रणथंभौर में बाघ-मानव संघर्ष : कारण एवं समाधान

एक तरफ हम इस बात के लिए गर्व कर रहे हैं कि रणथम्भौर बाघ आरक्षित क्षेत्र में सैलानियों की संख्या बढती जा रही हैं। पर्यटन क्षेत्र में दिनोदिन निवेश बढ़ता जा रहा हैं। नवीन सृजित आर्थिक गतिविधियों द्वारा कई स्थानीय लोगों का रोजगार प्राप्त हो रहा हैं। स्थानीय हस्तशिल्प के कलाकरों को आजीविका प्रपात हो रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ हमे इस बात के लिए भी चिंतित होना चाहिए कि बाघ आरक्षित क्षेत्र के कारण क्षेत्र में पर्यावरणीय कानूनों के कारण औद्योगिक विकास की संभावनाओं में कमी आई हैं। आरक्षित क्षेत्र के आसपास के गांवों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार अनुमतियों के जाल में उलझ गया हैं। एक बड़ी सामाजिक लागत इसके साथ निहित हैं। लेकिन इन सबसे बढ़कर समस्या यह हैं कि वन क्षेत्र के भीतर विभिन्न  कारकों के कारण बाघों की बाह्य क्षेत्रों में आमद बढ़ी हैं, जिसने न केवल मवेशियों बल्कि पिछले दस सालों में लगभग 14 लोगों की जान ली हैं। इस आलेख में हम उन्ही पहलुओं तक पहुँचने की कोशिश करेंगे, जो मानव-बाघ संघर्ष एवं बाघों के अधिवास की कमी के लिए उत्तरदायी हैं। 

1. स्थिति क्या है?

रणथम्भौर में बाघों के आपसी संघर्ष की सुर्खियाँ अक्सर समाचारों में देखने को मिल जाती हैं। बाघों के लिए क्षेत्र कम पड़ने के कारण युवा बाघ टेरिटरी नही बना पा रहे हैं। कुछ बाघ सीमावर्ती क्षेत्रों में रहते हैं, जहाँ से वे निकलकर पालतू पशुओं व मनुष्यों का शिकार करते हैं। वही मानव भी नियम विरुद्ध जंगल में पहुँच रहा हैं, जिससे बाघ और मानव का आमना-सामना होने लगा हैं। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) के अनुसार यहाँ पर अधिकतम 40 बाघ हो सकते हैं, लेकिन यहाँ पर इस समय 70 बाघ हैं। ऐसे में दबाव की मात्रा को हम समझ सकते हैं।

2. उत्तरदायी कारण

2.1. अति आबादी (Over-Population)

संरक्षण प्रयासों की बदौलत रणथम्भौर ही नहीं संपूर्ण भारत में बाघों की संख्या में भारी वृद्धि हुई हैं। भारत ने 2022 तक बाघों की संख्या को दोगुना करने के लक्ष्य को वर्ष 2018 में ही प्राप्त कर लिया था। हर चार साल में होने वाली टाइगर सेन्सस-2018 के अनुसार, वर्तमान में भारत में 2967 बाघ हैं। देश के सभी बाघ संरक्षित क्षेत्र अति आबादी के दबाव से गुजर रहे है। इस समय रणथम्भौर टाइगर रिज़र्व में भी 70 से 80 के मध्य बाघ हैं। समस्या की जड़ यह है कि प्रे-बेस के आधार पर यहाँ 40 से ज्यादा बाघ नहीं होने चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति इस सीमा के पूर्ण विपरीत हैं।

बाघों के मध्य होने वाले क्षेत्रीय संघर्ष (Territorial Conflict) में युवा बाघ वृद्धों को खदेड़ देते हैं, जो मानव आबादी वाले क्षेत्रों की ओर चले जाते हैं। इससे मानव-बाघ संघर्ष से जुडी समस्या उत्पन्न होती हैं।

2.2. अपर्याप्त अधिवास

बाघों की आबादी की तुलना में अनुकूल अधिवासों की कमी ही समस्या का कारण हैं। रणथम्भौर टाइगर रिज़र्व में बाघों की सांद्रता कुछ ही क्षेत्रों में हैं, जो सवाई माधोपुर या खंडार तहसील के क्षेत्र हैं। टाइगर रिज़र्व में ही आने वाले कैलादेवी अभयारण में कम बाघ पाए जाते है।

अधिवासों की कमी के लिए एक और कारण उत्तरदायी माना जाता हैं और वो यह हैं कि बाघ आरक्षित क्षेत्र में कुछ गाँव स्थित हैं, जिनके विस्थापन की प्रक्रिया बहुत ही मंद गति से चल रही हैं तथा इस दिशा में कोई महत्वपूर्ण विकासक्रम नही हुआ है।

2.3. पर्यटन का दबाव

वन क्षेत्र में पर्यटन के अधिक दबाव के कारण भी बाघ वन क्षेत्र से बाहर चले जाते हैं। इको टूरिज्म के नाम पर जिप्सियां पर्यटकों को भर-भर के उनके अधिवास स्थलों पर ले जाती रहती हैं, इससे उनके आराम एवं स्वछंद जीवन में दखल पड़ता हैं। वन क्षेत्र से बाहर जाने के लिए उनको यह वजह भी प्रेरित करती हैं।

2.4. बाहरी आकर्षक कारक

वन क्षेत्र में शिकार के लिए तो वैसे कई प्रकार के वन्य जीव पाए जाते हैं, परन्तु बाघ आरक्षित क्षेत्र की सीमाओं के समीप रहने वाले लोगो के मवेशी बाघों को बाहर आने के लिए आकर्षित करते रहे हैं। बाहर  इनको शिकार आसानी से मिल जाता हैं, साथ ही कई बगीचों में छिपने का आश्रय भी। जब फसले बड़ी हो जाती हैं तो बाघों का मूवमेंट आरक्षित क्षेत्र से बाहर 10-20 किलोमीटर की परिधि में देखने को मिलता हैं। जिससे किसानों में इसका व्यापक भय देखने को मिलता हैं क्योंकि हमले के कई मामले सामने आ चुके हैं। 

3. किए गये प्रयास और उनकी सीमाएं

3.1. प्रोजेक्ट टाइगर

प्रोजेक्ट टाइगर की घोषणा के साथ ही इन क्षेत्रों के संरक्षण मानदंडों में उतरोतर वृद्धि हुई हैं। क्रिटिकल टाइगर हैबिटैट एरिया में अवांछित लोगो की गतिविधियों को पाबन्द किया गया हैं। इससे वनों में बाघ के आराम में दखलंदाजी और खतरे कम हुए हैं।

3.2. बाघ आरक्षित क्षेत्रों से गांवों का विस्थापन

टाइगर रिज़र्व की सीमा में आने वाले बीस गांवों को विस्थापन के लिए चिन्हित किया गया हैं। विस्थापन की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही हैं। पांच गांवों को विस्थापित किया भी जा चूका हैं , बाकि लोगो से समझाइश की जा रही हैं।

3.3. टाइगर रिज़र्व के दुसरे क्षेत्रों में अनुकूलता में वृद्धि करना

टाइगर रिज़र्व में ही शामिल कैलादेवी में अनुकूलता में वृद्धि की जा रही हैं। इसके लिए संबंधित क्षेत्रों में संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं।

3.4. पर्यटन के दबाव में कमी करना

वनों में पर्यटन का दबाव भी बाघों के वनों से पलायन के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। इसके लिए उन पर दबाव कम पड़े इसलिए फुल डे सफारी पर रोक लगाईं गई हैं। इसके अतिरिक्त मानसून सीजन में भी पर्यटन पर पाबंदी लगी होती हैं।

3.5. अन्य स्थानों पर शिफ्ट करने पर विचार 

बाघों को अन्य क्षेत्र में भेजना भी एक समाधान हो सकता हैं। इस पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। यहाँ से बाघों को मुकन्दरा या रामगढ विषधारी में भेजने की बात हो रही हैं। जिस पर प्राथमिकता से आगे बढ़ने की जरुरत हैं।

आगे की राह

बाघों के संरक्षण के लिए विस्थापन कार्यों के लिए प्रमुखता से कार्य किए जाने की आवश्यकता हैं। इसके लिए विस्थापन के साथ-साथ पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास को भी प्राथमिकता मिलने पर ही बाकी लोग भी तैयार हो पाएंगे। विस्थापित होने वाले लोगो की आजीविका को ध्यान में रखकर योजना बनानी होगी। फुल डे सफारी को सीमित करने की आवश्यकता हैं। साथ ही पर्यटन कारोबार में लगे हितधारकों को भी प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। दूसरी जगह पर शिफ्ट करने की योजनाओं को यथाशीघ्र अमल में लाने की आवश्यकता हैं।

साथ ही मानवीय क्षति को कम करने के लिए भी कई उपाय करने की आवश्यकता हैं, जैसे कि :

  1. बाघों के हमले में घायल और मरने वाले लोगो के लिए एक निश्चित मुआवजा नीति होनी चाहिए। इसे अधिकारियो के विवेक और सौदेबाजी क्षमता के भरोसे मामला-दर-मामला निर्धारित नही करना चाहिए। घायलों के उपचार के लिए व्यवस्था होनी चाहिए। किसी भी हमले की स्थिति में एक जिम्मेदार अधिकारी को पीड़ित के पास जाकर अग्रिम कार्यवाही का आश्वासन देना चाहिए।
  2. बाघ की वन क्षेत्र के बाहर और भीतर सघन निगरानी की जानी चाहिए। वन क्षेत्र से बाहर निकलते ही संबंधित क्षेत्र के निवासियों को वास्तविक समय सूचना प्रदान करनी चाहिए ताकि वे सुरक्षित स्थानों पर पहुँच सके। साथ ही वन विभाग के कर्मियों को वापस वन में भेजने पर कार्य करना चाहिए।
  3. राष्ट्रीय उद्यान के जिन क्षेत्रो से बाघ की निकासी होती हैं, उन क्षेत्रो में चारदीवारी की मरम्मत की जाए। साथ ही चारदीवारी के निर्माण में खराब गुणवत्ता के सामानों का प्रयोग करने वाले ठेकेदारों पर कार्यवाही की जाए।
  4. हिंसक हुए बाघ को एनक्लोजर में रखा जाना चाहिए या फिर उसके लिए अधिक क्षेत्र की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसी घटनाओ को पुनः अंजाम देने वाले बाघों पर ठोस उपाय किए जाने चाहिए।  
  5. फसलो के दिनों में बाघ को छुपने में आसानी रहती हैं, इसलिए इस दौरान निगरानी में सख्ती बरतनी चाहिए। साथ ही बड़े-बड़े बगीचों के पौधो में भी उसके छुपे होने की संभावना हो सकती हैं। इसलिए किसानो और वन विभाग के बीच उसके मूवमेंट को लेकर सूचनाओ के आदान-प्रदान की संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए। चेतावनी प्रणाली की तरह सुचनाए वितरित करनी चाहिए।
  6. बाघ के मूवमेंट को लेकर ग्रामीणों द्वारा दी गई सूचनाओ को वन विभाग द्वारा नकार दिया जाता हैं, ऐसे में वन कर्मियों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता हैं।
  7. वन क्षेत्र में से पर्यटन के दबाव को कम करने की आवश्यकता हैं ताकि बाघ अपने मूल क्षेत्र में हस्तक्षेप मुक्त महसूस कर सके। एक समय सीमा का पालन किया जाना चाहिए। बाघ को परेशान करने वाले जिप्सी चालको और पर्यटकों पर कार्यवाही करने की आवश्यकता हैं।
  8. पर्यटन क्षेत्र और विचरण क्षेत्र को लग करने की आवश्यकता हैं। इसके लिए टाइगर सफारी पार्क की स्थापना  की योजना को यथासीघ्र जमीनी आधार दिया जा सके।
  9. बाघ आधारित नीतियों के निर्माण में स्थानीय लोगो को भी शामिल किए जाने की जरुरत हैं। इसमें केवल व्यवसायिक समूहों से जुड़े बाघ-प्रेमियों का ही दबदबा नही होना चाहिए ।
  10. इत्यादि।

निष्कर्ष

अंत में हम यही कहेंगे कि जंगल में विचरण करता बाघ निश्चित तौर पर एक वरदान की तरह है। परन्तु जैसे ही यह जंगल से बाहर निकलता है तो लोगो की दिनचर्या का बाधित करने के साथ-साथ दहशत उत्पन्न करने की वजह से यह अभिशाप बन जाता है। ऐसे में हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यह जंगल में ही बना रहे। इसके लिए सुझाए गये उपायों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।

