)

          जलवायु परिवर्तन के नुकसान देशों को भारी जान माल की क्षति कर रहे है। वैश्विक स्तर पर सभी देशो द्वारा इन नुकसानों का न्यूनीकरण करने पर ध्यान दिया जा रहा है। यह मुद्दा कई अंतर्राष्ट्रीय मंचो के एजेंडा का हिस्सा रहा है। सेंडाइ फ्रेमवर्क हो या फिर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन से संबंधित क्षेत्रीय आयोजन हो। सभी में इस पर लक्ष्यबद्ध तैयारी को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। भारत ने भी इन प्लेटफार्म की सदस्यता ली है और इनके लक्ष्यों का अंगीकरण भी किया है ताकि जलवायु परिवर्तन संबंधित जोखिमो को निम्नीकृत किया जा सके। 
          • इन तकनीकियों को अपनाने की क्यों जरुरत है -  Explain india's Vulnerability
          • इस सिलसिले में परम्परागत तरीको को अनुकूलित किए जाने की आवश्यकता है वही उनके जलवायु निम्नीकरण स्वभाव को न्यूनीकृत भी किया जाना चाहिए। इसके लिए निम्न तकनीकि उपयोगी हो सकती है -  Explain INDC and other technologies
          • लेकिन ये तकनीकियां मानस पटल पर ही रहेगी अगर हम इन्हे जमीं पर उतारने में काबिल नहीं हो सके तो , इसके लिए हमे इनके लिए तकनिकी और वित्त संबंधित जरुरतो की पूर्ति पर ध्यान देना होगा। अब इनके समाधान के लिए हम प्रयासरत तो है ही लेकिन सीमाओं को देखते हुए अधिक व्यवहार्य समाधानों पर विचार करने की जरुरत है। - Affordable and accessible solution
          • वैकल्पिक तकनीकियों के निम्न फायदे हो सकते है - ये निवेश का जरिया बनेगी, लोगो के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे और हरित अर्थव्यवस्था का आधार निर्मित होगा। अन्य फायदे तकनीकी के नवाचार से जुड़े हो सकते है।  
          • वैकल्पिक तकनीकियों के निम्न नुकसान हो सकते है- महँगी होगी , परम्परागत ज्ञान की उपेक्षा होगी या फिर उसके लाभ से वे वंचित रह सकते है। 
          निष्कर्ष : में कहा जा सकता है कि अत भारत को इन तकनीकियों को अपनाने पर ध्यान तो देना ही चाहिए , लेकिन इससे जुड़े सकारत्मक और नकारत्मक मुद्दों पर भी ध्यान दे लेना चाहिए। 

          1.2.एक अच्छा जीवन प्रेम से प्रेरित तथा ज्ञान से संचालित होता है।
          (A good life is one inspired by love and guided by knowledge)

          एक अच्छे जीवन की प्रकृति पर हमेशा विमर्श चलता रहता है। कुछ लोग इसका आंकलन पहले धन के आधार पर करते थे लेकिन हम देखते है कि धन रिश्तो में प्रेम का आभाव बना देता है और जीवन नीरस  या यांत्रिक अधिक प्रतीत होता है, वही गरीब आदमी पारिवारिक प्रेम की बदौलत ख़ुशी से अपना जीवन गुजारता है। लेकिन गरीब आदमी शिक्षा जैसे संसाधनों तक सीमित पहुंच के कारण अपने जीवन की गुणवत्ता को निम्नतर ही रखता है। प्रेम खाने को थोड़ी देता है। इसके लिए तो पैसा चाहिए जो कि ज्ञानार्जन के माध्यम से किए गए कुछ आर्थिक कार्यो पर निर्भर करता है। इसलिए हम देख सकते है की अच्छा जीवन अधिक प्रेम से भी प्रेरित नहीं होता, न ही अधिक ज्ञान से संचालित होता है। इसके लिए सभी गतिविधियों का समायोजन चाहिए। एक दूसरे को समय देना आना चाहिए। धनार्जन भी जरुरी है।  
          • जीवनशैली में प्रेम का महत्व : संतुलित प्रेम और प्रेम की अधिकता बिगड़ देती है और बच्चे कॅरिअर खराब कर लेते है , उसके बाद केवल प्रेम ही अच्छे जीवन का आधार नहीं है। 
          • ज्ञान से संचालित : ज्ञान से जीवन शैली की गुणवत्ता बढ़ती है। वः सही मायने में अच्छे जीवन की तरफ जाता है , लेकिन ज्ञान तर्क पर आधारित होता है जो जीवन को नीरस बना देता है। 
          • संतुलन : अच्छे जीवन के लिए ज्ञान और प्रेम दोनों में संतुलन होना चाहिए। 
          • अच्छे जीवन की लोकप्रिय धारणा और उस पर ये दोनों मानदंड : मानव विकास सूचकांक के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आय। ऐसे में धनार्जन पर ध्यान देना भी जरुरी है। जिसकी बदौलत सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है। 
          निष्कर्ष : अच्छे जीवन का पैमाना विविधता लिए हुए है जो अलग अलग चीजों पर निर्भर करता है. ये दोनों इसका बड़ा हिस्सा है। जिन की उपलब्धता पर हमे ध्यान देना चाहिए।  
          फैक्ट : Happiness index, HDI, Social justice based life

