How Ages Care Each Other


Recently I stayed three days at Divisional Railway Hospital, vadodara for my medical examination to the ASM post. The report of check up takes time so During this I got much time to earn lot of observation about the care of different ages by their patronage age apart from hospital. The scary pattern I observed was about the care of elderly.

The following category are considering inside this article:
1. Care of Elderly by youngsters
2. Care of young by Elders 
3. Mutual Care of Elders

अधिकतर बुजुर्ग चलने, सुनने के सहायक उपकरणों से जूझ रहे थे। उनके साथ मे कोई भी वयस्क सदस्य नही था, ज्यादातर छोटे बच्चों के भरोसे थे।



कुछ उदाहरणो का मै यहाँ पर जिक्र करना चाहूंगा ताकि मुद्दे को स्पष्ट किया जा सके-

1. वैसे तो अस्पताल कर्मचारी बहुत ही हार्दिक व्यवहारशील थे, लेकिन दो-तीन बार मे उनके निर्देशो को ग्रहण नही करने पर बुजुर्गों के साथ काफी रूखेपन से पेश आ रहे थे। एक आदमी जोकि आंखों की समस्या के लिए आया था उसे श्रवण सम्बंधित समस्या भी थी, तो जाहिर है वह उनके निर्देशो की गलत वाख्या ग्रहण कर गया होगा। उसे मेरे सामने धक्के मारकर ओर बहरेपन पर ताना मारकर बाहर कर दिया। यह दृश्य बहुत ही व्यतीत करने वाला था।

-कहने का मतलब है कि बुढ़ापे में एक से ज्यादा समस्या एक साथ रहती है, एक का इलाज करवाओ तो दूसरी भी साथ मे तैयार रहती है। साथ ही ये समस्याए आदमी को घर और बाहर के धक्के खाने के लिए मजबूर कर देती है।

2. While our test were running in PME Hall, we were waiting outside for our turn. OPD was in front of us so most of the patients also moving from there.
एक औरत अपनी सास को पीछे छोड़कर आगे-आगे चली जा रही थी। जबकि उसकी सास बहुत ही तकलीफ से चल रही थी, वह अपने एक हाथ मे अपने पेशाब की थैली को संभाले हुए थी और दूसरे से चलने की बैशाखी को। इस समय जरूरी था कि वह उसको चलने में सहायता के लिए उसके साथ चलती। लेकिन वह एक बूढ़ी औरत के साथ चलकर अपने स्टेटस को डाउन नही करना चाहती थी।
- सीधी सी बात है भाई बुढ़ापे में आदमी साफ-सुथरा तो रहेगा नही, दिखने में भी पहले वाली बात नही होगी, हो सकता है उन्हें पेशाब की नली भी लग जाये। ऐसे में कोई भी युवा अपने को उनके साथ दिखाकर अपनी काल्पनिक छवि को खराब नही करना चाहता। ऐसी मानसिकता यहाँ काम करती है।

3. A girl who was with her grandfather, sit nearly our bench . The boys of our group putting some grass to her so to reply them she continuously blush like an complete idiot.Same time she was ignoring the old man's things, Even he took a bottle and pointed to water but she ignored it.
तब हमारे एक लड़के से रहा नही गया, वह पानी लेकर आया और उस लड़की को फटकार लगाई की "फिर किस लिए आई हो यहाँ पर, ये काम तो बाहर ही बहुत कर लेना।" उसके बाद सारे समय वह हमसे नजरें चुराती रही।
कहने का मतलब है बुढ़ापे में आदमी हर एक चीज को लेकर उपेक्षा झेलता है। चाहे बड़े हो या बच्चे, घर की बात हो या उसकी देखभाल की। आदमी को यह स्वीकार करने में बहुत समय लगता है कि कल के बच्चे आज उसका लिहाज ही नही कर रहे है। आदमी के हाथ से सत्ता निकलती है तो उसे पचाने में समय लगता है।बुजुर्गो के लिए यह बहुत तकलीफ भरा समय होता है।

But at the same time the other side of the picture also available completly opposite which i observed there .
एक लड़की स्कूटी से अपना पैर कुचलवा बैठी थी। उसके पिताजी उसे अपने पारिवारिक चुटकलों को सुनाकर यह अहसास दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि मानो कुछ हुआ ही नही हो। कहने का मतलब है कि बड़े लोग छोटे लोगो को यह अहसास भी नही होने देते की तुम गलत थे, वे बस देखभाल करते है। वही छोटे लोग बुजुर्गो को अहसास करवाते रहते है कि हम तुम पर अहसान कर रहे है, अन्यथा तो तुम बोझ ही हो।

I don't want to become a judge here who decide what is wrong with youngsters, i know, they have their own priorities. But I wants to put a effort of Administrative approach to mitigate the problem.