सहकारी समितियों के माध्यम से अमरूद विपणन की समस्या का समाधान

सवाई माधोपुर का अमरुद अपनी मिठास के कारण बहुत अधिक लोकप्रिय हैं। यहां पर अमरूदों की बंपर पैदावार होती है। स्वादिष्ट व उत्तम क्वालिटी से भरपूर यहां का अमरूद देश की नामी-गिरामी मंडियों तक जाता है। यहाँ की मिट्टी और जलवायु के कारण अमरुद के बागान सवाई माधोपुर जिले में काफी सफल रहे हैं। करमोदा गाँव में अमरूदों की सफलता के बाद, एक दशक के भीतर ही इसके बगीचे लगभग पुरे सवाई माधोपुर जिले में विस्तृत हो गये।  सवाई माधोपुर में अब अमरूद की खेती व्यापक स्तर पर होने लगी है। लेकिन जैसे ही अमरुदों की बागवानी के अंतर्गत क्षेत्र में वृद्धि हुई, इनकी बिक्री की समस्या भी उत्पन्न हो गई। एक समय था जब अमरुद के लिए भाव और बाजार बहुत ज्यादा था, लेकिन धीरे-धीरे व्यापार खत्म होता चला गया। इस समय पर स्थिति उस निर्णायक मोड पर आ गई हैं, जहां किसान ये सोच रहा है कि इनके पेड़ों को लगे रहने दे या फिर खोद करके फेंक दे। सरकार भी इस दिशा में कई प्रयास कर रही हैं। ऐसी स्थिति में एक उपाय सहकारी समितियों के माध्यम से नजर आता है। जिस प्रकार क्रय-विक्रय सहकारी समितियां न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि खाद्यान्नों की खरीद करती हैं, उसी प्रकार से अमरुद के लिए भी खरीद की जा सकती हैं। इसके बारे में हम विस्तार से चर्चा करते है-

उपयुक्तता

अमरुद के लिए शुष्क जलवायु उपयुक्त होती हैं। ये सभी दशाएं सवाई माधोपुर में उपलब्ध हैं। इसलिए इसके बागान यहां पर तेजी से लोकप्रिय हुए। यहां की अनुकूल जलवायु, सिचाई हेतु यहां का बरसाती पानी एवं यहां की मिट्टी में बसे लौह तत्व की अधिकता व काली जलोढ़ मिट्टी की पर्याप्तता होने के कारण (अच्छी बारिश होने पर) लगभग सभी फसलों में प्रति हैक्टेयर उत्पादन बहुत अधिक है। मिट्टी काली जलोढ़ होने के कारण अधिक समय तक भूमि में नमी बनाए रखने में यह कारगर है। प्रायः देखा गया है कि पेड़ो की ग्रोथ के साथ फलों का आकार भी काफी बड़ा होता है। और सबसे अहम बात यहां मिट्टी में लवणीयता नही होने के कारण अमरूदों का स्वाद बिल्कुल मीठा है।

सवाई माधोपुर में अमरूद की खेती के प्रारंभिक चरण में उत्तर प्रदेश की नर्सरी से अमरूद के पौधे खरीदे गए।अब तो सवाई माधोपुर में ही बहुत सारी नर्सरी बन चुकी हैं। यहां बर्फ खान गोला, लखनऊ 49, इलाहाबादी, सफेदा किस्म के अमरूद के पौधे तैयार किए जाते हैं। वर्तमान में सवाई माधोपुर में 100 से अधिक नर्सरी हैं। इनमें विनियर ग्राफ्टिंग से अमरूद के पौधे तैयार किए जा रहे हैं।किसान अपनी आवश्यकता के अनुरूप पौधे यही से प्राप्त कर लेते हैं।

उत्पादन

  • देश का 60 प्रतिशत अमरूद केवल राजस्थान में हो रहा है। इस 60 प्रतिशत का 75 से 80 फीसदी हिस्सा सवाई माधोपुर जिले का है। अनुमानित रूप से देश का 50 प्रतिशत अमरूद अकेला सवाई माधोपुर जिला पैदा कर रहा है। विश्व में सबसे अधिक अमरूद भारत में होता है।
  • सवाई माधोपुर के अमरुद इतने अधिक पसंद किए जाते हैं कि वर्ष 2016-17 के सर्वे के अनुसार जहां सवाई माधोपुर में जहां पर्यटन से सालाना ₹800 करोड़  की आय हुई थी, वहीं अमरूदों के कारोबार ने  1200 करोड़ का आंकड़ा पार किया था।
  • उद्यान विभाग की माने तो गत वर्ष इस बार 90 हजार मीट्रिक टन के लगभग अमरुद का उत्पादन हुआ था और यह आंकड़ा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। इसके डेढ़ से दो लाख मीट्रिक टन के उत्पादन होने की आशा की जा रही है जो कि आने वाले समय में और बढ़ने की उम्मीद है।
  • बारह अरब तक व्यवसाय की उम्मीद: एक पक्के बीघा में 150 से 200 अमरूदों के पेड़ लगाए जा सकते हैं। जिले में फल दे रहे अमरूदों के पौधों की तादाद तकरीबन 40 लाख है। एक पौधा औसतन 100 से 125 किलोग्राम अमरूद की उपज देता है यानी जिले में 40 करोड़ किलोग्राम अमरूद का उत्पादन हो रहा है। यहां के अमरूद की औसतन फुटकर कीमत 25 रुपए किलोग्राम आंकी गई है। इस हिसाब से जिले में अमरूद का रिटेल कारोबार 12 अरब रुपए के आसपास पहुंच चुका है।

अमरुद की खेती से तुलनात्मक लाभ 

अमरूद की खेती सवाई माधोपुर जिले का वातावरण अनुकुल होने से फायदे का सौदा साबित हो रही है। अमरुद की खेती से उस खेत में बोई जाती रही अन्य फसलों की तुलना में लाभ रहता हैं। यह किसान की आय दोगुना करने में सहायक है।

उद्यान विभाग के अनुसार परंपरागत खेती की तुलना में अमरुद बागवानी से चार गुना तक लाभ होने से किसान इसे अपना रहे हैं। हाल के कुछ सालों में जिले के किसानों ने सरसों, गेहूं जैसी फसलों को को छोड़कर अमरूद की बागवानी की ओर रुख किया है।

शुरू में किसानों ने काफी मुनाफा कमाया

नवंबर व दिसंबर माह में यहां होने वाली अमरूदों की बंपर पैदावार किसानों को रोजगार ही नहीं आर्थिक सुदृढ़ीकरण में भी योगदान करती है। अमरूदों की खेती ने यहां के किसानों की जिंदगी ही बदल दी है। सवाईमाधोपर जिला मुख्यालय और आसपास के गांवों के किसानों की माली हालत सुधारने में अमरूद की खेती कारगर सिद्ध हुई है। इससे किसानों के सपने सच हुए हैं।

मांग अधिक होने के कारण अच्छे दाम प्राप्त होते हैं। किसानों का अमरूद की फसल पर कहना है कि फिलहाल अमरूद का उत्पादन काफी बेहतर चल रहा है जिसके चलते किसानों को अमरूदों के काफी अच्छे दाम मिल रहे है। अमरूदों के बगीचों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही हैं जिससे व्यापार के लगातार बढ़ने की उम्मीद है।

इससे प्रेरित होकर इनके बागानों की संख्या में चरघातांकी वृद्धि हुई। अमरूद के प्रति किसानों की बढ़ती रुचि को देखते हुए इसके पौधे की नर्सरियों की संख्या काफी बढ़ गई है। ऐसे में अब जिले में ही अमरूदों की नर्सरियां तैयार होने लगी हैं।

बीएचयू की स्थापना और मदन मोहन मालवीय

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की एक अमूल्य विरासत हैं। ब्रिटिश शासन के समक्ष स्वदेशी मूल्यों में भारतीयों को शिक्षित करने के लिए स्थापित इस विश्वविद्यालय का एक दीर्घ इतिहास रहा हैं। जितने  प्रयास और संघर्ष इसकी स्थापना से पूर्व के हैं, उससे अधिक संघर्ष इसकी स्थापना के बाद इसे निर्मित और संचालित करने में किया गया। इस विद्या की राजधानी को स्थापित करने में महामना जी ने अपने जीवन का अधिकांश भाग समर्पित किया हैं। इसलिए हम प. मदन मोहन मालवीय को इसकी स्थापना का श्रेय देते हैं। लेकिन हाल ही में एक शोधकर्ता तेजकर झा ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ बीएचयू में बीएचयू के संस्थापक को लेकर मालवीय जी की भूमिका पर सवाल उठाये है। इनका मानना है कि इसमें अन्य सहयोगियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी जिनमें एनी बेसेंट और दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह का नाम प्रमुख है। एनी बेसेंट ने कॉलेज प्रदान किया था और दरभंगा के महाराजा ने धन जुटाने की मुहिम का नेतृत्व किया था। लेकिन इसका श्रेय केवल मालवीय जी को जाता हैं, जबकि उनका योगदान अन्य व्यक्तियों के समकक्ष ही था।

बीएचयू के संस्थापक के रूप में नवीन दावे 

अपनी बात के समर्थन के लिए तेजकर झा निम्न तथ्य प्रस्तुत करते हैं :

  1. विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए गठित की गई बीएचयू सोसायटी के अध्यक्ष दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह थे। उनका यह दायित्व केवल सम्मानार्थ (honorary) नहीं था, बल्कि उन्होंने इस क्षमता से कार्य भी किए थे।
  2. बीएचयू मूवमेंट को लोकप्रिय बनाने और धन जुटाने के लिए उन्होंने कई देशी रियासतों के पास प्रतिनिधि मंडल भेजे थे और स्वंय ने भी 5 लाख रूपये का योगदान प्रदान किया था।
  3. बीएचयू मूवमेंट से संबंधित सभी चर्चाओं में महाराजा का नाम आता था, संबंधित पत्राचार भी महाराजा के नाम से होते थे।
  4. स्थापना समारोह के अवसर पर वायसरॉय लार्ड हार्डिंग के बाद प्रेसिडेंट ऑफ बीएचयू सोसाइटी की हैसियत से महाराजा रामेश्वर सिंह ने ही भाषण दिया था।  स्थापना समारोह की अध्यक्षता भी एनी बेसेंट द्वारा की गई थी। मालवीय जी कही से भी फ्रंट लाइन में दिखाई नही पड़ रहे थे। यहाँ तक कि स्थापना के बाद सभी प्रकार के बधाई संदेश भी महाराजा को ही प्राप्त हुए थे।

इस प्रकार तेजकर झा मानते हैं कि अन्य लोगो के योगदान को इतिहास से मिटा दिया गया हैं और मालवीय जी को एक तरफा श्रेय दिया जा रहा हैं। बीएचयू के हर संस्थान, डिपार्टमेंट और भवनों में मालवीय जी की प्रतिमा लगी हुई हैं, जबकि बाकी लोगो का उल्लेख तक नही हैं। जबकि उनके योगदान के बिना बीएचयू का अस्तित्व में आना कदापि संभव नही था।

मालवीय जी को संस्थापक मानने का तथ्य कब से प्रचलित हुआ, इस बारे में तेजकर झा बताते हैं कि लंबे समय तक इस विषय पर कभी चर्चा ही नहीं हुई कि इस विश्वविद्यालय का संस्थापक कौन है या कौन थे। सबसे पहले विश्वविद्यालय प्रशासन में शामिल एक सीनेट सदस्य सुंदरम ने अपनी पुस्तक “BHU 1905 to 1935” में मालवीय जी को संस्थापक बताया। इस तथ्य का विरोध कर सकने वाले पक्षकारों की तब तक मृत्यु हो गई थी, बीएचयू सोसायटी के सचिव सर सुंदरलाल की वर्ष 1917 और महाराजा रामेश्वर सिंह की वर्ष 1929 में मृत्यु हो गई थी। इस पुस्तक में 1905 से 1919 तक के दस्तावेजों से बचने की कोशिश की गई है। एक संभावना यह भी हो सकती हैं कि बाद में उन दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया हो।

अब तेजकर झा द्वारा प्रस्तावित मत पर टिप्पणी करने से पहले हमे बीएचयू की स्थापना से जुड़े घटनाक्रमों को समझ लेना चाहिए।

बीएचयू की स्थापना से संबंधित घटनाक्रम

दरअसल बनारस में उच्च शिक्षा के लिए संस्थान की स्थापना हेतु तीन लोग प्रयासरत थे :

  1. एनी बेसेंट : इन्होने वर्ष 1898 में सेंट्रल हिंदू कॉलेज नामक विद्यालय की स्थापना की थी  तथा इसके बाद वे विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रयास में आगे बढ़ रही थी। वर्ष 1960 में रॉयल चार्टर की अनुमति के लिए उन्होंने आवेदन भी कर दिया था, जिस पर सरकार की तरफ से उन्हें कोई भी प्रतिक्रिया नहीं मिली थी।
  2. महाराजा रामेश्वर सिंह : दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह भी काशी में शारदा विद्यापीठ की स्थापना करने की योजना बना रहे थे।
  3. मदन मोहन मालवीय : इन्होने वर्ष 1905 में कांग्रेस के बनारस सत्र के दौरान विश्वविद्यालय की स्थापना के संदर्भ में अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा की। इन्होने वर्ष 1911 में अपने विचारों को एक योजना के रूप में प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य ऐसी शिक्षा के लिए प्रयास करना था, जो गरीबी उन्मूलन और आय में वृद्धि के लिए भारतीय धर्म और संस्कृति के साथ तकनीकी और विज्ञान को संयोजित करती हो।