          1.3.कही पर भी गरीबी हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है।
          (Poverty anywhere is a threat to prosperity everywhere)

          आधुनिक सभ्य समाज में असमानता पर प्रश्न काफी दिनों से खड़ा किया जाता रहा है। जिसमे बहुआयामी गरीबी को जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी खत्म करने की बात कहि जाती है। सङ्ग में भी इस चीज के लक्ष्य निर्धारित किए गए है। जिसके लिए सभी देशो की सरकार प्रयासरत है। उसके अलावा कई निजी संस्थाए भी कार्यरत है। इस तरह के बहुआयामी प्रयासों वाले गरीबी के प्रश्न को अलगाव का विषय नहीं मानने की अवधारणा है। यह कही न कही दूसरे क्षेत्रो को भी प्रभावित करती है। 
          • गरीबी कैसे दूसरे क्षेत्रो को प्रभावित करती है - लोकतत्र कमजोर होता है, सही नीतिया नहीं बनती, जिससे शोषण या तो बढ़ता है या फिर सम्बोधित नहीं होता। अर्थव्यवस्था को भी शिथिल करती है , मांग का अभाव, उत्पादन और आगे रोजगारो को प्रेरित नहीं करता है।  सांस्कृतिक तोर पर भी विषमता उत्पन्न होती है जो देश के मूल्यों का विभाजन कर देती है , जिसकी वजह से समान रूप से लोगो का सम्बोधन रुक जाता है। समाज में भी व्यक्तिवाद जल्दी से घर कर जाता है।  संकीर्णतम विचारधाराओ को उर्वर भूमि मिल जाती है। 
          • लेकिन समृद्धि भी गरीबो के लिए मुश्किलें खड़ी करती है। जो आज के हालत में देख सकते है। धनि लोग उनके हको पर कब्जा कर रहे है और अपने नैतिक मूल्यों को ढीला कर रहे है। उन्हें विस्तापित करती है। 
          • उदाहरण जैसे नक्सलियों की गरीबी पुरे देश की सुरक्षा के लिए खतरा है, जिसके बदौलत निवेशकों की आनाकानी इस असुरक्षा को बढाती है।  
          • उठाये जाने वाले कदम- ताकि कोई क्षेत्र गरीब छूटे ही नहीं और अगर रह भी जाए तो उसे कैसे ऊपर लाये। 
          निष्कर्ष : हमारी संस्कृति लोगो को साथ में लेकर चलने की है। कोई पीछे छूट गया तो उसे साथ में लाना चाहिए। आरक्षण इसका उदारहण है। इसके अलावा आमिर लोगो को अपना न्य वर्ग बनाने की बजाय वर्गहीन समाज को बढ़ावा देना चाहिए।

          1.4.  भारत के सीमा विवादों का प्रबंधन - एक जटिल कार्य ।
          (Management of Indian border disputes - a complex task)