मुझे लगता है कि जब हमारे हाथ-पांव और दिमाग काम करता है तो उसे हम दुनिया भर के कामकाजों में लगा देते है। हम कभी सोचते भी नही है कि एक दुनिया हमे हमारे लिए भी बनाकर रखनी चाहिए जहां हम उम्र का आखिरी पड़ाव गरिमामय पूर्ण तरीके से गुजार सके, ओर अंत मे हम सम्मानजनक तरीके से दुनिया से विदा हो सके। ऐसी तैयारी हमे पहले से करके रखनी चाहिए।

यह कितना मुश्किल होता होगा न कि किसी आदमी ने जिंदगी पूरी खुद्दारी और स्वाभिमान के साथ गुजारी हो और बुढापे में किसी वजह से वह आश्रित हो जाये और उसे ताने सुनने पड़े, उपेक्षा झेलनी पड़ी, अपमानित होना पड़े। मुझे लगता है इनसे बचने की तैयारी हमे पहले से ही कर देनी चाहिए।

एक उदाहरण हम वैज्ञानिक सी वी रमन का लेते है वे जानते थे कि अपने शर्तो से समझौते करके वृद्धावस्था नही काट पाएंगे तो उन्होंने रिटायर होने से पहले ही रमन अकादमी बनवा ली ताकि बाकी की उम्र को वहां गुजारा जा सके। इसलिए हमे भी सामुदायिक तौर पर विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे संस्थानों की भारी मात्रा में स्थापना की जानी चाहिए जहां पर समान हित और रुचियों वाले बुजुर्ग लोग मिल जुल सके और युवा भी उनके माध्यम से उनके अनुभवों से लाभान्वित हो सके।

(#बुजुर्गो के जीवन को बेहतर करने के लिए आपसे भी सुझाव आमंत्रित है। इस लेख को कुछ सुझाव इकट्ठे होने पर मै फिर से सम्पादित करना चाहूंगा।)

अंत मे जाते-जाते मै एक और बात कहना चाहूंगा कि अपना जीवनसाथी ही बुढ़ापे में सबसे बड़ा देखभाली (caretaker) होता है, भले ही वह भी आपकी तरह ही असहाय क्यों न हो, बाकी तो औपचारिकता पूरी करते है। अनुभव से हासिल की गई बात है ये 

प्रशासक के तौर पर मोदीजी से क्या सीखे

वैसे तो एक प्रशासक राजनीतिक रूप से निष्पक्ष होता है और उसके पास अनुभव और ज्ञान ही इतना होता है कि वह पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सोच सकता है और वह इसी तरीके से कार्य करता भी है। उसके लिए सभी दल एक जैसे होते है और वह किसी भी दल या समूह के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ नही होता है। वही प्रधानमंत्री मोदीजी राजनीतिक कौशल में तो महारत रखते ही है  लेकिन प्रशासक के तौर पर अपने कामकाज को इस तरह से अंजाम दिया है कि वे भविष्य के अफसरों के लिए कुछ पदचिन्ह छोड़ जाते है।
उनके कार्य करने की शैली अनूठी है जिसे हम निम्न बिन्दुओ के माध्यम से समझ सकते है-



1. खुद की कमियों के बजाय खुद की क्षमताओं पर भरोसा

  • खुद की भाषा, संस्कृति पर गौरव की भावना होनी चाहिए, न कि शर्म और हो सके तो उन्हें दूसरे लोगो मे भी विस्तारित करना चाहिए। मोदीजी ने विदेशी मंचो पर भी हिंदी का धड़ल्ले से प्रयोग किया, भारतीय वेशभूषा को अपनाया, योग के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करवाया।
  • कभी भी नकारात्मक राजनीति को नही अपनाना चाहिए। जब 2014 के चुनाव हो रहे थे तो केजरीवाल ने यह फैलाया की देश तो बिकने वाला है, कुछ दिनों बाद आपको देश नही मिलेगा। ऐसा कहकर निराशा फैलाने की कोशिश की। मोदीजी ने उसी समय कहा कि देश विकास कर रहा है और बहुत जल्दी अच्छे दिन आने वाले है। लोगों को आशा पसन्द आयी।

2. सही समय का इंतजार करो, धैर्य रखो तब तक।

  • अगर आप कुछ बड़ा करना चाहते हो तो बीच मे हो-हल्ला मत करो, सही समय का इंतजार करो। वरना ईर्ष्या, द्वेष वाले लोग तुम्हे हतोत्साहित करेंगे और तुम उनसे निपटने में ही अपनी ऊर्जा गवां दोगे। यह भी हो सकता है फिर लोग आप जो करना चाहते  है वहाँ से पहले ही रोक दे।
  • टी.एन. शेषन ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त बनने पर सुधारो को सख्ती से लागू किया था। उससे पहले तो सभी नेता उसे सीधा-साधा अफसर ही मानते थे। और नेताओं को पता लग जाता कि यह इतना कड़क अफसर निकलेगा तो वे उसे कभी चुनाव आयुक्त नही बनाते।