इन सभी प्रयासों के सहयोग से वर्ष 1911 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी सोसाइटी की स्थापना हुई। दरभंगा के महाराजा को इसका अध्यक्ष बनाया गया और इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील सुंदरलाल इसके सचिव थे। इसमें 3 सदस्य थे, जिनमें प्रथम मदन मोहन मालवीय जी थे, दूसरे एनी बेसेंट और तीसरे काशी नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह थे।

विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए बीएचयू सोसाइटी को ब्रिटिश इंडिया गवर्नमेंट द्वारा दो शर्ते पूर्ण करनी थी। प्रथम तो सोसाइटी के पास कोई शिक्षा संस्थान का होना जरूरी था, इसके लिए एनी बेसेंट द्वारा स्थापित सेंट्रल हिंदू कॉलेज का अधिग्रहण किया गया था। द्वितीय शर्त के अनुसार 50 लाख रुपए एकत्रित करने थे, जिसे एकत्रित करने के लिए राजा महाराजाओं के सहयोग के अतिरिक्त जन सहयोग का भी सहारा लिया गया था। स्वंय दरभंगा के महाराजा ने 30 लाख रूपए प्रदान किए थे और फंड एकत्रित करने के लिए कई देसी राजा-महाराजाओं के पास प्रतिनिधि मंडल भेजा था। सोसाइटी के सदस्य काशी नरेश ने विश्वविद्यालय परिसर के लिए भूमि प्रदान की थी और आगे भी इस प्रक्रिया में योगदान देते रहे।

अक्टूबर 1915 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री सर हारकोर्ट बटलर के प्रयासों से हिंदू यूनिवर्सिटी एक्ट 1915 केंद्रीय विधानसभा से पारित हो गया, जिस पर वायसराय ने तुरंत स्वीकृति प्रदान कर दी थी।

4 फरवरी 1916 को बसंत पंचमी के दिन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वारा इसका शिलान्यास किया गया। समारोह की अध्यक्षता एनी बेसेंट के द्वारा की गई। जिसमें देसी राजा महाराजाओं, प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा भाषण दिए गए, जिनमें महात्मा गांधी जी की प्रमुख थे और उनका यह भारत में प्रथम सार्वजनिक भाषण था, अन्य व्यक्तियों में सीवी रमन जगदीश चंद्र बसु आदि शामिल थे।

विश्वविद्यालय में विधिवत शिक्षण कार्य अक्टूबर 1917 से सेंट्रल हिंदू कॉलेज में प्रारंभ हुआ। परिसर में सबसे पहले इंजीनियरिंग कॉलेज का निर्माण हुआ, उसके बाद क्रमशः कला संकाय और विज्ञान संकाय के कॉलेज स्थापित हुए। आगे 13 दिसंबर 1921 को प्रिंस ऑफ़ वेल्स द्वारा विश्वविद्यालय का औपचारिक उद्घाटन किया गया। निजी प्रयासों से स्थापित यह प्रथम विश्वविद्यालय था।

आगे भी कई महान हस्तियों ने इसमें मदद की, जिनके माध्यम से भवन, छात्रावास, संकाय भवन और अन्य सुविधाओं का निर्माण हुआ। उदाहरण के लिए :

  1. परिसर में चारदीवारी एवं प्रवेश द्वार के निर्माण कार्य का वित्तपोषण बलरामपुर के महाराजा पतेश्वर प्रताप सिंह द्वारा किया गया।
  2.  सेंट्रल लाइब्रेरी के निर्माण में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड तृतीय का अहम योगदान रहा।
  3.  बिरला परिवार द्वारा परिसर में विश्वनाथ मंदिर और एक बड़े छात्रावास का निर्माण किया गया।
  4.  कई राज परिवारों और व्यवसायियों द्वारा छात्रावास और अन्य विभागों के निर्माण में सहायता प्रदान की गई। जैसे कि : लिम्बडी के महाराजा द्वारा लिम्बडी छात्रावास, हैदराबाद के नवाब द्वारा हैदराबाद गेट का निर्माण।

इस प्रकार बीएचयू की स्थापना हुई। अब आते हैं इस विवाद पर 

आखिर मालवीयजी को ही संस्थापक क्यों माना जाना चाहिए ?

यह सही हैं कि बीएचयू की स्थापना में कई लोगो की उल्लेखनीय भूमिका रही। लेकिन मालवीयजी की भूमिका को हम इसलिए खास मान सकते हैं, क्योंकि :  

  1. स्वपनदृष्टा और साकार कर्ता :  मालवीयजी ने ही विश्वविद्यालय की स्थापना का स्वपन देखा और वे उसे साकार करने तक उससे जुड़े रहे। बीएचयू की स्थापना में भले ही अन्य लोगो का भी योगदान हो सकता हैं, लेकिन वे सभी चरणों में विश्वविद्यालय से जुड़े नही रहे। दरभंगा के महाराजा और ऐनी बेसेंट स्थापना के बाद विश्वविद्यालय के संचालन में सक्रिय नही रहे। जबकि मालवीयजी वर्ष 1919 से लेकर वर्ष 1938 तक यहाँ के कुलपति रहे।
  2. औपचारिक बनाम व्यावहारिक योगदान : मालवीयजी भले ही औपचारिक समितियों और समारोह का हिस्सा नही रहे हो, परन्तु उनके द्वारा इस मुहिम को ज़मीनी नेतृत्व प्रदान किया गया। उन्होंने ही देशभर में इस मांग हेतु समर्थन अर्जित करने के लिए भ्रमण किया और तत्कालीन राजनेताओं, शिक्षाविद एवं वैज्ञानिकों को यहाँ पर आमंत्रित किया।
  3. स्थापना के बाद के कार्य : विश्वविद्यालय की स्थापना कोई सरकारी मंजूरी प्राप्त करने का कार्य भर नही थी। विश्वविद्यालय में भवनों का निर्माण शेष था, जिसके लिए पहले से भी ज्यादा धन जुटाने की आवश्यकता थी। पढने वाले छात्रों की सुविधा और पढ़ाने वाले संकायों के लिए भी धन की जरुरत थी। इन सब के लिए धन के स्त्रोत मालवीयजी द्वारा जुटाए गये। कई मौके ऐसे आये जब विश्वविद्यालय सहायता के अभाव में बंद हो सकता था, लेकिन मालवीयजी द्वारा किए गये प्रयासों से यह बच गया। 

इस प्रकार मालवीयजी के पक्ष में औपचारिक साक्ष्य कमजोर प्रतीत होते हो, परंतु व्यावहारिक साक्ष्य केवल और केवल उन्ही के पक्ष में हैं। मालवीयजी,अन्य संस्थापकों से इस मायने में अलग हैं कि उन्होंने विश्वविद्यालय की बगियाँ को सींचकर बढ़ा करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जमीनी स्तर पर इस पहल को लोकप्रिय करने और स्थापना के बाद स्थायित्व प्रदान करने में मालवीय की भूमिका उन्हें अन्य से अलग कर देती हैं। इसलिए तेजकर झा द्वारा किए गये दावे के साथ खड़ा होने से हमे असहजता महसूस होती हैं।

अन्य संस्थापकों और योगदान करने वालो की उपेक्षा नही की गई हैं

ये बात सही हैं कि मालवीयजी की प्रतिमा की स्थापना ज्यादा संख्या में हैं, लेकिन इसका मतलब यह कतई नही हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अन्य संस्थापकों और योगदान करने वालो की उपेक्षा कर दी हैं।

  1. बीएचयू सोसाइटी के सदस्य रहे सुंदरलाल के नाम पर विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज का नाम रखा गया हैं।
  2. जिन भी लोगो ने आर्थिक सहयोग देकर विश्वविद्यालय परिसर के अंदर जो भी भवन, छात्रावास या विभाग बनवाये हैं, उनके नाम उन्ही महापुरुषों के नाम पर रखे गये हैं।
  3. दरभंगा के महाराजा को भी इसी प्रकार का सम्मान दिया गया हैं।

इसलिए यह कहना सही नही हैं कि अन्य संस्थापकों और योगदान करने वालो की उपेक्षा कर दी गई हैं।

निष्कर्ष 

बीएचयू की स्थापना एक महान उद्देश्य से जुडी हुई हैं, जिसके तहत हमारे महापुरुष ऐसी शिक्षा के लिए प्रयासरत थे, जो गरीबी उन्मूलन और आय में वृद्धि के लिए भारतीय धर्म और संस्कृति के साथ तकनीकी और विज्ञान को सयोंजित करती हो। इस उद्देश्य को पूरा करने में बहुत सार्थक रहा हैं, जिसने साबित किया कि धर्म और संस्कृति तथा तकनीकी और विज्ञान एक दुसरे के विरोधी नही हैं, बल्कि एक साथ अस्तित्व में आने पर प्रगति के द्वार खोलते हैं। इस प्रकार के मूल्यों को स्थापित करने वाले विश्वविद्यालय की स्थापना से जुड़े सभी महापुरुषों का सम्मान होना चाहिए।

ईआरसीपी परियोजना : राजनीतिक श्रेय के भंवर में पूर्वी राजस्थान का पानी

 “भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ,

आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दआ।”


कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां धरातल पर पानी की आवश्यकताओं और पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना के राष्ट्रीय दर्जे को लेकर चल रहे आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति पर सटीक बैठती है। एक तरफ तो पेयजल एवं सिंचाई के लिए बेसब्री से आस लगाये बैठे हुए लोग है, दूसरी तरफ एक दुसरे पर दोषारोपण करते हुए राजनीतिक दल है। कांग्रेस का कहना है कि इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देकर प्रधानमन्त्री को अपना वादा पूरा करना चाहिए। वही केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री का मानना है कि दर्जे की मांग करने से पहले कम से कम परियोजना की डीपीआर तो सही से बनाकर भेजे। वही लोगों के मन में बिठा दिया गया हैं कि यह परियोजना उनकी जल संकट की समस्या का समाधान कर देगी। बहुत सारे लोगों को तो यह पता भी नही है कि यह नहर किस भाग से होकर गुजरेगी, उनके क्षेत्रों से गुजरेगी भी या नहीं, लेकिन वे इस विषय पर राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में भाग लेकर अपनी उर्जा को व्यर्थ करने में कोई कमी नही छोड़ रहे है। इस आलेख में ऐसे ही कई आयामों को शामिल किया गया हैं।

सबसे पहले पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना के बारे में जान लेते है, इसके बाद राष्ट्रीय दर्जे को लेकर चल रही राजनीति के विभिन्न पहलुओं पर विचार करेंगे।


1.1. पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP) के बारे में

पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरपीसी ) का मुख्य उद्देश्य राजस्थान के जल प्रबंधन को नए सिरे से विकसित करना है। यह इंट्रा-बेसिन जल स्थानांतरण (Intra - Basin Water Transfer) स्कीम है, जिसके तहत दक्षिणी राजस्थान की नदियों (कुन्नू, पार्वती, कालीसिंध) के मानसून काल में अधिशेष पानी को दक्षिण-पूर्व की नदियों (बनास, मोरेल, बाणगंगा, गंभीर, पार्वती) में स्थानांतरित करना प्रस्तावित है। यह पूर्वी राजस्थान के 13 जिलों (झालवाड़, बांरा, कोटा, बूंदी, टोंक, अजमेर, जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर, भरतपुर, अलवर) की पेयजल एवं सिंचाई आवश्यकताओं को पूर्ण करेगी।


यह परियोजना तीन चरणों में पूर्ण होगी। इस परियोजना के अंतर्गत 6 बैराज (हनोतिया, रामगढ़, महलपुर, नवनेरा, मेज और राठौड़ बैराज) एवं डूंगरी नामक बांध का निर्माण प्रस्तावित है। गुरुत्वाकर्षण नहरें, गुरुत्वाकर्षण सुरंगें, पंपिंग/ डिलीवरी के माध्यम से लगभग 1268 किलोमीटर लंबी जल संवाहक प्रणाली निर्मित की जाएगी, जो सभी मौजूद एवं प्रस्तावित संरचनाओं को आपस में जोड़ेगी।


कुन्नु नदी, कुल नदी, पार्वती नदी एवं कालीसिंध नदी पर डायवर्जन संरचनाओं का निर्माण करके ग्रेविटी नहरों के माध्यम से पानी को चंबल क्रॉस कराते हुए आगे भेजा जाएगा। नहरों के माध्यम से जलाशयों को भरा जाएगा तथा विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अगले जलाशय तक पानी को भेजा जाएगा। उदाहरण के लिए- ईसरदा बांध के पानी को जयपुर की पेयजल आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए उपयोग में लिया जाएगा। 