          भारत एक बड़ी सीमा रखा का धनी है जो भौगोलिक रूप से समुद्र, रेगिस्तान, पहाड़ ,बर्फ, नदी-नाले, कीचड़ आदि के द्वारा बनती है। इसके अलावा यह सीमा कई देशों के साथ साझा होती है ,जिसमें से अधिकतर के साथ संबंध सही नही रहे है। ऐसे में यह चुनौती और बढ़ जाती है। इस सीमा के प्रबंधन के लिए बहुत सारी सुरक्षा एजेंसी भी कार्यरत है। जिसके कारण इसमें कोर्डिनेशन भी मुद्दा बना रहता है।  अंतरराष्ट्रीय सीमा घुसपैठ, तस्करी, चरमपंथियों के आवागमन  संबंधित मुद्दों से जूझ रही है। वही सैन्य प्रबंधन के लोगो को खराब दशा में कार्य करना पड़ता है। दूसरे देशो के सैन्य दलों के साथ कई बार मुठभेड़ की घटनाए भी होती है। 
          • सीमा विवादों की प्रकृति और उसकी वजह से क्या मुद्दे खड़े होते है। 
          • सीमा विवादों के समाधान क्या हो सकते है - क्षमता निर्माण, अवसंरचना निर्माण। राजनयिक प्रयास 
          • समाधानों की सीमाए क्या है - क्यों ये प्रभावी नहीं हो पा रहे है। 
          • सीमा विवादों का सुलझना अर्थव्यवस्था के हितो में जरुरी है। इसके लिए आगे की राह कैसी होनी चाहिए - न केवल सीमा विवादों का सुलझना चाहिए , बल्कि क्षेत्रीय एकीकरण के लिए कार्यकरना चाहिए। जिसका लाभ सभी को होगा। भारत की अफगानिस्तान तक पहुंच बढ़ेगी।  रक्षा बजट में कमी आएगी। मानव विकास में इजाफा होगा। 
          निष्कर्ष : हम दोस्त बदल सकते है लेकिन पडोसी नहीं।  इसलिए हमे इन संबंधो को सुधारने की बुनियाद सीमा विवादों के समाधान पर ध्यान देना चाहिए। जिससे हम देश के किसी भी हिस्से में होने वाली अनिश्चितताओं को रोक सके। क्षेत्र को आधुनिक मूल्यों की शक्ल दे सके, कब तक औपनिवेशिक विरासत से जूझते रहेंगे। 



          खंड II के निबंधों से संबंधित सही दृष्टिकोण

          2.1.रूढ़िगत नैतिकता आधुनिक जीवन का मार्गदर्शक नहीं हो सकती है।
          (Customary morality can not be a guide to modern life)

          भारतीय समाज विकास के आसमान स्तरो पर रहा है। जिसमे कुछ लोग आधुनिक मूल्यों को जल्दी ही प्राप्त कर लिए और कुछ लोग अभी भी परम्परागत मूल्यों के चिपके हुए है। इसके कारण समाज की गतिशीलता में विसंगति देखी जाती है। आधुनिक मूल्य वालो को प्राचीन वाले बिगड़े हुए मानते है, वही प्राचीन वालो को आधुनिक मूल्य वाले लोग पिछड़े हुए मानते है। अब हमे इसी पर विचार करना है कि वर्तमान आधुनिक जीवन में कोनसे मूल्य सही है और कोनसे गलत।  

          किसी भी समाज, संस्था या देश का संचालन कुछ नियमो के माध्यम से होता है। ये नियम उस समाज के उद्देशो की पूर्ति से जुड़े होते है। हमारा व्यवहार अगर उन नियमो के अनुरूप है जो संगठन के लक्ष्यों की पूर्ति में सहायक है तो हमे नैतिक समझा जाएगा। वही हमारा व्यवहार अगर उन नियमो के अनुरूप नहीं है या संगठन के लक्ष्यों में बाधा बनता है तो हमे अनैतिक समझा जायेगा। जैसे जैसे समय बदलता है, यह नैतिकता बदलती जाती है। स्थान के अनुसार भी यह बदलती है। 
          • आधुनिक समाज की प्रगति में रुकावट बने परंरागत मूल्य :  हमारा समाज आगे बढ़ गया। लेकिन कुछ मूल्य इस समाज को आधुनिक दौड़ में शामिल नहीं करा सके, जिनमे महिलाओ की शिक्षा से संबंधित प्रमुख है।
          • आधुनिक समाज के आधुनिक मूल्यों द्वारा उत्पन्न की गई विसंगति :जैसे महिलाओ को उपभोग की वस्तु मानना। अश्लीलता का प्रचलन 
          • आधुनिक जीवन में पश्चिमी मूल्यों की आवश्यकता : सयंम आधिरत जीवन और जलवायु परिवर्तन 
          निष्कर्ष : अत: हम कह सकते है की परम्परागत मूल्यों के संवर्धन की जरुरत है की उनको नकारने की। भारतीय मूल्यों की जड़े काफी गहरी है इसलिए उन्हें बेकार बताना सही नहीं है। भारतीय मूल्य परिष्कृत होकर समाज को बेहतर दिशा देते है। 