3. अपनी खुद की प्राथमिकताओ के लिए काम करो, चाहे कोई नाराज हो या फिर विरोध करे।
-मोदीजी ने कई प्रोजेक्ट अपनी मर्जी से निर्धारित किए, विपक्षी दलों ने खूब आलोचना की, लेकिन उन पर कोई फर्क नही पड़ा। उन्होंने अधिकतर प्रोजेक्ट में गुजरात को फायदा पहुचाया। इसलिए अपने प्राधिकार का प्रयोग अपने लोगो को उठाने के लिए जरूर करो। वरना कल को लोग कहेंगे कि खुद तो अफसर बन गया लेकिन भाई तो गांव में ही घूम रहे है।

4. लोगो से जुड़ने की क्षमता।

  • लोगो से बात करने के अधिकतम प्रयास किये जाने चाहिए। ध्यान रहे केवल सकारात्मक वार्तालापों का ही हिस्सा बने, डिबेट में कभी नही उलझना चाहिए (bcoz debates exchange negative energy)। मन की बात इसी तरह का प्रयास है।
  • मोदीजी मे उच्च स्तर की भावनात्मक बुद्धिमत्ता है। उनमें किसी भी आदमी से बात करने की क्षमता है, वे बच्चों से बच्चों की तरह, युवाओ से युवाओ की तरह, अन्य लोगों से भी उनकी जगह पर खुद को मानकर बात करना।
  • विपक्षियों से भी सकारात्मक तरीके से बात करना, उनसे समर्थन और सुझाव मांगना, चाय पे आमंत्रित करना आदि।मतलब औपचारिक शिष्टाचार कायम रखना चाहिए, विरोध के बावजूद भी।

5. बुनियादी समस्याओ को पहचान करने की क्षमता है कि आखिरकार गड़बड़ क्या है और उसे सही कैसे किया जा सकता है।
यह क्षमता गवर्नेन्स में बहुत ही ज्यादा मायने रखती है, इनसे हम योजनाबध्द तरीके से आगे बढ़ सकते है, जैसे कि स्वच्छ भारत योजना, उदय और उज्जवल स्कीम आदि।
अगर यह क्षमता हमारे पास नही होगी तो पॉलिसी पैरालिसिस की समस्या उत्पन्न हो जाएगी।

6.योजनाओ को जमीन पर उतारने की प्रतिबध्दता है, भले ही लोगो को परेशानी हो सकती है, परन्तु यह तनिक समस्या आगे के समय और आगे की पीढ़ी के लिए सुविधा बन जाएगी, यह सोच होनी चाहिए।
- स्वच्छ भारत मिशन में लोगो को शौचालय बनवाने के लिए मजबूर किया गया, विरोध से बचने के लिए अनुदान की व्यवस्था की। लोगो के पास पानी तक कि व्यवस्था नही थी फिर भी बनवाने पड़े। नोटबन्दी में लोगो की परेशानी की कीमत पर प्रतिबद्धता दर्शाई गई।

7.मौजूद अव्यवस्थाओ को समाप्त करने या कम करने के लिए लोगो को भरोसे में लेने की क्षमता।

  • गैस सब्सिडी को खत्म करने के लिए लोगो को राजी किया कि बड़ा दिल दिखाओ और give up करो। इसी पैसे से गांवो में चूल्हे की धूणी से मुक्ति दिलाएंगे। अगर बिना give it up campaign के सब्सिडी खत्म की जाती तो पक्की बात है कि हो-हल्ला होता।
  • हालांकि भूमि अधिग्रहण बिल पर किसानों को भरोसे में नही ले सके तो उन्होंने हार मान लेने में भी कोई आनाकानी नही की।

8. किसी क्षेत्र पर फोकस करने के लिए, दूसरे क्षेत्रों को भी प्रयोग करो।
- मोदीजी का पूरा जोर इंडस्ट्रियल/मैनुफैक्चरिंग के विकास पर रहा तो हर विभाग के कामो को इंडस्ट्रियल-फ्रेंडली बना दिया।
यह सबसे बड़ी चीज है, अगर किसी को किसी विशेष क्षेत्र में कोई वादा पूरा करना हो तो उसे इसी तरीके से पूरा करना चाहिए। सारी कायनात को उसी मकसद की पूर्ति के लिए लगाना पड़ता है।

9. योजनाओ और कार्यक्रमो का प्रचार।
-मोदीजी आसान से आसान भाषा मे हर स्कीम के बारे में लोगो को किसी न किसी प्लेटफार्म के माध्यम से अवगत करा देते है। कह सकते है कि प्रधानमंत्री खुद अपनी योजनाओ के ब्रांड अम्बेसडर है।

10. तकनीकी के प्रयोग को सुशासन का जरिया बनाना चाहते है। प्रशासकों को नवीन उपायों के प्रति सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए।

