समावेशी विकास का अप्राप्य उद्देश्य


आजकल, समावेशी विकास का लक्ष्य हमारी सरकारों की प्राथमिकता बन गया हैं। और इसको मीडिया में मिले कवरेज से ये शब्द इतना लोकप्रिय हो गया हैं की इसे ज्यादातर सभी लोग जान गए हैं।  इस बार मैंने दूसरे पहलुओ पर भी गौर किया और चिंतन किया की क्या समावेशी विकास के उद्देश्य को  प्राप्त किया जा सकता हैं, या फिर ये एक योजनागत शब्दावली बना रह जाएगा और बुद्धिजीवी लोगो के लिए एक बहस का माध्यम बनकर रह जाएगा ।

समावेशी विकास 
समावेशी विकास का सीधा मतलब ऐसा विकास होना चाहिए जो समानता की और ले जाए  जो  की समाजवाद की याद दिलाता हैं और यह  उदारीकरण के इस दौर में  अप्रासंगिक हो गया हैं। पर हम समावेशी विकास का नाम अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के विकास के नाम पर करते हैं तो हम इस अवधारणा से मुह कैसे मोड़ सकते हैं।
हम कुछ आर्थिक आकड़ो पर गौर करते हैं। आर्थिक सर्वे का अध्यन करने पर हम पाते हैं की देश की अधिकांश जनसँख्या जो कृषि पर निर्भर हैं की जीडीपी में भागीदारी केवल 13 प्रतिशत हैं और इस पर देश की 65प्रतिशत जनसँख्या निर्भर हैं , इस प्रकार हम कह सकते हैं की पैसठ प्रतिशत जनसँख्या के पास केवल देश के 13 प्रतिशत संसाधन हैं। असमानता का पहला कारण तो यही से समझ आता हैं।और शेष बची जनसँख्या के पास ही देश के 85 प्रतिशत संसाधनो का कब्ज़ा हैं। उनमे भी माना जाता हैं की टॉप के5 प्रतिशत लोग ही उनकी 95 प्रतिशत संसाधनो की हकदारी रखते हैं , इन सब के बाद हम यह भली भाति अंदाज़ा लगा सकते हैं की हमारे नीति-निर्माता किस प्रकार के समावेशी विकास की बात कर रहे हैं।

इस प्रकार हमने देखा की समावेशी विकास का तात्पर्य कदापि भी आर्थिक या सामाजिक समानता नही हैं। इसका मतलब केवल सबको उन विकल्पों तक पहुँच प्रदान करना हैं जिनसे की कथित तौर पर विकास  के रास्ते पर चला जा सकता हैं। इसमें यह भी तय नही हैं की उन विकल्पों की गुणवत्ता कैसी हैं। इसे हम इस तरीके से देख सकते हैं की सरकार समावेशी विकास के नाम पर वो सुविधाये प्रदान करेगी जो लोगो की शिक्षा , स्वास्थय, कौशल विकास आदि पर जोर देती हैं।

नागरिको की भूमिका 
समावेशी विकास के समबन्ध में हम नागरिको की भूमिका पर आते हैं,  जो लोग कृषि क्षेत्र से तालुक रखते हैं, हम उनकी जीडीपी में कम भागीदारी से देख चुके हैं की उनकी प्रति व्यक्ति आय उन लोगो से कम हैं  जो की उद्योग या  फिर सर्विस क्षेत्र में लगे  हुए हैं।
साथ ही हमारे आर्थिक सर्वेक्षण के नतीजे  यह रुझान दे रहे  हैं की इसमें और कमी होने की सम्भावना हैं, इस तरह मान सकते हैं की काफी लोग बहुत ही कम आय के साथ गुजारा कर रहे हैं उनकी संख्या में इजाफा होने वाला हैं।
अब हम आते हैं माध्यम वर्ग पर जो किसी ना किसी माध्यम से एक निशिचित आय प्राप्त कर रहा हैं इस वर्ग को अगर सरकार से सामाजिक सुरक्षा नही मिले तो इसकी हालत भी निम्न वर्ग की तरह ही हैं यह वर्ग सामाजिक तौर पर जागरूक रहने के कारण सभी सरकारी पहलो से लाभान्वित होने की क्षमता रखता हैं

आय और समावेशी विकास
हम नागरिको की भूमिका देख चुके हैं की उनकी आय उनके द्वारा तय गए कार्यक्षेत्र पर निर्भर हैं। और हम ने ये भी निष्कर्ष निकला था की अधिकतर लोगो की आय कम हैं। अब हम बात करते हैं  इस    अधिकतर जनसँख्या के जीवनयापन की