          2.2.अतीत मानवीय चेतना तथा मूल्यों का एक स्थायी आयाम है।
          (The past is a permanent dimension of human consciousness and values)

          मानवीय मूल्य और चेतना हमेशा गतिशील होती है। मानव जिस समाज में रहता है उसके अनुकूल अपने को ढालने के लिए अपने मूल्य विकसित करता है। इन सबके लिए उसे उस क्षेत्र की समझ बहुत सहायता करती है। ऐसे में उस समाज के पास इतिहास का समृध्द अनुभव उसके मूल्यों को बहुत धनवान बना सकता है। उसमे गलती होने के अवसर खत्म हो जाते है। इस प्रकार इतिहास एक आयाम की तरह कार्य करता है। 

          लेकिन इतिहास को हमेशा याद रखना उसके लिए अनिवार्य हो जाता है, वरना पुराणी चीजे फिर से दोहराई जा सकती है। इसलिए इतिहास एक स्थायी आयाम प्रतीत होता है। लेकिन मानव की चेतना भी विकसित होती रहती है। इसलिए वह इतिहास की उपेक्षा करके नवीन रास्ते अपना लेता है। जब वह सफल हो जाता है तो इतिहास के स्थायी आयाम की बात कंडित हो जाती है। 

          निष्कर्ष :  इसलिए मानव चेतना और मूल्यों में इतिहास एक आयाम तो होता है लेकिन स्थायी जैसी कोई चीजे नहीं होती है। क्योकि मानव चेतना स्वतंत्र होती है।

          2.3.जो समाज अपने सिधान्तो के ऊपर अपने विशेषाधिकारों को महत्व देता है, वह दोनों से हाथ धो बैठता है।
          (A people that values its privileges above its principles, loses both is defeated by both of them)

          किसी समुदाय या जगह पर बाउट सारे समाजो का अधिवास होता है। उनमे से कोई समाज वर्चस्वकारी  भूमिका में होता है तो कोई अधीनस्थ की भूमिका मे। ऊपर वाला समाज अपने वर्चस्व की बदौलत कुछ विशेषाधिकारों का उपभोग करता है। इसके लिए वह कुछ सिधान्तो के द्वारा अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करता है। लेकिन समाज गतिशील होता है उसमे स्थापित वर्ग को चुनौती मिलती है और दूसरा वर्ग स्थापित होता है। यह चक्र चलता रहता है। 

          लेकिन बात संतुलन की है किसके सिद्धांत अच्छे थे। इसे हम उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे -
          • ब्राह्मणो ने चतुर्वर्ण के सिद्धांत के आधार पर विशेषाधिकारों का प्रयोग किया, जिसमे व्यक्तिगत हितो केंद्र में रखकर चतुर्वर्ण का सिद्धांत बनाया गया था। आगे विशेषाधिकार भी नहीं रहे और न ही सिद्धांत रहा। अगर सिद्धांत में कुछ पवित्रता होती तो विशेषाधिकारों को चुनौती नहीं मिलती। 
          • अंग्रेजो ने भी सभ्य बनाने के लिए नस्लवाद के सिद्धांत के आधार पर विशेषाधिकारों का उपभोग किया, उनको भी लोगो ने भगा दिया। 
          • यही हाल यूरोप के सामंतो का हुआ था। 
          • लोकतान्त्रिक नेताओ ने लोकतांत्रिक सिद्धांतो के माध्यम से विशेषाधिकार प्राप्त किए। जिन्हे कोई चुनौती नहीं दे पा रहा है क्योकि इनमे सिद्धांतो की प्रमुखता है। यहां पर भी विप कल्चर के बढ़ने पर उसे चुनौती दी जाती है। 
          निष्कर्ष :  इसलिए यहां पर मुद्दा यह है की विशेषाधिकारों का अगर उपभोग करना है तो उनके लिए सिद्धांत नैतिक होने चाहिए, उनमे किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हो ,कोई भी प्रतिभा के आधार पर वहां तक पहुंच सके। लोकतंत्र की महत्ता यह से भी सही सिद्ध हो जाती है।