मोदीजी की प्रशासक के तौर पर तारीफ की विदेशी अखबार भी कर चुके है। प्रशासनिक सुधारो के मामले में मोदीजी के प्रयास शेरशाह शूरी की याद दिला देते है, जो अपने  एक छोटे से कार्यकाल में दिल्ली सल्तनत के सारे प्रशासनिक विकासक्रमो को संगठित कर देता है। उसी प्रकार कांग्रेस के दौरान जो भी प्रशासनिक प्रगति हुई थी, मोदीजी भी उसी को संगठित और परिष्कृत कर रहे है। साथ ही उभरते भारत की जटिलताओं के लिए प्रशासनिक तैयारियों में लगे हुए है।

खेती में शारीरिक जोखिम

खेतीं के कामकाजों में गम्भीर शारीरिक जोखिम निहित रहती है। ये जोखिम कृषि कार्यों के दौरान लापरवाही बरतने, कृषि यंत्रों के संचालन में कौशल के अभाव या कई प्रकार की दुर्घटनाओं के कारण होती है। जिनके कारण लोग शारीरिक अंगो को या तो विकृत कर लेते हैं या जान से ही हाथ धो बैठते है। इसके अलावा मेहनत भी अकुशल तरीके से करने के कारण सेहत पर भी कुप्रभाव पड़ता है। ऐसा लगता है कि लोग इसे मजबूरी ज्यादा और एक पेशा कम समझते है।

गांवो में लोग खेतीबाड़ी के कामो में दिन-रात कठीन परिश्रम करते है और फिर उसके अनुरूप   पोषण नही प्राप्त करते है। इस तरह की जीवन शैली के लंबे समय तक चलने से उनके शारीरिक ढांचे में बदलाव आ जाता है। जो लोग मजदूरी करते है वे भारी भरकम सामान उठाने के कारण कमर से झुक जाते है। इस वजह से वे युवावस्था के उत्तरार्द्ध से ही वृध्दों के समान लगने लग जाते है। अकुशल तरीके से की जाने वाली मेहनत उनके शरीर को निचोड़ लेती है। इससे उनकी रोग प्रतिरोधकता पर भी असर पड़ता है जिसके कारण वे बुढ़ापे के दिन बीमारियों के साथ व्यतीत करते है।