1.2. परियोजना का महत्व

इस प्रकार इस परियोजना के माध्यम से पूर्वी राजस्थान के जलाशयों को आपस में जोड़ा जाना संभव होगा। इससे मानसून अवधि में अधिशेष जल को दुसरे बेसिन में भेज कर बाढ़ की संभावनाओं को समाप्त किया जा सकेगा और वर्षा के जल का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा। इस प्रकार बाढ़ एवं सूखे की समस्या का समाधान होगा। पूर्वी क्षेत्र में जल की उपलब्धता बढ़ने से सतही एवं भूजल की उपलब्धता में वृद्धि होगी। 


बता दें कि इस परियोजना से 4.31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई का पानी मिलेगा। वहीं दिल्ली-मुबंई इंडस्ट्रियल कोरिडोर प्रोजेक्ट के तौर राजस्थान में औद्योगिक विकास के नए रास्ते खुल सकते हैं।


इससे लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन आएगा। इसके परिणामस्वरूप राज्य में निवेश और राजस्व में वृद्धि होगी।


1.3. अनुमानित लागत

इस परियोजना की अनुमानित लागत 37500 करोड़ रूपये है। इस पर 5200 करोड़ रूपये के कार्य पूर्व में स्वीकृत हो चुके हैं। राजस्थान सरकार ने 2022-23 के बजट में 9,600 करोड़ रुपये की लागत से नवनेरा-बीसलपुर-ईसरदा लिंक, महलपुर बैराज और रामगढ़ बैराज के निर्माण की घोषणा की है, जो कि वर्ष 2022-23 में शुरू करके वर्ष 2027 तक पूर्ण किए जाएंगे। सरकार ने यह घोषणा तब की है, जब केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देने के बजाय परियोजना को रोकने का निर्देश दिया था।


विलंब के कारण परियोजना की लागत बढती जा रही है, जो परियोजना 40 हजार करोड़ रूपये में पूरी होने वाली थी, अब उसकी लागत 70 हजार करोड़ रूपये तक आने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है। इस परियोजना को पूर्ण होने में काफी समय लग जाएगा, यदि यह राष्ट्रीय परियोजना घोषित नहीं हो पाती हैं।

खंड I

2.1. राष्ट्रीय परियोजना के दर्जे की मांग 

राजस्थान सरकार द्वारा इस परियोजना को समय पर पूर्ण करने के लिए राष्ट्रीय परियोजना के दर्जे की मांग की जा रही हैं। राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने से केंद्र सरकार के वित्तपोषण अंश में वृद्धि होगी। फंडिंग पैटर्न वर्तमान के 60:40 से बढ़कर 90:10 हो जाएगा। गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा अब तक 16 परियोजनाओं को यह दर्जा दिया गया है, जिसमे से एक भी राजस्थान की नहीं हैं।


2.2. राष्ट्रीय परियोजना के दर्जे को लेकर राजनीति

इस परियोजना को वर्ष 2016-2017 में भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार ने बनाया था।

वर्ष 2017-18 के बजट में राजस्थान की तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार ने इस परियोजना की घोषणा की थी। राजे ने अपने आखिरी बजट भाषण में कहा था कि राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने के लिए प्रस्ताव भेजा है।


अब, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी लगातार ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना दर्जा दिलाने की मांग कर रहे हैं। इनका तर्क है कि इसकी अनुमानित लागत लगभग 40,000 करोड़ रुपये है, जिसे राज्य सरकार अकेले वहन नहीं कर सकती है। इसलिए, केंद्र सरकार को राज्य के कल्याण के हित में सहायता प्रदान करनी चाहिए। 


अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को हराकर लोकसभा सदस्य बने गजेन्द्र सिंह शेखावत के जल संसाधन मंत्री बनते ही इस परियोजना को लेकर शेखावत बनाम गहलोत अडावट शुरू हो गई। मंत्री महोदय के राजस्थान से संबंध रखने के कारण इस परियोजना को राष्ट्रीय दर्जा मिलने की उम्मीद जगी थी, परन्तु मंत्री जी ने 3 आपत्तियां गिनवा दी-

  1. पहला मामला है नदियों के पानी के उपयोग की डिपेंडेबिलिटी। राष्ट्रीय परियोजना के लिए इसका प्रतिशत 75 होना चाहिए, जबकि ईआरसीपी के मामले में यह 50 फीसदी है। 

  2. दूसरा मामला मध्य प्रदेश से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) का है। एमपी से आने वाली नदियों के पानी के उपयोग के लिए एनओसी अभी तक नहीं मिल सकी है। एमपी को यह भी लग रहा है कि राजस्थान उनके हिस्से का पानी ले लेगा। 

  3. तीसरा मामला अंतर-राज्य विवाद पर केंद्र के दखल का है। ऐसे अंतर-राज्य विवादों को केंद्र साथ बैठकर हल कराता है। लेकिन ईआरसीपी मामले में कई बैठकों के बाद भी पेच 50 फीसदी डिपेंडेबिलिटी के चलते डीपीआर पर अटका हुआ है।


इसी सिलसिले में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के सचिव ने राजस्थान के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर निर्देश दिया कि जब तक मध्य प्रदेश की समस्या का समाधान नहीं हो जाता, तब तक ईआरसीपी पर सभी तरह के काम बंद कर दिए जाएं। 


इसके जवाब में मुख्यमंत्री श्री गहलोत ने पूछा कि पानी राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र को हस्तक्षेप ही नहीं करना चाहिए। साथ ही, राज्य द्वारा अपनी सीमाओं के भीतर अपने हिस्से के पानी को स्वयं की लागत पर प्रयुक्त किया जा रहा है, ऐसे में केंद्र सरकार, राज्य सरकार को काम रोकने के लिए कैसे कह सकती है। उन्होंने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत पर ईआरसीपी के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करने का भी आरोप लगाया। साथ ही कहा कि राज्य अब इसे अपने संसाधनों से ही पूर्ण करने की कोशिश करेगा।


2.3. तीनो आपत्तियों का विश्लेषण

2.3.1.  डिपेंडेबिलिटी 

प्रथम आपत्ति डिपेंडेबिलिटी को लेकर है। वर्तमान में राजस्थान सरकार ने 50 प्रतिशत निर्भरता पर DPR बना राखी हैं क्योंकि इसमें राजस्थान के कैचमेंट यील्ड एवं मध्य प्रदेश की 10% यील्ड पर 3510 MCM पानी उपलब्ध हैं, जबकि ERCP के लिए 3510 MCM पानी की ही आवश्यकता है। इसलिए पेयजल एवं सिंचाई की आवश्यकता आराम से पूर्ण हो जाएगी।

पानी की उपलब्धता (MCM में)

50% निर्भरता पर 

75% निर्भरता पर 

राजस्थान के कैचमेंट यील्ड एवं मध्य प्रदेश की सरप्लस यील्ड पर 

7878

3393

राजस्थान के कैचमेंट यील्ड एवं मध्य प्रदेश की 10% यील्ड पर 

3921

1744

ERCP के लिए आवश्यक पानी

3510

1744


लेकिन केंद्र सरकार 75 प्रतिशत निर्भरता पर DPR बनाने की कह रही हैं, जिस पर केवल 1744 MCM पानी ही उपलब्ध है। इससे पेयजल हेतु मांग 1723.5 MCM को पूर्ण करने के पश्चात केवल 21 MCM जल ही शेष रहेगा। ऐसे में सिचाई एवं उद्योगों की आवश्यकता के लिए पानी की मांग की पूर्ति नहीं हो सकेगी, जिससे जल संकट की समस्या हल होने की बजाय बनी रहेगी।


विवरण

मांग (MCM में)

पेयजल हेतु मांग

1723.5

उद्योगों के लिए आरक्षित

286.4

सिंचाई के लिए आरक्षित

1500.4


ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा 75 प्रतिशत डिपेंडेबिलिटी का मानदंड राज्य के हित में नहीं हैं। फिर भी नियमों के अनुसार भले ही 75 प्रतिशत निर्भरता पर DPR का होना जरुरी हो, परन्तु जल विवाद प्राधिकरण के निर्णय और केंद्र सरकार का एक सर्कुलर इसमे रियायत देते हैं। कावेरी एवं कृष्णा प्राधिकरण 75 प्रतिशत से कम के कई प्रोजेक्ट्स को सही ठहरा चूका है। वर्ष 1983 में जारी केंद्र सरकार के एक सर्कुलर में कहा गया है कि 50 प्रतिशत निर्भरता पर प्रोजेक्ट्स बनाये जा सकते है, जहां पानी की कमी है। इस प्रकार केंद्र सरकार चाहे तो मौजूदा 50 प्रतिशत निर्भरता पर आधारित डीपीआर के आधार पर भी राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दे सकती हैं।


2.3.2.  मध्य प्रदेश से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC)

राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के मध्य चंबल के पानी का बंटवारा वर्ष 2005 में जयपुर में आयोजित इंटर-स्टेट वाटर कंट्रोल बोर्ड की बैठक में हुआ था। इसमें तय हुआ था कि दोनों राज्य अपने जलग्रहण क्षेत्र के पानी के साथ-साथ दूसरे राज्य के जलग्रहण क्षेत्र से 10% पानी का उपयोग कर सकते है। 


मध्य प्रदेश ने पार्वती नदी की सहायक नदी नेवज नदी पर मोहनपुरा बांध और कालीसिंध नदी पर कुंडलिया बांध का निर्माण किया है, जिससे वहां पर लगभग 2.65 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र का विकास हुआ है। इनके निर्माण पर राजस्थान ने आपत्ति दर्ज नहीं की, न ही जल आयोग ने प्रदेश की NOC मांगी। जलशक्ति मंत्रालय ने भी सवाल नहीं उठाये थे। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2017 में बांधों के निर्माण के बाद अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त किया गया था।


राजस्थान सरकार ने कहा है कि ईआरसीपी पर मध्य प्रदेश की आपत्ति की आवश्यकता निराधार है, क्योंकि उसने वर्ष 2005 में आयोजित अंतर्राज्यीय बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार अपनी परियोजनाओं को मंजूरी दी थी। साथ ही, राजस्थान सरकार ने केंद्रीय जल आयोग के वर्ष 2010 के दिशानिर्देशों के अनुसार ही विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की है।


2.3.3.  केंद्र की भूमिका 

तीसरी आपत्ति केंद्र की भूमिका के बारे में हैं। ऐसे अंतर-राज्य विवादों को केंद्र साथ बैठकर हल कराता है। लेकिन ईआरसीपी मामले में कई बैठकों के बाद भी पेच 50 फीसदी डिपेंडेबिलिटी के चलते डीपीआर पर अटका हुआ है। यहाँ पर केंद्र सरकार की भूमिका असहयोगपूर्ण नजर आ रही है। केंद्र सरकार, राजस्थान के प्रति न केवल भेदभावपूर्ण रवैया अपना रही है बल्कि ईआरसीपी के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करने का कार्य कर रही है।


खंड II


3.1. ईआरसीपी राजनीतिक मुद्दे के रूप में

ईआरसीपी ऐसा मुद्दा बन गया है, जो श्रेय लेने की लड़ाई में फस गया है। भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार ने इसकी परिकल्पना की थी और प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अपने वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावी भाषण में इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देने का वादा किया था। इस परियोजना की आवश्यकता इतनी अपरिहार्य है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद अशोक गहलोत ने भी इसे दर्जा देने की मांग को केंद्र के समक्ष बार-बार दोहराया है। लेकिन अशोक गहलोत की मांग पर जल संसाधन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कभी भी सकारात्मक प्रतिक्रिया नही दी। वे चाहते तो अपने राज्य के हित पूर्ण करने का प्रतिनिधि धर्म निभा सकते थे। गहलोत ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने का इरादा जाहिर किया है। जब केंद्र सरकार ने रोक लगाने का आदेश किया तो गहलोत ने इसकी संवैधानिकता पर सवाल उठा कर सिद्ध कर दिया कि भाजपा इस परियोजना के पक्ष में नहीं है और पूर्वी राजस्थान के जल संकट की समस्या के समाधान हेतु अनिच्छुक है। अब भाजपा के लिए यह गले की फांस बनता जा रहा हैं, क्योंकि उहोने दर्जा देने के प्रति उदासीनता दर्शाई हैं। ऐसे में इसे दर्जा मिलने और नहीं मिलने दोनों ही स्थिति में कांग्रेस को फायदा होने की संभावना बन रही हैं।


निष्कर्ष 

पूर्वी राजस्थान में पेयजल एवं सिंचाई की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ईआरसीपी का क्रियान्वयन बहुत जरुरी है। इसके समय पर क्रियान्वयन हेतु जरुरी है कि इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा यथाशीघ्र प्रदान किया जाए। मानसून काल में व्यर्थ बहकर जाने वाले पानी को इसमें स्थानांतरित करके बाढ़ एवं सूखे की समस्या का समाधान प्रभावी तरीके से किया जा सकता हैं।



संदर्भ

Eastern Rajasthan Canal Project takes political twist after Centre’s directive to stop work

https://www.thehindu.com/news/national/other-states/eastern-rajasthan-canal-project-takes-political-twist-after-centres-directive-to-stop-work/article65600112.ece