           2.4.यथार्थ आदर्श के अनुरूप नहीं होता है , बल्कि उसकी पुष्टि करता है।
          (Reality Does not conform to the ideal, but confirms it.)

          हक़ीक़त हम सब जानते है कि आदर्श से कोसो दूर होती है। लेकिन हकीकत की कोशिस हमेशा आदर्श के नजदीक जाने की होती है। मतलब हकीकत की आदर्श की तरफ झुकाव उसकी पुष्टि करता है। इसलिए हम किसी भी उद्देश्य को दिशा देने के लिए एक आदर्श लक्ष्य मन में स्थापित कर लेते है। 
          • लेकिन वर्तमान में आदर्श को मनोरंजन जगत की शक्तिया निर्धारित कर रही है, इस वजह से आदर्श विलासिता वाला होता जा रहा है, वह परम्परागत तरीको की वैकल्पिक विधियों की सरासर उपेक्षा कर रहा है। इसकी वजह से लोगो की निजी जिंदगी खराब होती जा रही है -लोगो में तनाव बढ़ रहा है, अवैध संबंध पनप रहे है, लोग भौतिक चीजों को बसने में लगे हुए है, इन सबका दबाव पर्यावरण पर पद रहा है। 
          • इसलिए आदर्शलोक को हक़ीक़त के पैमाने पर रख करके आंकना चाहिए। मार्क्स आदि भी यूटोपियन माने जाते है। जिन्होंने समाजवाद के नाम पर कई लड़ाई लडवाई, जबकि हक़ीक़त दुनिया पूंजीवाद में ही तलाशती है। आदर्शलोक का अव्यवहारिक होना मनोरंजन जगत में तो चल जाता है। लेकिन उसके आधार पर सिद्धांत जब निजी जिंदगी में दे दिए जाते है तब समस्या खड़ी होती है। 
          • यह सब खराब होमवर्क का नतीजा है। इसलिए मनोरंजन जगत को भी प्रैक्टिकल चीजे दिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। वही उलटे सीधे नियम बनाने वालो को भी आलोचनात्मक समीक्षा के आधार पर परखा जाना चाहिए।
          • लेकिन  यह हमेशा गलत ही नहीं होता। यह सपने दिखता है जिसके आधार पर हम कार्य करते है और अभी की खराब हालत से निकलकर बाहर आने के लिए प्रेरित होते है।  इसका मतलब है कि आदर्श को प्राप्त करने के लिए लोगो को प्लेटफार्म दिए जाने चाहिए।
          निष्कर्ष : आज का आदर्श कल की सामन्य चीज हो सकती है। यह इस पर निर्भर करता है की हम उसे पाने के लिए मेहनत कितनी कर रहे है। इसके लिए हमारे पास संसाधन है या नहीं।