कृषि कार्यो के दौरान भी कई ऐसी घटनाएं होती है जो गम्भीर शारीरिक नुकसान पहुचाती है। जो कि इस प्रकार है-
  1. धूल और धुंए सम्बंधित कई कामकाज ऐसे होते है जो सांस व त्वचा की बीमारियों को जन्म देते है जैसे कि थ्रेशिंग कार्य। त्वचा सम्बंधित बीमारी अक़्सर बच्चों में ज्यादा देखने को मिलती है, इनमे फोड़े, खाज-खुजली, एलर्जी आदि शामिल है।
  2. गांवो में बरसात के पानी के निकास की सही व्यवस्था नही होती है, ऐसे में गंदे जल से बार-बार निकलने के कारण पैरो में खारवा नामक समस्या लोगो को होती है। पांवो के फटने की समस्या भी अधिकतर महिलाएं और पुरुषों में देखी जाती है। कई लोगो के तो हाथ की धारियां ही मिट गई है, जिसके कारण उन्हें बॉयोमेट्रिक प्रमाणीकरण में दिक्कत होती है ।
  3. कई जानलेवा चीजे भी खेतीं के कार्य मे निहित होती है। कई बार लोग फसल कटाई या चारा काटते समय अपने अंगो को क्षतिग्रस्त करवा बैठते है। मशीनों से कइयों की अंगुली कट जाती है तो कइयों के हाथ या पैर, कई बार तो थ्रेशिंग मशीनों से लोगो तक के मरने तक कि खबर सुनने में आती है।
  4. रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग के सही तरीको से अज्ञानता के कारण भी समस्या उत्पन होती है। लोग उन्हें सीधे हाथ मे ले लेते है और फिर हाथ सही से साफ नही करते है। उन्हें छिड़कते समय भी मुह को ढककर नही रखते है। जिसके कारण साँस लेने में समस्या होती है और कई प्रकार की त्वचा सम्बंधित एलर्जी उत्पन हो जाती है।
  5. फसली कामकाज के दौरान जहरीले कीड़ो का भी खतरा रहता है। सांप, बिच्छू जैसे जीव खेतो में घूमते रहते है। घास में ये दिखते तो है नही और जब गलती से हाथ-पैर लग जाता है तो ये काट लेते है। इनके उपचार के लिए भी स्थानीय स्तर पर कोई चिकित्सकीय व्यवस्था नही होती है। लोग झाड़फूंक के भरोसे रह जाते है।
  6. विधुत लाइनो की क्षतिग्रस्तता भी किसानों के लिए जानलेवा बन रही है। खंभो और तारो का सरकार द्वारा समय पर रखरखाव नही किया जाता है, जिससे वे कभी भी टूटकर खेतो में गिर जाते है। ऐसे में अंधेरे-उजाले खेतो में जाने वाले किसानों को करंट लग जाता है। उच्च वोल्टेज के उतरने पर भी विधुत उपकरणों की वजह से करंट आ जाता है।
  7. लोगो को शारीरिक नुकसान पहुंचाने में आपसी झगड़ो का भी योगदान रहता है। वे खेतो की मेड़बंदी, मेड़ो पर स्थित पोधो के स्वामित्व को लेकर, पशुओं के दुसरो के खेतों में जाने को लेकर आपस मे लड़ पड़ते है। इन बातों पर वे लाठी या धारदार हथियारों का प्रयोग करते है जिससे सामने वाले के या तो हाथपैर तोड़ दिये जाते है या काट दिये जाते है, कई बार तो जान भी चली जाती है।
उपाय
कृषि कार्य के दौरान होने वाली शारीरिक जोखिमों को कम करने के लिए वैसे तो सबसे बड़ा उपाय सावधानी बरतना है फिर भी निम्न उपाय किए जाने चाहिए--
  1. साँस व त्वचा सम्बंधित समस्याओं का कारण धूल और धुंए में कार्य है। इसलिए किसानों को ऐसी पध्दतियों से अवगत कराने की जरूरत है जो स्वच्छ तरीके से करे जा सकते हो। गंदे जल की निकसीं की व्यवस्था की जाए ताकि उसमे बार-बार घूमने की जरूरत नही पड़े।
  2. कृषि उपकरणों को चलाने का प्रशिक्षण दिया जाए , बिना जानकारी के अभाव में मशीनों से अपने हाथपैर कटवा लेते है। मशीनों की डिज़ाइन भी इस तरीके से की जाए कि वे लापरवाही और असावधानी की दशा में नुकसान दायक साबित नही हो।
  3. रासायनिक पदार्थो को प्रयोग करने के सही तरीको के बारे में किसानों को अवगत कराया जाए। हाथ मे दस्ताने लगाने और मुंह ढकने की सलाह दी जाए।
  4. जहरीले कीड़ो के काटते ही आदमी और उसके आसपास के लोग अपना आपा खो देते है। जल्दबाजी में वे कोई उचित कदम नही उठा पाते है। पहले तो उन्हें प्राथमिक चिकित्सा के बारे में अवगत कराया जाए और फिर स्थानीय चिकित्सालय में पहुचाया जाए। जहर-रोधी दवाएं गांवो के स्तर तक भी उपलब्ध होनी चाहिए।
  5. करंट लगने की दशा में भी प्राथमिक उपचार से लोगो को अवगत कराया जाए। इसके अलावा तारो की समय-समय पर देखरेख की जानी चाहिए। तारो की लाइनो को खेतों के बीच से होकर कम से कम निकाला जाए।
  6. लोगो को आपसी झगड़ो के समाधान में भी कम आक्रामक रहने की सलाह दी जाए। छोटी-मोटी लड़ाइयों में शरीर को नुकसान पहुंचाने को कभी भी सही नही कहा जा सकता।

निष्कर्ष
इस प्रकार खेतीं के कार्य को कम जोखिमयुक्त बनाया जा सकता है। ग्रामीणों को कौशल प्रशिक्षण और तकनीकी साहचर्यता से परिचित कराकर इन समस्याओं के समाधान ढूंढना चाहिए।
कोई भी ऐसी आजीविका सही नही मानी जा सकती जिसमे शारीरिक नुकसान शामिल हो। कृषि को भी एक आरामदायक पेशा बनाया जाना चाहिए जिसे तकनीकी उपकरणों और पध्दतियों के माध्यम से सुनिश्चित किया जाए।

इतिहास के साथ हमारी असुविधा

भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है जिसका एक विस्तृत इतिहास रहा है। इन इतिहास के पन्नो में तमाम उतार-चढ़ाव भरे पड़े है, इनमे जीत और हार, सम्मान और अपमान, वीरता और कायरता के असंख्य उदाहरण भरे पड़े है। इन उदाहरणो के माध्यम से कुछ लोग आज भी गर्व महसूस करते है और अपनी महिमा का बखान करते है। वही कई उदाहरणो के द्वारा कुछ लोग शर्मिंदगी महसूस करते है और वे नही चाहते कि किसी भी कहानी, फ़िल्म, किताब या अन्य माध्यमों के द्वारा वे यादे ताजा हो। एक तरीके से ये लोग इतिहास को अपनी सुविधा के अनुकूल नही मानते है।

भारतीय इतिहास का मूल्यांकन करे तो इसमे सुविधाओं और असुविधाओं के तमाम उदाहरण भरे पड़े है। सुविधाओं के तौर पर हम जीत, सम्मान, वीरता के किस्से याद करते है। जैसे महाराणा प्रताप ने अकबर के आगे जीवनपर्यंत समर्पण नही किया तो इस बात से राजपूत गर्व महसूस करते है और अपनी वीरता को सबके सामने रखते है। मराठा भी शिवाजी के कौशल का बखान करने में सुविधा महसूस करते है। मुस्लिम भी मूक रूप से इस बात में गर्व करते है कि उन्होंने इस देश पर लंबे समय तक शासन किया था। इसके अलावा तमाम धर्मो और जातियों के लोग भी कई आयामो पर सुविधा देखते है, जैसे सिक्खों, जाटो ने औरंगजेब का प्रतिकार किया।

लेकिन समस्या इतिहास से जुड़ी हुई असुविधाओं को लेकर है। जिनके कारण सम्बंधित वर्ग का आदमी सार्वजनिक विमर्शों में आत्मविश्वास को कमजोर महसूस करता है।कोई भी दूसरे वर्ग का आदमी उनको इतिहास याद दिलाकर अपमानित कर देता है। उनकी भूमिका को भी वे लोग हल्के में ले लेते है जिनका कोई दागरहित या समृद्ध इतिहास रहा होता है। उदाहरण के लिए - मुगलों के साथ वैवाहिक गठबंधन की नीति के कारण राजपूत अब असुविधा महसूस करते है। उनकी महिलाओं पर आधारित अब कोई भी रचनाये उनकी भावनाओं को दुख पहुचाती है।
यहां पर समय-समय पर बाहरी तत्वों का आगमन होता रहा जिन्होंने स्थानीय तत्वों का दमन किया। विदेशियों के द्वारा आक्रमण किया गया, लुटपाट मचाई गई, संसाधनों का दोहन किया गया और स्त्रियों के सम्मान को क्षति पहुचाई गई। ये सब ज्यादतियां विदेशियों द्वारा ही नही की गई अपितु स्थानीय स्तर पर भी हुई।एक वर्ग के लोगो द्वारा दूसरे वर्ग के लोगो को उत्पीड़ित किया गया, दूसरे क्षेत्र के लोगो का दमन किया गया और वहां के संसाधनों का दोहन किया गया। प्राचीन काल मे ग्रीक और मध्य एशिया की लड़ाकू जनजातियों ने, मध्य काल मे अरब व तुर्को द्वारा तथा आधुनिक काल मे अंग्रेजों द्वारा स्थानीय तत्वों के सम्मान को क्षति पहुचाई। वही स्थानीय शासको द्वारा भी आदिवासियों व दलितों के साथ अत्याचार किया गया, मुस्लिम शासकों के काल में हिन्दू कुलीन भी प्रताड़ित किए गए। ब्रिटिश काल मे सभी भारतीयों को नस्लीय आधार पर अपमानित और वंचित किया गया। ये सब मोटे-मोटे उदाहरण है जिनके आधार पर हम ऐतिहासिक किताबो और फिल्मो को देखते हुए असुविधा महसूस करते है।

इन असुविधाओं के स्वरूप को हम और ढंग से समझ सकते है---

  1. प्राचीन काल मे दलितों व आदिवासियों का उच्च वर्गो के द्वारा शोषण किया गया। अब प्राचीन काल का इतिहास पढ़ेंगे तो दलितों के मन मे यह बात बैठेगी ही कि हमारा भूतकाल अगरिमामय रहा है।
  2. मध्य काल मे मुस्लिम शासकों के अधीन हिन्दू जनता की भावनाओ को तवज्जों नही मिली और कई जगह अपमानजनक समझौते भी करने पड़े। इस काल के इतिहास को लेकर मुस्लिम और हिन्दू दोनो असुविधा महसूस करते है। मुस्लिम यह कह नही सकते कि फलां मुस्लिम शासक हमारा आदर्श है, अगर ऐसा किया तो बहुसंख्यक लोगो के सामने उनकी निष्ठा तक पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। हिन्दू इसलिए असुविधाग्रस्त है कि उनके पास इस काल के बुरे अनुभव है, उनके राजवंशो को खत्म किया गया, स्त्रियों के सम्मान को चोट पहुचाई गयी, औरतो को जोहर करना पड़ा, उन्हें जबरदस्ती हरमो में डाल दिया गया।
  3. ब्रिटिश काल मे भारतीयों को नस्लीय आधार पर वंचित और अपमानित किया गया था। लेकिन इन सब को भारतीयों ने राष्टवादी आंदोलन का जरिया बना लिया। इसलिए यहां का इतिहास भारत से ज्यादा ब्रिटिश को असुविधा ग्रस्त करता है क्योंकि उनके आधुनिक मूल्य खोखले साबित होते है।