राईसेम में सहकारी निरीक्षकों के आधारभूत प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन

सहकारिता अधीनस्थ सेवा के निरीक्षकों का फाउंडेशन कोर्स हरीश चन्द्र माथुर-राजस्थान लोक प्रशासन संस्थान (HCM-RIPA), जयपुर के मार्गदर्शन में राजस्थान सहकारिता शिक्षा एवं प्रबंध संस्थान (राईसेम), झालाना, जयपुर द्वारा आयोजित किया जाता है। RAS-2018 के माध्यम से नियुक्त निरीक्षकों का प्रशिक्षण दो समूहों में आयोजित किया गया, पहले समूह ने 11 मई 2011 से लेकर 5 जुलाई 2022 तक और दुसरे समूह ने 7 जुलाई 2022 से लेकर 30 अगस्त 2022 तक प्रशिक्षण प्राप्त किया। मेरा नंबर 80 लोगो के प्रथम समूह में ही आ गया था,  जबकि एक्सटेंशन लेने वाले और शेष अन्य साथियों का प्रशिक्षण कॉल दुसरे समूह में आया। ट्रेनिंग आर्डर आते ही हमने अपने-अपने कार्यालयों से कार्य मुक्त आदेश (Relieving order) प्राप्त किया और जयपुर के लिए रवाना हो गये। झालाना में राईसेम संस्थान स्थित हैं, इससे 400 मीटर की दुरी पर राईसेम हॉस्टल स्थित है। सबसे पहले हम हॉस्टल गये, जहां पर दो लोगो को एक रूम आवंटित किया गया। इसके बाद हम संस्थान गये, जहां पर अपने पदस्थापित कार्यालय से कार्यमुक्त आदेश, छ हजार रूपये हॉस्टल फीस की रसीद, 5-5 पासपोर्ट एवं स्टाम्प साइज़ फोटो जमा करवा कर एक आवेदन पत्र को भरके जमा करवाया। इसके बाद हमे अगले सप्ताह के कार्यक्रमों की सूची का एक पेज दिया गया।

उदघाटन समारोह
12 मई को उद्घाटन समारोह का कार्यक्रम था, इसमें माननीय सहकारिता मंत्री श्री उदय लाल आंजना जी मुख्य अतिथि थे। इस कार्यक्रम में OTS के महानिदेशक श्री वेंकटेश्वर, सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार श्री मुक्तानंद अग्रवाल भी शामिल हुए। इसके अलावा राईसेम की निदेशक श्रीमती शिल्पी पांडे, अतिरिक्त निदेशक श्री मोरार सिंह जाड़ावत, उप रजिस्ट्रार श्रीमती सारिका गुप्ता एवं सहायक रजिस्ट्रार श्रीमती सीमा मालावत उपस्थित रही। इस समारोह के शुरू होने से पूर्व सभी को एक फोल्डर दिया गया, जिसमे एक प्रशिक्षण निर्देशिका, डायरी और एक पेन था, साथ ही एक पहचान पत्र दिया गया था।

कार्यक्रम में सहकारिता मंत्री ने कहा कि सहकारिता किसानों से जुड़ा हुआ विभाग है। इसलिए संवेदनशील होकर किसानों की समस्याओं का सुलझाने का आव्हान किया। वही HCM-RIPA के महानिदेशक डॉ. आर. वेंकटेश्वरन ने कहा कि 3D-ड्यूटी, डिग्निटी एवं डिसिप्लिन का अपने कार्य के दौरान ध्यान रखे और नियमों की वाख्या जनता के हित में करे। रजिस्ट्रार मुक्तानंद अग्रवाल जी ने कहा कि सहकारिता के समक्ष अनेक चुनौतियां है फिर भी सहकारिता की प्रासंगिकता बनी हुई है। प्रशिक्षण के दौरान गंभीरता से सीखे, एक दुसरे की मदद करे और परिश्रम करके अपनी दक्षताओं में सुधार करे।

क्लास रूम एक्टिविटीज
अवकाश के दिनों को छोड़कर दो सत्रों में कक्षाये आयोजित होती थी। फाउंडेशन कोर्स के पाठ्यक्रम में 3 पेपर थे- 
  • प्रथम पेपर- राजस्थान की राजव्यवस्था, लोक प्रशासन, योजना एवं नीतियां।
  • द्वितीय पेपर - राजस्थान सेवा नियम (RSR), सामान्य वित्तीय एवं प्रशासनिक नियम (GF&AR), TA Rule।
  • तृतीय पेपर- कंप्यूटर एवं सूचना प्रोद्योगिकी।
इन पेपर में उल्लेखित टॉपिक पर कई विशेषज्ञों द्वारा सेशन लिए गये। इसके अलावा सहकारिता अधिनियम, ऑडिट से संबंधित कक्षाएं भी विभागीय जानकारी के लिए आयोजित की गई। तृतीय पेपर में कोई टॉपिक्स को कंप्यूटर लैब में प्रायोगिक तौर पर समझाया गया।
इसके अलावा कुछ सत्र गैर-शैक्षणिक गतिविधियों के थे, जिन्हें द्वितीय पारी में आयोजित किया गया था। ये व्यक्तित्व विकास, पारस्परिक संबंध निर्माण के लिए महत्वपूर्ण थे-
  • आइस ब्रेकिंग सेशन : यह पहले दिन आयोजित किया गया, इसमें आपसी जान पहचान को बढ़ावा देने के लिए बहुत सारी गतिविधियां करवाई गई थी। जैसे- लोगो को गृह जिले, जन्म तिथि के आधार पर साथ में खड़े करना, उनकी पारस्परिक विशेषताओं/समानताओं को पूछना आदि  
  • अंत्याक्षरी : इसमें गाने और नृत्य की गतिविधियां शामिल थी।
  • वाद-विवाद (Debate) : इसके लिए प्रशिक्षणार्थियों ने ही टॉपिक निर्धारित किए थे। 
  • मेडिकल चेक अप : डॉक्टर्स की टीम ने विभिन्न टेस्ट लिए और स्वास्थ्य को लेकर परामर्श प्रदान किया।
  • ऑफिसियल विजिट : झालाना में ही स्थित भामाशाह टेक्नो हब और भामाशाह स्टेट डाटा सेंटर का 40-40 के दो समूहों में विजिट करवाया गया।
हॉस्टल लाइफ
दो ट्रेनीज को एक रूम आवंटित किया गया था। रूम में बिस्तर, कुर्सी, मेज, एसी एवं अटैच्ड बाथरूम की सुविधा उपलब्ध थी। मेस में बेड टी, मॉर्निंग ब्रेकफास्ट, लंच एवं डिनर के अलावा दिन में 2 बार चाय-बिस्कुट शामिल थे। आवासीय सुविधा का कोई शुल्क नहीं लिया गया, लेकिन भोजन के 300 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से शुल्क लिया गया था।  हॉस्टल में होने वाले क्रियाकलापों में निम्न गतिविधियां शामिल थी- जैसे खेलकूद, जिम, मॉर्निंग एक्सरसाइज, बर्थडे सेलिब्रेशन। इसके अलावा उन सभी गतिविधियों के माध्यम से ट्रेनीज मनोरंजन करते थे, जो कि कॉलेज लाइफ में चलती है। कई स्थानों पर लघु समूहों में घुमने चले जाते थे।

परीक्षा 
प्रशिक्षण कार्यक्रम में ऊपर वर्णित तीन पेपरों के लिए एग्जाम आयोजित की गई थी। परीक्षा HCM-RIPA द्वारा करवायी गई थी। प्रोबेशन के बाद स्थायीकरण (Fixation) के लिए इन परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना आवश्यक था। इन तीन पेपर के अलावा टर्म पेपर एवं बुक रिव्यु और अन्य गतिविधियों के आधार पर भी अंक प्रदान किए गये थे।

निष्कर्ष
इस प्रकार फाउंडेशन ट्रेनिंग प्रोग्राम में उन सभी आयामों पर जोर दिया गया, जो कि व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होते हैं। हर सप्ताह ट्रेनीज से एक फीडबैक फॉर्म भरवाया जाता था, इससे ट्रेनिंग प्रोग्राम को अधिक बेहतर बनाने में मदद मिलती थी। 

सहकारिता निरीक्षक की प्रोफाइल, कार्य एवं उत्तरदायित्व

RAS-2018 के सेवा आवंटन में मुझे सहकारिता अधीनस्थ सेवा आवंटित हुई, जिसके माध्यम से विभिन्न कार्यालयों में सहकारिता निरीक्षकों की नियुक्ति की जाती हैं। सेवा आवंटित होते ही 27 दिसम्बर 2021 को हमे नेहरु सहकार भवन जयपुर में आकर नियुक्ति ग्रहण करने को कहा गया था। निर्धारित तिथि को वहां पहुंचने पर हमसे नियुक्ति ग्रहण पत्र, शपथ पत्र एवं पोस्टिंग के लिए पांच जिलों की प्राथमिकता भरवाई गई। शपथ पत्र जुडिशल स्टाम्प पर देना था, तो थोड़ी ही दुरी पर स्थित हाई कोर्ट परिसर पर जाकर सभी साथी बनवाकर लाये थे। इस शपथ पत्र पर दो Surety और दो ही गवाहों के हस्ताक्षर करवाने थे, जो कि सभी ने एक दुसरे से करवाए थे। कुछ ऐसे भी नवनियुक्त निरीक्षकगण थे, जो RAS-2021 की मुख्य परीक्षा की तैयारी या पुरानी नोकरी से कार्यमुक्त नहीं होने या फिर अन्य कारणों से अपनी नियुक्ति ग्रहण करने की तिथि में विस्तार (Extension) चाहते थे। ऐसे साथी नियुक्ति संबंधित प्रपत्रों को भरने के बजाय विस्तार (Extension) हेतु सादे कागज़ पर प्रार्थना पत्र देकर आ गये थे। अगले दिन नियुक्ति ग्रहण करने वाले साथी चतुर्थ तल पर स्थित कांफ्रेंस हॉल में उपस्थित हुए, वहां पर सर्विस बुक बनवाई गई तथा संयुक्त रजिस्ट्रार (प्रशासन) मैडम ने उदबोधित किया और कई साथियों की शंकाओं का समाधान भी किया। तीसरे दिन भी हम सहकार भवन गए, हमे उम्मीद थी कि भरी गई प्राथमिकताओं के आधार पर किसी न किसी जिले में पोस्टिंग दे दी जाएगी। परन्तु पोस्टिंग आर्डर 21 जनवरी 2022 को जाकर जारी हो पाए। 

पोस्टिंग आर्डर

पोस्टिंग आर्डर जारी होने पर सभी साथियों को अलग-अलग कार्यालयों में पोस्टिंग दी गई। ये पोस्टिंग जिला स्तर पर उप रजिस्ट्रार कार्यालय एवं विशेष लेखा परीक्षक कार्यालय, जोनल स्तर पर जोनल रजिस्ट्रार कार्यालय एवं रीजनल ऑडिट ऑफिस तथा जयपुर स्थित प्रधान कार्यालय में दी गई।

पोस्टिंग देने में सभी प्रकार के समीकरण सामने आये। जैसे कि कुछ लोगों को अपने गृह जिले की प्रथम प्राथमिकता प्राप्त हो गई थी, कुछ लोगों को  दूसरी या अगली प्राथमिकता के आधार पर पोस्टिंग दे दी गई। कुछ लोगों को पांच जिलों की प्राथमिकता से भिन्न स्थान पर पोस्टिंग दी गई। इनमे ज्यादातर ऐसे निरीक्षक थे, जिन्होंने किसी प्रकार की डिजायर नहीं लगाई थी। डिजायर लगाने वालों को अपनी ऐच्छिक जगह पर पोस्टिंग मिल गई थी। कुछ ऐसे जिले होते है, जहां के स्थानीय व्यक्ति नहीं होने के कारण स्वीकृत पद खाली पड़े रहते हैं। ऐसे में ऐसी जगहों पर प्राथमिकता क्रम में नहीं होने के बावजूद भी पोस्टिंग दी गई थी। जैसे कि झालावाड, बारा, धौलपुर आदि। बाहर से आने वाले भी कुछ दिनों में अपना स्थानान्तरण करवा लेते हैं, ऐसे में इन जिलों में फ्रेशर को पोस्टिंग दी जाती रही है।

सहकारिता निरीक्षक की प्रोफाइल से पहले,  मैं आपको सहकारिता विभाग के विभिन्न कार्यालयों की कार्यप्रणाली से अवगत करा देता हूँ।