          धन्यवाद 

          Theory of individual interference

          mastram meena blog, theory of individual inteference
          भारतीय संविधान में लोगों के आर्थिक, सामाजिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए नीति निदेशक तत्वों का प्रावधान किया गया है। जिसके अनुसार राज्य लोगो के उत्थान के लिए सक्रिय हस्तक्षेप करता है। हम देखते है की वर्तमान में यह हस्तक्षेप लोगो को राहत ही प्रदान करता है , न की उन्हें उठने का सामर्थ्य देता है। जिस सामर्थ्य के सहारे ये अभावो के चक्र से मुक्त हो सके और फिर अगले आर्थिक स्तर में प्रवेश कर सके। ऐसा करना समाज के निचले तबके के लिए बहुत ही जरुरी है क्योकि उनकी वर्तमान लाचार हालत उनके मानवीय विकास को अवरुद्द करने का पाप करती है। साथ ही उन्हें जन्म दर जन्म एक ही चक्र में घुमाती रहती है। ऐसे लोगो की उपलब्धता प्राइवेट कंपनी को सस्ते श्रमिक प्रदान करने की वजह से अच्छी लग सकती है। लेकिन तकनीकी समृध्द इस युग में दबी कुचली चेतना के लोगो की उपस्थिति खासकर किसी भी संवेदनशील मन को तो अवश्य कचोट रही होती है। ऐसे में जरूरी है कि हम प्रत्येक व्यक्ति की लॉन्चिंग पर आधारित Theory of Individual Interference के सिद्धांत पर विचार करना चाहिए।

          क्या योजना है  (What) : 
          प्रत्येक व्यक्ति को चयनात्मक हस्तक्षेप उपलब्ध कराने के बजाय लॉन्चिंग हस्तक्षेप उपलब्ध कराने चाहिए।  मौजूदा हस्तक्षेप केवल उनकी बेहतरी की बजाय कमतरी को ज्यादा सम्बोधित करते है। यह प्रणाली केवल उन्हें निर्वाह सक्षम उपाय प्रदान करती है। जबकि इससे आगे जाने के लिए किसी बाह्य समर्थन की जरूरत को पूरा किया जाना चाहिए।

          वर्तमान में लॉन्चिंग के लिए हम सरकार के बहुआयामी उपायों  के माध्यम से समर्थ व्यक्ति के आगे आने की उम्मीद करते है। अगर समर्थ व्यक्ति बनाकर आगे लाने के उपाय किए जाए तो स्थिति अलग हो सकती है।

          किस प्रकार (How) :
          अब इसे किस प्रकार क्रियान्वित किया जा सकता है, इस पर भी विचार कर लेते है -
          यूनिवर्सल बेसिक इनकम को पायलट मोड पर शुरू किया जाना चाहिए। यह शुरू में आर्थिक पैमाने पर परिवार आधारित हो सकती है। यह इतनी पर्याप्त हो कि संबंधित आदमी को शिक्षा, स्वस्थ्य जैसे क्षेत्रो में निवेश के लिए समर्थ कर सके।
          उसके बाद मुद्रा योजना का प्रसार किया जा सकता है। इसे मांग आधारित की बजाय अधिकार आधारित बनाया जा सकता है। इसके लिए लाभार्थियों से काम की प्राथमिकता आमंत्रित करके कौशल विकास किया जाए, फिर ट्रायल एंड एरर मेथड पर आधारित गतिविधियों में भेजा जाए। उसकी लगातार तीन साल तक मॉनिटरिंग की जाए, अगर वह लांच हो जाता है तो हमारा मकसद सफल हो जाएगा। अन्यथा बचे हुए लोगो के लिए फिर से प्रयास किए जाएंगे। या फिर उन्हें अधीनस्थता के ढांचे में खपा लिया जाएगा।

          व्यवहार्यता  (Feasibility) : 
          योजना की व्यवहार्यता पूरी तरीके से क्रियान्वित करने योग्य है। मौजूदा समय में लॉन्चिंग की योजना के तोर पर मनरेगा को लिया जा सकता है। लेकिन हम जानते है की मनरेगा अधिकार आधारित से आकड़े भरपाई आधारित हो गई है। अब लॉन्चिंग के लिए दूसरे प्लेटफार्म की आवश्यकता है और प्रत्येक जरूरतमंद को सक्रिय हस्तक्षेप निश्चित तोर पर बेहतर विकल्प होगा।

          नकारात्मक (Negative) :
          इस योजना के नकारत्मक बिंदु यह हो सकते है की आदमी अब ज्यादा निकम्मे हो सकते है। वे संसाधनों का दुरूपयोग कर सकते है। इसके बाद वे अधिक निकम्मे हो सकते है।  जिससे मानव पूंजी की उत्पादकता में कमी हो सकती है।

          परिणाम (Outcomes ):
          इस योजना के परिणाम का आंकलन करे तो यह है कि इसके बाद आदमी की नागरिक गतिविधि अधिक सक्रियता की परिचायक हो जायेगी। इससे अभिशासन और राजनीती की गुणवत्ता में बढ़ोतरी होगी। जिससे आगे भी लोगो में सुधार के मूल्यों का समायोजन होगा।

          खंड II
          अब हम दूसरे सहायक मुद्दों पर विचार करते है। जो इस कदम की सार्थकता को सिध्द करने में मददगार होंगे।

          1. समाजवाद की अवधारणा आज के युग में 
          समाजवाद की अवधारणा आज के युग में पहले से ज्यादा मायने रखती है। भले ही १९ वि सदी से जीवन स्तर में सुधार हुआ है जिस कारण सम्पतियो का विषम वितरण दृष्टिगोचर नहीं होता है। वर्तमान में यह खाई बढ़ती जा रही है। आदमी आदमी को गुलाम बनाने की हालत पहले भी थी और आज भी वह संवर्द्धित हुई है , जिससे अनुमान लगा सकते है कि इस समय पर भी समाजवाद पूरी तरीके से प्रासंगिक है। 


          लेकिन इसके उद्देश्यों को किस प्रकार प्राप्त किया जाए, यह असली चुनौती है। इसके लिए हमे निचले लोगो को मौजूदा हालत में राहत आधारित समर्थनों से आगे जाकर उन्हें अगले स्तर पर लांच करना होगा। तब जाकर वे भी अगली कक्षाओं में दोड़ने के लिए समर्थ हो सकेंगे।  वरना वे अपने मौजूदा चक्र में ही वे घूमते रहेंगे।

          2. विकास अधिकार या फिर भाग्य के रूप में 
          मौजूदा समय में विकास के जो अवसर उपलब्ध है, उनका वितरण असमान रूप से है। जो नए प्रवेशार्थी  है अगर वे इन विकास अवसरों के पास में है तो वे भी लाभदायक स्थिति में होंगे। वही जो लोग दूरस्थ क्षेत्रो में है उनको इन विकल्पों की उपलब्धता प्राप्त नहीं हो सकेगी। ऐसे में एक बात सामने आती है कि विकास तक पहुँच कोई अधिकार की बात नहीं होकर के भाग्य की बात होती है। अगर विकास के भाग्य रूपी स्वरूप को बदलना है तो दूरस्थ क्षेत्रो को भी लॉन्चिंग करनी होगी।

          3. सभी कार्यो को करने की सुगमता 
          अगर हम लॉन्चिंग ड्राइव शुरू करना चाह रहे है तो हमे निम्न वर्ग के लिए उत्थान के कार्यक्रमों की क्रियान्वयन रुकावटों को न्यून करना होगा। यह एक तरीके से व्यापार की सुगमता के समान होगा। लेकिन इसके क्षेत्र भिन्न होंगे और उनके लिए सुगमता के पैरामीटर भी भिन्न प्रकार के ही होंगे। जिनकी सबसे पहले तो हमे पहचान करनी होगी। उसके बाद उन्हें आसान बनाने के प्रयासों को लागू करना होगा।

          4. दूसरे क्षेत्रो की भागीदारी 
          दूसरे क्षेत्रो की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। जिसके तहत हम कॉर्पोरेट की सामाजिक जिम्मेदारी, अकेडमिक सामाजिक जिम्मेदारी, सोसाइटी की सामाजिक जिम्मेदारी जैसे नवाचारी प्रयासों की मदद लेनी होगी। इससे यह कार्य एक आंदोलन की शक्ल लेगा। जिससे सभी प्रयासों की प्रभावशीलता में इजाफा होगा और हम उद्देश्य के अधिक करीब पहुंचेंगे।

          निष्कर्ष :
          भारतीय संस्कृति सर्वे भवन्तु सुखिनः की रही है। जिसमे सभी लोगो के सुखी होने के आदर्श को स्थापित किया गया है।  इसलिए हमे सरकारी रवैये में भी कष्ट निवारण  से कष्ट उन्मूलन की तरफ बढ़ना होगा। इस कार्य के लिए सरकार को अपनी जिम्मेदारी को एक योजना के लागू करने से बढाकर विभिन्न योजनाओ के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।