राजनीतिक असुविधा सम्बन्धित उदाहरण
टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ो का जीवनपर्यंत विरोध किया और उन्हें खदेड़ने की सोची, इसलिए कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने उसकी जयंती मनाई। वही भाजपा ने उसे हिन्दू विरोधी बताते हुए इसका विरोध किया। एक तरीके से यह भाजपा की असुविधा को दर्शा रहा है। बंगाल में टीटू मीर की अंग्रेज़ो के खिलाप बगावत की कहानी की पाठ्यक्रम में जगह देने को भी भाजपा ने इसी आधार पर विरोध किया। भाजपा की एक और सबसे बड़ी असुविधा इस तथ्य को लेकर है कि स्वतन्त्रता संग्राम में इनका कोई योगदान नही है।

मुस्लिम, दलितों, आदिवासी सभी को कुछ न कुछ आश्वासन देकर कांग्रेस ने इन सबकी असुविधाओ को भुना लिया । अब भाजपा ने भी इन असुविधाओ को भुनाने के लिए स्वतंत्रता के बाद के इतिहास को पकड़ा है। इन्होंने कहा है कि नेहरू के कारण अन्य नेताओ की उपेक्षा कर दी गयी, जैसे कि- सरदार पटेल, अम्बेडकर, सुभाष चन्द्र बोस आदि। फिर इन्होंने उन सबको अपने खेमे में पकड़ लिया। इसके अलावा अपनी धर्मनिरपेक्ष अंधता के कारण हिन्दुओ की भावनाओं की हुई अनदेखी को भी कांग्रेस की गलती माना है। यहां से कांग्रेस को असुविधा हुई है। हाल में इंदु सरकार को लेकर कांग्रेस का विरोध भी इंदिरा गांधी के काल की असुविधाओ को लेकर था। इस कारण दोनों पार्टियां इतिहास के प्रति संवेदनशील हो गयी है।


असुविधाओं का असर

  1. राजनीतिक तौर पर ऐतिहासिक असुविधाओ की संवेदनशीलता अधिक होती है। दरअसल चुनाव उम्मीदवार की प्रतिष्ठा के नाम पर लड़े जाते है जिसमे उसके अतीत को भी शामिल किया हुआ होता है। ऐसे में कोई भी उम्मीदवार या दल नही चाहता कि कोई भी फ़िल्म, गाना, किताब व नाटक उसके अतीत की याद दिलाकर उनकी छवि को न्यून करके दिखाए। इन्हें रोकने के लिए भावनाओ को ठेस पहुचाने का आरोप लगाकर अभिव्यक्ति की आज़ादी तक को सीमित कर दिया जाता है। यही कारण था कि पद्मावती पर बनने वाली फिल्म के विरोध में पूरे राजपूत नेता खड़े हो गए,  भाजपा ने भी इन्हें समर्थन दिया।
  2.  कई वर्ग अपनी ऐतिहासिक असुविधाओं से बचने के लिए इतिहास की ही दोबारा व्याख्या पर जोर दे रहे है। कई राज्यों की सरकारों ने इतिहास के पाठ्यक्रमो में बदलाव किया है। वे इतिहास की मनमर्जी से व्याख्या करके खुद को सुविधा में रख रहे है। जैसे कहा जा रहा है कि दलितों की खराब दशा प्राचीन काल मे न होकर मुस्लिम शासकों के समय हुई है। यह नया तथ्य उच्च वर्गों के प्रभुत्व वाली भाजपा के फायदे के अनुकूल है। इस प्रकार अन्य तथ्यों को भी विभिन्न वर्ग अपने फायदे के अनुकूल पुनर्परिभाषित कर रहे है।
  3. इन असुविधाओ का फायदा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा भी उठाया जा रहा है। पहले वे  ऐतिहासिक कमजोरिया पर बनने वाली फिल्मों, किताबो को वित्तीय समर्थन प्रदान करते है। इसके बाद जब स्थानीय वर्गो का अपनी चीजो के प्रति विश्वास कम हो जाता है, तब वे अपने उत्पादों को श्रेष्ठ विकल्पों के तौर पर लेकर आ जाते है। 

आगे क्या किया जाना चाहिए ?
हमने देखा कि इतिहास से जुड़ी हुई असुविधाएं एक तरफ तो भावनाओ को ठेस पहुचाती है, वही उनके कलात्मक प्रदर्शन का विरोध रचनात्मक कला के सृजन को तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकता है। ऐसे में हमारे सामने निम्न विकल्प है-

  1. अगर हम भावनाओ को ठेस पहुंचाने के आधार पर असुविधाओं से सम्बंधित रचनात्मक कार्यो को रोकेंगे तो कोई भी ऐतिहासिक फ़िल्म बन ही नही पायेगी। मान लो राजपूतो की हार की कहानियों से उनकी भावनाओं को ठेस पहुचती है लेकिन उन्होंने जो वीरता हासिल की है वह भी तो जनजातीय और दलितों के उत्पीड़न पर आधारित है। कहने का मतलब है कि एक वर्ग के लिए सकारात्मक चीज दुसरो के लिए नकारात्मक है।ऐसे में जरूरी है कि हम इतिहास के बुरे प्रसंगों को सभी के लिए बुरे अनुभव माने। इस प्रकार की मानसिकता का निर्माण जरूरी है।
  2. फिल्मो की फंडिंग में पारदर्शिता को बढ़ावा दिया जाए । हो सकता है कोई बाहरी तत्व जान बूझकर ही असुविधाओ को भड़का रहा हो या हीन साबित कर रहा हो।
  3. राजनेताओं को भी इतिहास सम्बन्धित छेड़छाड़ करने से बचना चाहिए। अनावश्यक पाठ्यक्रम में बदलाव से बचे।


निष्कर्ष
असुविधाओ को हमे व्यक्तिगत तौर पर ज्यादा नही लेना चाहिए क्योंकि हमें कई बार उस काल की परिस्थितियों का पता नही होता है। हो सकता है उस काल मे उन चीजों में कोई गलत रहा ही नही हो। जैसे वैवाहिक गठबंधन राजपूतो में ही नही विदेशो में भी खूब प्रचलन में था।
और अच्छा-बुरा कुछ नही होता, इतिहास इसी का नाम होता है। कोई भी काल कभी भी ऐसा नही होता जो सभी की सुविधाओं के अनुकूल हो। इसलिए असुविधा को इतिहास में नही राजनीति में तलाशा जाना चाहिए

ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धजनों की देखभाल

वैसे तो बुढापा सभी लोगो के लिए चुनोतियाँ भरा होता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों की देखभाल में गम्भीर मुश्किलें शामिल होती है। गांवो में बुढापा ज्यादा दिन इंतजार नही करता है। 

गांवो में लोग खेती-बाड़ी और मजदूरी के कामकाज इतनी कड़ी मेहनत से करते है कि उनका शरीर जल्दी ही जवाब दे जाता है। वे अपनी युवावस्था के उत्तरार्द्ध से ही वृद्धावस्था की ओर चले जाते है।  युवावस्था में होने वाले कई शारिरिक विकारों को आर्थिक तंगी के कारण टालते रहते है, कई बार चोटिल हो जाते है, ये सभी समस्याएं बुढापे में फिर उभरकर आती है। इस तरह गांवो में वृद्धावस्था बीमारियों के साथ चलती है।

परिवारों की आर्थिक तंगी का असर भी वृध्दों की देखभाल के दौरान देखने को मिलता है। एक तो उनको होने वाली गम्भीर स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज नही हो पाता, दूसरा उनके अनुसार खानपान की व्यवस्था भी नही हो पाती है। साथ ही आर्थिक तंगी के कारण उनके पुत्र भी उनका भार अपने ऊपर लेने से कतराते है और वे एक दूसरे के ऊपर डालने के चक्कर मे बुजुर्गों की भावनाओं की पूर्णतः उपेक्षा कर देते है। कई बार बुजुर्गों को भी इस खींचतान में प्रताड़ित कर दिया जाता है।

कई सामाजिक योजनाओ का हस्तक्षेप बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में अग्रसर है। वृद्धावस्था पेंशन के माध्यम से बुजुर्गों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सक्षम बनाया जा रहा है। कानूनी अमलीजामा भी बच्चों को वृध्दों की देखभाल के लिए प्रेरित कर रहा है। इसके साथ ही वृध्दों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए स्वास्थ्य केंद्रों को विशेष रूप से निर्देशित किया गया है। मेडिकल टीम साप्ताहिक रूप से होम विजिट करके वृद्धजनों की स्वास्थ्य समस्याओं को बेहतर तरीके से जान सकती

लेकिन बुजुर्गों की सुभेदयता काफी अधिक होती है जिसमे अकेलापन, लाचारी, अवसाद, उत्पीड़न जैसी अवस्थाएं शामिल होती है। पारिवारिक समर्थन जैसे तन्त्रो का तेजी से ह्रास हो रहा है। ऐसे में बुजुर्गों के लिए गांवो में भी बुनियादी संरचना स्थापित करने की आवश्यकता है। बालको और महिलाओं के लिए आंगनबाडी केंद्रों की तर्ज पर बुजुर्गों को भी कुछ दिनों की अवधि में सम्भालने के लिए कोई व्यवस्था होनी चाहिए। उनकी नियमित जांच की व्यवस्था हो।

निष्कर्ष
गांवो में सरकारी और सामाजिक पहलों में बुजुर्गों को जगह देकर उनसे अनुभव प्राप्ति को जारी रखा जा सकता है। बुजुर्गों को बोझ न समझकर बेहतर मार्गदर्शक बनाया जा सकता है। अगर बुजुर्ग स्वास्थ्य और शारीरिक रूप से ठीक रहेंगे तो वे खुद ही उत्पादक कार्यो में लगे रहेंगे। इस प्रकार हमे हमारी वरिष्ठ जनसांख्यकी के महत्व को समझना चाहिए।