विभिन्न कार्यालय एवं उनके उत्तरदायित्व 

  • सहकारिता विभाग में सबसे निचले स्तर पर यूनिट ऑफिस होता है, जो कि सामान्यतया जिला स्तर पर होती हैं। राजस्थान में इस समय 37 यूनिट ऑफिस हैं, ये 33 जिलों के अतिरिक्त ब्यावर (अजमेर), खैरथल (अलवर), अनुपगढ, जयपुर (ग्रामीण) में स्थित हैं। ये यूनिट उप रजिस्ट्रार (DR ऑफिस) के अधीन कार्य करती हैं। सहकारिता विभाग के यूनिट एरिया के सभी काम  इस कार्यालय द्वारा किए जाते हैं, जैसे संस्थाओं का पंजीकरण, निर्वाचन, परिसमापन आदि। 
  • यूनिट ऑफिस के स्थान पर एक और कार्यालय होता है- विशेष लेखा परीक्षक कार्यालय (SAऑफिस)। इसका दायित्व इकाई कार्यालय में पंजीकृत सोसाइटियों की ऑडिट करवानी होती हैं। यह कार्यालय एक सहायक रजिस्ट्रार (AR) स्तर के अधिकारी के नियंत्रण में होता हैं।
  • इसके बाद जोनल स्तर पर भी दो कार्यालय होते हैं। प्रथम, जोनल रजिस्ट्रार जो कि अतिरिक्त रजिस्ट्रार (AD) स्तर का अधिकारी होता है। द्वितीय, क्षेत्रीय अंकेक्षण अधिकारी (RAO) जो कि संयुक्त रजिस्ट्रार (JR) स्तर का अधिकारी होता हैं।
  • इसके बाद सर्वोच्च स्तर पर प्रधान कार्यालय होता हैं, जहां पर क्षेत्र-वार बहुत सारे डिवीज़न हैं। इन डिवीज़न को एक संयुक्त रजिस्ट्रार स्तर का अधिकारी संभालता हैं, उसकी सहायता के लिए सहायक रजिस्ट्रार सहित अन्य अधिकारी होते हैं। इन डिवीज़न एवं जोनल कार्यालयों को मॉनिटर करने के लिए प्रधान कार्यालय में सीनियर स्केल के अतिरिक्त रजिस्ट्रार होते हैं।
  • प्रधान कार्यालय में सर्वोच्च स्तर का अधिकारी रजिस्ट्रार होता हैं। राजस्थान सहकारिता अधिनियम (RCS Act) 2001 के सभी कार्य रजिस्ट्रार के नाम से ही होते है। सभी यूनिट कार्यालय इन्ही की प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग करते हैं। परम्परागत रूप में रजिस्ट्रार एक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को नियुक्त किया जाता रहा हैं, हालांकि अधिनियम में किसी प्रकार का उल्लेख नहीं हैं।
  • सहकारी समितियों के प्रधान कार्यालय के बाद सचिवालय के अधिकारी होते हैं, जो विभाग के प्रधान सचिव के अधीन होते हैं।

SA ऑफिस झालावाड
पोस्टिंग आर्डर के माध्यम से मुझे विशेष लेखा परीक्षक के कार्यालय झालावाड में पोस्टिंग मिली थी। 24 जनवरी 2022 को मैंने यहां पर आकर कार्यग्रहण कर लिया। यह मेरी प्राथमिकता में शामिल नहीं था, फिर भी मुझे यहाँ पर पोस्टिंग दी गई। इसका एक कारण तो यह हो सकता हैं कि यहाँ पर स्वीकृत सभी पद खाली पड़े हुए थे। ऑडिट सहायक का चार्ज जो कि एक सीनियर इंस्पेक्टर के पास होना चाहिए, वो भी ऑफिस के LDC को दे रखा था। दूसरा यह कि मैंने किसी प्रकार की कोई डिजायर भी नहीं लगाईं थी। 

यहां पर SA का चार्ज भी उप रजिस्ट्रार साब को दे रखा था। वे बहुत ही सपोर्टिव थे, उन्होंने मुझे मार्च 2022 में होने वाली RAS-2021 की मुख्य परीक्षा की तैयारी पर ध्यान देने के बारे में बोला। इसलिए परीक्षा के बाद मार्च में जाकर ही मैंने ऑडिट सहायक के रूप में कार्य शुरू किया। चूंकि SA साब का पद रिक्त था और अतिरिक्त चार्ज के भरोसे चल रहा था, साथ ही कोई सीनियर इंस्पेक्टर भी कार्यरत नहीं था। इसलिए काफी दिनों तक मुझे अपना काम ही समझ नहीं आया। 

ऐसी स्थिति में मैंने RCS Act, 2001 और RCS Rule, 2003 का अध्ययन शुरू किया तो कुछ चीजे ऑडिट के बारे में मेरी समझ में आई। जिनका विवरण इस प्रकार हैं-
  • RCS Act के अनुसार प्रत्येक सोसाइटी को प्रति वर्ष अपनी ऑडिट करवाकर ऑडिट रिपोर्ट को आम सभा में सभी सदस्यों के सामने प्रस्तुत करनी होती हैं।
  • प्रत्येक सोसाइटी को वित्तीय वर्ष की समाप्ति के उपरांत दो माह के भीतर ऑडिटर नियुक्ति का प्रस्ताव पारित करना होता हैं और इसकी सूचना SA ऑफिस में देनी होती हैं। अगर दो माह के भीतर SA ऑफिस को प्रस्ताव प्राप्त नहीं होता हैं तो ऑफिस अपनी तरफ से ऑडिटर नियुक्त कर देता हैं। ऐसी स्थिति में SA ऑफिस द्वारा विभिन्न एम्पनेल चार्टेड एकाउंटेंट/फ़र्म/या विभागीय ऑडिटर को शेष सोसाइटियों का ऑडिट आवंटन जारी किया जाता हैं।
  • प्रस्ताव या आवंटन के माध्यम से प्राप्त सोसाइटी की ऑडिट सितम्बर तक हो जानी चाहिए। इसके बाद विलंब पर नोटिस से लेकर आगे की कार्यवाही की जाती हैं।
  • ऑडिट रिपोर्ट में अलग से ऑडिट आक्षेप एक साथ उल्लेखित होते हैं। सोसाइटी को इन आक्षेपों को दूर करने के लिए SA ऑफिस द्वारा एक माह का समय दिया जाता हैं। इसकी अनुसार सोसाइटी द्वारा प्रस्तुत आक्षेप अनुपालना रिपोर्ट की इंस्पेक्टर द्वारा पैरा वाइज जांच की जाती हैं और नोट लिखा जाता हैं कि आक्षेप दूर करने की अनुपालना की गई हैं या नहीं। सभी आक्षेपों की अनुपालना करने की स्थिति में इंस्पेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर SA साब द्वारा आक्षेप निरस्तीकरण प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाता है।
  • आक्षेप अनुपालना रिपोर्ट पर SA साब के निर्णय के विरुद्ध RAO साब को अपील की जा सकती हैं।
  • आक्षेप अनुपालना नहीं करने की स्थिति में SA साब द्वारा उप रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर सोसाइटी के विरुद्ध कार्यवाही की मांग जा सकती हैं।
इस प्रकार ऑडिट ऑफिस के कामकाज का संचालन होता हैं। यहाँ इंस्पेक्टर का काम मुख्यतः इस प्रकार होता हैं : सोसाइटी के प्रस्ताव प्राप्त नहीं होने की स्थिति में आवंटन करवाना। विभागीय निरीक्षकों को आवंटित सोसाइटी की खुद ऑडिट करना। ऑडिट आक्षेपों के अनुपालना की जांच करना। आदि। इस प्रकार देखा जाए तो ऑडिट ऑफिस में स्थित इंस्पेक्टर के पास ज्यादा काम नहीं होता हैं। परंतु ऑडिट इंस्पेक्टर का आराम उप रजिस्ट्रार कार्यालय वालो से देखा नहीं जाता और वे समय-समय पर काम आवंटित करते रहते हैं।

उप रजिस्ट्रार कार्यालय
उप रजिस्ट्रार कार्यालय में कार्यरत इंस्पेक्टर द्वारा विभिन्न काम किए जाते हैं। जिनका विवरण इस प्रकार हैं :
  1. सहकारी समितियों का पंजीकरण: इंस्पेक्टर द्वारा नवीन सोसाइटी के रजिस्ट्रेशन में कागजी कार्यवाही संपन्न करवाई जाती हैं। इसके साथ ही   
  2. आम सभाओं का आयोजन : रजिस्ट्रार साब के निर्देशों के अनुसार आयोजित होने वाली आम सभा इंस्पेक्टर की निगरानी में संपन्न होती हैं। 
  3. सहकारी समितियों में निर्वाचन : सहकारी समितियों में निर्वाचन के दौरान इंस्पेक्टर द्वारा निर्वाचन अधिकारी की भूमिका निभाई जाती हैं। 
  4. सहकारी समितियों की धारा 55 के तहत जांच
  5. सहकारी समितियों का अवसायन एवं अवसायित समिति का पुनर्गठन
  6. गोदाम निर्माण की प्रगति की निगरानी
  7. विभिन्न प्रकार की निगरानी : इंस्पेक्टर द्वारा सक्रिय एवं निष्क्रिय सोसाइटी की जानकारी, समिति की वित्तीय स्थिति, समिति के अनुपयोगी सामान, समिति द्वारा ऋण एवं अनुदान के उपयोग, लाभांश वितरण की प्रगति, राजकीय ऋण एवं ब्याज की वसूली की निगरानी की जाती हैं।
  8. समितियों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन: समिति के स्टॉक का भौतिक सत्यापन भी इंस्पेक्टर द्वारा किया जाता हैं।     
मैं SA ऑफिस में कार्यरत था, फिर भी DR ऑफिस के कई काम मुझे आवंटित किए गये, जैसे कि- पंजीकरण, भौतिक सत्यापन आदि। साथ ही, निर्वाचन के काम के लिए बहुत सारे इंस्पेक्टरों की जरुरत होती हैं, इसलिए सभी कार्यालयों में कार्यरत इंस्पेक्टर की ड्यूटी इसमें लगाईं जाती हैं। झालावाड में हुए ग्राम सेवा सहकारी समितियों के निर्वाचन में मुझे पर्यवेक्षण अधिकारी नियुक्त किया गया था।

जोनल ऑफिस एवं हेड ऑफिस में कार्यरत इंस्पेक्टर विभिन्न कार्यों की प्रगति की समीक्षा करते हैं। इसके अलावा कुछ इंस्पेक्टरों को क्रय-विक्रय सहकारी समितियों के सीईओ का चार्ज दे दिया जाता है।     

निष्कर्ष 
इस प्रकार सहकारिता निरीक्षक का कार्य बहुआयामी प्रकार का है। हालाकि 2013 के संशोधन के बाद इंस्पेक्टरों की निरीक्षण शक्ति को वापस ले लिया गया हैं, इससे वर्क लोड में कमी आई हैं। इसका फायदा उठाकर इंस्पेक्टरों को भावी सुधार के लिए पढाई-लिखाई पर ध्यान देना चाहिए। 

RAS-2018 के संदर्भ में मेडिकल एवं सेवा आवंटन प्रक्रिया

राजस्थान लोक सेवा आयोग, अजमेर द्वारा आयोजित होने वाली RAS परीक्षा में इंटरव्यू के बाद अंतिम परिणाम की घोषणा की जाती है। इस अंतिम परिणाम के आधार पर सेवाओं का आवंटन मेरिट एवं विज्ञापित रिक्तियों के अनुसार किया जाता हैं। सेवा आवंटन से पूर्व मेडिकल टेस्ट एवं पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया भी पूर्ण की जाती हैं। इस आलेख में RAS-2018 को आधार मानकर सेवा आवंटन की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों का विवरण दिया गया हैं।

 RAS-2018 भर्ती की प्रक्रिया काफी लंबी चली थी। जुलाई 2021 में परिणाम घोषित होने के बाद 25 दिसम्बर 2021 को जाकर सफल अभ्यर्थियों को विभिन्न पदों को आवंटित किया गया। RAS के परिणाम एवं पद आवंटन की प्रक्रिया कई मायनों में UPSC से भिन्न हो जाती हैं। इस आलेख में हम UPSC के सापेक्ष तुलनात्मक अध्ययन करते हुए सेवा आवंटन तक की प्रक्रिया को समझेंगे।

परीक्षा में सेवा आवंटन की प्रक्रिया तक के विभिन्न चरण इस प्रकार हैं-

अंतिम परिणाम घोषित होना 

अंतिम दिन के इंटरव्यू के दिन ही अंतिम परिणाम घोषित किया जाता है। अंतिम परिणाम में कुल प्राप्तांकों के आधार पर सभी इंटरव्यू में भाग लेने वाले उम्मीदवारों की श्रेणी-वार रैंक जारी की जाती हैं। इससे यह निर्धारित नहीं हो पाता है कि अंतिम किस रैंक तक उम्मीदवारों को सेवा आवंटन हो जाएगा।

इसके विपरीत UPSC में अंतिम परिणाम में उन ही अभ्यर्थियों को शामिल किया जाता हैं, जिन्हें सेवा आवंटन होना होता हैं। इसका कारण यह हैं कि इंटरव्यू के दौरान ही कार्मिक विभाग मेडिकल टेस्ट एवं पुलिस वेरिफिकेशन की कार्यवाही पूर्ण कर लेता हैं। जबकि RAS में RPSC एवं DOP दोनों के मध्य यह समन्वय नहीं रहता हैं।      