इन्हे अपनी इस छोटी आय में से इस महंगाई के जमाने में अपनी दैनिक जरुरत की चीजे जुटानी पड़ती हैं, यहां पर एक और विडंबना हैं की कृषि उत्पादों की कीमत  बढ़ती नही हैं इसलिए  उनकी आय वही हैं और उनके पास महंगाई के कारण कम पैसे ही बचते हैं। इस प्रकार यह तय हैं की उनकी क्रय शक्ति बढ़ने के बजाय काम हो रही हैं  और ना ही वे गुणवत्ता वाली शिक्षा, चिकित्सा व्यवस्था प्राप्त कर रहे हैं इस प्रकार हम कह सकते हैं की कृषि पर लोगो की निर्भरता रखकर समावेशी विकास के मकसद को कभी भी प्राप्त नही किया जा सकेगा

समावेशी विकास की अवधारणा की आवश्यकता

आजकल समावेशी विकास समाचार पत्रों में एक प्रमुख शब्द बना हुआ हैं ,हालांकि इसकी प्रसिद्धि केवल अखबारों की वजह से न होकर, बल्कि नीति निर्माताओ द्वारा इस पर दिए जा रहे जोर के कारण हैं। पूरा राजनितिक वर्ग भी इस  पर  ध्यान दे रहा हैं, जिसका अंदाज़ा हम 'आम आदमी' और 'सबका साथ, सबका विकास' जैसे प्रभावित करने वाले स्लोगनों से लगा सकते हैं।

भारत में समावेशी विकास की अवधारण कोई नई नहीं है। प्राचीन धर्म ग्रन्थों का यदि अवलोकन करें, तो उनमें भी सभी लोगों को सात लेकर चलने का भाव निहित है। सर्वे भवन्तु सुखिन में भी सबको साथ लेकर चलने का ही भाव निहित है, लेकिन नब्बे के दशक से उदारीकरण की प्रक्रिया के प्रारम्भ होने से यह शब्द नए रूप में प्रचलन में आया, क्योंकि उदारीकरण के दौर में वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को भी आपस में निकट से जुड़ने का मौका मिला और अब यह अवधारणा देश और प्रान्त से बाहर निकलकर वैश्विक सन्दर्भ में भी प्रासंगिक बन गई है। सरकार द्वारा घोषित कल्याणकारी योजनाओं में इस समावेशी विकास पर विशेष बल दिया गया और 12वीं पंचवर्षीय योजना 2012-17 का तो सारा जोर एक प्रकार से त्वरित, समावेशी और सतत् विकास के लक्ष्य हासिल करने पर है, ताकि 8 फीसद की विकास दर हासिल की जा सके।

क्या है समावेशी विकास?

समान अवसरों के साथ विकास करना ही समावेशी विकास है। दूसरे शब्दों में ऐसा विकास जो न केवल नए आर्थिक अवसरों को पैदा करे, बल्कि समाज के सभी वर्गो के लिए सृजित ऐसे अवसरों की समान पहुंच को सुनिश्चित भी करे हम उस विकास को समावेशी विकास कह सकते हैं। जब यह समाज के सभी सदस्यों की इसमें भागीदारी और योगदान को सुनिश्चित करता है। विकास की इस प्रक्रिया का आधार समानता है। जिसमें लोगों की परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा जाता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि समावेशी विकास में जनसंख्या के सभी वर्गो के लिए बुनियादी सुविधाओं यानी आवास, भोजन, पेयजल, शिक्षा, कौशल, विकास, स्वास्थ्य के साथ-साथ एक गरिमामय जीवन जीने के लिए आजीविका के साधनों की सुपुर्दगी भी करना है, परन्तु ऐसा करते समय पर्यावरण संरक्षण पर भी हमें पूरी तरह ध्यान देना होगा, क्योंकि पर्यावरण की कीमत पर किया गया विकास न तो टिकाऊ होता है और न समावेशी ही वस्तुपरक दृटि से समावेशी विकास उस स्थिति को इंगित करता है। जहां सकल घरेलू उत्पाद की उच्च संवृद्धि दर प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की उच्च संवृद्धि दर में परिलक्षित हो तथा आय एवं धन के वितरण की असमानताओं में कमी आए।

समावेशी विकास की दशा और दिशा

आजादी के 65 वर्ष बीत जाने के बाद भी देश की एक चौथाई से अधिक आबादी अभी भी गरीब है और उसे जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसी स्थिति में भारत में समावेशी विकास की अवधारणा सही मायने में जमीनी धरातल पर नहीं उतर पाई है। ऐसा भी नहीं है कि इन छह दशकों में सरकार द्वारा इस दिशा में प्रयास नहीं किए गए केन्द्र तथा राज्य स्तर पर लोगों की गरीबी दूर करने हेतु अनेक कार्यक्रम बने, परन्तु उचित अनुश्रवण के अभाव में इन कार्यक्रमों से आशानुरूप परिणाम नहीं मिले और कहीं तो ये कार्यक्रम पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। यही नहीं, जो योजनाएं केन्द्र तथा राज्यों के संयुक्त वित्त पोषण से संचालित की जानी थीं, वे भी कई राज्यों की आर्थिक स्थिति ठीक न होने या फिर निहित राजनीतिक स्वार्थो की वजह से कार्यान्वित नहीं की जा सकीं।

समावेशी  विकास ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों के संतुलित विकास पर निर्भर करता है। इसे समावेशी विकास की पहली शर्त के रूप में भी देखा जा सकता है। वर्तमान में हालांकि मनरेगा जैसी और भी कई रोजगारपरक योजनाएं प्रभावी हैं और कुछ हद तक लोगों को सहायता भी मिली है, परन्तु इसे आजीविका का स्थायी साधन नहीं कहा जा सकता, जबकि ग्रामीणों के लिए एक स्थायी तथा दीर्घकालिका रोजगार की जरूरत है। अब तक का अनुभव यही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सिवाय कृषि के अलावा रोजगार के अन्य वैकल्पिक साधनों का सृजन ही नहीं हो सका, भले ही विगत तीन दशकों में रोजगार सृजन की कई योजनाएं क्यों न चलाई गई हों। सके अलावा गांवों में ढ़ांचागत विकास भी उपेक्षित रहा फलतःगांवों से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन होता रहा और शहरों की ओर लोग उन्मुख होते रहे। इससे शहरों में मलिन बस्तियों की संख्या बढ़ती गई तथा अधिकांश शहर जनसंख्या के बढ़ते दबाव को वहन कर पाने में असमर्थ ही हैं। यह कैसी विडम्बना है कि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहीं जाने वाली कृषि अर्थव्यवस्था निरन्तर कमजोर होती गई और वीरान होते गए, तो दूसरी ओर शहरों में बेतरतीब शहरीकरण को बल मिला और शहरों में आधारभूत सुविधाएं चरमराई यही नहीं रोजी-रोटी के अभाव में शहरों में अपराधों की बढ़ ई है।

वास्तविकता यह है कि भारत का कोई राज्य ऐसा नहीं है जहां कृषि क्षेत्र से इतर वैकल्पिक रोजगार के साधन पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हों, परन्तु मूल प्रश्न उन अवसरों के दोहन का है सरकार को कृषि में भिनव प्रयोगों के साथ उत्पादन में बढ़ोतरी सहित नकदी फसलों पर भी ध्यान केन्द्रित करना होगा। यहां पंचायतीराज संस्थाओं के साथ जिला स्तर पर कार्यरत् कृषि अनुसंधान संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है जो किसानों से सम्पर्क कर कृषि उपज बढ़ाने की दिशा में पहल करे तथा उनके समक्ष आने वाली दिक्कतों का समाधान भी खोजे तभी कृषि विकास का इंजन बन सकती है। कृषि के बाद सम्बद्ध राज्य में मौजूद घरेलू तथा कुटीर उद्योगों के साथ पर्यटन पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। सरकार को आर्थिक सुधारों के साथ-साथ कल्याणकारी योजनाओं जैसे मनरेगा, सब्सिडी का नकद अन्तरण आदि पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

भारत की विकास दर, जो वर्ष 2012-13 में पांच फीसद है, वह पिछले दस वर्षो में सबसे कम है वर्ष 2013-14 की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है भारतीय रिजर्व बैंक ने विकास दर की सम्भावना को घटाकर 5.5 कर दिया है। वर्ष 2002-03 में विकास दर चार फीसद थी, लेकिन उस समय भयंकर सूखे की वजह से ऐसा हुआ था, लेकिन इस बार ऐसी कोई बात नहीं है। समावेशी विकास हेतु श्रम बहुल विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देना ही होगा। यदि विकास दर में 8-9 फीसद प्रतिवर्ष चाहते हैं, तो विनिर्माण क्षेत्र को 14-15 फीसद प्रतिवर्ष की दर से सतत् आधार पर विकास करना होगा। जापान,कोरिया तथा चीन में विनिर्माण क्षेत्र की स्थिति देखें, तो यह संघ के संघटक रूप में भारत की तुलना में काफी अच्छी है।

चीन में जहां यह 42 फीसद, दक्षिण कोरिया में 30 फीसद तो भारत में मात्र 16 फीसद है। कुच समय पहले घोषित राष्ट्रीय विनिर्माण नीति एनएमपी का उद्देश्य भारत में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को 2021-22 तक 16 फीसद से बढ़ाकर 25 फीसद करना और अतिरिक्त 100 मिलियन रोजगार अवसर प्रदान करना है इस हेतु भारत के प्राचीनतम श्रम कानून में जो विश्व में सबसे ज्यादा सख्त है, संशोधन करना होगा, ताकि वे कामगारों की सुरक्षा के उनकी रोजी-रोटी को भी बचा सके पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिण क्षेत्रों के समर्पित माल ढुलाई गलियारा डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर्स का त्वरित कार्यान्वयन करना होगा। स्मरम रहे कि इसमें दक्षता विकास के जरिए जॉब प्रशिक्षण की व्यवस्था है। जारी…  

समावेशी विकास से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उम्मीदों की सच्चाई


आजादी के 65 वर्ष बीत जाने के बाद भी देश की एक चौथाई से अधिक आबादी अभी भी गरीब है और उसे जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसी स्थिति में भारत में समावेशी विकास की अवधारणा सही मायने में जमीनी धरातल पर नहीं उतर पाई है। ऐसा भी नहीं है कि इन छह दशकों में सरकार द्वारा इस दिशा में प्रयास नहीं किए गए केन्द्र तथा राज्य स्तर पर लोगों की गरीबी दूर करने हेतु अनेक कार्यक्रम बने, परन्तु उचित अनुश्रवण के अभाव में इन कार्यक्रमों से आशानुरूप परिणाम नहीं मिले और कहीं तो ये कार्यक्रम पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। यही नहीं, जो योजनाएं केन्द्र तथा राज्यों के संयुक्त वित्त पोषण से संचालित की जानी थीं, वे भी कई राज्यों की आर्थिक स्थिति ठीक न होने या फिर निहित राजनीतिक स्वार्थो की वजह से कार्यान्वित नहीं की जा सकीं।

समावेशी  विकास ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों के संतुलित विकास पर निर्भर करता है। इसे समावेशी विकास की पहली शर्त के रूप में भी देखा जा सकता है। वर्तमान में हालांकि मनरेगा जैसी और भी कई रोजगारपरक योजनाएं प्रभावी हैं और कुछ हद तक लोगों को सहायता भी मिली है, परन्तु इसे आजीविका का स्थायी साधन नहीं कहा जा सकता, जबकि ग्रामीणों के लिए एक स्थायी तथा दीर्घकालिका रोजगार की जरूरत है। अब तक का अनुभव यही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सिवाय कृषि के अलावा रोजगार के अन्य वैकल्पिक साधनों का सृजन ही नहीं हो सका, भले ही विगत तीन दशकों में रोजगार सृजन की कई योजनाएं क्यों न चलाई गई हों। सके अलावा गांवों में ढ़ांचागत विकास भी उपेक्षित रहा फलतःगांवों से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन होता रहा और शहरों की ओर लोग उन्मुख होते रहे। इससे शहरों में मलिन बस्तियों की संख्या बढ़ती गई तथा अधिकांश शहर जनसंख्या के बढ़ते दबाव को वहन कर पाने में असमर्थ ही हैं। यह कैसी विडम्बना है कि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहीं जाने वाली कृषि अर्थव्यवस्था निरन्तर कमजोर होती गई और वीरान होते गए, तो दूसरी ओर शहरों में बेतरतीब शहरीकरण को बल मिला और शहरों में आधारभूत सुविधाएं चरमराई यही नहीं रोजी-रोटी के अभाव में शहरों में अपराधों की बढ़ ई है।


ग्रामीण क्षेत्र में समावेशी विकास से जो उम्मीद 

ग्रामीण क्षेत्र में समावेशी विकास से जो उम्मीद की जाती हैं उनको हम इस तरीके से देख सकते हैं-
1. शिक्षा
कई गाँवो तक अब सरकारी स्कूल पहुँच चुके हैं। अब शायद ही कोई बदनसीब गांव होगा जहां पर कोई स्कूल नही होगा। समावेशी विकास के तहत उम्मीद की गयी थी की बच्चे पढ़ेंगे लिखेंगे तो आगे बढ़ेंगे और अपने पैरो पर खड़े होंगे। 
परन्तु हम स्कूलों की संख्या से खुश नही रह सकते हमे इनकी गुणवत्ता को जानने का रुख करना ही होगा। इस दौरान हम पाते हैं की मिड डे मिल या फिर सर्व शिक्षा अभियान ने स्कूलों से ड्रॉपआउट करने वालो की संख्या में कमी कराइ हो पर हम उनके और एक सभ्य वर्ग के उसी लेवल के  बच्चो की तुलना करने पर पाते हैं की दोनों के बीच एक बहुत बढ़ी खाई हैं। 

एक बच्चा पब्लिक स्कूल में बिलकुल ही अलग क्वालिटी का अध्यन कर रहा हैं दूसरी और एक बच्चा गांव के स्कूल में पढाई के नाम की टाइमपास कर रहा हैं। यहां तक की दोनों की शिक्षा का माध्यम भी अलग-अलग हैं,  हम इस सम्बन्ध में आगे नही बढ़ेंगे परन्तु हम यह निष्कर्ष जरूर निकालेंगे की अगर आप समावेशी विकास की बात कर रहे हो तो वह अलग अलग प्रकार की शिक्षा अलग-अलग तरह की सुविधाओ के साथ प्रदान करके किस प्रकार प्राप्त करोगे। 

2. चिकित्सा 
कई गांव इस मामले में खुशनसीब  हैं की उनके वहां पर कोई न कोई  चिकत्सीय इकाई मौजूद हैं। वरना अभी भी अधिकांश गाँवो के लोग अपने इलाज के लिए निकटवर्ती कस्बे या शहर का रुख करते हैं।
अगर गांव में कोई प्राथमिक केंद्र हैं भी तो वो भी अपने आप में  एक समस्या हैं क्यूंकि अगर नही  होता  तो  लोग यह सोचकर सब्र कर लेते की उनको ऐसी सुविधा मिली ही नही हैं परन्तु अब वे  समय पर नही खुलने,  समय पर कम्पाउण्डर/डॉक्टर नही आने, प्राइवेट क्लिनिक चलाने जैसी समस्याओ से जूझ रहे हैं। 
समय पर चिकित्सा सुविधा नही मिल पाने के कारण कई दुर्घटनाऍ भी होती हैं। हालांकि कई राज्य सरकारों ने जिला मुख्यालयों पर 108 एम्बुलेंस सर्विस शुरू की हैं , जो ग्रामीण स्तर पर मौजूद नही सुविधाओ की कमी को विकल्प प्रदान करती हैं ,जो भी अपनी कम संख्या और अन्य कठिनाइयों के कारण सही विकल्प नही बन पाया हैं। 

सबसे संवेदनशील समस्या प्रसूताओं की मानी जा सकती हैं वो इन सबके अभाव में पारम्परिक तरीको पर ही निर्भर रहती हैं। और असहनीय दर्द को सहती हैं। 


3. सड़क 
ये गाँवो को दूसरे माध्यमो से जोड़ने का साधन हैं। अगर गांव शहर या फिर कस्बे से अच्छी तरीके से जुड़ा हुआ होगा तो वहां के लोग मुख्यधारा से जुड़ पाएंगे। जो समावेशी विकास की दिशा में ही प्रयास होगा। ग्रामवासियो को शहर पहुँचने में सुविधा होगी तो वे अपने कृषि उत्पादों  को आसानी से बाज़ार तक पहुंचा सकेंगे और अपनी आवश्यकता की चीजे भी खरीद सकेंगे।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की बदौलत अब सभी गाँवो को बहुमासिक संपर्क सुविधा प्राप्त हो रही हैं। कुछ गांव अभी भी इससे वंचित हैं , तथा कई जगहों पर तो ऐसे निर्माण किये गए हैं जो निर्धारित आवश्यकताओं की पूर्ति बहुत ही  काम मात्रा में करते हैं।
अब सम्पर्को के साथ -साथ गतिशील सम्पर्कसाधनो की भी आवश्यकता महशूस हो रही हैं। इस दिशा में होने वाली प्रगति की अगर गति तीव्र कर दी जाए तो यह संतोषजनक साबित हो सकती हैं।

4.पेयजल
गाँवो को पेयजल की आपूर्ति की व्यवस्था करना भी एक चुनौती हैं। गाँवो में नलकूपों के माध्यम से नलो या टंकियों की व्यवस्था की गयी हैं। गाँवो में पहले पीने के पानी  का  साधन कुए हुआ करते थे।   परन्तु पानी के लगातार निचे होते स्तर के कारण ये अब अप्रासंगिक हो गए हैं।  हैंडपंप जैसे माध्यम गाँवो में पानी की पूर्ति में सहायक हो रहे हैं।

5. सिंचाई 
गाँवो की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर हैं और कृषि, मानसूनी जलवायु होने के कारण सिंचाई पर निर्भर हैं। गाँवो में खेती के लिए पहले कई प्राकृतिक साधनो से पानी मिलता था परन्तु अब वे सब संशाधन जलवायु परिवर्तन या अन्य कारणों से इस लायक नही रहे हैं। इन सबका नतीजा किसान को उत्पादन में भुगतना पड़ रहा हैं। जिस कारण उसकी आय में कमी आ रही हैं। साथ ही महंगाई में वृद्धि के कारण उस पर वित्तीय भर बढ़ता जा रहा हैं और किसानो की आत्महत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं।

5. आवास 
गाँवो में जीवनयापन का सदन केवल कृषि होती हैं ,वर्तमान बढ़ती हुई महंगाई के कारण कृषि की उत्पादन लागत में वृद्धि हुई हैं जिससे   उनके फायदे में कमी हुई हैं और साथ ही उनके खर्चे भी काफी अधिक होते हैं  इस कारण उनके पास गुजारा करने के अलावा आय का स्त्रोत नही होता हैं।  ऐसी हालत में उनके घर निर्माण के कम ही अवसर होते हैं। 
गाँवो में बड़े किसानो को अगर छोड़ दिया जाए तो सबी छोटे किसानो की यही हालत हैं। पक्के मकानो के अभाव में उनको सर्दी ,बरसात और गर्मियों में काफी परेशानी उठानी पड़ती हैं। 
आवास के लिए सरकार की योजनाओ के लिए योगतया मानक बहुत ही अव्यवहारिक हैं। आवास के अभाव में गांव के लोग फिर शौचालयों का भी निर्माण नही करते और फिर खुले में जाकर गंदगी फैलाते हैं और बीमारियो को न्यूता देते हैं।

6. सामाजिक सुरक्षा 
सामाजिक सुरक्षा भी समावेशी विकाश का ही भाग हैं। समावेशी विकाश के लिए सामाजिक सुरक्षा की सूनिशिचतता एक जरुरी आवश्यकता हैं। जब भी  समाजिक सुरक्षा की बात होती हैं तो उसमे केवल उन्ही पक्षों का अध्यन किया जाता हैं जोकि उनको प्रभावित नही कर पाते हैं उसका अध्यन शहरी या ग्रामीण तौर पर नही किया जाता।

गाँवो में हम सबसे पहले वृद्धजनों की बात करते हैं तो हम देखते हैं की इस अनुत्पादक उम्र में बड़े-बूढो को काफी धक्के खाने पड़ते हैं जो ज्यादातर उसके परिवारजनो में बेटे या बहुओ के द्वारा होते हैं।
वहां पर कोई ऐसा माध्यम भी नही होता जसके कारण वे अपना जी बहला सके। साथ ही वित्तीय तौर पर भी सुदृढ़ नही होने के कारण उनको अपमानजनक हालत से गुजरना पड़ता हैं। गाँवो में प्रचार प्रसार के अभाव में वे सरकारी पेंशन जैसी चीजो से भी वंचित रह जाते हैं।

महिलाओ से संबंधित मामले गाँवो में बहुत सामने आते हैं एक तो उनसे दिनभर काम करवाया जाता हैं और फिर छोटी-छोटी गलतियों पर पीटा जाता हैं। कई बार उन्हें घर से निकाल दिया जाता हैं ,उन्हें खाना नही दिया जाता और दहेज़ जैसी चीजो के लिए तंग किया जाता हैं। गांव में औरते ज्यादातर अशिक्षित होती हैं और वे अपने शोषण को पहचान नही पाती हैं। गाँवो में जो महिला शोषण के जो तरीके सामने आते हैं वो बहुत ही जघन्य श्रेणी के होते हैं जैसे की - आग लगाकर मार डालना , कुए में लटका देना , ट्रैन से कट जाना , फंदे से झूल जाना आदि ऐसे ही उदहारण हैं।

बच्चो को भी गाँवो में सामजिक सुरक्षा नही मिल पाती हैं। उनको छोटी उम्र में ही कृषि या फिर कमाने के कार्यो में लगा दिया जाता हैं। उनकी शिक्षा जैसी चीजो की कोई परवाह नही की जाती ,साथ ही उनको खेलने तक भी नही दिया जाता , यह कहकर की खेलकूद ठाले लोगो के काम हैं। इस प्रकार बच्चो को सर्वांगीण विकास करने से वंचित कर दिया जाता हैं। कई बच्चे उचित देखभाल के अभाव में कुपोषण के शिकार हो जाते हैं।



इस प्रकार हम देख सकते हैं की समावेशी विकास के ग्रामीण व्यवस्था के सम्बन्ध में चुनौतियां बिलकुल ही अलग हैं ,और उनका अलग तरीके से ही समाधान जरुरी हैं। 

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की आवश्यकता

ग्रामीण क्षेत्रो में आजीविका के साधन के तौर पर कृषि प्रमुख साधन रहा हैं। कृषि लोगो को खाद्यान्न भी उपलब्ध करता हैं और रोजगार भी। वर्तमान में रोजगार के सेवा और उद्योग जैसे क्षेत्र खुलने से पहले कृषि और शिल्प ही  रोजगार क्षेत्रक हुआ करते थे,  तब किसी परिवार में कितने भी सदस्य हो वे सभी कृषि में हाथ बटा सकते थे। धीरे-धीरे गाँवो के लोगो का भौतिक विकास हुआ और उन्हें अधिक आय  की जरुरत पड़ी। तब कृषि कार्य में लगे अतिरिक्त लोगो में  छिपी बेरोजगारी दृष्टिगोचर होने लगी। तकनीकी विकास ने इस चीज को दृश्य बनाया की कम लोग काम करे या ज्यादा लोग काम करे उत्पादन तो उतना ही होगा। बढ़ती हुई महंगाई ने भी कृषि को अलाभदायक पेशा बनाया, छोटे किसानों की तो लागत भी उत्पादन में नहीं निकल पाती थी , दूसरे खर्चो का बोझ कृषि के भरोसे नहीं उठाया जा सकता था । अब गांव के लोगो ने दूसरे वैकल्पिक साधनो की तलाश शुरू की। कई लोग रोजगार की तलाश में शहरो की तरफ पलायन करने लगे। सरकार ने भी शहरो पर बढ़ते दबाव को रोकने के लिए गाँवो में रोजगार के लिए मनरेगा जैसी योजनाए चलाई।

महंगाई आधारित माहौल में कृषि से लोगो का मोह हट रहा था वही बड़े किसानों को महंगाई ने ही एक अन्य रास्ता पकड़ाया और वह था -बागवानी खेती, नकदी फसल, मात्सियकी, मधुमक्खी पालन और अन्य अधीनस्थ गतिविधियों को अपनाना। दरअसल इन सभी गतिविधियों के लिए एक तो काफी मात्रा में निवेश की जरुरत पड़ती हैं वही इनके लिए अतिरिक्त भूमि भी प्रयुक्त होती हैं , इस कारण बड़े किसान ही इनको अपना पाते हैं। इनसे होने वाली आमदनी भी अधिक होती हैं जो महंगाई के जमाने में कृषि के औचित्य को साबित करने के लिए आवश्यक होती हैं।

मनरेगा भी गांव के लोगो को रोजगार प्रदान करने का अच्छा सरकारी माध्यम था। जिसके माध्यम से एक तो लोगो का शहरो की और पलायन रुका  वही उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार की प्राप्ति हुई। लेकिन धीरे धीरे मनरेगा में भी वह क्षमता नहीं थी जो गाँवो की बेरोजगारी को दूर कर सके।  एक तो काम के लिए बजट में कटौती हुई  जिससे लोगो के काम के दिनों को काम कर दिया गया और साथ में मजदूरी को भी। इसका असर यह हुआ की गाँवो से पलायन को फिर से बल मिला।

जो लोग कृषि से परे रोजगार की तलाश में हैं उनको स्थानीय स्तर पर रोजगार की प्राप्ति हो , यह बात अब महत्वपूर्ण हो गयी हैं। इस दिशा में सरकारी नीति प्रोत्साहन बेहतर कार्य कर सकते हैं जो हाल ही के दिनों में काफी लोकप्रिय हुए जा रहे हैं क्योंकि लोग इनकी तरफ आजीविका के लिए देख भी रहे हैं। पहले तो गाँवो में कृषि उत्पादन के मूल्य में वृद्धि  करने के क्रम  में प्रसंस्करण गतिविधियों को गाँवो में अपनाने से लोगो को क्षेत्रीय स्तर पर रोजगार की प्राप्ति होती हैं , इसमें खासकर संख्या  महिलाये की ही अधिक होने की सम्भावना रहती हैं।  इसके अलावा गाँवो में डिजिटल इंडिया ने भी रोजगार के कई अवसर उपलब्ध कराये हैं और युवाओ को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराया हैं। इसके अलावा पर्यटन जैसी गतिविधियां भी ग्रामीणों को रोजगार के नवीन साधन उपलब्ध करा रही हैं।

इस प्रकार अगर देखा जाए तो समर्पित तरीके से अगर प्रयास कर लिए जाए तो गांव के लोगो की बेरोजगारी न केवल दूर की जा सकती हैं बल्कि उनमे उद्यमिता का संचार भी किया जा सकता हैं। इसके लिए सरकार  के साथ स्थानीय निकायों के अलावा तकनिकी संस्थानों और सिविल सोसाइटी के सहयोग की भी अपेक्षा होगी।

भूमि आधारित आजीविका की संरचनाएं

जमीन  ग्रामीण आजीविका का महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं जो मानव समाज को प्राचीन समय से ही खाद्यान्न प्रदान कर रही हैं। पहले भूमि से केवल अनाजो की  प्राप्ति प्राथमिक उद्देश्य था क्योंकि  आदमी की जरूरते सीमित थी। जब आदमी की जरूरतों ने रोटी से आगे कपडा और मकान की तरफ भी देखना शुरू किया तो इनके लिए संसाधनों की जरुरत थी और इस हेतु जमीं की तरफ देखा गया। जमीन ने न केवल आदमी को तन ढकने के लिए कपास उपलब्ध कराई अपितु आवास की आवश्यकताओ की पूर्ति में भी बुनियादी सहयोग प्रदान किया। जब आदमी को बुनियादी आवश्यकताओं से आगे भौतिक चीजो की जरुरत पड़ी तो भी कृषि से लोगो को विनिमय समर्थन प्राप्त हुआ। लोगो ने अनाजो के बदले सेवाए प्राप्त की, वस्तुए खरीदी , अतिरिक्त अनाज को बेचकर बदले में दूसरी भौतिक चीजो की प्राप्ति की। भूमि आगे चलकर एक रोजगार का साधन बानी जब इसने दो फसली स्वरुप ग्रहण किया, बागवानी और नकदी फसलो की शुरुवात हुई। जब इसे वर्तमान में तकनिकी विकास का समर्थन हासिल हुआ - सुचना क्रांति , ख़ाद्य प्रसंस्करण, सुदूर व्यापार आदि , तो जमीन की तरफ आजीविका हेतु आकर्षण बढ़ा।

भूमि से प्राप्त आजीविका के विभिन्न स्वरुप इस प्रकार हैं -


बड़े किसान जिनके पास भूमि अधिक हैं। वे भूमि से न केवल खाद्यान्न की पर्याप्त प्राप्ति कर लेते हैं अपितु बिक्री के लिए फसलो के विविधिकरण में भी सक्षम होते हैं , नकदी और बागवानी खेतियो के लिए इनके आकर्षण को इसी संदर्भ में समझा जा सकता हैं।  इसके लिए इन्हें पर्याप्त तकनीकि और क्रेडिट समर्थन प्राप्त होता हैं। इनके पास श्रम हासिल करने के लिए संसाधन भी होते हैं। एक तरह से देखा जाए तो यही वो वर्ग हैं जिसके लिए कृषि अभी भी लाभदायक पेशा बना हुआ हैं। इनकी आय इनकम टैक्स के स्लैब्स में शामिल होने योग्य होती हैं और ये गाँवों में प्रतिष्टित स्थान रखते हैं।

मझले किसान भी भूमि से अपना गुजारा करने की क्षमता रखते हैं।  इनके पास मशीनरी, सिंचाई के साधनो की उपलब्धता में बड़े किसानों से अंतर हो सकता हैं , लेकिन फिर भी ये सीमांत किसानों के समान लाचारी में नहीं जीते हैं।

सीमांत किसान भूमि से केवल खाद्यान्नों की प्राप्ति करते हैं और ये बड़े किसानों के खेतो में काम करके अतिरिक्त आजीविका प्राप्त करते हैं। इनकी आय इतनी कम होती हैं की ये गैर-कृषि कार्यो से भी आय प्राप्ति हेतु संघर्षरत रहते हैं। अपनी थोड़ी-बहुत जमीं पर खेती करने के लिए भी इन्हें बड़े किसानों के मुह की तरफ देखते रहना होता हैं , उनसे ऋण लेकर खाद बीज का इंतजाम होता हैं, उनके ट्रैक्टर से बुवाई होती हैं और नलकूपो से सिंचाई होती हैं। कुल मिलकर देखा जाए तो यह कृषि से सम्बन्ध वह वर्ग है जिसके लिए कृषि आजीविका का एकमात्र साधन नहीं हैं और इन्हें तत्काल अपने कार्यक्षेत्र को विस्तारित करने की आवश्यकता हैं।

एक वर्ग गाँवो में उन लोगो का भी हैं जिनके पास कोई जमीं नहीं हैं और वे या तो किसानों के जजमान हैं या फिर बड़े किसानों के खेतो में मजदूरी करके अपनी आजीविका चलाते हैं।