मेडिकल टेस्ट

एक रफ़ सेवा आवंटन कार्मिक विभाग द्वारा किया जाता हैं और इस रफ़ सर्विस एलोकेशन में जिस रैंक तक सेवा आवंटन की संभावना होती हैं, वहां तक रैंक वाले अभ्यर्थियों को संभाग स्तर पर चिकित्सा परीक्षण के लिए भेजा जाता हैं। 

कार्मिक विभाग द्वारा चिकित्सा परीक्षण का कार्यक्रम निर्धारित किया जाता हैं। संभाग स्तर पर स्थित हॉस्पिटल में मेडिकल टेस्ट के लिए अभ्यर्थियों को बुलाया जाता हैं।

मेरा अनुभव 

मेरा मेडिकल सवाई मानसिंह अस्पताल, जयपुर में हुआ था। मेरे साथ कुछ और भी लोग थे। वहां पर हमारी प्रक्रिया दो दिन चली थी, जिसका विवरण इस प्रकार हैं -

प्रथम दिन: हम मेडिकल टेस्ट के लिए निर्धारित रूम के बाहर खड़े थे। तभी कार्मिक विभाग का एक प्रतिनिधि आया और उसने अंदर अभ्यर्थियों की लिस्ट दी। प्रत्येक उम्मीदवार के लिए मूत्र, खून, ECG और X-Ray टेस्ट के लिए पर्ची देकर DOP प्रतिनिधि के साथ हमे संबंधित प्रयोगशालाओं में भेज दिया गया। सभी प्रयोगशालाओं में सैंपल देने के बाद हमे अगले दिन आने की बोला गया ताकि तब तक सैंपल्स की रिपोर्ट आ जाए।

द्वितीय दिन : दुसरे दिन हमे Eye Test के लिए भेज दिया गया। हमारे साथ एक फॉर्म था, जिसमे डॉक्टर ने सभी की आँखों का विवरण लिख दिया। इसके बाद फिर से हम फिजिकल एग्जामिनेशन रूम के बाहर आ गये। यहाँ पर एक डॉक्टर ने सभी को बारी बारी से बुलाकर हर्निया की जांच की। इसके कुछ देर बाद फिजिकल टेस्ट करने वाला डॉक्टर आया, उसने ऊंचाई, छाती का प्रसार, वजन आदि माप नोट की और फ्लेट फीट का टेस्ट भी किया। इस प्रकार सारे टेस्ट होने के बाद हमसे फॉर्म में कुछ और अतिरिक्त जानकारी भरवाई गई। इसके बाद DOP प्रतिनिधि ने कहा कि अब आप जा सकते हो।

री-मेडिकल

कार्मिक विभाग का प्रतिनिधि सारे टेस्ट होने के बाद आवेदक के फॉर्म को ले जाता हैं। उस फॉर्म में सभी टेस्टों के बारे में उम्मीदवार का विवरण होता हैं। फॉर्म का कार्मिक विभाग द्वारा परीक्षण किया जाता हैं और उसके उपरांत कुछ मामलों में कुछ दिन के अंतराल के बाद उम्मीदवारों को री-मेडिकल के लिए बुलाया जाता है। कुछ अभ्यर्थियों के कुछ मेडिकल टेस्ट मापदंडों के अनुरूप नहीं आते हैं, ऐसे अभ्यर्थियों को कुछ दिन के उपरांत री-मेडिकल के लिए बुलाया जाता हैं। कुछ उम्मीदवार विभिन्न कारणों से अनुपस्थित रह जाते है, ऐसे अभ्यर्थियों को दूसरा अवसर दिया जाता हैं।

कुछ अन्य उम्मीदवारों को मेडिकल के लिए बुलावा

मेडिकल टेस्ट होने तक बहुत सारे उम्मीदवार अपने को मिलने वाली पोस्ट का अंदाजा लगा चुके होते हैं और अगर उनकी सेवा में कोई बदलाव की आशंका नही हो या पहले से कही दूसरी जगह अधिक लाभदायक पद पर हो तो ऐसे अभ्यर्थी मेडिकल टेस्ट से अनुपस्थित रह जाते हैं। इंटरव्यू रिजल्ट और मेडिकल की प्रक्रिया तीन से चार महीने ले लेती हैं, ऐसे में कुछ लोगो का UPSC में भी हो जाता हैं तो वे मेडिकल देने के बाद भी कार्मिक विभाग में शपथ पत्र देकर अपनी अभ्यर्थना वापस ले लेते हैं। इस प्रकार कुछ रिक्तियां सृजित हो जाती हैं। इन रिक्तियों को भरने के लिए संबंधित वर्ग से मेरिट के अनुसार अगले अभ्यर्थियों को मेडिकल के लिए बुलाया जाता हैं। यह एक प्रकार से अप्रत्यक्ष प्रतीक्षा सूची का कार्य करती हैं। इससे 5-10 अभ्यर्थी आसानी से लाभान्वित हो जाते हैं।   

सेवा आवंटन 

मेडिकल टेस्ट हो जाने वाले अभ्यर्थियों का समानांतर रूप से पुलिस वेरिफिकेशन भी कराया जाता हैं। सभी अभ्यर्थियों के मेडिकल टेस्ट और पुलिस वेरिफिकेशन हो जाने के बाद सर्विस एलोकेशन जारी कर दिया जाता हैं। यह आवंटन कार्मिक विभाग द्वारा संबंधित विभागों को भेजा जाता है, फिर संबंधित विभाग द्वारा ही अभ्यर्थियों को अग्रिम निर्देशों के साथ नियुक्ति की सूचना भेजी जाती हैं।   

प्रशिक्षण एवं फील्ड पोस्टिंग 

सेवा आवंटन आने के बाद संबंधित विभागों में रिपोर्ट करना होता हैं। जो अभ्यर्थी विभिन्न कारणों से तत्काल नियुक्ति नहीं चाहते हैं, वे नियुक्ति तिथि में विस्तार (Extension) के लिए आवेदन दे देते हैं। बाकी उम्मीदवार नियुक्ति ग्रहण संबंधित आवेदन एवं शपथ पत्र को भरके जमा करवाते हैं। ऐसी सेवाएँ जिनमे तत्काल प्रशिक्षण शुरू होना है, उनमे नियुक्ति संबंधित विस्तार (Extension) की अनुमति नहीं होती हैं।  

कुछ सेवाओं में सीधे HCM-RIPA, Jaipur में ही रिपोर्ट करना होता हैं, जैसे- RAS, RPS, RAcS एवं अन्य। इनमे नियुक्ति ग्रहण संबंधित कागजी कार्यवाही प्रशिक्षण स्थल पर ही हो जाती हैं, विभागों में जाने की जरुरत नहीं रहती। यही पर संबंधित विभागों के प्रतिनिधि आ जाते हैं।

नियुक्ति ग्रहण करने के बाद में कुछ सेवाओं में तत्काल आधारभूत प्रशिक्षण शुरू हो जाता हैं। राज्य सेवाओं का प्रशिक्षण OTS, जयपुर में होता हैं। कुछ सेवाओं का प्रशिक्षण RIPA के अन्य केन्द्रों उदयपुर एवं कोटा में भी होता हैं। अधीनस्थ सेवाओं में कुछ विभागों के अपने प्रशिक्षण केंद्र होते हैं, जैसे तहसीलदार सेवा के लिए अजमेर में, सहकारिता अधीनस्थ सेवा के लिए झालाना में राईसेम आदि।

जिन सेवाओं में तत्काल प्रशिक्षण शुरू नहीं होता, उनमे फिल्ड में अटेच कर दिया जाता हैं या पोस्टिंग दे दी जाती हैं। ऐसी स्थिति में प्रशिक्षण के लिए बाद में बुलाया जाता हैं। 

UPSC के सापेक्ष तुलना 

UPSC के सापेक्ष तुलना करने पर हम पाते है कि मेडिकल एवं पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया इंटरव्यू के समानांतर पूर्ण की जा सकती हैं। इसके लिए कार्मिक विभाग एवं  RPSC के मध्य समन्वय स्थापित करना होगा। इससे प्रक्रिया को तीव्र करने में सहायता मिलेगी। 

निष्कर्ष

इस प्रकार RAS में अंतिम परिणाम से लेकर नियुक्ति तक की प्रक्रिया में विभिन्न चरण शामिल हैं, जो कई मायनों में केन्द्रीय सिविल सेवाओं से भिन्न हैं। इसमें अत्यधिक समय लगने की समस्या काफी गंभीर हैं, जिसे कम किए जाने की आवश्यकता हैं।      

UPSC कोचिंगों में कंटेंट डेवलपर के रूप में कैरियर की समीक्षा

कंटेंट डेवलपर या कंटेंट राइटर कोचिंग क्षेत्र में स्थायित्व ग्रहण करने की और बढ़ता हुआ एक क्षेत्र हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसमें कंटेंट डेवलप करना होता हैं। कोचिंग क्षेत्र में कई प्रकार के कंटेंट डेवलप किये जाते हैं, जैसे कि- स्टडी मटेरियल, करेंट अफेयर्स, डेली न्यूज़, मंथली मैगज़ीन, टेस्ट सीरीज, मॉडल आंसर इत्यादि। ये सब कंटेंट कोचिंग में पढने वाले छात्रों को उपलब्ध कराया जाता हैं।  कंटेंट एक प्राइमरी प्रोडक्ट की तरह भी कार्य करता हैं। इसी कंटेंट के आधार पर टीचर अध्यापन कार्य करवाता हैं, टेस्ट सीरीज करवाई जाती हैं और फिर मॉडल आंसर उपलब्ध कराये जाते हैं। इसी कंटेंट को एक्सप्लेनेशन विडियो बनाने के लिए भी प्रयुक्त किया जाता हैं। इस प्रकार कंटेंट कोचिंग इंडस्ट्री में एक प्राइमरी प्रोडक्ट की भूमिका निभाता हैं और कंटेंट बनाने वाले बेक एंड प्लेयर्स की भूमिका में होते हैं। कंटेंट डेवलपर की भूमिका टीचर के विपरीत होती हैं, वह छात्रों से सीधा जुड़ने के कारण फ्रंट एंड प्लेयर होता हैं। आजकल कोचिंग क्षेत्र अपनी गहरी जड़े जमा चूका हैं, कोटा, जयपुर, पटना, दिल्ली जैसे शहरों की अर्थव्यवस्था में कोचिंग क्षेत्र बड़ी भूमिका निभा रहा हैं। ऐसे में फ्रंट एवं बेक एंड दोनों की समान आवश्यकता महसूस की जा रही है। दोनों ही प्रोफाइल स्थायित्व ग्रहण कर रही हैं।

विभिन्न प्रश्नों के माध्यम से इस आलेख में मैं अपने अनुभव को साझा कर रहा हूँ।

आपने इसे ज्वाइन करने का निर्णय क्यों लिया?

मैं 2015 में अपनी ग्रेजुएशन पूर्ण होने के बाद से लगातार यूपीएससी द्वारा आयोजित होने वाली सिविल सेवा की परीक्षा दे रहा था। तैयारी के माध्यम से मैंने अपनी एकेडमिक स्किल्स में काफी वृद्धि की थी। मैंने तीन बार मुख्य परीक्षा में कटऑफ के बहुत नजदीक अंक प्राप्त किए थे। 2016 में मेरा इंटरव्यू कॉल 12 मार्क्स (718/730) से रह गया था। 2018 में मैं UPSC सिविल सेवा के प्रीलिम्स में ही फ़ैल हो गया था परन्तु RAS का प्रीलिम्स पास हो गया था। ऐसे में 2019 में आयोजित RAS की मुख्य परीक्षा देने के बाद मैं पूरी तरीके से फ्री था, तब मैंने सोचा था कि अपने एकेडमिक नॉलेज का उपयोग करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त पारिवारिक वित्तीय दबावों के कारण भी रोजगार प्राप्त करना आवश्यक था। चूँकि कोचिंग वाले वेतन भी अच्छा प्रदान कर रहे थे, जो कि सरकारी जॉब के समान ही था। इसलिए मुझे यह बेहतर विकल्प लगा।

आपकी जोइनिंग किस प्रकार हुई?    

ज्वाइन करने का निर्णय लेने के बाद, मुझे एक दोस्त ने बताया कि एक नई कोचिंग यूथ डेस्टिनेशन के नाम से शुरू हुई हैं, उसने एक दिन विज्ञापन जारी किया था। इसके बाद मैं कोचिंग के ऑफिस गया और HR को अपना रिज्यूमे दिया, तीन दिन बाद उन्होंने मुझे टेस्ट के लिए बुलाया और कुछ सैंपल लिख कर लाने को कहा। अगले दिन सैंपल सबमिट करने के बाद कंटेंट हेड ने मेरी मुलाकात उच्चाधिकारी से करवाई, जिन्होंने इंटरव्यू लिया। इसके बाद मुझे अगले दिन से आने की बोल दिया, पर कहा कि अभी आप अपने आपको स्थायी नहीं माने, हम आपको सात दिन के ट्रायल पर रख रहे हैं। पर वे मेरे काम से पहले दिन ही खुश हो गये थे, तो उन्होंने अगले दिन कुछ दस्तावेज और बैंक डिटेल्स उपलब्ध करवाने को कह दिया था। इस प्रकार मेरी फर्स्ट जॉब की शुरुआत हुई। कहते हैं कि हमे अपने को पहली जॉब देने वालो को कभी नहीं भूलना चाहिए, इसलिए मैं भी HR मैडम पूजा शर्मा जी, कंटेंट हेड अतुल मिश्रा जी का बहुत-बहुत आभार व्यक्त करना चाहता हूं।

यूथ डेस्टिनेशन में मेरा वेतन सोलह हजार रूपये था, इसलिए द हिन्दू में प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर मैंने विज़न में भी आवेदन कर दिया था। जहाँ पर लिखित परीक्षा एवं इंटरव्यू के बाद मेरा चयन हो गया था और मेरा वेतन भी वर्तमान से दोगुना (बत्तीस हजार रूपये) था। यूथ डेस्टिनेशन में 35 दिन जॉब करने के बाद, मैंने 27 अगस्त 2019 को विज़न में अपना कैरियर शुरू किया था।

विज़न में कार्य संस्कृति किस प्रकार की थी?

विज़न आईएएस कोचिंग फॉर्मल सेक्टर में कार्य करता हैं, जिसमे हरेक एम्प्लोयी को सभी विधिसम्मत सुविधा प्रदान की जाती हैं। ज्वाइन करते समय कॉन्ट्रैक्ट एक्ट के नियमानुसार ऑफर लैटर जारी किया जाता हैं, जिसमे वेतन, कार्यावधि एवं अन्य चीजों का वर्णन होता हैं। सप्ताह में 6 दिन प्रात: दस बजे से सांय छ: बजे तक कार्यदिवस होता था। सभी नेशनल होलीडे पर अवकाश होता था। बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम था। टेस्ट सीरीज और करंट अफेयर्स के लिए अलग-अलग टीम थी। मैं करेंट अफेयर्स वाली टीम में था।

टीम लीडर द्वारा रोजाना कार्य आवंटन किया जाता था। इसकी सूचना ईमेल के माध्यम से प्रदान की जाती थी। ऑफिस जाने के बाद इसे पूर्ण करना होता था। 1500 शब्दों का काम रोजाना के हिसाब से आवंटित किया जाता था। अगर किसी के टॉपिक पहले कम्पलीट हो जाते तो उसे उन्हें फिर से देखने को कहा जाता था ताकि किसी प्रकार की कोई त्रुटि न रहे। इस प्रकार वर्क लोड ज्यादा नहीं था। कभीकभार ही काम 1800 शब्दों तक पहुंचता था। कार्य कितना ज्यादा है या कितना कम है, यह मैटर नही करता, टीम और टीम लीडर का व्यवहार बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं। टीम लीडर का व्यवहार बहुत ही सपोर्टिव था, वे आगे पढाई के लिए भी प्रोत्साहित करते थे। मेरे टीम लीडर ने प्रारंभ के 3 महीने इंडस्ट्री स्टैण्डर्ड को सिखाने में बहुत ही ज्यादा मदद की। इसलिए मुझे वर्क कल्चर भी बहुत ही ज्यादा अच्छा लगा।

एक कंटेंट डेवलपर में किस प्रकार की स्किल्स होनी चाहिए?

एक कंटेंट डेवलपर में एकेडमिक और टेक्निकल स्किल्स होनी चाहिए। एकेडमिक स्किल्स में सब्जेक्ट का नॉलेज होना चाहिए ताकि प्रासंगिक चीजो को जोड़ा एवं आवश्यकतानुसार हटाया जा सके। उसी प्रकार टेक्निकल स्किल्स में MS-Word, Google Doc, गूगल इनपुट टूल और गूगल सर्च के बारे में जानकारी होनी चाहिए।

कंटेंट डेवलपर की भूमिका एवं उत्तरदायित्व क्या होती हैं?

एक कंटेंट डेवलपर टीम लीडर द्वारा आवंटित कार्य के संपादन के लिए उत्तरदायी होता हैं। कोचिंग क्षेत्र में किए जाने वाले प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:

  • स्टडी मटेरियल तैयार करना और समय-समय पर अपडेट करना।
  • डेली न्यूज़, MCQ एवं अन्य अभ्यास पत्रक तैयार करना।
  • टेस्ट सीरीज तैयार करना और उनके मॉडल उत्तर तैयार करना। आदि

कंटेंट डेवलपर के कैरियर का भावी संभावना क्या हैं?

खुद कोचिंग का जीवनकाल बहुत छोटा होता है। इसलिए कोचिंग के बंद होने पर कंटेंट डेवलपर का कैरियर भी जोखिम में आ जाता है। इसलिए लॉन्ग टर्म के लिए इसकी सलाह नहीं दी जा सकती। हालांकि कंटेंट डेवलपर आगे फैकल्टी के रूप में पढाना शुरू कर सकता हैं, तब कैरियर को स्थायी बनाने के लिए अधिक विकल्प प्राप्त हो जाते हैं।

किसी अभ्यर्थी को कब ज्वाइन करना चाहिए?

जब कोई अभ्यर्थी कम मार्क्स से रह जाता है और फिर से कोशिस करना चाहता हैं। अगर उसे वित्तीय दबाव महसूस हो रहा है, तब वह ज्वाइन कर सकता हैं। ऐसी स्थिति में ज्वाइन करने से वह पढाई से जुड़ा रहेगा और वित्तीय सहायता भी प्राप्त होगी। जो अभ्यर्थी कम मार्क्स से रहते हैं, और अगले अटेम्पट में भी काफी टाइम होता हैं, तब रूम पर खाली रहने के बजाय ज्वाइन कर लेना चाहिए। इससे न केवल वित्तीय आवश्यकता पूर्ण होती है, बल्कि जॉब का अनुभव भी हो जाता है।

हालाँकि मैं फ्रेशर को ज्वाइन नहीं करने की सलाह दूंगा, क्योंकि उन्हें अभी अपने अटेम्पट देने चाहिए। एक बार पैसे के लालच में फंस गये तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा। जॉब करते वक्त इतना टाइम भी नहीं मिलता की ज्यादा पढाई कर सके।

निष्कर्ष 

कंटेंट डेवलपर पार्ट टाइम जॉब के लिए एक बेहतरीन विकल्प हैं। कुछ अच्छे संस्थानों में यह बेहतरीन करियर विकल्प प्रदान करता हैं। अभ्यर्थियों की डिमांड इस क्षेत्र में जॉब पाने के लिए बढ़ रही हैं, इसका फायदा फ्रीलांसर मोड़ में काम करवाने वाले उठा रहे हैं। इसलिए गैर-संगठित क्षेत्र के ऐसे अभिकर्ताओं को कानून के दायरे में लाने की आवश्यकता हैं। साथ हो कंटेंट डेवलपर को भी संगठित होकर इंडस्ट्री से बात करनी चाहिए। 

अवैध बजरी खनन पर रोक के प्रयास, उनकी सीमाएं और समाधान

राजस्थान ऐसा पहला राज्य नहीं है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने बजरी खनन पर रोक लगाई हो। लेकिन दुसरे राज्यों में 2 साल के बाद ही पर्यावरणीय अनुमति के साथ इसे हटा दिया गया था, उदाहरण के लिए उत्तराखंड। लेकिन राजस्थान में राज्य सरकार की लापरवाही को इस स्थिति के लिए उत्तरदायी माना जा रहा है। अगर नियमानुसार खनन होता तो ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती। इसने समय पर रिप्लेसमेंट स्टडी रिपोर्ट पेश नहीं की। साथ ही राज्य सरकार, अवैध खनन पर भी कोई विश्वसनीय रोक नहीं लगा पाई है। अवैध खनन पर रोक नहीं होने के कारण माफिया बेलगाम हो गये हैं। माफियाओं द्वारा निर्मित जोखिमग्रस्त परिस्थितियों को पिछले आलेख में वर्णित किया गया हैं। अवैध वसूली में शामिल रहे उत्तरदायी सरकारी कर्मियों ने स्थिति को ऐसी जगह पहुंचा दिया हैं कि अब समस्या नासूर बन गई हैं। 

इससे पूर्व के 2 आलेख में हम अवैध बजरी खनन की समस्या के कारण एवं प्रभावों के बारे में विभिन्न आयामों की जानकारी दे चुके हैं। जबकि इस आलेख में हमारा ध्यान सीधे इस समस्या से पार पाने के लिए राज्य सरकार द्वारा किए गये प्रयासों एवं उनकी सीमओं का अध्ययन करने पर हैं।

1. अवैध खनन से जुडी विसंगतियों पर सरकार की प्रतिक्रिया और उनकी नियति

अवैध खनन से न तो राजस्व प्राप्त हो रहा है, और न ही पर्यावरण का निम्नीकरण रुक रहा है। इसलिए अवैध खनन से जुडी विसंगतियों को रोकने एवं समाप्त करने के लिए सरकार ने कई प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं, जो कि इस प्रकार हैं :

1.1. अवैध खनन पर रोक

अवैध खनन से जुडी विसंगतियों को रोकने के लिए सबसे पहले तो अवैध खनन पर रोक लगायी जानी चाहिए। इसके लिए जिला स्तर पर डीएम को जवाबदेह बनाया गया है। फिर भी इसके लिए प्रशासन द्वारा किये जाने वाले प्रयास नाकाफी हो रहे हैं। इसके बावजूद भी अवैध खनन, परिवहन एवं भंडारण पर रोक नहीं लग पायी हैं।

1.2. बजरी के वैध खनन को शुरू करवाने का प्रयास

राजस्थान सरकार ने खनन शुरू करवाने के लिए कई प्रयास किए हैं, इसके लिए किए गए विभिन्न उपाय इस प्रकार है :

  • फिर से नीलामी की तैयारी : राजस्थान सरकार ने 2018 में पुरानी नीलामी की खानों पर पर्यावरणीय अनुमति के अभाव में रोक लगा दी थी। ऐसे में सरकार ने फिर से नीलामी की तैयारी शुरू की थी। इस बार सरकार ने नीलामी के लिए 800 छोटे प्लाट राज्य भर में आवंटन के लिए चयनित किए। इनको लेकर आशा व्यक्त की जा रही थी कि इनका आकार छोटा होने के कारण पर्यावरण अनुमति में भी दिक्कत नहीं आएगी। ऐसे में नीलामी के बाद राज्य में बजरी खनन चालू हो सकेगा। लेकिन पुरानी नीलामी के मंशा पत्र धारकों द्वारा न्यायालय में चले जाने के कारण यह योजना अटक गई। [1]
  • निजी खातेदारी भूमि से खनन की अनुमति : सरकारी जमीन पर बजरी खनन पर रोक के बाद एक हेक्टेयर तक की निजी खातेदारी भूमि से खनन के लिए खान विभाग ने आवेदन आमंत्रित किये थे। परंतु इनमें से अधिकतर आवेदनों पर पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त नहीं हो सकी। जहाँ कही अनुमति प्राप्त हुई, वहां खातेदारी भूमि की आड़ में नदी से खनन आरंभ हो गया। लोग नदी से बजरी भरकर लाते और खातेदारी भूमि के पास से रवन्ना लेकर आराम से परिवहन कर रहे थे। (अधिक विस्तृत 2.2 में)

1.3. बजरी पर रोक से विकास कार्य प्रभावित नही हो, इसलिए वर्क परमिट का प्रावधान 

सरकारी अवसंरचना विकास एवं निर्माण कार्यों में प्रयुक्त होने वाली बजरी के खनन एवं परिवहन के लिए वर्क परमिट जारी किए जाते हैं। ताकि बजरी खनन पर रोक की वजह से विकास कार्य अवरुद्ध नहीं हो। लेकिन वर्क परमिट समस्या के समाधान के बजाय अपने आप में ही अवैध खनन का एक और जरिया बन गया।

1.4. बजरी के विकल्प के रूप में एम-सैंड को प्रोत्साहन

  • एम सैंड को बजरी के विकल्प के तौर पर देखा गया। बजरी खनन पर रोक के बाद राज्य में एम सैंड के संयंत्र लगना शुरू हो गये हैं। एम सैंड उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए राज्य में राजस्थान प्रधान खनिज रियायत नियम 2017 में संशोधन प्रस्तावित है। राजस्थान निवेश प्रोत्साहन नीति 2019 में एम सैंड मैन्युफैक्चरिंग पर दी जाने वाली सहायता का विवरण है।
  • एम सैंड नीति की घोषणा [2]
  • कुछ जगह पर पत्थरों को पीसकर एम-सैंड तैयार की गई, लेकिन यह बजरी मकानों के कार्यों में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाई।